
श्रीबृहदम्बाधिपते ब्रह्मपुरोगाः सुराः स्तुवन्ति त्वाम् ।
व्युष्टा रजनी शयनादुत्थायैषामनुग्रहः क्रियताम् ॥
गोकर्णनाथ गौर्या सहसुतयारुह्य पादुके हैमे ।
मौक्तिकमण्टपमेहि स्नातुमवष्टभ्य मामकं हस्तम् ॥
तैलैः सप्तमहार्णवीपरिमितैस्तावद्भिरुष्णोदकै -
राज्यक्षीरदधीक्षुचूतरससत्क्षौद्रैस्तथान्यैरपि ।
स्नानार्हैरभिषेचयामि चतुरो वेदान् पठन् भक्तितः
स्वामिन् श्रीबृहदम्बिकेश कृपया तत् सर्वमङ्गीकुरु ॥
अण्डभित्तिपरिवेष्टनयोग्यान् हंसचित्रितदशानुपवीतैः ।
अर्पयामि भवते बृहदम्बाधीश धत्स्व नवपीतपटांस्त्वम् ॥
भस्मोद्धूलनपूर्वकं शिव भवद्देहं त्रिपुण्ड्रैरलं-
कृत्यादावनु चन्दनैर्मलयजैः कर्पूरसंवासितैः ।
सर्वाङ्गं तव भूषयामि तिलकेनालीकमप्यादरात्
पश्यात्मानमनेकमन्मथसमच्छायं स्वमादर्शगम् ॥
यावन्तस्त्रिजगत्सु रत्ननिकरा यावद्धिरण्यं च तै-
स्तेनापीश तवाङ्गकेषु रचयाम्यापादकेशं हृदा ।
योग्यं भूषणजातमद्य बृहदम्बेश त्वयाथाम्बिका-
पुत्रेण प्रतिगृह्यतां मयि कृपादृष्टिश्च विस्तार्यताम् ॥
नन्दनचैत्ररथादिषु देवोद्यानेषु यानि पुष्पाणि ।
तैर्भूषयामि नागाभरण बृहन्नायिकेश ते गात्रम् ॥
कोटिकोटिगुणितैः शिव बिल्वैः कोमलैर्वकुलवृक्षवनेश ।
स्वर्णपुष्पसहितैः श्रुतिभिस्त्वां पूजयामि पदयोः प्रतिमन्त्रम् ॥
गुग्गुळुभारसहस्रैर्बाडववह्नौ प्रधूपितो धूपः ।
चकुलवनेश स्वामिन्नगरुसमेतस्तवास्तु मोदाय ॥
बिसतन्तुवर्तिविहिताः सगोघृताः शतकोटिकोटिगणनोपरि स्थिताः
प्रभयाधरीकृतरवीन्दुपावका वकुलाटवीश तव सन्तु दीपिकाः ॥
शाल्यन्नं कनकाभसूपसहितं सद्योघृतैरन्वितं
सोष्णं हाटकभाजनस्थमचलस्पर्धालु सव्यञ्जनम् ।
गोकर्णेश्वर गृह्यतां करुणया सच्छर्करान्नं तथा
मुद्गान्नं कृसरान्नमप्यतिसुधं पानीयमप्यन्तरा ॥
कृसरमनोहरलड्डुकमोदकशष्कुल्यपूपवटकादीन् ।
सप्तसमुद्रमितान् श्रीवकुलवनाधीश भुङ्क्ष्व भक्ष्यांस्त्वम् ॥
क्षोणीसंस्थैः समस्तैः पनसफलबृहन्नालिकेराम्ररम्भा-
द्राक्षाखर्जूरजम्बूबदरफललसन्मातुलङ्गैः कपित्यैः ।
नारङ्गैरिक्षुखण्डैरपि निजजठरं पूर्यतां मामकं चा-
भीष्टं गोकर्णसंज्ञस्थलनिलय महादेव सर्वज्ञ शम्भो ॥
क्षीराम्भोधिगतं पयस्तदुचिते पात्रे समर्योपरि
प्रक्षिप्यार्जुनशर्कराश्चणकगोधूमान् सहैलानपि ।
पक्कं पायससंज्ञमद्भुततमं मध्वाज्यसम्म्मिश्रितं
भक्त्याहं वितरामि तेन बृहदम्वेशातिसन्तुप्यताम् ॥
मल्लीपुष्पसमानकान्तिमृदुलानन्नाचलानम्बुधौ
दघ्नस्तद्वदमर्त्यधेनुदधिजान् हैयङ्गवीनाचलान् ।
क्षिप्त्वा श्रीबृहदम्बिकेश लवणैः किञ्चित् समेतं मया
दास्यामोऽपिचुमन्दचूर्णसहितं दध्योदनं भुज्यताम् ॥
अर्घ्यां चाचमनीयं पानीयं क्षालनीयमप्यम्बु ।
स्वामिन् वकुलवनेश स्वःसरिदद्भिः सुधाभिरपि दद्याम् ॥
हर्म्ये रत्नपरिष्कृते मरतकस्तम्भायुतालङ्कृते
