
श्लोक 1
पार्वतीपतिं प्रभुं पिनाकिनं
मृत्युमृत्युमीश्वरं वृषध्वजम् ।
व्योमकेशमीशमुग्रदेहिनं
नीललोहितं जटाधरं भजे ।
इस प्रथम श्लोक में भगवान शिव के दिव्य और सामर्थ्यशाली स्वरूप की वंदना की गई है। पार्वतीपतिं कहकर उन्हें आदि शक्ति के स्वामी के रूप में संबोधित किया गया है, जो प्रकृति और पुरुष के शाश्वत मिलन का प्रतीक है। उन्हें प्रभु और पिनाकी कहा गया है, जिसका अर्थ है वह शक्तिशाली देव जो पिनाक नामक दिव्य धनुष को धारण करते हैं। मृत्युमृत्युम् शब्द अत्यंत गूढ़ है, जिसका अर्थ है वह जो स्वयं मृत्यु की भी मृत्यु हैं, अर्थात वे काल से परे महाकाल हैं। वृषध्वज विशेषण उनके नंदी पर विराजमान होने के गौरव को दर्शाता है, जहाँ बैल धर्म का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक संदर्भ में शिव को व्योमकेश कहा गया है, जिसका अर्थ है वे जिनके केश आकाश के समान विस्तृत और अनंत हैं। यह उनकी विराट व्यापकता और सर्वव्यापकता को सूचित करता है। उग्रदेहिनं उनके उस प्रचंड स्वरूप को प्रकट करता है जो अधर्म और बुराई के विनाश के लिए आवश्यक है। नीललोहित नाम उनके नीले और लाल रंग के मिश्रण को दर्शाता है, जो हलाहल विष पान की ऐतिहासिक घटना और उनकी प्रचंड संहारक शक्ति का स्मरण कराता है। जटाधर होना उनके एक महान तपस्वी और अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले योगी होने का प्रमाण है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक शिव को उस परम ईश्वर के रूप में स्थापित करता है जो संपूर्ण सृष्टि के नियंता हैं। उनकी शरण में जाने का वास्तविक तात्पर्य सांसारिक माया और मृत्यु के निरंतर भय से मुक्ति प्राप्त करना है। उनके विभिन्न नाम साधक को यह बोध कराते हैं कि ईश्वर एक ही समय में सौम्य भी है और उग्र भी, वह गृहस्थ पार्वतीपति भी है और पूर्णतः विरक्त जटाधारी भी। इन विरोधाभासी गुणों का अद्भुत समागम ही शिवत्व की पूर्णता है जो भक्त को द्वंद्वों से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है।
श्लोक 2
त्र्यंबकं कपर्दिनं महेश्वरं
शूलिनं गिरीशमब्जशेखरम् ।
भानुकोटितुल्यमादिशङ्करं
सोमसूर्यवह्निलोचनं भजे ।
द्वितीय श्लोक में भगवान शिव के ब्रह्मांडीय स्वरूप और उनकी दिव्य दृष्टि का विस्तार से वर्णन मिलता है। त्र्यंबक का अर्थ है तीन नेत्रों वाले देव। ये तीन नेत्र केवल शारीरिक अंग नहीं बल्कि भूत, भविष्य और वर्तमान के साथ-साथ ज्ञान के तीन सूक्ष्म मार्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कपर्दी उनकी जटाओं के उन जटिल गुच्छों को कहते हैं, जो स्वर्ग से उतरती गंगा की प्रचंड तीव्रता को थामने की असीम शक्ति रखती हैं। महेश्वर के रूप में वे देवताओं के भी आराध्य देव हैं और गिरीश के रूप में वे पवित्र कैलाश पर्वत के अधिपति हैं, जो स्थिरता और अखंड ध्यान का केंद्र है।
अब्जशेखर का अर्थ है जिनके मस्तक पर चंद्रमा या कमल सुशोभित है। यहाँ चंद्रमा मन की परम शांति और शीतलता का प्रतीक माना जाता है। शिव के ओज की तुलना भानुकोटि यानी करोड़ों सूर्यों के सम्मिलित तेज से की गई है, जो उनके असीमित ज्ञान के प्रकाश को दर्शाता है। उन्हें आदिशंकर कहा गया है, जिसका अर्थ है वह पुरातन सत्ता जो सबका कल्याण करने वाली है। उनका तेज जितना प्रखर और डरावना हो सकता है, उनका स्वभाव उतना ही करुणा और आशीर्वाद से भरा है जो भक्तों के कष्टों को क्षण भर में दूर कर देता है।
