शिव शंकर स्तुति

Verse 1
अतिभीषण कटुभाषण यमकिङ्करपटली-
कृतताडनपरिपीडनमरणागमसमये।
उमया सह मम चेतसि यमशासन निवसन्
शिवशङ्कर शिव शङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १ ।।
यह प्रथम श्लोक मृत्यु के उस अत्यंत भयावह क्षण का वर्णन करता है जिससे प्रत्येक जीव भयभीत रहता है। इसका शाब्दिक अर्थ मृत्यु के समय आने वाले यमदूतों के डरावने स्वरूप और उनकी कठोर वाणी की ओर संकेत करता है जो जीव को प्रताड़ित करते हैं। भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करता है कि जब वह समय आए तब शिव अपनी शक्ति माता उमा के साथ उसके मन में निवास करें। शिव को यहाँ यमशासन कहा गया है जिसका अर्थ है वह जो स्वयं मृत्यु के देवता यमराज को भी नियंत्रित करता है। यह विशेषण भक्त को निर्भयता प्रदान करता है क्योंकि यमराज के स्वामी की उपस्थिति में यमदूतों का भय समाप्त हो जाता है।
पौराणिक दृष्टि से यह श्लोक कालंतक शिव की महिमा का गान करता है जिन्होंने मार्कण्डेय ऋषि को यमराज के पाश से मुक्त कराया था। आध्यात्मिक स्तर पर यह श्लोक इस बात पर बल देता है कि सांसारिक बंधन अंततः कष्टदायी होते हैं और केवल शिव की स्मृति ही उस अंतिम संक्रमण में शांति प्रदान कर सकती है। उमा और शिव का एक साथ स्मरण करना प्रकृति और पुरुष के संतुलन का प्रतीक है। यह प्रार्थना शिव से उसके संचित पापों को नष्ट करने की याचना करती है ताकि जीव इस जन्म-मृत्यु के चक्र से ऊपर उठ सके। जब सर्वोच्च चेतना हृदय में स्थित होती है तो मृत्यु का भय भी विलीन हो जाता है।

Verse 2
असदिन्द्रियविषयोदयसुखसात्कृतसुकृतेः
परदूषणपरिमोक्षण कृतपातकविकृतेः ।
शमनानन भवकानननिरतेर्भव शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। २ ।।
इस श्लोक में जीव की उस मानसिक अवस्था का वर्णन है जो निरंतर बाहरी विषयों में सुख खोजती है। इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि इंद्रियों के असत्य और क्षणिक विषयों में आनंद ढूंढने के कारण हमारे द्वारा किए गए अच्छे कार्यों का पुण्य धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है। दूसरों की निंदा करने और व्यर्थ के वाद-विवाद में पड़ने से जो पाप उत्पन्न होते हैं वे आत्मा को मलिन कर देते हैं। भक्त इस संसार को एक घने जंगल के रूप में देखता है जहाँ वह भटक गया है और उसे चारों ओर केवल मृत्यु का मुख ही दिखाई दे रहा है। वह शिव से प्रार्थना करता है कि वे इस विकट स्थिति में उसके रक्षक बनें।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक भारतीय दर्शन के असत् और सत् के सिद्धांत को स्पष्ट करता है। इंद्रियाँ सदैव अनित्य वस्तुओं की ओर आकर्षित होती हैं जिससे जीव का आध्यात्मिक पतन होता है। संसार को कानन यानी वन कहना यह दर्शाता है कि वासनाओं का जाल कितना गहरा और उलझाने वाला है। शिव को शमन यानी मृत्यु के देवता से रक्षा करने वाला बताया गया है। यहाँ शरणागति का भाव प्रधान है जहाँ भक्त अपनी असमर्थता स्वीकार करता है। पापों को हरने की विनती केवल दुखों से मुक्ति के लिए नहीं है बल्कि चित्त की उस शुद्धि के लिए है जिससे ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो सके।

