उमापति स्तोत्र

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उमापति स्तोत्र

Lyrics:

ब्रह्मोवाच । अथ वृत्ते विवाहे तु भवस्यामिततेजसः ।

प्रहर्षमतुलं गत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।

तुष्टुवुर्वाग्भिराद्याभिः प्रणेमुस्ते महेश्वरम् ॥


देवा ऊचुः । नमः पर्वतलिङ्गाय पर्वतेशाय वै नमः ।

नमः पवनवेगाय विरूपायाजिताय च ।

नमः क्लेशविनाशाय दात्रे च शुभसम्पदाम् ॥


नमो नीलशिखण्डाय अम्बिकापतये नमः ।

नमः पवनरूपाय शतरूपाय वै नमः ॥


नमो भैरवरूपाय विरूपनयनाय च ।

नमः सहस्रनेत्राय सहस्रचरणाय च ॥


नमो देववयस्याय वेदाङ्गाय नमो नमः ।

विष्टम्भनाय शक्रस्य बाह्वोर्वेदाङ्कुराय च ॥


चराचराधिपतये शमनाय नमो नमः ।

सलिलाशयलिङ्गाय युगान्ताय नमो नमः ॥


नमः कपालमालाय कपालसूत्रधारिणे ।

नमः कपालहस्ताय दण्डिने गदिने नमः ॥


नमस्त्रैलोक्यनाथाय पशुलोकरताय च ।

नमः खट्वाङ्गहस्ताय प्रमथार्तिहराय च ॥


नमो यज्ञशिरोहन्त्रे कृष्णकेशापहारिणे ।

भगनेत्रनिपाताय पूष्णो दन्तहराय च ॥


नमः पिनाकशूलासिखड्गमुद्गरधारिणे ।

नमोऽस्तु कालकालाय तृतीयनयनाय च ॥


अन्तकान्तकृते चैव नमः पर्वतवासिने ।

सुवर्णरेतसे चैव नमः कुण्डलधारिणे ॥


दैत्यानां योगनाशाय योगिनां गुरवे नमः ।

शशाङ्कादित्यनेत्राय ललाटनयनाय च ॥


नमः श्मशानरतये श्मशानवरदाय च ।

नमो दैवतनाथाय त्र्यम्बकाय नमो नमः ॥


गृहस्थसाधवे नित्यं जटिले ब्रह्मचारिणे ।

नमो मुण्डार्धमुण्डाय पशूनां पतये नमः ॥


सलिले तप्यमानाय योगैश्वर्यप्रदाय च ।

नमः शान्ताय दान्ताय प्रलयोत्पत्तिकारिणे ॥


नमोऽनुग्रहकर्त्रे च स्थितिकर्त्रे नमो नमः ।

नमो रुद्राय वसव आदित्यायाश्विने नमः ॥


नमः पित्रेऽथ सांख्याय विश्वेदेवाय वै नमः ।

नमः शर्वाय उग्राय शिवाय वरदाय च ॥


नमो भीमाय सेनान्ये पशूनां पतये नमः ।

शुचये वैरिहानाय सद्योजाताय वै नमः ॥


महादेवाय चित्राय विचित्राय च वै नमः ।

प्रधानायाप्रमेयाय कार्याय कारणाय च ॥


पुरुषाय नमस्तेऽस्तु पुरुषेच्छाकराय च ।

नमः पुरुषसंयोगप्रधानगुणकारिणे ॥


प्रवर्तकाय प्रकृतेः पुरुषस्य च सर्वशः ।

कृताकृतस्य सत्कर्त्रे फलसंयोगदाय च ॥


कालज्ञाय च सर्वेषां नमो नियमकारिणे ।

नमो वैषम्यकर्त्रे च गुणानां वृत्तिदाय च ॥


नमस्ते देवदेवेश नमस्ते भूतभावन ।

शिव सौम्यमुखो द्रष्टुं भव सौम्यो हि नः प्रभो ॥


ब्रह्मोवाच । एवं स भगवान् देवो जगत्पतिरुमापतिः ।

स्तूयमानः सुरैः सर्वैरमरानिदमब्रवीत् ॥


श्रीशङ्कर उवाच ।

द्रष्टुं सुखश्च सौम्यश्च देवानामस्मि भोः सुराः ।