दीप्यद्धेमघटैरलङ्कृतशिरस्यालम्बिमुक्तासरे ।
दिव्यैरास्तरणैर्विभूषितमहामञ्चेऽभितो वासिते
साकं श्रीबृहृदम्बया सकुतुकं संविश्य विश्रम्यताम् ॥
पञ्चाक्षरेण मनुना पञ्चमहापापभञ्जनप्रभुणा ।
पञ्चपरार्ध्यैर्बिल्वैर्दक्षिणगोकर्णनायकार्चामि ॥
एलाक्रमुककर्पूरजातिकाजातिपत्रिभिः ।
ताम्बूलं चूर्णसंयुक्तं गोकर्णेश्वर गृह्यताम् ॥
बृहदम्बापते हेमपात्रयित्वा महीतलम् ।
कर्पूरयित्वा हेमाद्रिं तव नीराजयाम्यहम् ॥
छत्रं ते शशिमण्डलेन रचयाम्याकाशगङ्गाझरैः
श्वेतं चामरमष्टदिक्करिघटाकर्णानिलैर्बीजनम् ।
आदर्शं रविमण्डलेन जलदारावेण भेरीरवं
गन्धर्वाप्सरसां गणैर्वकुलभूवासेश तौर्यत्रिकम् ॥
कल्याणाचलवर्चसो रथवरान् कार्तस्वरालङ्कृतान्
कैलासाद्रिनिभानिभानतिमरुद्वेगांस्तुरङ्गानपि ।
कामाभीप्सितरूपपौरुषजुषः सङ्ख्याविहीनान् भटा-
नालोक्याम्बिकयोररीकुरु बृहन्मातुः प्रियेशादरात् ॥
काश्मीरचोलदेशानपि निजविभवैर्विनिन्दतः शश्वत् ।
सन्ततफलदान् देशान् श्रीबृहदम्बेश चित्तजान् प्रददे ॥
स्वर्गं भर्त्सयतो निमीलितदृशः सत्यं ह्रियालोकितुं
वैकुण्ठं हसतः कचाकचिजुषः कैलासधाम्ना तव ।
अत्याश्चर्ययुतान् गृहानभिमतानुत्पाद्य बुद्धया स्वया
भक्त्याहं वितरामि देव वकुलारण्याश्रयाङ्गीकुरु ॥
विश्वस्यान्तर्बहिरपि विभो वर्तसे तेन ते स्तः
तत् त्वां नन्तुं क्रमितुमभितोऽसम्भवान्नास्मि शक्तः ।
भक्ताधीनस्त्वमसि बकुलाटव्यधीशोपचारान्
सर्वान् कुर्वे प्रणमनमुखानाशयेनानिशं ते ॥
श्रीमन्मङ्गलतीर्थपश्चिमतटप्रासादभद्रासना-
जस्रावासकृतान्तरङ्गमहनीयाङ्गेन्दुगङ्गाधर ।
स्तोत्रं ते कलयामि शश्वदखिलाम्नायैः सहाङ्गैः पुनः
सर्वैश्चोपनिषत्पुराणकवितागुम्भैर्भवच्छंसिभिः ॥
सकलत्रपुत्रपौत्रं सहपरिवारं सहोपकरणं च ।
आत्मानमर्पयामि श्रीबृहदम्बेश पाहि मां कृपया ॥
कायकृतं वचनकृतं हृदयकृतं चापि मामकं मन्तुम् ।
परिहृत्य मामजस्रं त्वयि कृतभारं महेश परिपाहि ॥
यह स्तोत्र एक गहन भावपूर्ण उपासना है, जिसमें भक्त अपने हृदय से भगवान बृहदम्बिकेश्वर (शिव) और देवी बृहदम्बा की सेवा, पूजन और समर्पण कर रहा है। हर श्लोक में सेवा के अलग-अलग रूप हैं — जैसे स्नान, वस्त्र, आभूषण, भोजन, दीप, धूप, और अंत में पूर्ण आत्मसमर्पण।
यहाँ भक्त भगवान को जगाने से शुरुआत करता है। वह कहता है कि देवता भी आपकी स्तुति कर रहे हैं। रात समाप्त हो चुकी है। अब उठिए और सब पर कृपा कीजिए।
फिर वह भगवान से विनती करता है कि आप देवी के साथ स्वर्ण पादुकाओं पर चलकर मोती के मंडप में आएँ। मेरे हाथ का सहारा लेकर स्नान करने चलिए।
इसके बाद भक्त भगवान को स्नान कराने की कल्पना करता है। वह विभिन्न दिव्य पदार्थों से अभिषेक करता है। वह चारों वेदों का पाठ करते हुए यह सेवा करता है और प्रार्थना करता है कि आप इसे स्वीकार करें।
