कपालीश्वर स्तोत्र

कपालिनामधेयकं कलापिपुर्यधीश्वरं कलाधरार्धशेखरं करीन्द्रचर्मभूषितम् ।
कृपारसार्द्रलोचनं कुलाचलप्रपूजितं कुबेरमित्रमूर्जितं गणेशपूजितं भजे ॥

मैं उन भगवान् का भजन करता हूँ जिनका एक नाम 'कपाली' है, जो कलापिपुर के स्वामी हैं, जिन्होंने चन्द्रमा की कला को अपने मस्तक पर धारण किया है, और जो गजराज के चर्म से सुशोभित हैं। जिनके नेत्र कृपा के रस से भीगे हुए हैं, जो प्रमुख पर्वतों द्वारा पूजित हैं, जो धन के स्वामी कुबेर के प्रिय मित्र और महान ऊर्जा से युक्त हैं, तथा जिनकी पूजा स्वयं श्री गणेश करते हैं।

इस श्लोक में भगवान् शिव के कई महत्वपूर्ण स्वरूपों का वर्णन है। उन्हें 'कपाली' कहा गया है क्योंकि उन्होंने ब्रह्मा जी के अहंकार रूपी पाँचवें सिर को अपने हाथ में धारण किया था; यह उनके वैराग्य और अहंकार के नाशक होने का प्रतीक है। 'कलापिपुर' वर्तमान चेन्नई का 'मयिलापुर' क्षेत्र है, जहाँ प्रसिद्ध कपालेश्वर मंदिर स्थित है। 'कलाधरार्धशेखरं' का अर्थ है मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले, जो समय और काल पर उनके नियंत्रण का प्रतीक है। 'करीन्द्रचर्मभूषितम्' गजासुर नामक असुर के वध की कथा से जुड़ा है, जहाँ शिव ने उसके चर्म को धारण कर अहंकार पर अपनी विजय को दर्शाया। उनकी आँखों में कृपा का रस होना उनकी करुणा को, और कुबेर का मित्र होना यह दर्शाता है कि जो परम वैरागी है, वही समस्त ऐश्वर्य का भी स्वामी है। प्रथम पूज्य गणेश द्वारा पूजित होना उनके परमेश्वर पद को सिद्ध करता है।

भजे भुजङ्गभूषणं भवाब्धिभीतिभञ्जनं भवोद्भवं भयापहं सुखप्रदं सुरेश्वरम् ।
रवीन्दुवह्निलोचनं रमाधवार्चितं वरं ह्युमाधवं सुमाधवीसुभूषितं महागुरुम् ॥

मैं उन भगवान् शिव का भजन करता हूँ जो सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करते हैं, जो संसार रूपी सागर के भय को नष्ट करते हैं, जो स्वयं सृष्टि के उद्गम हैं, जो सब प्रकार के भय को हर लेते हैं, जो सुख प्रदान करने वाले और देवताओं के स्वामी हैं। सूर्य, चंद्रमा और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं, जिनकी पूजा लक्ष्मीपति विष्णु भी करते हैं, जो श्रेष्ठ वर देने वाले हैं, जो उमा के पति हैं, जो सुन्दर माधवी लता के पुष्पों से सुशोभित हैं और जो महान गुरु हैं।

'भुजंगभूषणं' में सर्प कुंडलिनी शक्ति, काल और मृत्यु पर शिव के अधिकार का प्रतीक हैं। 'भवाब्धिभीतिभञ्जनं' में वे भक्तों को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करने वाले के रूप में वर्णित हैं। 'रवीन्दुवह्निलोचनं' उनके त्रिनेत्र का वर्णन है; सूर्य और चन्द्र उनके भौतिक नेत्र हैं जो सृष्टि पर दृष्टि रखते हैं, और अग्नि उनका ज्ञानचक्षु है जो अधर्म और अज्ञान को भस्म कर देता है। 'रमाधवार्चितं' यह दर्शाता है कि भगवान् विष्णु भी उनकी पूजा करते हैं, जो शैव और वैष्णव मतों की एकता (हरि-हर) का प्रतीक है। उन्हें 'महागुरु' कहा गया है क्योंकि वे ही संगीत, योग, तंत्र और समस्त ज्ञान के आदि स्रोत, आदियोगी और आदिगुरु हैं।