वरं वरयत क्षिप्रं दातास्मि तमसंशयम् ॥


ब्रह्मोवाच ।

ततस्ते प्रणताः सर्वे सुरा ऊचुस्त्रिलोचनम् ॥


देवा ऊचुः ।

तवैव भगवन् हस्ते वर एषोऽवतिष्ठताम् ।

यदा कार्यं तदा नस्त्वं दास्यसे वरमीप्सितम् ॥


ब्रह्मोवाच ।

एवमस्त्विति तान् उक्त्वा विसृज्य च सुरान् हरः ।

लोकांश्च प्रमथैः सार्धं विवेश भवनं स्वकम् ॥


यस्तु हरोत्सवमद्भुतमेनम् ।

गायति दैवतविप्रसमक्षम् ।

सोऽप्रतिरूपगणेशसमानो ।

देहविपर्ययमेत्य सुखी स्यात् ।

 Meaning:

Verse 1

ब्रह्मोवाच । अथ वृत्ते विवाहे तु भवस्यामिततेजसः ।
प्रहर्षमतुलं गत्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।
तुष्टुवुर्वाग्भिराद्याभिः प्रणेमुस्ते महेश्वरम् ॥

यह श्लोक उस समय का वर्णन करता है जब भगवान शिव का विवाह पूर्ण हुआ। ब्रह्मा बताते हैं कि उस अनंत तेज वाले शिव के विवाह के बाद, इंद्र के नेतृत्व में सभी देवता अत्यंत आनंद से भर गए। अमिततेजसः का अर्थ है ऐसा दिव्य प्रकाश जो किसी सीमा में नहीं बंधता, जो संपूर्ण सृष्टि का आधार है।

देवताओं ने आद्य वाणी से उनकी स्तुति की। इसका अर्थ है मूल, पवित्र और सृष्टि के आरंभ से जुड़ी हुई वाणी। उन्होंने शिव को प्रणाम किया, जो केवल सम्मान नहीं बल्कि पूर्ण समर्पण का संकेत है।

यह दृश्य केवल एक विवाह नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक है। यही मिलन सृष्टि में संतुलन स्थापित करता है।

दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि जब चेतना और शक्ति का मिलन होता है, तब भीतर और बाहर दोनों जगह आनंद उत्पन्न होता है। जब मन उस परम सत्य को पहचानता है, तब स्तुति अपने आप प्रकट होती है।

Verse 2
देवा ऊचुः । नमः पर्वतलिङ्गाय पर्वतेशाय वै नमः ।
नमः पवनवेगाय विरूपायाजिताय च ।
नमः क्लेशविनाशाय दात्रे च शुभसम्पदाम् ॥

देवता शिव को पर्वतलिंग और पर्वतेश कहकर नमस्कार करते हैं। इसका अर्थ है पर्वत के समान स्थिर और अडिग स्वरूप। यह कैलाश निवास का भी संकेत है, पर उससे अधिक यह अचल चेतना का प्रतीक है।

पवनवेगाय का अर्थ है वायु की गति जैसा तीव्र। यह दर्शाता है कि शिव स्थिर दिखते हुए भी सब कुछ गति देते हैं। विरूप का अर्थ है सामान्य रूप से भिन्न, जो बाहरी सुंदरता से परे है। अजित का अर्थ है जिसे कोई जीत नहीं सकता।

क्लेशविनाशाय का अर्थ है दुखों का नाश करने वाला और शुभसम्पदाम् दाता, अर्थात मंगल देने वाला।

यह श्लोक सिखाता है कि परम तत्व स्थिर भी है और गतिशील भी। वह बाहरी रूप से नहीं समझा जा सकता। जो उस सत्य को पहचानता है, उसके भीतर के क्लेश समाप्त हो जाते हैं।

