द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

सौराष्ट्रदेशे वसुधावकाशे ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतम्सम्।
भक्तिप्रदानाय कृतावतारं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥

मैं उन भगवान सोमनाथ की शरण में जाता हूँ, जो सौराष्ट्र प्रदेश के पवित्र भू-भाग पर ज्योति-स्वरूप में विद्यमान हैं, जिन्होंने चंद्रमा की कला को अपने मस्तक पर आभूषण की भांति धारण किया है तथा जो भक्तों को अपनी भक्ति प्रदान करने हेतु ही अवतरित हुए हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम, यह श्लोक श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को नमन करता है। यह गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। 'सोम' अर्थात 'चंद्रमा' के 'नाथ' होने के कारण वे सोमनाथ कहलाए। पौराणिक कथा के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के श्राप से चंद्रमा क्षीण होने लगे, तब उन्होंने इसी स्थान पर शिव की घोर आराधना की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर न केवल उन्हें श्राप-मुक्त किया, बल्कि उन्हें अपने मस्तक पर धारण कर 'चंद्रकलावतम्सम्' स्वरूप को प्रकट किया। यहाँ भगवान का अवतार भक्तों पर कृपा करने और उन्हें भक्ति का मार्ग दिखाने के लिए ही हुआ है, इसलिए वे भक्ति-प्रदाता हैं।

श्रीशैलशृङ्गे विविधप्रसङ्गे शेषाद्रिशृङ्गेऽपि सदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेनं नमामि संसारसमुद्रसेतुम्॥

जो श्रीशैल पर्वत की रमणीय चोटी पर, जहाँ अनेक दिव्य लीलाएँ हुई हैं, सर्वदा निवास करते हैं, उन भगवान मल्लिकार्जुन को मैं नमन करता हूँ, जो संसार रूपी महासागर को पार कराने के लिए सेतु (पुल) के समान हैं।

यह श्लोक द्वितीय ज्योतिर्लिंग, श्री मल्लिकार्जुन की स्तुति में है, जो आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम पर्वत पर कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। 'मल्लिकार्जुन' नाम में 'मल्लिका' माता पार्वती का और 'अर्जुन' भगवान शिव का नाम है, जो यहाँ शिव-शक्ति के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक है। कथा है कि अपने भाई गणेश से रूठकर स्वामी कार्तिकेय क्रौंच पर्वत पर चले गए थे, तब उन्हें मनाने के लिए शिव-पार्वती यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। 'संसारसमुद्रसेतुम्' उपाधि भगवान की उस कृपा को दर्शाती है जो भक्त को जीवन के दुःखों और जन्म-मृत्यु के चक्र से सहज ही पार ले जाती है।

अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकालमहं सुरेशम्॥

मैं उन देवों के भी ईश्वर, भगवान महाकाल की वंदना करता हूँ, जिन्होंने सज्जनों को मोक्ष प्रदान करने हेतु अवंतिका (उज्जैन) में अवतार लिया है तथा जो अपने भक्तों की अकाल मृत्यु से रक्षा करते हैं।

यह श्लोक तृतीय ज्योतिर्लिंग, श्री महाकालेश्वर को समर्पित है, जो मध्य प्रदेश की मोक्षदायिनी नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर विराजमान हैं। यह विश्व का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। 'महाकाल' का अर्थ केवल 'मृत्यु के देवता' नहीं, अपितु 'काल के भी स्वामी' हैं; अर्थात समय और मृत्यु स्वयं उनके अधीन हैं। इसीलिए वे 'अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं' अर्थात् अकाल मृत्यु के भय का निवारण करने वाले हैं। उनकी शरण में गया हुआ भक्त जीवन में अभय और मृत्यु के पश्चात मोक्ष को प्राप्त करता है।

कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तम् ओङ्कारमीशं शिवमेकमीडे॥

जो कावेरी और नर्मदा के पवित्र संगम पर स्थित मान्धाता नगरी में, सज्जनों का उद्धार करने हेतु सदा निवास करते हैं, मैं उन एकमात्र कल्याणस्वरूप भगवान ओंकारेश्वर का स्तवन करता हूँ।

यह चतुर्थ ज्योतिर्लिंग, श्री ओंकारेश्वर की स्तुति है, जो मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के मध्य स्थित मान्धाता द्वीप पर प्रतिष्ठित हैं। इस द्वीप की आकृति स्वयं पवित्र 'ॐ' के आकार की है, जिसके कारण यह ज्योतिर्लिंग 'ओंकारेश्वर' कहलाया। यहाँ नर्मदा नदी दो धाराओं में विभक्त होकर द्वीप के चारों ओर बहती है, जिसे कावेरी-नर्मदा का संगम भी माना जाता है। इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धाता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें यहाँ दर्शन दिए और उनके अनुरोध पर लोक-कल्याण के लिए ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हो गए।