गुरुं गिरीन्द्रधन्विनं गुहप्रियं गुहाशयं गिरिप्रियं नगप्रियासमन्वितं वरप्रदम् ।
सुरप्रियं रविप्रभं सुरेन्द्रपूजितं प्रभुं नरेन्द्रपीठदायकं नमाम्यहं महेश्वरम् ॥

मैं उन महेश्वर को नमन करता हूँ जो गुरु स्वरूप हैं, जिन्होंने पर्वतों के राजा (मेरु) को अपना धनुष बनाया, जो गुह (कार्तिकेय) को प्रिय हैं, और जो भक्तों के हृदय रूपी गुफा में निवास करते हैं। जिन्हें पर्वत प्रिय हैं, जो पर्वत की पुत्री पार्वती के साथ रहते हैं, जो वरदान देने वाले हैं, जो देवताओं को प्रिय हैं, जिनका तेज सूर्य के समान है, जो देवराज इंद्र द्वारा पूजित हैं, और जो राजाओं को भी सिंहासन प्रदान करने वाले स्वामी हैं।

यहाँ शिव को 'गुरु' के रूप में नमन किया गया है। 'गिरीन्द्रधन्विनं' त्रिपुरासुर के संहार की कथा का संकेत है, जहाँ उन्होंने मेरु पर्वत को अपना पिनाक धनुष बनाया था, यह उनके ब्रह्मांडीय सामर्थ्य को दर्शाता है। 'गुहाशयं' के दो अर्थ हैं - एक तो वे कैलाश की गुफाओं में रहते हैं, और दूसरा गहरा अर्थ यह है कि वे प्रत्येक जीव के हृदय रूपी गुफा में आत्मा के रूप में वास करते हैं। 'नरेन्द्रपीठदायकं' का अर्थ है कि वे केवल मोक्ष ही नहीं, बल्कि सांसारिक ऐश्वर्य और राजपद भी प्रदान करने की क्षमता रखते हैं।

महेश्वरं सुरेश्वरं धनेश्वरप्रियेश्वरं वनेश्वरं विशुद्धचित्तवासिनं परात्परम् ।
प्रमत्तवेषधारिणं प्रकृष्टचित्स्वरूपिणं विरुद्धकर्मकारिणं सुशिक्षकं स्मराम्यहम् ॥

मैं उन महेश्वर का स्मरण करता हूँ जो देवों के भी ईश्वर हैं, जो धन के स्वामी कुबेर के भी प्रिय स्वामी हैं, जो वनों के भी स्वामी हैं, जो शुद्ध चित्त वालों के हृदय में निवास करते हैं और जो पर से भी परे (सर्वोच्च तत्त्व) हैं। जो उन्मत्त या मतवाले का वेश धारण करते हैं, किन्तु जिनका वास्तविक स्वरूप परम चैतन्य है, जो بظاهر विरुद्ध कर्म करते प्रतीत होते हैं, और जो सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हैं।

'परात्परम्' का अर्थ है कि वे ब्रह्म से भी परे, सबसे उच्च सत्ता हैं। 'प्रमत्तवेषधारिणं' उनका अवधूत रूप है, जो सामाजिक नियमों और बंधनों से परे, आत्म-आनंद में लीन रहने का प्रतीक है। 'विरुद्धकर्मकारिणं' उनका एक अनूठा गुण है; वे संहारक रुद्र हैं, पर कल्याणकारी शिव भी हैं। वे श्मशान में रहते हैं, पर सम्पूर्ण सृष्टि के स्रोत हैं। ये विरोधाभास दिखाते हैं कि वे सभी द्वंद्वों से परे हैं। 'सुशिक्षकं' के रूप में वे मौन रहकर ही अपने दक्षिणामूर्ति स्वरूप में सबसे बड़ा ज्ञान प्रदान करते हैं।

स्मराम्यहं स्मरान्तकं मुरारिसेविताङ्घ्रिकं परारिनाशनक्षमं पुरारिरूपिणं शुभम् ।
स्फुरत्सहस्रभानुतुल्यतेजसं महौजसं सुचण्डिकेशपूजितं मृडं समाश्रये सदा ॥