Verse 3
नमो नीलशिखण्डाय अम्बिकापतये नमः ।
नमः पवनरूपाय शतरूपाय वै नमः ॥

नीलशिखण्ड का अर्थ है नीले कंठ वाला, जो समुद्र मंथन के विष को धारण करने के कारण हुआ। यह सहनशीलता और त्याग का प्रतीक है। अम्बिकापति का अर्थ है अम्बिका के स्वामी, जो शिव और शक्ति की एकता को दर्शाता है।

पवनरूपाय का अर्थ है वायु के रूप में उपस्थित, जो जीवन का आधार है। शतरूपाय का अर्थ है अनेक रूपों में प्रकट होने वाला।

यह श्लोक बताता है कि शिव एक ही समय में अनेक रूपों में उपस्थित हैं। वह हर श्वास में, हर अनुभव में हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जीवन के विष को धारण करना और उससे प्रभावित न होना ही साधना है। शिव का स्मरण हमें यह शक्ति देता है।

Verse 4
नमो भैरवरूपाय विरूपनयनाय च ।
नमः सहस्रनेत्राय सहस्रचरणाय च ॥

भैरवरूप शिव का उग्र रूप है, जो भय का नाश करता है। विरूपनयन का अर्थ है विशेष दृष्टि, विशेष रूप से तीसरा नेत्र जो सत्य को देखता है।

सहस्रनेत्र और सहस्रचरण का अर्थ है हजारों नेत्र और चरण, अर्थात वह हर जगह देखता और चलता है।

यह श्लोक बताता है कि शिव की दृष्टि सामान्य नहीं है। वह बाहरी रूप के पार जाकर सत्य को देखती है।

दार्शनिक रूप से यह बताता है कि जब भीतर की दृष्टि जागती है, तब भय समाप्त हो जाता है। भैरव रूप का अर्थ भय देना नहीं, बल्कि भय को मिटाना है।

Verse 5
नमो देववयस्याय वेदाङ्गाय नमो नमः ।
विष्टम्भनाय शक्रस्य बाह्वोर्वेदाङ्कुराय च ॥

देववयस्य का अर्थ है देवताओं के मित्र। वेदाङ्ग का अर्थ है वेदों का आधार। इसका अर्थ है कि समस्त ज्ञान का स्रोत शिव ही हैं।

विष्टम्भनाय शक्रस्य का अर्थ है इंद्र को स्थिर रखने वाला। बाह्वोर्वेदाङ्कुर का अर्थ है जिनकी शक्ति से वेदों का उद्भव होता है।

यह श्लोक बताता है कि शिव के बिना ज्ञान और शक्ति दोनों अधूरे हैं।

दार्शनिक रूप से यह समझाता है कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि उस चेतना में है जिससे सब कुछ उत्पन्न होता है। वही स्थिरता का आधार है।

Verse 6
चराचराधिपतये शमनाय नमो नमः ।
सलिलाशयलिङ्गाय युगान्ताय नमो नमः ॥

देवता शिव को चर और अचर सबका अधिपति कहकर प्रणाम करते हैं। चराचराधिपति का अर्थ है जो चलने वाले और स्थिर सभी प्राणियों पर शासन करते हैं। शमनाय का अर्थ है जो सब प्रकार के क्लेश और अशांति को शांत करते हैं।

सलिलाशयलिङ्गाय का अर्थ है जल में भी जिनका लिंग रूप स्थित है, अर्थात जो हर तत्व में विद्यमान हैं। युगान्ताय का अर्थ है युग के अंत करने वाले, जो समय के चक्र को पूर्ण करते हैं।

यह श्लोक बताता है कि शिव केवल किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे हर रूप, हर तत्व और हर अवस्था में उपस्थित हैं।

दार्शनिक रूप से यह समझाता है कि जीवन के उतार-चढ़ाव, आरंभ और अंत, सब एक ही सत्य के भीतर घटित होते हैं। जब मन उस आधार को पहचानता है, तब शांति प्राप्त होती है।