Verse 3
विषयाभिध बडिशायुध पिशितायुतसुखतः
मकरायितमतिसन्ततिकृतसाहसविपदम् ।
परमालय परिपालय परिशापितमनिशं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ३ ।।
तीसरे श्लोक में संसार की माया को समझाने के लिए एक बहुत ही सुंदर रूपक का प्रयोग किया गया है। शाब्दिक रूप से विषयों यानी सांसारिक भोगों की तुलना एक ऐसे मछली पकड़ने वाले कांटे से की गई है जिस पर मांस का टुकड़ा लगा हो। मनुष्य की बुद्धि उस मछली के समान है जो उस छोटे से टुकड़े के लालच में कांटे को निगल लेती है और स्वयं को संकट में डाल लेती है। मकर यानी मगरमच्छ के समान खतरनाक इस संसार सागर में बुद्धि निरंतर दुस्साहसपूर्ण गलतियाँ करती रहती है जिससे जीवन एक अभिशाप जैसा बन जाता है। भक्त शिव को परमालय कहते हुए पुकारता है जिसका अर्थ है वह परम निवास जहाँ जाने के बाद कोई दुख नहीं रहता।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह श्लोक विवेक की कमी को दुखों का मूल कारण मानता है। जैसे मछली यह नहीं जानती कि वह भोजन नहीं बल्कि मृत्यु को चुन रही है वैसे ही अज्ञानी मनुष्य क्षणिक सुख को ही जीवन का लक्ष्य मान लेता है। शिव यहाँ रक्षक और मार्गदर्शक के रूप में सामने आते हैं। परमालय विशेषण यह बताता है कि यह संसार अस्थायी और अशांत है जबकि शिव का धाम ही वास्तविक घर है। यह प्रार्थना जीव को उसकी आंतरिक जड़ता और मूर्खतापूर्ण कार्यों से मुक्त करने के लिए की गई है ताकि वह संसार के आकर्षणों में न फंसकर ईश्वरीय सत्य को पहचान सके।

Verse 4
दयिता मम दुहिता मम जननी मम जनकः
मम कल्पितमतिसन्ततिमरुभूमिषु निरतम् ।
गिरिजासुख जनितासुख वसतिं कुरु सुखिनं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ४ ।।
यह श्लोक मानवीय संबंधों और उनके प्रति हमारी अत्यधिक आसक्ति की समीक्षा करता है। इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि पत्नी पुत्री माता और पिता जैसे संबंधों को अपना मानकर उनके मोह में पड़े रहना एक मरुभूमि यानी रेगिस्तान में भटकने जैसा है। हमारा मन निरंतर इन कल्पित संबंधों के ताने-बाने बुनता रहता है जिससे जीवन में शुष्कता और अशांति बनी रहती है। भक्त शिव से प्रार्थना करता है जो गिरिजा यानी पार्वती को सुख देने वाले हैं कि वे उसके हृदय में निवास करें और इस नीरस जीवन को आनंदमय बना दें। शिव की उपस्थिति ही इस मरुस्थल को नंदनवन में बदल सकती है।
पौराणिक रूप से शिव और पार्वती का दांपत्य जीवन आदर्श माना जाता है जो त्याग और तपस्या पर आधारित है। यहाँ भक्त अपने मोह को त्यागने की इच्छा प्रकट करता है क्योंकि यह ममता ही उसे बंधन में रखती है। मरुभूमि का प्रतीक यह दर्शाता है कि भौतिक संबंधों से कभी भी पूर्ण संतुष्टि नहीं मिल सकती क्योंकि वे जलविहीन मरुस्थल की तरह प्यास बढ़ाते ही रहते हैं। शिव को सुख का दाता मानकर भक्त अपने अंतःकरण को एक मंदिर बनाने की मांग करता है। जब भगवान स्वयं हृदय में बसते हैं तो सांसारिक संबंधों का बोझ हल्का हो जाता है और व्यक्ति सभी में ईश्वर को देखने लगता है।