मैं कामदेव का अंत करने वाले उन भगवान् शिव का स्मरण करता हूँ, जिनके चरणों की सेवा मुरारि (विष्णु) करते हैं, जो शत्रुओं के विशाल समूह का भी नाश करने में सक्षम हैं, जिन्होंने त्रिपुरासुर का संहार किया था और जो परम कल्याणकारी हैं। मैं उन 'मृड' (सुख देने वाले) शिव की शरण लेता हूँ, जिनका तेज हजारों चमकते हुए सूर्यों के समान है, जो महान ओजस्वी हैं और जिनकी पूजा उनके प्रिय गण चण्डिकेश्वर द्वारा की जाती है।

'स्मरान्तकं' कामदेव को भस्म करने की कथा की ओर संकेत करता है, जो दर्शाता है कि सच्ची तपस्या और ज्ञान से कामनाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है। 'पुरारिरूपिणं' में वे त्रिपुरासुर नामक तीन असुरों और उनके नगरों का विनाश करने वाले हैं, यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। 'स्फुरत्सहस्रभानुतुल्यतेजसं' उनके निराकार, परम प्रकाश स्वरूप का वर्णन है, जो शुद्ध चैतन्य का तेज है। 'मृड' उनका एक नाम है, जिसका अर्थ है भक्तों को सांसारिक और आध्यात्मिक सुख प्रदान करने वाला।

सदा प्रहृष्टरूपिणं सतां प्रहर्षवर्षिणं भिदा विनाशकारण प्रमाणगोचरं परम् ।
मुदा प्रवृत्तनर्तनं जगत्पवित्रकीर्तनं निदानमेकमद्भुतं नितान्तमाश्रयेह्यहम् ॥

मैं उन भगवान् शिव की पूर्ण शरण लेता हूँ, जो सदैव प्रसन्न स्वरूप में रहते हैं और सज्जनों पर भी प्रसन्नता की वर्षा करते हैं, जो समस्त भेद-भाव और द्वैत के विनाश का कारण हैं, जो इंद्रियों और बुद्धि के प्रमाणों से परे तथा सर्वोच्च हैं। जो आनंदपूर्वक नृत्य (तांडव) में प्रवृत्त रहते हैं, जिनका कीर्तन जगत को पवित्र करने वाला है और जो इस सृष्टि के एकमात्र अद्भुत मूल कारण हैं।

'भिदा विनाशकारणं' का गहरा अर्थ है कि शिव की कृपा से ही जीव में 'मैं' और 'तुम' का भेद समाप्त होता है और अद्वैत ज्ञान की प्राप्ति होती है। 'प्रमाणगोचरं परम्' का अर्थ है कि उन्हें तर्क, बुद्धि या इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता, केवल अनुभव और भक्ति से ही पाया जा सकता है। उनका आनंद-नृत्य, 'तांडव', केवल संहार का प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह - इन पंच कृत्यों का भी प्रतीक है। वे ही इस जगत के 'निदानम्' अर्थात् मूल कारण हैं।

अहम्ममादिदूषणं महेन्द्ररत्नभूषणं महावृषेन्द्रवाहनं ह्यहीन्द्रभूषणान्वितम् ।
वृषाकपिस्वरूपिणं मृषापदार्थधारिणं मृकण्डुसूनुसंस्तुतं ह्यभीतिदं नमामि तम् ॥

मैं उन शिव को नमन करता हूँ जो 'मैं' और 'मेरा' (अहंकार और ममत्व) जैसे दोषों को दूर करने वाले हैं, जो देवराज इंद्र के रत्नों से बने आभूषण पहनते हैं, जिनका वाहन महान वृषराज नंदी है और जो सर्पराज वासुकि से सुशोभित हैं। जो 'वृषाकपि' (धर्मरक्षक) स्वरूप हैं, जो असत्य या नश्वर पदार्थों को भी लीलापूर्वक धारण करते हैं, जिनकी स्तुति मृकण्डु ऋषि के पुत्र (मार्कण्डेय) ने की थी और जो अभय प्रदान करने वाले हैं।