Verse 7
नमः कपालमालाय कपालसूत्रधारिणे ।
नमः कपालहस्ताय दण्डिने गदिने नमः ॥

देवता शिव को कपालमाला धारण करने वाले के रूप में प्रणाम करते हैं। कपालमाला जीवन की नश्वरता का प्रतीक है। प्रत्येक कपाल एक बीते हुए जीवन को दर्शाता है।

कपालसूत्रधारिणे का अर्थ है उन सभी जीवन चक्रों को एक सूत्र में पिरोने वाले। कपालहस्ताय का अर्थ है हाथ में कपाल धारण करने वाले, जो मृत्यु की स्मृति को सदा साथ रखते हैं।

दण्ड और गदा धारण करने वाले का अर्थ है अनुशासन और शक्ति के स्वामी।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक सिखाता है कि जीवन अस्थायी है। जो इस सत्य को समझता है, वही सही मार्ग पर चलता है। शिव हमें यह जागरूकता देते हैं कि समय सीमित है, इसलिए जीवन को सजगता से जीना चाहिए।

Verse 8
नमस्त्रैलोक्यनाथाय पशुलोकरताय च ।
नमः खट्वाङ्गहस्ताय प्रमथार्तिहराय च ॥

देवता शिव को तीनों लोकों के स्वामी कहकर प्रणाम करते हैं। त्रैलोक्यनाथ का अर्थ है तीनों लोकों के अधिपति। पशुलोकरताय का अर्थ है बंधन में पड़े जीवों के प्रति करुणा रखने वाले।

खट्वाङ्गहस्ताय का अर्थ है विशेष दंड धारण करने वाले, जो नियंत्रण और अधिकार का प्रतीक है। प्रमथार्तिहराय का अर्थ है अपने गणों के दुखों को दूर करने वाले।

यह श्लोक दर्शाता है कि शिव केवल महान देवता ही नहीं, बल्कि हर जीव के रक्षक हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जब मन बंधनों में उलझा होता है, तब शिव का स्मरण उसे मुक्त करने की दिशा देता है।

Verse 9
नमो यज्ञशिरोहन्त्रे कृष्णकेशापहारिणे ।
भगनेत्रनिपाताय पूष्णो दन्तहराय च ॥

यह श्लोक शिव के उन कार्यों का वर्णन करता है जिनमें उन्होंने अधर्म को रोका। यज्ञशिरोहन्त्रे का अर्थ है अहंकारयुक्त यज्ञ का नाश करने वाले।

कृष्णकेशापहारिणे, भगनेत्रनिपाताय और पूष्णो दन्तहराय यह सभी संकेत हैं उन घटनाओं के जब शिव ने अन्याय करने वालों को दंड दिया।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जब कर्म अहंकार से प्रेरित होते हैं, तब उनका परिणाम विनाश होता है। शिव उस संतुलन को स्थापित करते हैं।

यह दंड विनाश नहीं, बल्कि सुधार का मार्ग है।

Verse 10
नमः पिनाकशूलासिखड्गमुद्गरधारिणे ।
नमोऽस्तु कालकालाय तृतीयनयनाय च ॥

देवता शिव को विभिन्न अस्त्र धारण करने वाले के रूप में प्रणाम करते हैं। पिनाक धनुष, त्रिशूल, तलवार और गदा उनके अलग-अलग शक्तियों के प्रतीक हैं।

कालकाल का अर्थ है समय का भी अंत करने वाला। तृतीयनयन का अर्थ है तीसरा नेत्र, जो सत्य को देखता है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि शिव समय से परे हैं। उनका तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक है जो भ्रम को नष्ट करता है।

जब यह दृष्टि जागती है, तब जीवन का सही स्वरूप समझ में आता है।

Verse 11
अन्तकान्तकृते चैव नमः पर्वतवासिने ।
सुवर्णरेतसे चैव नमः कुण्डलधारिणे ॥

देवता शिव को मृत्यु का भी अंत करने वाला कहते हैं। अन्तकान्तकृत का अर्थ है मृत्यु का नाश करने वाला।