Verse 5
जनिनाशन मृतिमोचन शिवपूजननिरतेः
अभितो दृशमिदमीदृशमहमाहव इति हा ।
गजकच्छपजनितश्रम विमलीकुरु सुमतिं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ५ ।।
पाँचवें श्लोक में जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति की तीव्र आकांक्षा प्रकट की गई है। शाब्दिक अर्थ में शिव को जन्म का नाश करने वाला और मृत्यु के भय से मुक्त करने वाला बताया गया है। भक्त अपने भीतर चल रहे विचारों के निरंतर युद्ध का वर्णन करता है जिससे वह थक चुका है। यहाँ गज यानी हाथी और कच्छप यानी कछुए के बीच हुए उस पौराणिक युद्ध का संदर्भ दिया गया है जिसमें दोनों ही लड़ते-लड़ते थक गए थे। भक्त प्रार्थना करता है कि शिव उसकी बुद्धि को स्वच्छ और विमल कर दें ताकि वह इस व्यर्थ के संघर्ष और मानसिक भ्रम से बाहर निकल सके।
पौराणिक कथा के अनुसार हाथी और कछुए का युद्ध अहंकार और क्रोध का प्रतीक है जो कई जन्मों तक चलता रहा। आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक उस मानसिक द्वंद्व को दर्शाता है जो हमें स्थिर नहीं होने देता। शिव को जनिनाशन इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे मोक्ष के देवता हैं और पुनर्जन्म के कारण यानी कर्म को जड़ से काट देते हैं। सुमति या शुद्ध बुद्धि की याचना का अर्थ है कि जब विवेक जागृत होता है तभी व्यक्ति माया के इस युद्ध को समाप्त कर सकता है। शिव की आराधना ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य अपनी बुद्धि को विकारों से मुक्त कर परम शांति की ओर अग्रसर हो सकता है।

Verse 6
त्वयि तिष्ठति सकलस्थितिकरुणात्मनि हृदये
वसुमार्गणकृपणेक्षण मनसा शिव विमुखम् ।
अकृताह्निकमसुपोषकमवताद्गिरिसुतया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ६ ।।
यह श्लोक मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना को उजागर करता है कि ईश्वर हमारे भीतर है फिर भी हम उसे बाहर ढूंढते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि शिव जो करुणा के अवतार हैं और संपूर्ण सृष्टि का आधार हैं वे स्वयं हमारे हृदय में विराजमान हैं। इसके बावजूद मनुष्य धन और बाहरी सुखों की तलाश में एक भिखारी की तरह दयनीय दृष्टि लेकर भटकता रहता है। भक्त स्वीकार करता है कि वह शिव से विमुख होकर केवल अपने शरीर के पोषण में लगा हुआ है और उसने अपने आध्यात्मिक कर्तव्यों को भुला दिया है। वह शिव और पार्वती से अपनी रक्षा की गुहार लगाता है।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक वेदांत के इस सत्य को पुष्ट करता है कि आत्मा ही परमात्मा है। वसुमार्गण यानी धन की खोज यह बताती है कि अज्ञानता के कारण हम अपनी आंतरिक संपदा को नहीं देख पाते। असुरपोषक शब्द उन लोगों के लिए है जो केवल खाने-पीने और सोने में ही अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। शिव और गिरिजासुता यानी पार्वती से रक्षा की प्रार्थना यह दर्शाती है कि केवल ईश्वरीय अनुकंपा ही हमें इस सांसारिक जड़ता से बाहर निकाल सकती है। यह श्लोक आत्म-निरीक्षण का आह्वान करता है ताकि मनुष्य अपने भीतर छिपे हुए असीम शांति के भंडार को पहचान सके और बाह्य दिखावे का त्याग करे।

Verse 7
पितराविति सुखदाविति शिष्णुनाकृत हृदयौ
शिवया सह भयके हृदि जनितं तव सुकृतम् ।
इति मे व हृदयं भव भवतात्तव दयया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ७ ।।
सातवें श्लोक में सांसारिक आश्रय की तुलना में दैवीय आश्रय की श्रेष्ठता बताई गई है। शाब्दिक अर्थ यह है कि हम अपने भौतिक माता-पिता को ही सुख का एकमात्र स्रोत मानते हैं परंतु वे भी अंततः नश्वर हैं। भक्त कहता है कि भय के समय में जब कोई काम नहीं आता तब शिव और शिवा यानी पार्वती की उपस्थिति ही हृदय में वास्तविक पुण्य और साहस पैदा करती है। वह चाहता है कि उसका हृदय पूरी तरह शिव का हो जाए और शिव अपनी दया से उसे अपने चरणों में स्थान दें। यह प्रार्थना हृदय के पूर्ण रूपांतरण की माँग करती है।
भारतीय संस्कृति में शिव और पार्वती को जगत के माता-पिता माना गया है। भौतिक माता-पिता हमें यह शरीर देते हैं लेकिन आध्यात्मिक जन्म और मुक्ति के मार्ग का द्वार दिव्य माता-पिता ही खोलते हैं। भयके यानी भय के समय ईश्वर का स्मरण करना मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है पर यहाँ भक्त निरंतर उनके वास की कामना करता है। सुकृतम् का अर्थ है वह संचित पुण्य जो ईश्वर की निकटता से प्राप्त होता है। शिव की दया ही वह सेतु है जो जीव को उसके दोषों के बावजूद परमात्मा से जोड़ देती है। यह श्लोक भक्त को अपनी छोटी पहचान छोड़कर विराट चेतना के साथ एक होने के लिए प्रेरित करता है।