पूर्वोत्तरे पारलिकाभिधाने सदाशिवं तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं श्रीवैद्यनाथं सततं नमामि॥

मैं उन श्री वैद्यनाथ भगवान को निरंतर नमन करता हूँ, जो पूर्वोत्तर दिशा में 'परली' नामक स्थान पर माता गिरिजा (पार्वती) के साथ विराजमान हैं और जिनके चरण-कमलों की आराधना देवता और असुर समान रूप से करते हैं।

यह श्लोक पंचम ज्योतिर्लिंग, श्री वैद्यनाथ की वंदना करता है। इस ज्योतिर्लिंग का स्थान महाराष्ट्र के परली में माना जाता है, जैसा श्लोक में 'पारलिकाभिधाने' शब्द से संकेत मिलता है। 'वैद्यनाथ' का अर्थ है 'वैद्यों के भी नाथ', अर्थात परम चिकित्सक। मान्यता है कि इनके दर्शन और पूजन से भक्तों को असाध्य शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति मिलती है। 'सुरासुराराधितपादपद्मं' यह दर्शाता है कि उनकी महिमा इतनी व्यापक है कि देव और दानव, दोनों ही अपने भेद भुलाकर उनके आश्रय में शांति और आरोग्य पाते हैं।

आमर्दसंज्ञे नगरे च रम्ये विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।
सद्भुक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये॥

जो 'आमर्द' नामक रमणीय नगर में स्थित हैं, जो स्वयं नाना प्रकार के ऐश्वर्यों से सुशोभित हैं तथा जो अपने भक्तों को उत्तम भोग (सांसारिक सुख) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों ही प्रदान करते हैं, मैं उन एकमात्र भगवान श्री नागनाथ की शरण ग्रहण करता हूँ।

यह श्लोक छठे ज्योतिर्लिंग, श्री नागनाथ (नागेश्वर) की महिमा का गान है। यह ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के औंढा नामक स्थान पर स्थित है, जिसका प्राचीन नाम आमर्दकपुर था। 'नागनाथ' अर्थात् 'नागों के स्वामी'। भगवान शिव का यह स्वरूप विष और भय का हरण करने वाला है। श्लोक की सबसे विशेष पंक्ति 'सद्भुक्तिमुक्तिप्रदम्' है, जो यह स्पष्ट करती है कि भगवान नागनाथ की उपासना से न केवल आध्यात्मिक उन्नति (मोक्ष) होती है, बल्कि वे अपने भक्तों को जीवन में धर्मानुकूल भौतिक सुख-समृद्धि (भोग) भी प्रदान करते हैं, जिससे जीवन संतुलित और पूर्ण होता है।

सानन्दमानन्दवने वसन्तम् आनन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये॥

जो आनंदवन (काशी) में आनंदपूर्वक निवास करते हैं, जो स्वयं आनंद के मूल स्रोत हैं, जो पापों के समूह का नाश करने वाले हैं, जो वाराणसी के अधिपति और अनाथों के नाथ हैं, मैं उन श्री विश्वनाथ की शरण में जाता हूँ।

यह सप्तम ज्योतिर्लिंग, श्री विश्वनाथ को समर्पित श्लोक है, जो भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी (वाराणसी) में प्रतिष्ठित हैं। काशी को 'आनंदवन' भी कहते हैं, क्योंकि यह सांसारिक दुःखों से परे, शिव के आनंद का नित्य धाम है। भगवान यहाँ 'आनन्दकन्द' अर्थात् आनंद के मूल रूप में विराजते हैं। 'विश्वनाथ' का अर्थ है 'संपूर्ण विश्व के स्वामी' और 'अनाथनाथ' का भाव है कि जिनका इस संसार में कोई आश्रय नहीं, वे स्वयं उनका सहारा बनते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी विश्वनाथ के दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

यो डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमानः पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शङ्करं भक्तहितं नमामि॥

जो डाकिनी-शाकिनी एवं अन्य पिशाच गणों के समुदाय द्वारा सेवित हैं तथा जो 'भीम' आदि नामों से प्रसिद्ध हैं, मैं उन भक्तों का सदैव हित करने वाले भगवान शंकर को नमन करता हूँ।

