विश्वनाथ पंचक स्तोत्र

तरङ्गभङ्गशोभिगङ्गयाभिषिक्तपार्वती-पते पदं समस्तपापतापतारकं तव। श्रये शिवाशुतोष लोकपाशमाशु नाशय प्रमत्तमत्तमोवृतं मनःप्रबोधय प्रभो ॥१॥

हे पार्वती के स्वामी! जिनकी जटाओं को अपनी लहरों के आघात से सुशोभित गंगा निरंतर अभिषिक्त करती है, आपके चरण समस्त पापों और संतापों से तारने वाले हैं। हे शीघ्र प्रसन्न होने वाले शिव! मैं आपकी शरण लेता हूँ। मेरे सांसारिक बंधनों का शीघ्र नाश करें और हे प्रभु! मेरे अहंकार, प्रमाद तथा गहन अंधकार में डूबे हुए मन को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करें।

इस श्लोक में कवि भगवान शिव की वंदना करते हुए उनकी पूर्ण शरणागति स्वीकार करते हैं। वे शिव के उस भव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं जहाँ तरंगों से सुशोभित गंगा स्वयं उनके शीश का अभिषेक कर रही हैं। यह शिव के योगीश्वर और गृहस्थ (पार्वती-पति) रूपों का अद्भुत समन्वय है। कवि कहते हैं कि शिव के चरण सभी पापों (कर्म-दोष) और तापों (सांसारिक कष्ट) से मुक्ति दिलाने वाले हैं। वे शिव को 'आशुतोष' अर्थात् शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता के रूप में पुकारते हुए दो प्रमुख निवेदन करते हैं - पहला, 'लोकपाश' यानी सांसारिक मोह-माया के बंधन से मुक्ति, और दूसरा, अहंकार और घोर अज्ञान ('प्रमत्तमत्तमोवृतं') से आवृत मन को जाग्रत करने की प्रार्थना। यह भक्त की आतुर पुकार और पूर्ण समर्पण का भाव है।

नूतनोढसुन्दरीसमानमण्डितां भुवं मन्दिरे विलोकितुं समुत्सुकं मनो मम। व्याव्य गर्भगेहगर्तभूमिभागमायतं शङ्करः प्रकर्षति प्रदर्श्य विक्रमं निजम् ॥२॥

मेरा मन, मंदिर के भीतर उस भूमि के दर्शन के लिए अत्यंत उत्सुक है, जो एक नवविवाहिता सुंदरी के समान सुसज्जित है। उस गर्भगृह के गहन स्थल में व्याप्त किसी (तत्व) को भगवान शंकर अपना पराक्रम प्रदर्शित करते हुए बलपूर्वक खींच रहे हैं।

यह श्लोक एक अत्यंत गूढ़ एवं प्रतीकात्मक दृश्य का चित्रण करता है। यहाँ मंदिर की पवित्र भूमि की तुलना एक 'नववधू' से की गई है, जो उसकी दिव्यता, सुंदरता और मंगलमयता को प्रकट करती है। कवि का मन उस दिव्य भूमि को निहारने के लिए लालायित है। श्लोक का सबसे रहस्यपूर्ण अंश वह है जहाँ भगवान शंकर गर्भगृह के किसी गहरे स्थान से कुछ खींच रहे हैं। यह उनके संहारक एवं उद्धारक, दोनों रूपों का एक शक्तिशाली प्रतीक है। इसका एक भाव यह हो सकता है कि शिव सृष्टि के गहनतम रहस्यों को अपने पराक्रम से उजागर करते हैं, अथवा वे भक्तों के जीवन में गहरे बसे अंधकार और पापों को इसी प्रकार बलपूर्वक खींचकर बाहर निकाल देते हैं।

विनिर्गताम्बुमेघवृन्दसुप्रभासहोदर- श्मशानभस्मलेपिताङ्गसुन्दरं महेश्वरम्। चलद्भुजङ्गकङ्कणप्रजातरोमहर्षणं मुहुर्मुहुस्स्मरन्नुपैमि रोमहर्षणं भृशम्॥३॥

जिनका श्मशान-भस्म से लिप्त शरीर भी जल-भरे मेघ-समूह की कांति के समान सुंदर है, और जिनके हाथों में कंगन के रूप में लिपटे हुए सर्पों की गति से रोमांच उत्पन्न होता है, उन महेश्वर का बार-बार स्मरण करते हुए मेरा शरीर भी अत्यधिक पुलकित हो रहा है।

