जंबुनाथ अष्टक स्तोत्र

कश्चन जगतां हेतुः कपर्दकन्दलितकुमुदजीवातुः।
जयति ज्ञानमहीन्दुर्जन्मस्मृतिक्लान्तिहरदयाबिन्दुः।
श्रितभृतिबद्धपताकः कलितोत्पलवननवमदोद्रेकः।
अखिलाण्डमातुरेकः सुखयत्वस्मान् तपःपरीपाकः।
कश्चन कारुण्यझरः कमलाकुचकलशकषणनिशितशरः।
श्रीमान् दमितत्रिपुरः श्रितजम्बूपरिसरश्चकास्तु पुरः।
शमितस्मरदवविसरः शक्राद्याशास्यसेवनावसरः।
कविवनघनभाग्यभरो गिरतु मलं मम मनःसरः शफरः।
गृहिणीकृतवैकुण्ठः गेहितजम्बूमहीरुडुपकण्ठम्।
दिव्यं किमप्यकुण्ठं तेजःस्तादस्मदवनसोत्कण्ठम्।
कृतशमनदर्पहरणं कृतकेतफणितिचारिरथचरणम्।
शक्रादिश्रितचरणं शरणं जम्बुद्रुमान्तिकाभरणम्।
करुणारसवारिधये करवाणि नमः प्रणम्रसुरविधये।
जगतामानन्दनिधये जम्बूतरुमूलनिलयसन्निधये।
कश्चन शशिचूडालं कण्ठेकालं दयौघमुत्कूलम्।
श्रितजम्बूतरुमूलं शिक्षितकालं भजे जगन्मूलम्।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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