शिव आपद् विमोचन स्तोत्र

शिव आपद् विमोचन स्तोत्र

Lyrics:

श्रीमत्कैरातवेषोद्भटरुचिरतनो भक्तरक्षात्तदीक्ष
प्रोच्चण्टारातिदृप्तद्विपनिकरसमुत्सारहर्यक्षवर्य ।
त्वत्पादैकाश्रयोऽहं निरुपमकरूणावारिधे भूरितप्त-
स्त्वामद्यैकाग्रभक्त्या गिरिशसुत विभो स्तौमि देव प्रसीद ॥1॥

पार्थः प्रत्यर्थिवर्गप्रशमनविधये दिव्यमुग्रं महास्त्रं
लिप्सुध्र्यायन् महेशं व्यतनुत विविधानीष्टसिध्यै तपांसि ।
दित्सुः कामानमुष्मै शबरवपुरभूत् प्रीयमाणः पिनाकी
तत्पुत्रात्माऽविरासीस्तदनु च भगवन् विश्वसंरक्षणाय ॥2॥

घोरारण्ये हिमाद्रौ विहरसि मृगयातत्परश्चापधारी
देव श्रीकण्ठसूनो विशिखविकिरणैः श्वापदानाशु निघ्नन् ।
एवं भक्तान्तरङ्गेष्वपि विविधभयोद्भ्रान्तचेतोविकारान्
धीरस्मेरार्द्रवीक्षानिकरविसरणैश्चापि कारुण्यसिन्धो ॥3॥

विक्रान्तैरुग्रभावैः प्रतिभटनिवहैः सन्निरुद्धाः समन्ता-
दाक्रान्ताः क्षत्रमुख्याः शबरसुत भवद्ध्यानमग्नान्तरङ्गाः ।
लब्ध्वा तेजस्त्रिलोकीविजयपटुसस्तारिवंशप्ररोहान्
दग्ध्वाऽसन् पूर्णकामाः प्रदिशतु स भवान् मह्रमापद्विमोक्षम् ॥4॥

 Meaning:

Verse 1
श्रीमत्कैरातवेषोद्भटरुचिरतनो भक्तरक्षात्तदीक्ष
प्रोच्चण्टारातिदृप्तद्विपनिकरसमुत्सारहर्यक्षवर्य ।
त्वत्पादैकाश्रयोऽहं निरुपमकरूणावारिधे भूरितप्त-
स्त्वामद्यैकाग्रभक्त्या गिरिशसुत विभो स्तौमि देव प्रसीद ॥१॥

इस श्लोक में स्तुतिकर्ता भगवान किरातस्वरूपधारी देव की शरण ग्रहण करता है। "श्रीमत्कैरातवेष" का अर्थ है दिव्य और मंगलमय किरात अर्थात वनवासी शिकारी का रूप धारण करने वाले। "उद्भटरुचिरतनु" से उनके अद्भुत और तेजस्वी स्वरूप का वर्णन होता है। "भक्तरक्षात्तदीक्ष" का तात्पर्य है कि जिन्होंने भक्तों की रक्षा का अटल संकल्प धारण किया है। "हर्यक्षवर्य" सिंह के समान पराक्रमी और उन्मत्त शत्रुओं का विनाश करने वाले का सूचक है।

पौराणिक दृष्टि से यह स्वरूप उस प्रसंग की स्मृति कराता है जब भगवान शिव ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात का रूप धारण किया। उनके पुत्र भगवान किरात शास्ता अथवा अय्यप्प भी इसी दिव्य परंपरा के प्रतीक माने जाते हैं। वन्य जीवन का यह रूप बताता है कि परमात्मा केवल कैलास में ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रत्येक अंश में विद्यमान हैं। वे बाहरी रूप से साधारण दिखाई देते हुए भी भीतर अनंत दिव्यता धारण करते हैं।

भक्त स्वयं को केवल भगवान के चरणों का आश्रित बताता है। "निरुपमकरुणावारिधे" अर्थात हे अनुपम करुणा के सागर, मैं संसार के तापों से अत्यंत संतप्त होकर आपकी शरण में आया हूँ। यहां सांसारिक कष्ट केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक, आध्यात्मिक और कर्मजनित दुखों का भी संकेत हैं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक पूर्ण शरणागति का आदर्श प्रस्तुत करता है। जब मनुष्य अपने अहंकार, सामर्थ्य और उपायों का अभिमान छोड़कर केवल ईश्वर के चरणों को ही आधार मानता है, तब दिव्य कृपा का द्वार खुलता है। किरात का स्वरूप यह भी सिखाता है कि ईश्वर को केवल बाह्य वैभव में नहीं, बल्कि जीवन के अप्रत्याशित और साधारण प्रतीत होने वाले रूपों में भी पहचानना चाहिए। एकाग्र भक्ति और विनम्रता ही उनकी कृपा प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन है।