इस पद में कवि शिव के वैरागी और सुंदर स्वरूप के अद्भुत विरोधाभास को प्रस्तुत करते हैं। सामान्य दृष्टि में जो श्मशान की भस्म अमंगलकारी है, वही जब महेश्वर के शरीर का अंग बनती है तो जल से भरे श्याम मेघों के समान दिव्य कांति प्रदान करती है। यह दर्शाता है कि शिव के लिए मंगल-अमंगल का भेद नहीं है; वे सभी द्वंद्वों से परे हैं। उनके हाथों में आभूषणों के स्थान पर भुजंग हैं, जिनकी सहज गति भी भक्त के भीतर रोमांच ('रोमहर्षणं') भर देती है। कवि कहते हैं कि शिव के इस अलौकिक रूप का केवल स्मरण ('मुहुर्मुहुस्स्मरन्') करने मात्र से ही वे स्वयं भी भक्ति के उस रोमांच का गहन अनुभव कर रहे हैं।

नातिदूरतोऽग्रतः प्रसारितेन पाणिना भावुकैः कृतं जलार्चनं हि पूर्णकुम्भतः। लालया प्रपूरितं शिशोर्मनोज्ञचुम्बनं मोदकं पितुर्यथा तथा विभाति निश्चयम्॥४॥

अत्यधिक दूर से नहीं, अपितु समीप से ही, आगे हाथ बढ़ाकर भावुक भक्तों द्वारा पूर्ण कलश से किया गया जलाभिषेक ठीक वैसा ही सुशोभित हो रहा है, जैसा स्नेहपूर्वक किया गया शिशु का मनोहारी चुम्बन अथवा पिता को अर्पित किया गया मोदक होता है।

यह श्लोक भक्ति के सबसे सरल और वात्सल्यपूर्ण स्वरूप को उजागर करता है। कवि उस दृश्य का वर्णन कर रहे हैं जहाँ भक्तगण शिवलिंग के अत्यंत निकट ('नातिदूरतः') होकर अपने हाथों से जल अर्पित कर रहे हैं। कवि इस साधारण पूजन की तुलना दो अत्यंत कोमल और निश्छल भावों से करते हैं: पहला, जैसे कोई शिशु प्रेमवश अपने पिता का चुम्बन लेता है, और दूसरा, जैसे कोई पुत्र अपने पिता को प्रसन्न करने के लिए मोदक अर्पित करता है। इन उपमाओं के माध्यम से कवि का संदेश स्पष्ट है कि ईश्वर के लिए बाहरी आडम्बर या महंगी भेंटों से अधिक भक्त की सच्ची भावना और निश्छल प्रेम का मूल्य है। भक्तों का वह सरल जलाभिषेक भी शिव को उतना ही प्रिय है, जितना एक पिता को अपनी संतान का निष्कपट प्रेम।

निरन्तरं हृदङ्गणे विभासमानविग्रहं चिरन्तनं विभावयामि लिङ्गरूपिणं शिवम्। तनोतु लोकमङ्गलं दिशेच्च सत्पथं नृणां निजात्मभावजाग्रतौ तदस्तु कारणं द्रुतम्॥५॥

मैं अपने हृदय रूपी आँगन में निरंतर प्रकाशमान, सनातन, लिंगस्वरूपी शिव का ध्यान करता हूँ। वे प्रभु विश्व का मंगल करें, मनुष्यों को सन्मार्ग दिखाएं और शीघ्र ही समस्त जीवों के भीतर आत्म-स्वरूप के जागरण का कारण बनें।

इस श्लोक में कवि की भक्ति बाह्य पूजन से आगे बढ़कर आंतरिक साधना में प्रवेश करती है। वे कहते हैं कि मैं उन चिरंतन शिव का ध्यान केवल मंदिर में नहीं, अपितु अपने ही हृदय रूपी आँगन ('हृदङ्गणे') में करता हूँ, जहाँ वे ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा विद्यमान हैं। यह अद्वैत दर्शन की ओर संकेत है, जहाँ भक्त और भगवान की दूरी मिट जाती है। इसके पश्चात कवि की प्रार्थना व्यक्तिगत न रहकर सार्वभौमिक हो जाती है। वे सम्पूर्ण लोक के कल्याण ('लोकमङ्गलं'), मनुष्यों के लिए सत्पथ-प्रदर्शन और सबसे महत्वपूर्ण, सभी के भीतर अपनी ही आत्मा के दिव्य स्वरूप के जागरण ('निजात्मभावजाग्रतौ') की कामना करते हैं।

शोभने सिते शिवस्य माघमासिके दिने धेनुधूलिसंयुतेऽतिपावने मुहूर्तके। काशिकापुराधिनाथ दर्शनं प्रपूजनं जातमद्य ते कृपाभरेण चन्द्रशेखर॥६॥