इस श्लोक का दार्शनिक महत्व उनके तीन नेत्रों के प्रतीकों में गहराई से छिपा है, जिन्हें सोम, सूर्य और अग्नि के रूप में वर्णित किया गया है। चंद्र शीतलता और जगत के पोषण का, सूर्य प्रकाश और जीवन की ऊर्जा का, तथा अग्नि संहार और अशुद्धियों के शुद्धिकरण का प्रतीक है। यह इंगित करता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड का सफल संचालन और संतुलन शिव की दिव्य दृष्टि में ही निहित है। ऐसे महान ईश्वर की अर्चना भक्त को अज्ञान के गहन अंधकार से निकालकर सत्य के शाश्वत प्रकाश की ओर ले जाती है और जीवन में स्पष्टता प्रदान करती है।
श्लोक 3
धूर्जटिं गुहाशयाम्बरं वरं
सर्वमङ्गलेश्वरं जगत्पतिम् ।
स्थाणुमन्धकान्तकं कपालिनं
कृत्तिवाससं हरं भवं भजे ।
तृतीय श्लोक शिव के परम वैराग्य और उनकी संहारक शक्ति के बीच के अद्भुत संतुलन को स्पष्ट करता है। धूर्जटि शब्द का प्रयोग उस विशाल भार के लिए किया गया है जो उनकी जटाएं स्वेच्छा से धारण करती हैं, जो वास्तव में संसार के संचित पापों को सोखने की क्षमता रखती हैं। गुहाशयाम्बर का अर्थ है वे जो प्रत्येक जीव के हृदय रूपी गुप्त गुफा में निवास करते हैं और अनंत आकाश ही जिनका एकमात्र वस्त्र है। वे सर्वमङ्गलेश्वर हैं, जो अत्यंत प्रतिकूल और कठिन परिस्थितियों में भी कल्याण का मंगलकारी मार्ग प्रशस्त करते हैं।
पौराणिक गाथाओं के अनुसार शिव को अंधकान्तक कहा गया है, क्योंकि उन्होंने अंधकासुर नामक मायावी राक्षस का वध कर अज्ञान के अंधकार का नाश किया था। कपालिन और कृत्तिवासस उनके अवधूत और अघोर रूप को दर्शाते हैं, जहाँ वे हाथ में कपाल धारण करते हैं और गज या व्याघ्र की चर्म को वस्त्र के रूप में लपेटते हैं। यह भौतिक संसार के बाहरी आडंबरों के त्याग और मृत्यु की अटल अपरिहार्यता को सहजता से स्वीकार करने का कड़ा संदेश देता है। स्थाणु का अर्थ है वह जो अडिग, अचल और शाश्वत है, जिसे काल का प्रभाव बदल नहीं सकता।
श्लोक की अंतिम पंक्ति में उन्हें हर और भव के नाम से पुकारा गया है। हर का अर्थ है जो भक्त के समस्त दुखों और जन्मों के पापों का हरण कर ले, और भव का अर्थ है वह मूल स्त्रोत जिससे सारा जगत और जीवन उत्पन्न हुआ है। आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक सिखाता है कि शिव ही सृष्टि के आरंभ और अंत दोनों के एकमात्र स्वामी हैं। उनका वीभत्स दिखने वाला श्मशानवासी रूप वास्तव में परम वैराग्य का वह शिखर है, जो साधक को सांसारिक मोह-माया के कृत्रिम बंधनों से पूर्णतः मुक्त करने में सहायक होता है।
श्लोक 4
चक्रपाणिशक्रधातृवन्दितं
दन्दशूकभूषणं कृपाकरम् ।
नन्दिवर्द्धनं जगद्विनाशकं
पांशुचन्दनं महानटं भजे ।
चतुर्थ श्लोक शिव की वैश्वविक सर्वोच्चता और उनके निर्दोष भक्तों के प्रति उनके अगाध प्रेम का वर्णन करता है। चक्रपाणि यानी भगवान विष्णु, शक्र यानी देवराज इंद्र और धातृ यानी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा द्वारा उनकी निरंतर वंदना की जाती है, जो यह सिद्ध करता है कि वे त्रिदेवों और समस्त कोटि के देवताओं के भी परम आराध्य हैं। दन्दशूकभूषणं का अर्थ है कि वे भयंकर और विषैले सर्पों को अपने सहज आभूषण के रूप में धारण करते हैं। सर्प यहाँ काल, मृत्यु और जागृत कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक हैं, जिस पर शिव का पूर्ण नियंत्रण स्थापित है।