फिर वह भगवान को नए पीले वस्त्र अर्पित करता है। यह वस्त्र अत्यंत सुंदर हैं और हंसों की आकृतियों से सजाए गए हैं।
इसके बाद वह भगवान के शरीर पर भस्म लगाता है। त्रिपुण्ड्र धारण कराता है। चंदन और कपूर की सुगंध से शरीर को सुशोभित करता है। फिर भगवान को दर्पण दिखाता है, जिसमें उनका स्वरूप कामदेव से भी अधिक सुंदर प्रतीत होता है।
भक्त आगे कहता है कि संसार के जितने भी रत्न और सोना हैं, उनसे मैं आपके पूरे शरीर को सजाता हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें और मुझ पर कृपा दृष्टि रखें।
वह देवताओं के उद्यानों के फूलों से भगवान को सजाता है। बिल्वपत्रों और वेद मंत्रों से उनकी पूजा करता है।
फिर वह सुगंधित धूप और असंख्य दीप अर्पित करता है, जो सूर्य, चंद्र और अग्नि जैसी चमक देते हैं।
भोजन में वह विविध प्रकार के व्यंजन अर्पित करता है — चावल, घी, दूध, दही, मधुर पदार्थ, लड्डू, मोदक, और अनेक फल। वह कहता है कि सात समुद्रों जितना भोजन भी मैं अर्पित करता हूँ।
फिर वह पायसम (खीर) और दधि-भात भी अर्पित करता है, जो अत्यंत स्वादिष्ट हैं।
इसके बाद वह अर्घ्य, आचमन और जल अर्पित करता है।
फिर वह भगवान को एक भव्य महल में विश्राम करने के लिए आमंत्रित करता है, जहाँ रत्नों से सजा हुआ सिंहासन है।
वह पंचाक्षर मंत्र से बिल्वपत्र अर्पित करता है और तांबूल भी समर्पित करता है।
फिर आरती करता है और कहता है कि मैं आपके लिए आकाश में छत्र बनाता हूँ, गंगा के जल से स्नान कराता हूँ, और देवताओं के संगीत से आपकी सेवा करता हूँ।
भक्त भगवान को रथ, घोड़े, सैनिक और सुंदर नगर अर्पित करता है। वह कहता है कि मैं अपनी कल्पना से अद्भुत भवन बनाकर आपको अर्पित करता हूँ।
फिर वह एक गहरी सच्चाई स्वीकार करता है। वह कहता है कि आप हर जगह हैं, भीतर और बाहर। इसलिए मैं आपको पूरी तरह से जान नहीं सकता। फिर भी मैं आपकी सेवा करता हूँ क्योंकि आप भक्तों के वश में रहते हैं।
अंत में वह वेद, उपनिषद और पुराणों से आपकी स्तुति करता है।
सबसे अंत में वह अपनी सबसे बड़ी अर्पण करता है। वह कहता है — मैं अपना शरीर, वाणी, मन, परिवार, सब कुछ आपको समर्पित करता हूँ।
और फिर एक विनम्र प्रार्थना करता है — मेरे द्वारा किए गए सभी कर्मों की गलतियों को क्षमा करें। अब मैं अपने जीवन का भार आपको सौंपता हूँ। कृपया मेरी रक्षा करें।
यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि पूजा केवल बाहरी क्रिया नहीं है। यह मन की गहराई से उठने वाला समर्पण है। जब भक्त अपने हर कर्म, हर विचार और अपने पूरे अस्तित्व को भगवान को अर्पित कर देता है, तभी सच्ची भक्ति पूरी होती है।