इंदुमौलि स्मरण स्तोत्र

कलय कलावित्प्रवरं कलया नीहारदीधितेः शीर्षम् ।
सततमलङ्कुर्वाणं प्रणतावनदीक्षं यक्षराजसखम् ॥

मैं उन कलाओं के ज्ञाताओं में सर्वश्रेष्ठ, यक्षराज कुबेर के मित्र शिव का ध्यान करता हूँ, जो अपने मस्तक पर चन्द्रमा की कला को निरन्तर धारण करते हैं और जो शरणागतों की रक्षा करने का व्रत लिए हुए हैं।

यह श्लोक भगवान शिव के ध्यान योग्य स्वरूप का वर्णन करता है, जिसमें उनके विरोधाभासी किंतु सामंजस्यपूर्ण गुणों को दर्शाया गया है। उन्हें 'कलावित्प्रवर' अर्थात् सभी कलाओं (जैसे नृत्य, संगीत) में श्रेष्ठ कहा गया है; उनका नटराज स्वरूप इसी का प्रतीक है। वहीं, वे परम वैरागी भी हैं। उनके मस्तक पर स्थित चन्द्रमा की एक कला ('कलया नीहारदीधितेः') उनकी शीतलता, शांति और समय पर उनके नियंत्रण का प्रतीक है। 'प्रणतावनदीक्षं' शब्द उनकी शरणागतवत्सलता को प्रकट करता है, अर्थात् उन्होंने अपने भक्तों की रक्षा का दृढ़ संकल्प लिया हुआ है। 'यक्षराजसखम्' अर्थात् धन के देवता कुबेर का मित्र होना यह दर्शाता है कि जो परम वैरागी हैं, उन्हीं के आश्रय में सम्पूर्ण ऐश्वर्य है। यह वैराग्य और ऐश्वर्य का अद्भुत संगम है।

कान्तागेन्द्रसुतायाः शान्ताहङ्कारचिन्त्यचिद्रूप ।
कान्तारखेलनरुचे शान्तान्तःकरणं दीनमव शम्भो ॥

हे पर्वतराजपुत्री पार्वती के प्रियतम! हे अहंकार से रहित, मनन करने योग्य चैतन्यस्वरूप! हे वन-विहार में रुचि रखने वाले! हे शांत चित्त वाले शम्भो! मुझ दीन की रक्षा कीजिए।

यह श्लोक एक भक्त की विनम्र प्रार्थना है, जिसमें वह शिव के विभिन्न स्वरूपों को संबोधित कर रहा है। 'कान्तागेन्द्रसुतायाः' कहकर उनके प्रेमपूर्ण, गृहस्थ स्वरूप का स्मरण किया गया है, जहाँ वे आदिशक्ति के पति हैं। 'शान्ताहङ्कारचिन्त्यचिद्रूप' उनके पारमार्थिक, निर्गुण स्वरूप का वर्णन है, जो अहंकार से परे, शुद्ध चेतना हैं और केवल गहरे ध्यान में ही अनुभव किए जा सकते हैं। 'कान्तारखेलनरुचे' उनके वैरागी, दिगम्बर स्वरूप को दर्शाता है, जिन्हें राजप्रासादों का वैभव नहीं, अपितु श्मशान का वैराग्यपूर्ण एकांत प्रिय है। इन सभी महान स्वरूपों वाले प्रभु के समक्ष भक्त स्वयं को 'दीन' मानकर अपनी रक्षा के लिए पुकार रहा है।

दाक्षायणीमनोम्बुजभानो वीक्षावितीर्णविनतेष्ट ।
द्राक्षामधुरिममदभरशिक्षाकत्रीं प्रदेहि मम वाचम् ॥

हे दाक्षायणी (सती) के मन रूपी कमल के लिए सूर्य के समान! हे अपनी दृष्टि मात्र से विनम्र भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले! मुझे ऐसी वाणी प्रदान करें जो अंगूर की मिठास के अभिमान को भी पराजित कर दे।