यह श्लोक अष्टम ज्योतिर्लिंग, श्री भीमाशंकर की वंदना करता है, जो महाराष्ट्र में सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के घने वनों में स्थित हैं। यहाँ का प्राकृतिक परिवेश भगवान शिव के औघड़ और भूतनाथ स्वरूप को दर्शाता है, जहाँ उनके गण (डाकिनी-शाकिनी) उनकी सेवा करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने इसी स्थान पर भक्तों की रक्षा के लिए अत्यंत विशाल ('भीम') रूप धारण कर त्रिपुरासुर नामक राक्षस का संहार किया था। उनका स्वरूप भले ही भयंकर हो, किंतु वे सदैव 'भक्तहितं' अर्थात् अपने भक्तों का कल्याण करने वाले हैं।

श्रीताम्रपर्णीजलराशियोगे निबद्ध्य सेतुं निशि बिल्वपत्रैः।
श्रीरामचन्द्रेण समर्चितं तं रामेश्वराख्यं सततं नमामि॥

ताम्रपर्णी नदी और समुद्र के संगम स्थल पर, सेतु का निर्माण करने के पश्चात, स्वयं भगवान श्रीरामचंद्र द्वारा बिल्वपत्रों से पूजित, उन 'रामेश्वर' नाम से विख्यात ज्योतिर्लिंग को मैं निरंतर नमन करता हूँ।

यह नवम ज्योतिर्लिंग, श्री रामेश्वर की स्तुति है, जो तमिलनाडु के रामेश्वरम द्वीप पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कथा सीधे रामायण से जुड़ी है। रावण का वध करने के पश्चात लगे ब्रह्महत्या के दोष के निवारण हेतु, भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना कर शिव की आराधना की। 'रामस्य ईश्वरः इति रामेश्वरः' अर्थात् 'राम के जो ईश्वर हैं, वही रामेश्वर हैं'। यह ज्योतिर्लिंग शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का प्रतीक है, जहाँ भगवान विष्णु के अवतार ने अपने आराध्य भगवान शिव की स्थापना की।

सिंहाद्रिपार्श्वेऽपि तटे रमन्तं गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात्पातकजातनाशः प्रजायते त्र्यंबकमीशमीडे॥

जो गोदावरी नदी के पवित्र तट पर, ब्रह्मगिरि पर्वत के समीप रमण करते हैं, जिनके दर्शन मात्र से ही समस्त पापों का समूह नष्ट हो जाता है, मैं उन तीन नेत्रों वाले भगवान त्र्यंबकेश्वर की स्तुति करता हूँ।

यह दशम ज्योतिर्लिंग, श्री त्र्यंबकेश्वर का स्तवन है, जो महाराष्ट्र के नासिक के निकट ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित है। इसी पवित्र स्थान से दक्षिण भारत की गंगा कही जाने वाली गोदावरी नदी का उद्गम होता है। 'त्र्यंबक' का अर्थ है 'तीन नेत्रों वाले'। कथा के अनुसार, गौतम ऋषि के आग्रह पर भगवान शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, ताकि यहाँ स्नान और दर्शन करने वालों के सभी पाप नष्ट हो जाएँ। यहाँ के लिंग की विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों के प्रतीक छोटे-छोटे लिंग हैं।

हिमाद्रिपार्श्वेऽपि तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैः केदारसंज्ञं शिवमीशमीडे॥

जो हिमालय की केदार नामक चोटी पर रमण करते हैं तथा जो श्रेष्ठ मुनियों, देवताओं, असुरों, यक्षों और महान सर्पों आदि के द्वारा निरंतर पूजे जाते हैं, मैं उन 'केदार' नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव का स्तवन करता हूँ।

यह श्लोक एकादश ज्योतिर्लिंग, श्री केदारनाथ की स्तुति करता है, जो उत्तराखंड के दुर्गम हिमालय में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित हैं। महाभारत युद्ध के पश्चात, पांडव गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के दर्शन हेतु यहाँ आए थे। शिव जी ने बैल का रूप धारण कर लिया था और भूमि में अंतर्धान होने लगे। तब भीम ने उनके पृष्ठ भाग को पकड़ लिया, जो आज भी लिंग रूप में पूजा जाता है। 'केदार' का अर्थ है 'दलदली भूमि का स्वामी'। यह स्थान इतना पवित्र है कि यहाँ केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु सभी दिव्य योनियों के जीव उनकी आराधना करते हैं।

एलापुरीरम्यशिवालयेऽस्मिन् समुल्लसन्तं त्रिजगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावं सदाशिवं तं धिषणेश्वराख्यम्॥

जो एलापुर (एलोरा) के रमणीय शिवालय में देदीप्यमान हैं, जो तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ और वंदनीय हैं, मैं उन अत्यंत उदार स्वभाव वाले 'धिष्णेश्वर' (घुश्मेश्वर) नामक सदाशिव की वंदना करता हूँ।