'अहम्ममादिदूषणं' शिव भक्ति का सबसे बड़ा फल है - अहंकार और आसक्ति का नाश। उनका वाहन 'वृष' या बैल धर्म का प्रतीक है; वे धर्म पर आरूढ़ रहते हैं। 'मृकण्डुसूनुसंस्तुतं' अमरत्व के लिए मार्कण्डेय ऋषि द्वारा की गई शिव-स्तुति की प्रसिद्ध कथा का संदर्भ है, जहाँ शिव ने यमराज से उनके भक्त की रक्षा की थी। यह सिद्ध करता है कि वे 'अभीतिदं' अर्थात् भय को हरकर अभय प्रदान करने वाले हैं।

नमामि तं महामतिं नतेष्टदानचक्षणं नतार्तिभञ्जनोद्यतं नगेन्द्रवासिनं विभुम् ।
अगेन्द्रजासमन्वितं मृगेन्द्रविक्रमान्वितं खगेन्द्रवाहनप्रियं सुखस्वरूपमव्ययम् ॥

मैं उन भगवान् शिव को नमन करता हूँ जो महान बुद्धि से संपन्न हैं, जो शरणागतों को इच्छित वस्तु देने में निपुण हैं, जो भक्तों के दुखों को नष्ट करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, जो पर्वतराज कैलाश पर निवास करते हैं और जो सर्वव्यापी हैं। जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के साथ रहते हैं, जिनमें सिंह के समान पराक्रम है, जिन्हें पक्षीराज गरुड़ के स्वामी (विष्णु) प्रिय हैं, और जो सुख स्वरूप एवं अविनाशी हैं।

'नतार्तिभञ्जनोद्यतं' का अर्थ है कि वे अपने भक्तों का दुःख दूर करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं, यह उनकी भक्तवत्सलता को दर्शाता है। 'मृगेन्द्रविक्रमान्वितं' उनके शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। 'खगेन्द्रवाहनप्रियं' पुनः भगवान् विष्णु के प्रति उनके स्नेह और हरि-हर की अभिन्नता को दर्शाता है। 'सुखस्वरूपमव्ययम्' का अर्थ है कि वे स्वयं आनंद के साकार रूप हैं और उनका यह स्वरूप कभी नष्ट नहीं होता, वे शाश्वत और अविनाशी हैं।

सुकल्पकाम्बिकापतिप्रियं त्विदं मनोहरं सुगूडकाञ्चिरामकृष्णयोगिशिष्यसंस्तुतम् ।
महाप्रदोषपुण्यकालकीर्तनात् शुभप्रदं भजामहे सदा मुदा कपालिमङ्गलाष्टकम् ॥

हम सब आनंदपूर्वक इस 'कपालि मंगलाष्टक' का भजन करते हैं, जो अम्बिकापति शिव को अत्यंत प्रिय और मनोहर है, तथा जिसकी रचना सुगूडकाञ्चि राम कृष्ण योगी के शिष्य द्वारा की गई है। यह अष्टक महाप्रदोष के पुण्यकाल में कीर्तन करने पर विशेष रूप से शुभ फल प्रदान करने वाला है।

यह श्लोक 'फलश्रुति' का आरम्भ है, जिसमें स्तोत्र की महिमा और रचना का संकेत दिया जाता है। इसमें बताया गया है कि यह स्तोत्र भगवान् शिव को प्रिय है। 'महाप्रदोष' का समय शिव पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, और उस समय इस स्तोत्र का पाठ करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह श्लोक स्तोत्र की प्रामाणिकता और उसके प्रभाव को स्थापित करता है।

कपालि तुष्टिदायकं महापदिप्रपालकं त्वभीष्टसिद्धिदायकं विशिष्टमङ्गलाष्टकम् ।
पठेत्सकृत्सुभक्तितः कपालिसन्निधौ क्रमात् अवाप्य सर्वमायुरादि मोदते सुमङ्गलम् ॥

यह विशिष्ट 'मंगलाष्टक' भगवान् कपाली (शिव) को संतुष्टि प्रदान करने वाला, बड़ी से बड़ी विपत्ति से रक्षा करने वाला और सभी मनोकामनाओं की सिद्धि देने वाला है। जो कोई भी व्यक्ति इस अष्टक को सच्ची भक्ति के साथ भगवान् कपाली के सान्निध्य में एक बार भी क्रम से पढ़ता है, वह सम्पूर्ण आयु आदि सब कुछ प्राप्त करके परम मंगल और आनंद को प्राप्त होता है।