इस श्लोक में भक्त भगवान शिव से भौतिक सुखों के स्थान पर कला और ज्ञान का वरदान मांग रहा है। शिव को 'दाक्षायणीमनोम्बुजभानो' कहा गया है; इसका भाव है कि जैसे सूर्य को देखकर कमल खिल उठता है, वैसे ही शिव को देखकर देवी सती का हृदयकमल प्रफुल्लित हो उठता था। यह उनके दिव्य प्रेम का प्रतीक है। 'वीक्षावितीर्णविनतेष्ट' का अर्थ है कि उनकी कृपा इतनी सहज है कि उनके केवल एक दृष्टिपात से ही भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं। भक्त उनसे ऐसी कवित्वपूर्ण और मधुर वाणी मांग रहा है जो इतनी श्रेष्ठ हो कि अंगूर की मधुरता का गर्व भी उसके सामने चूर्ण हो जाए। यह दर्शाता है कि शिव केवल संहारक नहीं, बल्कि कला और साहित्य के भी अधिष्ठाता हैं।

पारदसमानवर्णो नीरदनीकाशदिव्यगलदेशः ।
पादनतदेवसङ्घः पशुमनिशं पातु मामीशः ॥

जिनका वर्ण पारे के समान धवल है, जिनका दिव्य कंठ मेघ के समान नीला है, और जिनके चरणों में देवताओं के समूह शीश झुकाते हैं, वे पशुपति ईश्वर मुझ जीव की सदैव रक्षा करें।

यहाँ शिव के भव्य और करुणामयी स्वरूप का वर्णन है। 'पारदसमानवर्णो' उनके कर्पूर जैसे गौर वर्ण को दर्शाता है, जो उनकी सात्विकता और शुद्धता का प्रतीक है। 'नीरदनीकाशदिव्यगलदेशः' उनके नीलकंठ स्वरूप का स्मरण कराता है। जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला, तो उन्होंने सृष्टि की रक्षा हेतु उसे अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। यह उनकी असीम करुणा को दर्शाता है। 'पादनतदेवसङ्घः' बताता है कि वे देवाधिदेव महादेव हैं, जिनके समक्ष सभी देवता नतमस्तक होते हैं। इस श्लोक में भक्त स्वयं को 'पशु' कहता है, जिसका शास्त्रीय अर्थ है 'पाश' अर्थात् सांसारिक बंधनों में बंधा हुआ जीव। वह उन 'पशुपति' (जीवों के स्वामी) से प्रार्थना करता है कि वे उसे इन बंधनों से मुक्त कर उसकी रक्षा करें।

भव शम्भो गुरुरूपेणाशु मेऽद्य करुणाब्धे ।
चिरतरमिह वासं कुरु जगतीं रक्षन् प्रबोधनानेन ॥

हे करुणा के सागर शम्भो! आप आज शीघ्र ही मेरे लिए गुरु के रूप में प्रकट हों और इस आत्मज्ञान के द्वारा जगत की रक्षा करते हुए मेरे हृदय में चिरकाल तक निवास करें।

यह श्लोक ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए एक गहन प्रार्थना है। भक्त शिव से उनके देवता स्वरूप के साथ-साथ 'गुरुरूपेण' प्रकट होने की याचना कर रहा है। भगवान शिव को 'दक्षिणामूर्ति' के रूप में आदिगुरु माना जाता है। भक्त चाहता है कि उसे आत्मज्ञान का प्रकाश तत्काल ('आशु') प्राप्त हो। 'चिरतरमिह वासं कुरु' का अर्थ केवल बाहरी उपस्थिति नहीं, बल्कि गुरु रूपी शिव का ज्ञान भक्त के हृदय में सदा के लिए स्थापित हो जाए। श्लोक का अंतिम भाग 'जगतीं रक्षन् प्रबोधनानेन' अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका भाव है कि जब एक व्यक्ति को आत्मज्ञान होता है, तो उससे केवल उसका कल्याण नहीं होता, बल्कि उसके ज्ञान के प्रकाश से समस्त जगत का हित होता है।

