सुंदरेश्वर स्तोत्र

श्रीपाण्ड्यवंशमहितं शिवराजराजं
भक्तैकचित्तरजनं करुणाप्रपूर्णम्।
मीनेङ्गिताक्षिसहितं शिवसुन्दरेशं
हालास्यनाथममरं शरणं प्रपद्ये।
आह्लाददानविभवं भवभूतियुक्तं
त्रैलोक्यकर्मविहितं विहितार्थदानम्।
मीनेङ्गिताक्षिसहितं शिवसुन्दरेशं
हालास्यनाथममरं शरणं प्रपद्ये।
अम्भोजसम्भवगुरुं विभवं च शंभुं
भूतेशखण्डपरशुं वरदं स्वयंभुम्।
मीनेङ्गिताक्षिसहितं शिवसुन्दरेशं
हालास्यनाथममरं शरणं प्रपद्ये।
कृत्याजसर्पशमनं निखिलार्च्यलिङ्गं
धर्मावबोधनपरं सुरमव्ययाङ्गम्।
मीनेङ्गिताक्षिसहितं शिवसुन्दरेशं
हालास्यनाथममरं शरणं प्रपद्ये।
सारङ्गधारणकरं विषयातिगूढं
देवेन्द्रवन्द्यमजरं वृषभाधिरूढम्।
मीनेङ्गिताक्षिसहितं शिवसुन्दरेशं
हालास्यनाथममरं शरणं प्रपद्ये।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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