Verse 8
शरणागत भरणाश्रित करुणामृतजलधे
शरणं तव चरणौ शिव मम संसृतिवसतेः ।
परिचिन्मय करुणामय भिषजेन चिरावतात्
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ८ ।।
इस श्लोक में शिव को एक ऐसे महान चिकित्सक के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो जन्म-मरण के रोग को मिटा सकते हैं। शाब्दिक रूप से शिव को करुणा के अमृत का सागर कहा गया है जो अपनी शरण में आए लोगों का पोषण करते हैं। संसार को यहाँ एक संसृति-वसति यानी अस्थायी निवास कहा गया है जहाँ जीव केवल कुछ समय के लिए रहता है। भक्त शिव के चरणों को ही अपना एकमात्र स्थायी आश्रय मानता है। वह शिव को परिचिन्मय यानी शुद्ध चेतना का स्वरूप और सबसे बड़ा वैद्य मानकर अपने आध्यात्मिक कल्याण की प्रार्थना करता है।
शिव को वेदों में भी भिषक् यानी वैद्य कहा गया है जो समस्त मानसिक और शारीरिक कष्टों को दूर करने में सक्षम हैं। संसार को अस्थायी घर कहना यह याद दिलाता है कि हमारा वास्तविक गंतव्य कहीं और है। परिचिन्मय विशेषण यह दर्शाता है कि शिव केवल एक आकृति नहीं बल्कि वह ज्ञान स्वरूप चेतना हैं जो सर्वत्र व्याप्त है। यह शरणागति का भाव भक्त के अहंकार को समाप्त करता है। जब मनुष्य पूरी तरह समर्पित हो जाता है तो शिव की करुणा उसे जन्मों-जन्मों के पापों से मुक्त कर देती है। यह श्लोक विश्वास दिलाता है कि शिव की शरण में आने वाला कभी भी रिक्त हाथ नहीं लौटता।

Verse 9
विविधाधिभिरतिभीतरकृताधिकसुकृतं
शतकोटिषु नरकादिषु हतपातकविवशम् ।
मृड मामव सुसुकृतीभव शिवया सह कृपया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ९ ।।
नौवाँ श्लोक कर्मों के दंड और नरक के भय से मुक्ति की मार्मिक प्रार्थना है। इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि भक्त विभिन्न प्रकार की मानसिक व्याधियों और कष्टों से अत्यंत डरा हुआ है क्योंकि उसके पास सत्कर्मों का अभाव है। वह उन करोड़ों नरकों की कल्पना से कांप उठता है जो पापों के कारण भोगने पड़ सकते हैं। वह शिव को मृड कहते हुए पुकारता है जिसका अर्थ है वह जो दुख दूर कर आनंद देता है। वह विनती करता है कि शिव और पार्वती मिलकर उसे एक पवित्र व्यक्ति बना दें और उसके जीवन से सभी पापों का अंत कर दें।
पौराणिक रूप से नरक का वर्णन जीव को गलत कर्मों से रोकने के लिए किया गया है। आध्यात्मिक स्तर पर व्याधियाँ हमारे मन के वे विकार हैं जो हमें चैन से नहीं रहने देते। शिव को मृड कहकर संबोधित करना उनकी दयालुता को रेखांकित करता है क्योंकि वे अत्यंत शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। भक्त जानता है कि वह अपने प्रयासों से पाप मुक्त नहीं हो सकता इसलिए वह पूरी तरह ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। सुसुकृतीभव का अर्थ है एक ऐसा व्यक्ति बनना जिसके विचार और कर्म पवित्र हों। यह प्रार्थना केवल दंड से बचने के लिए नहीं बल्कि आत्मा के वास्तविक उत्थान और शुद्धिकरण के लिए की गई है।