पर्वतवासिन का अर्थ है पर्वतों में निवास करने वाला, जो वैराग्य का प्रतीक है।

सुवर्णरेतसे का अर्थ है उज्ज्वल सृजन शक्ति वाला और कुण्डलधारिणे का अर्थ है संतुलन का प्रतीक धारण करने वाला।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जो सत्य को पहचान लेता है, उसके लिए मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

Verse 12
दैत्यानां योगनाशाय योगिनां गुरवे नमः ।
शशाङ्कादित्यनेत्राय ललाटनयनाय च ॥

शिव दैत्यों के अनुचित योग का नाश करते हैं और सच्चे योगियों के गुरु हैं।

शशाङ्क और आदित्य उनके नेत्र हैं, जो शांति और ऊर्जा का प्रतीक हैं। ललाटनयन उनका तीसरा नेत्र है।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि सही साधना और गलत साधना में अंतर होता है। शिव सच्चे मार्ग का निर्देशन करते हैं।

Verse 13
नमः श्मशानरतये श्मशानवरदाय च ।
नमो दैवतनाथाय त्र्यम्बकाय नमो नमः ॥

शिव श्मशान में रहने वाले हैं। इसका अर्थ है जहां सबका अंत होता है, वहां भी उनकी उपस्थिति है।

श्मशानवरदाय का अर्थ है वहां भी कृपा देने वाले। त्र्यम्बक का अर्थ है तीन नेत्र वाले।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए जीवन के अंत को स्वीकार करना आवश्यक है।

Verse 14
गृहस्थसाधवे नित्यं जटिले ब्रह्मचारिणे ।
नमो मुण्डार्धमुण्डाय पशूनां पतये नमः ॥

शिव गृहस्थ भी हैं और संन्यासी भी। जटिल और ब्रह्मचारी होने का अर्थ है पूर्ण संयम।

मुण्डार्धमुण्डाय का अर्थ है सामान्य नियमों से परे स्वरूप।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि साधना केवल बाहरी रूप पर निर्भर नहीं है। भीतर की अवस्था ही मुख्य है।

Verse 15
सलिले तप्यमानाय योगैश्वर्यप्रदाय च ।
नमः शान्ताय दान्ताय प्रलयोत्पत्तिकारिणे ॥

शिव जल में भी तप करने वाले हैं, जो कठोर साधना का संकेत है।

योगैश्वर्यप्रदाय का अर्थ है योग की शक्तियां देने वाले। शान्त और दान्त का अर्थ है पूर्ण नियंत्रण और शांति।

प्रलयोत्पत्तिकारिणे का अर्थ है सृष्टि और लय दोनों करने वाले।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति भीतर की शांति से आती है।

Verse 16
नमोऽनुग्रहकर्त्रे च स्थितिकर्त्रे नमो नमः ।
नमो रुद्राय वसव आदित्यायाश्विने नमः ॥

शिव अनुग्रह देने वाले और संसार को स्थिर रखने वाले हैं।

वे रुद्र, वसु, आदित्य और अश्विन रूपों में भी उपस्थित हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि एक ही सत्य अनेक रूपों में कार्य करता है।

Verse 17
नमः पित्रेऽथ सांख्याय विश्वेदेवाय वै नमः ।
नमः शर्वाय उग्राय शिवाय वरदाय च ॥

शिव पिता हैं, ज्ञान के आधार हैं और सभी देवताओं में स्थित हैं।

वे उग्र भी हैं और कल्याणकारी भी।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि सत्य के अनेक आयाम होते हैं।

Verse 18
नमो भीमाय सेनान्ये पशूनां पतये नमः ।
शुचये वैरिहानाय सद्योजाताय वै नमः ॥

शिव भीम रूप में शक्तिशाली हैं और सेना के नायक हैं।

वे शुद्ध हैं और शत्रुओं का नाश करते हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि शक्ति और शुद्धता साथ-साथ चलती हैं।

Verse 19
महादेवाय चित्राय विचित्राय च वै नमः ।
प्रधानायाप्रमेयाय कार्याय कारणाय च ॥

शिव महान और अद्भुत हैं। वे कारण और कार्य दोनों हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि सब कुछ उसी एक तत्व से उत्पन्न होता है।

