त्रिनेत्र स्तुति

त्रिनेत्र स्तुति

Lyrics:

दक्षाध्वरध्वंसनकार्यदक्ष
मद्दक्षनेत्रस्थितसूर्यरूप ।
कटाक्षदृष्ट्या मनुजप्रसाद
मन्नेत्ररोगं शमय त्रिनेत्र ।।1।।

वामाकृते शुभ्रशशाङ्कमौले
मद्वामनेत्रस्थितचन्द्ररूप ।
सहस्रनेत्राद्यमरप्रपूज्य
मन्नेत्ररोगं शमय त्रिनेत्र ।।2।।

सर्वज्ञानिन् सर्वनेत्रप्रकाश
मज्ज्ञानाक्षिक्षेत्रजाग्निस्वरूप ।
भक्तस्याश्रुं स्वाश्रुवन्मन्यमान
मज्ज्ञानाक्षिं हे शिवोन्मीलयाऽऽशु ।।3।।

नेत्रात्तोयप्रपातं शमय शमय भो दूरदृष्टिं द्विदृष्टिं
रात्र्यन्धत्वाख्यरोगं शमय शमय भो चक्षुषोऽस्पष्टदृष्टिम् ।
वर्णान्धत्वाल्पदृष्टी शमय शमय भो नेत्ररक्तत्वरोगं
मन्नेत्रालस्यरोगं शमय शमय भो हे त्रिनेत्रेश शम्भो ।।4।।

Meaning:

यह भगवान शिव के त्रिनेत्र रूप की प्रार्थना है। इसमें भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे आँखों के रोग दूर करें और स्पष्ट दृष्टि प्रदान करें। इसमें शिव के दिव्य नेत्रों को सूर्य, चन्द्र और ज्ञान की अग्नि से जोड़ा गया है।

श्लोक 1

हे त्रिनेत्र भगवान शिव,
आप जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया था,
जो मेरे दाहिने नेत्र में सूर्य के रूप में प्रकाशित हैं,

अपनी करुणामयी कटाक्ष दृष्टि से मनुष्यों पर कृपा करने वाले प्रभु,
कृपया मेरी आँखों के रोग को शांत कर दीजिए।

श्लोक 2

हे शिव, जिनके मस्तक पर उज्ज्वल श्वेत चन्द्रमा शोभित है,
जो मेरे बाएँ नेत्र में चन्द्रमा के रूप में स्थित हैं,

जो इन्द्र और अन्य देवताओं द्वारा पूजित हैं,
हे त्रिनेत्र प्रभु, मेरी आँखों के रोग को दूर कर दीजिए।

श्लोक 3

हे सर्वज्ञ शिव,
जो सभी नेत्रों को प्रकाश देने वाले हैं और ज्ञान के क्षेत्र में चेतना की अग्नि के रूप में प्रकट होते हैं,

जो अपने भक्तों के आँसुओं को अपने ही आँसुओं के समान मानते हैं,
हे शिव, कृपया मेरे ज्ञान और दृष्टि के नेत्र को शीघ्र खोल दीजिए।

श्लोक 4

हे त्रिनेत्र शम्भु, कृपया इन नेत्र रोगों को दूर कर दीजिए:

आँखों से अधिक पानी आना

दूर की वस्तुएँ स्पष्ट न दिखना

दो-दो दिखाई देना

रात्रि में दिखाई न देना

धुँधला दिखाई देना

रंगों को पहचानने में कठिनाई

दृष्टि का कमजोर होना

आँखों में लालिमा या सूजन

आँखों की थकान या सुस्ती

हे तीन नेत्रों वाले प्रभु, कृपया मेरी आँखों के सभी रोगों को शांत कर दीजिए।

प्रार्थना का सार

इस स्तुति में शिव के तीन नेत्रों को सूर्य, चन्द्र और ज्ञान की अग्नि से जोड़ा गया है:

सूर्य → दाहिना नेत्र (स्पष्टता और शक्ति)
चन्द्र → बायाँ नेत्र (शीतलता और संतुलन)
अग्नि → आंतरिक नेत्र (ज्ञान और जागरूकता)

भक्त प्रार्थना करता है कि जो भगवान सम्पूर्ण ब्रह्मांड के प्रकाश के अधिपति हैं, वे उसकी बाहरी दृष्टि और आंतरिक ज्ञान-दृष्टि दोनों को पुनः प्रकाशित करें।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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