अरुणाचलेश्वर स्तोत्र

काश्यां मुक्तिर्मरणादरुणाख्यस्याचलस्य तु स्मरणात्।
अरुणाचलेशसंज्ञं तेजोलिङ्गं स्मरेत्तदामरणात्।
द्विधेह सम्भूय धुनी पिनाकिनी द्विधेव रौद्री हि तनुः पिनाकिनी।
द्विधा तनोरुत्तरतोऽपि चैको यस्याः प्रवाहः प्रववाह लोकः।
प्रावोत्तरा तत्र पिनाकिनी या स्वतीरगान् संवसथान्पुनानी।
अस्याः परो दक्षिणतः प्रवाहो नानानदीयुक् प्रववाह सेयम्।
लोकस्तुता याम्यपिनाकिनीति स्वयं हि या सागरमाविवेश।
मनाक् साधनार्तिं विना पापहन्त्री पुनानापि नानाजनाद्याधिहन्त्री।
अनायासतो या पिनाक्याप्तिदात्री पुनात्वहंसो नः पिनाकिन्यवित्री।
अरुणाचलतः काञ्च्या अपि दक्षिणदिक्स्थिता।
चिदम्बरस्य कावेर्या अप्युदग्या पुनातु माम्।
याधिमासवशाच्चैत्र्यां कृतक्षौरस्य मेऽल्पका।
स्नापनाय क्षणाद्वृद्धा साद्धासेव्या पिनाकिनी।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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