यह अंतिम श्लोक इस स्तोत्र के पाठ का फल बताता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक कवच भी है जो 'महापदिप्रपालकं' अर्थात् बड़ी आपदाओं से रक्षा करता है। 'सकृत्' का अर्थ है 'एक बार भी'; यदि कोई सच्ची भक्ति से एक बार भी इसका पाठ करता है, तो उसे 'सर्वमायुरादि' अर्थात् लंबी आयु, स्वास्थ्य, धन और सभी सुखों की प्राप्ति होती है और वह परम मंगलमय जीवन जीता है। यह भक्तों को स्तोत्र-पाठ के लिए प्रेरित करता है।

 

कपालिनामधेयकं कलापिपुर्यधीश्वरं
कलाधरार्धशेखरं करीन्द्रचर्मभूषितम् ।
कृपारसार्द्रलोचनं कुलाचलप्रपूजितं
कुबेरमित्रमूर्जितं गणेशपूजितं भजे ॥

भजे भुजङ्गभूषणं भवाब्धिभीतिभञ्जनं
भवोद्भवं भयापहं सुखप्रदं सुरेश्वरम् ।
रवीन्दुवह्निलोचनं रमाधवार्चितं वरं
ह्युमाधवं सुमाधवीसुभूषितं महागुरुम् ॥

गुरुं गिरीन्द्रधन्विनं गुहप्रियं गुहाशयं
गिरिप्रियं नगप्रियासमन्वितं वरप्रदम् ।
सुरप्रियं रविप्रभं सुरेन्द्रपूजितं प्रभुं
नरेन्द्रपीठदायकं नमाम्यहं महेश्वरम् ॥

महेश्वरं सुरेश्वरं धनेश्वरप्रियेश्वरं
वनेश्वरं विशुद्धचित्तवासिनं परात्परम् ।
प्रमत्तवेषधारिणं प्रकृष्टचित्स्वरूपिणं
विरुद्धकर्मकारिणं सुशिक्षकं स्मराम्यहम् ॥

स्मराम्यहं स्मरान्तकं मुरारिसेविताङ्घ्रिकं
परारिनाशनक्षमं पुरारिरूपिणं शुभम् ।
स्फुरत्सहस्रभानुतुल्यतेजसं महौजसं
सुचण्डिकेशपूजितं मृडं समाश्रये सदा ॥

सदा प्रहृष्टरूपिणं सतां प्रहर्षवर्षिणं
भिदा विनाशकारण प्रमाणगोचरं परम् ।
मुदा प्रवृत्तनर्तनं जगत्पवित्रकीर्तनं
निदानमेकमद्भुतं नितान्तमाश्रयेह्यहम् ॥

अहम्ममादिदूषणं महेन्द्ररत्नभूषणं
महावृषेन्द्रवाहनं ह्यहीन्द्रभूषणान्वितम् ।
वृषाकपिस्वरूपिणं मृषापदार्थधारिणं
मृकण्डुसूनुसंस्तुतं ह्यभीतिदं नमामि तम् ॥

नमामि तं महामतिं नतेष्टदानचक्षणं
नतार्तिभञ्जनोद्यतं नगेन्द्रवासिनं विभुम् ।
अगेन्द्रजासमन्वितं मृगेन्द्रविक्रमान्वितं
खगेन्द्रवाहनप्रियं सुखस्वरूपमव्ययम् ॥

सुकल्पकाम्बिकापतिप्रियं त्विदं मनोहरं
सुगूडकाञ्चिरामकृष्णयोगिशिष्यसंस्तुतम् ।
महाप्रदोषपुण्यकालकीर्तनात् शुभप्रदं
भजामहे सदा मुदा कपालिमङ्गलाष्टकम् ॥

कपालि तुष्टिदायकं महापदिप्रपालकं
त्वभीष्टसिद्धिदायकं विशिष्टमङ्गलाष्टकम् ।
पठेत्सकृत्सुभक्तितः कपालिसन्निधौ क्रमात्
अवाप्य सर्वमायुरादि मोदते सुमङ्गलम् ॥

 

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