Verse 20
पुरुषाय नमस्तेऽस्तु पुरुषेच्छाकराय च ।
नमः पुरुषसंयोगप्रधानगुणकारिणे ॥

शिव पुरुष हैं और इच्छा को पूर्ण करने वाले हैं।

वे प्रकृति और पुरुष के संयोग के कारण हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि चेतना और प्रकृति के मिलन से संसार प्रकट होता है।

Verse 21
प्रवर्तकाय प्रकृतेः पुरुषस्य च सर्वशः ।
कृताकृतस्य सत्कर्त्रे फलसंयोगदाय च ॥

शिव प्रकृति और पुरुष को गति देने वाले हैं।

वे कर्म और फल के संबंध को स्थापित करते हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि हर कर्म का परिणाम होता है।

Verse 22
कालज्ञाय च सर्वेषां नमो नियमकारिणे ।
नमो वैषम्यकर्त्रे च गुणानां वृत्तिदाय च ॥

शिव समय को जानने वाले और नियम स्थापित करने वाले हैं।

वे गुणों की विविधता को संचालित करते हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जीवन में भिन्नता एक नियम के अनुसार होती है।

Verse 23
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते भूतभावन ।
शिव सौम्यमुखो द्रष्टुं भव सौम्यो हि नः प्रभो ॥

देवता शिव से उनके सौम्य रूप को देखने की प्रार्थना करते हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि जब मन शांत होता है, तब सत्य का कोमल रूप दिखाई देता है।

Verse 24
ब्रह्मोवाच । एवं स भगवान् देवो जगत्पतिरुमापतिः ।
स्तूयमानः सुरैः सर्वैरमरानिदमब्रवीत् ॥

ब्रह्मा बताते हैं कि शिव ने देवताओं की स्तुति सुनकर उत्तर दिया।

यह दिखाता है कि सच्ची भक्ति का उत्तर अवश्य मिलता है।

Verse 25
श्रीशङ्कर उवाच ।
द्रष्टुं सुखश्च सौम्यश्च देवानामस्मि भोः सुराः ।
वरं वरयत क्षिप्रं दातास्मि तमसंशयम् ॥

शिव कहते हैं कि वे सौम्य रूप में दर्शन देने को तैयार हैं और वर देने के लिए तत्पर हैं।

दार्शनिक रूप से यह सिखाता है कि सच्चे भाव से की गई प्रार्थना स्वीकार होती है।

Verse 26
ब्रह्मोवाच ।
ततस्ते प्रणताः सर्वे सुरा ऊचुस्त्रिलोचनम् ॥

देवता प्रणाम करके शिव से निवेदन करते हैं।

यह विनम्रता का प्रतीक है।

Verse 27
देवा ऊचुः ।
तवैव भगवन् हस्ते वर एषोऽवतिष्ठताम् ।
यदा कार्यं तदा नस्त्वं दास्यसे वरमीप्सितम् ॥

देवता कहते हैं कि वर शिव के पास ही रहे और समय आने पर दिया जाए।

यह धैर्य और विश्वास को दर्शाता है।

Verse 28
ब्रह्मोवाच ।
एवमस्त्विति तान् उक्त्वा विसृज्य च सुरान् हरः ।
लोकांश्च प्रमथैः सार्धं विवेश भवनं स्वकम् ॥

शिव सहमति देकर अपने धाम को लौट जाते हैं।

यह कार्य पूर्ण होने का संकेत है।

Verse 29
यस्तु हरोत्सवमद्भुतमेनम् ।
गायति दैवतविप्रसमक्षम् ।
सोऽप्रतिरूपगणेशसमानो ।
देहविपर्ययमेत्य सुखी स्यात् ।

जो इस स्तुति का गान करता है, वह गणेश के समान श्रेष्ठ बनता है और अंत में सुख प्राप्त करता है।

यह श्लोक बताता है कि स्मरण और स्तुति से मन शुद्ध होता है और जीवन में स्थायी सुख प्राप्त होता है।

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