Verse 10
कलिनाशन गरलाशन कमलासनविनुत
कमलापतिनयनार्चित करुणाकृतिचरण ।
करुणाकर मुनिसेवित भवसागरहरण
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १० ।।
यह श्लोक शिव की महानता को उनके विभिन्न अवतारों और कार्यों के माध्यम से दर्शाता है। शाब्दिक रूप से उन्हें कलियुग के दोषों का नाश करने वाला और विष का पान करने वाला कहा गया है। उनकी स्तुति कमलासन यानी ब्रह्मा करते हैं और कमलापति यानी विष्णु अपने नेत्रों से उनकी पूजा करते हैं। वे करुणा की साक्षात मूर्ति हैं और ऋषियों द्वारा उनकी सेवा की जाती है। वे उस शक्ति के स्वामी हैं जो भक्त को संसार रूपी सागर से पार ले जाती है। शिव की महिमा यहाँ सर्वोच्च शिखर पर दिखाई देती है।
पौराणिक संदर्भ में गरलाशन का अर्थ है हलाहल विष पीने वाले नीलकंठ जिन्होंने पूरी सृष्टि को विनाश से बचाया था। विष्णु द्वारा नेत्रों से पूजा करने का उल्लेख उस कथा से है जहाँ विष्णु ने शिव को चढ़ाने के लिए कमल कम पड़ने पर अपना नेत्र ही अर्पित कर दिया था। यह कथा ईश्वर के प्रति सर्वोच्च समर्पण का प्रतीक है। मुनिसेवित शब्द यह बताता है कि ज्ञान के साधक भी शिव को ही अपना गुरु मानते हैं। भवसागरहरण विशेषण यह स्पष्ट करता है कि शिव केवल व्यक्तिगत कष्टों को ही नहीं बल्कि संसार के मूल बंधन को ही काट देते हैं। यह श्लोक शिव को ब्रह्मांड के रक्षक और मुक्तिदाता के रूप में स्थापित करता है।

Verse 11
विजितेन्द्रिय विबुधार्चित विमलाम्बुजचरण
भवनाशन भयनाशन भजिताङ्कितहृदय ।
फणिभूषण मुनिवेषण मदनान्तक शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ११ ।।
ग्यारहवें श्लोक में शिव को एक आदर्श योगी और इंद्रियों के स्वामी के रूप में चित्रित किया गया है। शाब्दिक रूप से वे विजितेन्द्रिय हैं जिन्होंने अपनी सभी इंद्रियों को जीत लिया है। उनके चरण कमल के समान अत्यंत पवित्र हैं और वे देवताओं द्वारा पूजित हैं। वे संसार के मोह और मृत्यु के भय को नष्ट करने वाले हैं। उनके शरीर पर सर्प सुशोभित हैं वे मुनियों जैसा वेश धारण करते हैं और उन्होंने कामदेव का विनाश किया है। भक्त ऐसे शक्तिशाली और शांत देव की शरण में जाने की इच्छा व्यक्त करता है।
मदनान्तक विशेषण कामदेव को भस्म करने की घटना की ओर संकेत करता है जो वासना पर विजय का प्रतीक है। फणिभूषण यानी सर्पों को गले में डालना यह दर्शाता है कि शिव ने मृत्यु और समय को वश में कर लिया है। उनका मुनि वेश त्याग और वैराग्य का सर्वोच्च उदाहरण है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक यह संदेश देता है कि जो स्वयं विकारों से मुक्त है वही दूसरों को मुक्त कर सकता है। शिव के चरण कमलों की वंदना करने से भक्त के हृदय में भी वही शांति और पवित्रता आने लगती है। यह प्रार्थना शिव से उस शक्ति को पाने की है जिससे जीव अपने आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सके और ईश्वर से जुड़ सके।