हे चंद्रशेखर! आज माघ मास के शुक्ल पक्ष के इस शुभ दिन पर, गोधूलि वेला के इस परम पावन मुहूर्त में, आपकी अपार कृपा से ही मुझे काशीपुरी के स्वामी श्री विश्वनाथ का दर्शन एवं पूजन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

यह श्लोक इस स्तुति की रचना की पृष्ठभूमि, समय और स्थान को स्पष्ट करता है। कवि बताते हैं कि यह कोई सामान्य दिन नहीं, अपितु माघ मास के शुक्ल पक्ष का एक शुभ दिवस है। समय 'धेनुधूलिसंयुते' अर्थात् गोधूलि वेला का है, जो दिन और रात्रि का संधिकाल होने के कारण ध्यान और पूजन के लिए अति पवित्र माना जाता है। इस पावन मुहूर्त में कवि को काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ के दर्शन का अवसर मिला। वे इस सौभाग्य को अपने किसी पुण्य या प्रयास का फल न मानकर, भगवान चंद्रशेखर (जिनके शीश पर चंद्र है) की साक्षात कृपा ('ते कृपाभरेण') का परिणाम मानते हैं। यह भक्त की परम विनम्रता और कृतज्ञता को दर्शाता है।

दृष्टा काशीति हर्षेण विश्वनाथस्य पञ्चकम्। शिवरात्रौ शिवायेदं बालचन्द्रेण निर्मितम्॥७॥

’मैंने काशी का दर्शन कर लिया’, इस हर्ष के भाव से, शिवरात्रि के अवसर पर, यह 'विश्वनाथ पंचक' भगवान शिव को समर्पित करते हुए 'बालचंद्र' के द्वारा रचा गया है।

यह अंतिम श्लोक एक 'पुष्पिका' या उपसंहार है, जिसमें कवि अपना नाम, रचना का शीर्षक और उसका प्रयोजन बताते हैं। कवि का नाम 'बालचंद्र' है। उन्होंने इस 'विश्वनाथ पंचकम्' (पाँच श्लोकों की स्तुति) की रचना उस परमानंद और हर्ष के आवेग में की है, जो उन्हें काशी नगरी के दर्शन से प्राप्त हुआ। इस स्तुति की रचना का पवित्र अवसर 'शिवरात्रि' का महापर्व है। अंततः, वे इस कृति को अपने आराध्य भगवान शिव ('शिवाय') के चरणों में ही समर्पित करते हैं। यह श्लोक पूरी रचना को एक प्रामाणिक, भक्तिपूर्ण और व्यक्तिगत अनुभूति के रूप में पूर्णता प्रदान करता है।

 

तरङ्गभङ्गशोभिगङ्गयाभिषिक्तपार्वती-
पते पदं समस्तपापतापतारकं तव।
श्रये शिवाशुतोष लोकपाशमाशु नाशय
प्रमत्तमत्तमोवृतं मनःप्रबोधय प्रभो ॥१॥

नूतनोढसुन्दरीसमानमण्डितां भुवं
मन्दिरे विलोकितुं समुत्सुकं मनो मम।
व्याव्य गर्भगेहगर्तभूमिभागमायतं
शङ्करः प्रकर्षति प्रदर्श्य विक्रमं निजम् ॥२॥

विनिर्गताम्बुमेघवृन्दसुप्रभासहोदर-
श्मशानभस्मलेपिताङ्गसुन्दरं महेश्वरम्।
चलद्भुजङ्गकङ्कणप्रजातरोमहर्षणं
मुहुर्मुहुस्स्मरन्नुपैमि रोमहर्षणं भृशम्॥३॥

नातिदूरतोऽग्रतः प्रसारितेन पाणिना
भावुकैः कृतं जलार्चनं हि पूर्णकुम्भतः।
लालया प्रपूरितं शिशोर्मनोज्ञचुम्बनं
मोदकं पितुर्यथा तथा विभाति निश्चयम्॥४॥

निरन्तरं हृदङ्गणे विभासमानविग्रहं
चिरन्तनं विभावयामि लिङ्गरूपिणं शिवम्।
तनोतु लोकमङ्गलं दिशेच्च सत्पथं नृणां
निजात्मभावजाग्रतौ तदस्तु कारणं द्रुतम्॥५॥

शोभने सिते शिवस्य माघमासिके दिने
धेनुधूलिसंयुतेऽतिपावने मुहूर्तके।
काशिकापुराधिनाथ दर्शनं प्रपूजनं
जातमद्य ते कृपाभरेण चन्द्रशेखर॥६॥

दृष्टा काशीति हर्षेण विश्वनाथस्य पञ्चकम्।
शिवरात्रौ शिवायेदं बालचन्द्रेण निर्मितम्॥७॥

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