यक्षाधिपसखमनिशं रक्षाचतुरं समस्तलोकानाम् ।
वीक्षादापितकवितं दाक्षायण्याः पतिं नौमि ॥

मैं यक्षों के अधिपति कुबेर के मित्र, समस्त लोकों की रक्षा करने में निपुण, अपनी दृष्टि से कवित्व-शक्ति प्रदान करने वाले और दाक्षायणी के पति (शिव) को निरन्तर नमन करता हूँ।

यह श्लोक भगवान शिव के विभिन्न गुणों का पुनः स्मरण करते हुए एक वंदना है। यहाँ कुछ गुणों को दोहराया गया है, जो भक्ति में अपने इष्ट के गुणों का बार-बार चिंतन करने की परंपरा को दर्शाता है। 'यक्षाधिपसखम्' उनके ऐश्वर्य और वैराग्य के समन्वय को, 'रक्षाचतुरं समस्तलोकानाम्' उनके पालक स्वरूप को, और 'वीक्षादापितकवितं' उनकी कृपा से प्राप्त होने वाली कलात्मक और बौद्धिक सिद्धि को दर्शाता है। 'दाक्षायण्याः पतिम्' कहकर उनके आदर्श प्रेम और पारिवारिक निष्ठा का स्मरण किया गया है। भक्त इन सभी रूपों वाले शिव को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।

यमनियमनिरतलभ्यं शमदममुखषङ्कदानकृतदीक्षम् ।
रमणीयपदसरोजं शमनाहितमाश्रये सततम् ॥

जो यम-नियम जैसे योगांगों में निरत रहने वालों को ही प्राप्त होते हैं, जो शम-दम आदि छः सम्पत्तियाँ प्रदान करने का व्रत लिए हुए हैं, जिनके चरणकमल परम रमणीय हैं, और जो मृत्यु के देवता यम के भी शत्रु हैं, मैं उन शिव का सदैव आश्रय लेता हूँ।

इस श्लोक में शिव को प्राप्त करने के आध्यात्मिक मार्ग का वर्णन है। 'यमनियमनिरतलभ्यं' से स्पष्ट है कि उनकी प्राप्ति केवल कर्मकांड से नहीं, बल्कि अष्टांग योग के कठिन अनुशासन से होती है। वे साधक को 'शमदममुखषङ्कदानकृतदीक्षम्' अर्थात् छः आध्यात्मिक सम्पत्तियाँ (शम - मन का निग्रह, दम - इन्द्रियों का निग्रह, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान) प्रदान करने का व्रत लिए हुए हैं। 'शमनाहितम्' का अर्थ है 'यमराज का शत्रु'। इसका गहरा अर्थ है कि शिव की शरण लेने वाला जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है, जिससे उस पर यम का अधिकार समाप्त हो जाता है। भक्त ऐसे मोक्षदाता के सुंदर चरणकमलों का आश्रय ले रहा है।

यमिहृन्मानसहंसं शमिताघौघं प्रणाममात्रेण ।
अमितायुःप्रदपूज्यं कमितारं नौमि शैलतनयायाः ॥

जो योगियों के हृदय रूपी मानसरोवर में हंस की भांति विहार करते हैं, जो केवल प्रणाम करने मात्र से पापों के समूह को नष्ट कर देते हैं, जो अनंत आयु प्रदान करने के कारण पूजनीय हैं, उन शैलपुत्री पार्वती के प्रियतम को मैं नमन करता हूँ।