यह द्वादश ज्योतिर्लिंग, श्री घुश्मेश्वर (घृष्णेश्वर) का वंदन है, जो महाराष्ट्र में औरंगाबाद के निकट विश्व प्रसिद्ध एलोरा गुफाओं के समीप स्थित है। इसका नाम शिव की परम भक्त 'घुश्मा' के नाम पर पड़ा। घुश्मा की अटूट भक्ति और क्षमाशीलता से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने न केवल उसके मृत पुत्र को जीवनदान दिया, बल्कि उसकी प्रार्थना पर लोक-कल्याण हेतु उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में वास करने का वचन दिया। उनका 'महोदारतरस्वभाव' अर्थात् अत्यंत दयालु और उदार प्रकृति, भक्तों के प्रति उनके असीम वात्सल्य को प्रकट करती है।

एतानि लिङ्गानि सदैव मर्त्याः प्रातः पठन्तोऽमलमानसाश्च।
ते पुत्रपौत्रैश्च धनैरुदारैः सत्कीर्तिभाजः सुखिनो भवन्ति॥

जो मनुष्य पवित्र और निर्मल मन से प्रतिदिन प्रातःकाल इन बारह ज्योतिर्लिंगों के स्तोत्र का पाठ करते हैं, वे पुत्र-पौत्रों, ऐश्वर्य, धन-धान्य और श्रेष्ठ कीर्ति से युक्त होकर सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं।

यह इस स्तोत्र का फलश्रुति श्लोक है, जो इसके पाठ का माहात्म्य बताता है। यह केवल भौतिक कामनाओं की पूर्ति का आश्वासन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी मार्ग है। पाठ के लिए पहली शर्त 'अमल मन' अर्थात् राग-द्वेष रहित, शुद्ध हृदय है। ऐसे हृदय से किया गया स्मरण भक्त को न केवल सांसारिक समृद्धि और सम्मानित जीवन प्रदान करता है, बल्कि उसे आंतरिक शांति और सुख से भी परिपूर्ण कर देता है, जो भगवान शिव की सच्ची कृपा का प्रसाद है।

 

सौराष्ट्रदेशे वसुधावकाशे
ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतम्सम्।
भक्तिप्रदानाय कृतावतारं
तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये।
श्रीशैलशृङ्गे विविधप्रसङ्गे
शेषाद्रिशृङ्गेऽपि सदा वसन्तम्।
तमर्जुनं मल्लिकपूर्वमेनं
नमामि संसारसमुद्रसेतुम्।
अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकालमहं सुरेशम्।
कावेरिकानर्मदयोः पवित्रे
समागमे सज्जनतारणाय।
सदैव मान्धातृपुरे वसन्तम्
ओङ्कारमीशं शिवमेकमीडे।
पूर्वोत्तरे पारलिकाभिधाने
सदाशिवं तं गिरिजासमेतम्।
सुरासुराराधितपादपद्मं
श्रीवैद्यनाथं सततं नमामि।
आमर्दसंज्ञे नगरे च रम्ये
विभूषिताङ्गं विविधैश्च भोगैः।
सद्भुक्तिमुक्तिप्रदमीशमेकं
श्रीनागनाथं शरणं प्रपद्ये।
सानन्दमानन्दवने वसन्तम्
आनन्दकन्दं हतपापवृन्दम्।
वाराणसीनाथमनाथनाथं
श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये।
यो डाकिनीशाकिनिकासमाजे
निषेव्यमानः पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं
तं शङ्करं भक्तहितं नमामि।
श्रीताम्रपर्णीजलराशियोगे
निबद्ध्य सेतुं निशि बिल्वपत्रैः।
श्रीरामचन्द्रेण समर्चितं तं
रामेश्वराख्यं सततं नमामि।
सिंहाद्रिपार्श्वेऽपि तटे रमन्तं
गोदावरीतीरपवित्रदेशे।
यद्दर्शनात्पातकजातनाशः
प्रजायते त्र्यंबकमीशमीडे।
हिमाद्रिपार्श्वेऽपि तटे रमन्तं
सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः।
सुरासुरैर्यक्षमहोरगाद्यैः
केदारसंज्ञं शिवमीशमीडे।
एलापुरीरम्यशिवालयेऽस्मिन्
समुल्लसन्तं त्रिजगद्वरेण्यम्।
वन्दे महोदारतरस्वभावं
सदाशिवं तं धिषणेश्वराख्यम्।
एतानि लिङ्गानि सदैव मर्त्याः
प्रातः पठन्तोऽमलमानसाश्च।
ते पुत्रपौत्रैश्च धनैरुदारैः
सत्कीर्तिभाजः सुखिनो भवन्ति।

 

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