नन्दिवर्द्धन कहकर उनके उस वात्सल्य रूप को याद किया गया है जो अपने प्रिय वाहन और अनन्य भक्त नंदी को सदैव आनंद प्रदान करते हैं। वे एक ओर जगद्विनाशक हैं तो दूसरी ओर अत्यंत दयालु और कृपाकर भी हैं। विनाश का अर्थ यहाँ सृष्टि का केवल अंत नहीं, बल्कि पुरानी सड़ी-गली व्यवस्था का अंत कर नए सृजन का अवसर प्रदान करना है। उनकी करुणा इतनी अगाध है कि वे जगत की रक्षा के लिए स्वयं कालकूट विषपान करने से भी पीछे नहीं हटते। वे अपने भक्तों के लिए सदैव सुलभ और वरदान देने के लिए आतुर रहते हैं।
महानट के रूप में शिव साक्षात नटराज हैं, जिनका अलौकिक तांडव नृत्य ब्रह्मांड की हर सूक्ष्म लय और गति को नियंत्रित करता है। पांशुचन्दन का अर्थ है वह वैरागी जो श्मशान की भस्म को सुगंधित चंदन की तरह अपने शरीर पर लगाता है। यह जीवन की क्षणभंगुरता की कठोर याद दिलाता है कि अंत में सब कुछ राख में ही मिल जाना है। यह श्लोक साधक को अपने अहंकार को पूरी तरह शून्य होकर उस महान नर्तक की लय में खुद को लीन करने का आह्वान करता है जो इस समस्त अस्तित्व का गतिशील केंद्र है।
श्लोक 5
वामदेवमम्बिकामनःप्रियं
कामलोभमोहनाशकं सुरम् ।
स्वर्गमोक्षदायकं सदानघं
दक्षयज्ञहारकं शिवं भजे ।
अंतिम श्लोक भगवान शिव के सौम्य, सुंदर और मोक्ष प्रदान करने वाले सर्वोच्च स्वरूप पर केंद्रित है। वामदेव का अर्थ है वह जो अत्यंत सुंदर, मनोहर और सदैव कल्याणकारी है। वे अंबिका यानी माता पार्वती के मन को अत्यंत प्रिय हैं, जो उनके गृहस्थ और प्रेममय रूप को दर्शाता है। शिव का यह दिव्य रूप साधक को उसके आंतरिक शत्रुओं जैसे काम (वासना), लोभ (लालच) और मोह (आसक्ति) के समूल विनाश की शक्ति प्रदान करता है। वे एक ऐसे महान सुर हैं जो अपनी शरण में आने वाले मनुष्य को पशुत्व के बंधनों से मुक्त कर देवत्व की ओर ले जाते हैं।
शिव को स्वर्ग के सुख और मोक्ष यानी परम मुक्ति दोनों का एकमात्र प्रदाता माना गया है। वे सदानघ हैं, जिसका अर्थ है वे जो समस्त दोषों से सर्वथा रहित और सदैव परम पवित्र हैं। पौराणिक संदर्भ में उन्हें राजा दक्ष के घमंडी यज्ञ का विध्वंस करने वाला (दक्षयज्ञहारक) बताया गया है। यह घटना आध्यात्मिक रूप से अहंकार के पूर्ण विनाश का प्रतीक है, जहाँ राजा दक्ष का मिथ्या गर्व शिव की प्रचंड शक्ति के सामने चूर हो गया था। यह प्रसंग सिखाता है कि बिना पूर्ण समर्पण और भक्ति के किया गया कोई भी धार्मिक कर्म कभी फलदायी नहीं होता।
अंत में शिव शब्द का उच्चारण किया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही परम मंगल और कल्याण है। यह श्लोक पूर्णतः आत्म-साक्षात्कार और चिरस्थायी शांति को समर्पित है। शिव की सच्ची आराधना का अर्थ है स्वयं के भीतर जमे अज्ञान के अंधकार को मिटाकर उस शुद्ध चेतना को प्राप्त करना जो सत-चित-आनंद स्वरूप है। उनकी निस्वार्थ भक्ति से साधक न केवल इस दृश्य संसार के समस्त सुख प्राप्त करता है, बल्कि अंततः वह जन्म और मृत्यु के दुखद चक्र से सदैव के लिए मुक्त होकर शिवत्व के परम पद को प्राप्त कर लेता है।
पार्वतीपतिं प्रभुं पिनाकिनं
मृत्युमृत्युमीश्वरं वृषध्वजम् ।
व्योमकेशमीशमुग्रदेहिनं
नीललोहितं जटाधरं भजे ।1।
त्र्यंबकं कपर्दिनं महेश्वरं
शूलिनं गिरीशमब्जशेखरम् ।
भानुकोटितुल्यमादिशङ्करं
सोमसूर्यवह्निलोचनं भजे ।2।
धूर्जटिं गुहाशयाम्बरं वरं
सर्वमङ्गलेश्वरं जगत्पतिम् ।
स्थाणुमन्धकान्तकं कपालिनं
कृत्तिवाससं हरं भवं भजे ।3।
चक्रपाणिशक्रधातृवन्दितं
दन्दशूकभूषणं कृपाकरम् ।
नन्दिवर्द्धनं जगद्विनाशकं
पांशुचन्दनं महानटं भजे ।4।
वामदेवमम्बिकामनःप्रियं
कामलोभमोहनाशकं सुरम् ।
स्वर्गमोक्षदायकं सदानघं
दक्षयज्ञहारकं शिवं भजे ।5।