यह श्लोक शिव की परम महिमा और भक्तवत्सलता का गुणगान करता है। 'यमिहृन्मानसहंसं' एक सुंदर उपमा है। जैसे हंस पवित्र मानसरोवर में विहार करता है, और उसमें दूध और पानी को अलग करने की क्षमता होती है, वैसे ही शिव योगियों के शुद्ध हृदय में निवास करते हैं और उन्हें सत्य-असत्य का विवेक प्रदान करते हैं। 'शमिताघौघं प्रणाममात्रेण' उनकी असीम कृपा को दर्शाता है कि सच्चे भाव से किया गया एक प्रणाम भी समस्त पापों को नष्ट करने में समर्थ है। 'अमितायुःप्रदपूज्यं' उनके महामृत्युंजय स्वरूप का संकेत है, जो अकाल मृत्यु से रक्षा कर अमरत्व प्रदान करते हैं। भक्त, देवी पार्वती के ऐसे प्रियतम पति को नमन करता है।

येन कृतमिन्दुमौले मानववर्येण तावकस्मरणम् ।
तेन जितं जगदखिलं को न ब्रूते सुरार्यतुल्येन ॥

हे चन्द्रमौलि! जिस भी श्रेष्ठ मनुष्य ने आपका स्मरण किया है, उसने सम्पूर्ण जगत को जीत लिया है। ऐसा कौन है जो यह नहीं कहेगा कि वह पूजनीय देवताओं के समान हो गया है?

यह अंतिम श्लोक शिव-स्मरण के फल या 'फलश्रुति' का वर्णन करता है। यहाँ भक्त सीधे शिव से संवाद करते हुए कहता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से आपका स्मरण करता है, वह 'जितं जगदखिलं' अर्थात् इस सम्पूर्ण संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है। यहाँ संसार जीतने का अर्थ भौतिक विजय नहीं, बल्कि मन, इन्द्रियों, इच्छाओं और भय पर विजय प्राप्त करना है। ऐसा व्यक्ति आंतरिक रूप से इतना शक्तिशाली और शांत हो जाता है कि उसका स्तर 'सुरार्यतुल्येन' अर्थात् श्रेष्ठ देवताओं के समान हो जाता है। यह शिव-भक्ति की सर्वोच्च महिमा का उद्घोष है, जो एक साधारण मानव को भी देवत्व के पद पर आसीन करने की क्षमता रखती है।

 

कलय कलावित्प्रवरं कलया नीहारदीधितेः शीर्षम् ।
सततमलङ्कुर्वाणं प्रणतावनदीक्षं यक्षराजसखम् ॥

कान्तागेन्द्रसुतायाः शान्ताहङ्कारचिन्त्यचिद्रूप ।
कान्तारखेलनरुचे शान्तान्तःकरणं दीनमव शम्भो ॥

दाक्षायणीमनोम्बुजभानो वीक्षावितीर्णविनतेष्ट ।
द्राक्षामधुरिममदभरशिक्षाकत्रीं प्रदेहि मम वाचम् ॥

पारदसमानवर्णो नीरदनीकाशदिव्यगलदेशः ।
पादनतदेवसङ्घः पशुमनिशं पातु मामीशः ॥

भव शम्भो गुरुरूपेणाशु मेऽद्य करुणाब्धे ।
चिरतरमिह वासं कुरु जगतीं रक्षन् प्रबोधनानेन ॥

यक्षाधिपसखमनिशं रक्षाचतुरं समस्तलोकानाम् ।
वीक्षादापितकवितं दाक्षायण्याः पतिं नौमि ॥

यमनियमनिरतलभ्यं शमदममुखषङ्कदानकृतदीक्षम् ।
रमणीयपदसरोजं शमनाहितमाश्रये सततम् ॥

यमिहृन्मानसहंसं शमिताघौघं प्रणाममात्रेण ।
अमितायुःप्रदपूज्यं कमितारं नौमि शैलतनयायाः ॥

येन कृतमिन्दुमौले मानववर्येण तावकस्मरणम् ।
तेन जितं जगदखिलं को न ब्रूते सुरार्यतुल्येन ॥

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