Verse 12
त्रिपुरान्तक त्रिदशेश्वर त्रिगुणात्मक शम्भो
वृषवाहन विषदूषण पतितोद्धर शरणम् ।
कनकासन कलिनाशन कनकाम्बर शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १२ ।।
अंतिम श्लोक शिव के विराट और कल्याणकारी स्वरूप का उपसंहार करता है। शाब्दिक रूप से उन्हें त्रिपुरासुर का अंत करने वाला देवताओं का स्वामी और तीनों गुणों यानी सत्व रज और तम का आधार माना गया है। वे नंदी की सवारी करते हैं विष के घातक प्रभाव को समाप्त करते हैं और गिरे हुए लोगों का उद्धार करने वाले हैं। वे स्वर्ण के समान चमकते हुए सिंहासन पर बैठते हैं और सुनहरे वस्त्र धारण करते हैं। भक्त बार-बार शिव की शरण में जाने की बात कहता है ताकि उसके जीवन के सभी अंधकार दूर हो सकें।
त्रिपुरान्तक शब्द का गहरा दार्शनिक अर्थ है अहंकार की तीन अवस्थाओं स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर का विनाश करना। त्रिगुणात्मक होने का अर्थ है कि वे संपूर्ण प्रकृति के नियंता हैं फिर भी उससे परे हैं। वृषवाहन नंदी धर्म का प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि शिव का शासन धर्म पर आधारित है। पतितोद्धर विशेषण प्रत्येक जीव को यह आश्वासन देता है कि शिव की दया की कोई सीमा नहीं है और वे सबसे बड़े पापी को भी अपना सकते हैं। कनकासन और कनकाम्बर उनकी दिव्य कांति और ऐश्वर्य को प्रदर्शित करते हैं। यह स्तोत्र एक महान शांति और विश्वास के साथ समाप्त होता है कि शिव ही समस्त पापों के हर्ता और मोक्ष के एकमात्र दाता हैं।

अतिभीषण कटुभाषण यमकिङ्करपटली-
कृतताडनपरिपीडनमरणागमसमये।
उमया सह मम चेतसि यमशासन निवसन्
शिवशङ्कर शिव शङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १ ।।

असदिन्द्रियविषयोदयसुखसात्कृतसुकृतेः
परदूषणपरिमोक्षण कृतपातकविकृतेः ।
शमनानन भवकानननिरतेर्भव शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। २ ।।

विषयाभिध बडिशायुध पिशितायुतसुखतः
मकरायितमतिसन्ततिकृतसाहसविपदम् ।
परमालय परिपालय परिशापितमनिशं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ३ ।।

दयिता मम दुहिता मम जननी मम जनकः
मम कल्पितमतिसन्ततिमरुभूमिषु निरतम् ।
गिरिजासुख जनितासुख वसतिं कुरु सुखिनं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ४ ।।

जनिनाशन मृतिमोचन शिवपूजननिरतेः
अभितो दृशमिदमीदृशमहमाहव इति हा ।
गजकच्छपजनितश्रम विमलीकुरु सुमतिं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ५ ।।

त्वयि तिष्ठति सकलस्थितिकरुणात्मनि हृदये
वसुमार्गणकृपणेक्षण मनसा शिव विमुखम् ।
अकृताह्निकमसुपोषकमवताद्गिरिसुतया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ६ ।।

पितराविति सुखदाविति शिष्णुनाकृत हृदयौ
शिवया सह भयके हृदि जनितं तव सुकृतम् ।
इति मे व हृदयं भव भवतात्तव दयया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ७ ।।

शरणागत भरणाश्रित करुणामृतजलधे
शरणं तव चरणौ शिव मम संसृतिवसतेः ।
परिचिन्मय करुणामय भिषजेन चिरावतात्
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ८ ।।

विविधाधिभिरतिभीतरकृताधिकसुकृतं
शतकोटिषु नरकादिषु हतपातकविवशम् ।
मृड मामव सुकृतीभव शिवया सह कृपया
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ९ ।।

कलिनाशन गरलाशन कमलासनविनुत
कमलापतिनयनार्चित करुणाकृतिचरण ।
करुणाकर मुनिसेवित भवसागरहरण
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १० ।।

विजितेन्द्रिय विबुधार्चित विमलाम्बुजचरण
भवनाशन भयनाशन भजिताङ्कितहृदय ।
फणिभूषण मुनिवेषण मदनान्तक शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। ११ ।।

त्रिपुरान्तक त्रिदशेश्वर त्रिगुणात्मक शम्भो
वृषवाहन विषदूषण पतितोद्धर शरणम् ।
कनकासन कलिनाशन कनकाम्बर शरणं
शिवशङ्कर शिवशङ्कर हर मे हर दुरितम् ।। १२ ।।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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