Verse 2
पार्थः प्रत्यर्थिवर्गप्रशमनविधये दिव्यमुग्रं महास्त्रं
लिप्सुध्र्यायन् महेशं व्यतनुत विविधानीष्टसिध्यै तपांसि ।
दित्सुः कामानमुष्मै शबरवपुरभूत् प्रीयमाणः पिनाकी
तत्पुत्रात्माऽविरासीस्तदनु च भगवन् विश्वसंरक्षणाय ॥२॥

इस श्लोक में महाभारत के प्रसिद्ध किरातार्जुनीय प्रसंग का वर्णन किया गया है। "पार्थः" अर्थात अर्जुन ने अपने शत्रुओं के दमन के लिए दिव्य और अत्यंत प्रबल अस्त्र प्राप्त करने की इच्छा से भगवान महेश्वर की आराधना की। "व्यतनुत विविधानी तपांसि" का अर्थ है कि उन्होंने अनेक प्रकार की कठोर तपस्याएं कीं ताकि इच्छित सिद्धि प्राप्त हो सके।

भगवान शिव अर्जुन की भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए "शबरवपुः" अर्थात वनवासी शिकारी का रूप धारण करके प्रकट हुए। पिनाकधारी शिव ने अर्जुन के साथ युद्ध किया और जब अर्जुन की निष्ठा, वीरता और समर्पण से प्रसन्न हुए तब उन्होंने उसे पाशुपतास्त्र प्रदान किया। इसके पश्चात भगवान के पुत्र का अवतार भी विश्व की रक्षा के उद्देश्य से प्रकट हुआ, जिससे धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश निरंतर होता रहे।

इस प्रसंग का गहरा आध्यात्मिक संदेश यह है कि ईश्वर साधक की परीक्षा अवश्य लेते हैं। वे सीधे वरदान नहीं देते, बल्कि उसके धैर्य, श्रद्धा, विनय और साहस को परखते हैं। अर्जुन की विजय केवल युद्ध कौशल की नहीं थी, बल्कि अपने अहंकार पर विजय की भी थी। जब उसने समझ लिया कि उसके सामने स्वयं महादेव हैं, तभी उसकी तपस्या पूर्ण हुई।

यह श्लोक बताता है कि दिव्य अनुग्रह पाने के लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं होती। उसके साथ कठोर साधना, धैर्य और पूर्ण समर्पण भी आवश्यक हैं। भगवान कभी-कभी ऐसे रूप में सामने आते हैं जिन्हें साधारण दृष्टि पहचान नहीं पाती। इसलिए सच्चा साधक प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर की उपस्थिति अनुभव करता है। यही भावना अंततः उसे दिव्य शक्ति, विवेक और धर्मरक्षा के योग्य बनाती है।

Verse 3
घोरारण्ये हिमाद्रौ विहरसि मृगयातत्परश्चापधारी
देव श्रीकण्ठसूनो विशिखविकिरणैः श्वापदानाशु निघ्नन् ।
एवं भक्तान्तरङ्गेष्वपि विविधभयोद्भ्रान्तचेतोविकारान्
धीरस्मेरार्द्रवीक्षानिकरविसरणैश्चापि कारुण्यसिन्धो ॥३॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकण्ठपुत्र अर्थात शिवपुत्र के वनवासी शिकारी स्वरूप का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है। वे हिमालय के दुर्गम वनों में धनुष धारण करके विचरण करते हैं और अपने तीक्ष्ण बाणों से हिंसक पशुओं का शीघ्र विनाश करते हैं। यहां उनका रूप केवल एक शिकारी का नहीं, बल्कि धर्म और संतुलन की रक्षा करने वाले दिव्य संरक्षक का है।

पौराणिक रूप से भगवान का यह स्वरूप प्रकृति के साथ उनके घनिष्ठ संबंध को प्रकट करता है। वे वन, पर्वत और समस्त जीवों के स्वामी हैं। जब भी अधर्म, हिंसा या भय का प्रकोप बढ़ता है, तब वे अपने अस्त्रों द्वारा उसका नाश करते हैं। उनके बाण केवल बाहरी शत्रुओं को ही नहीं, बल्कि भय और अज्ञान जैसी सूक्ष्म शक्तियों को भी समाप्त करने वाले माने गए हैं।

श्लोक का दूसरा भाग अत्यंत गहन आध्यात्मिक अर्थ प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार भगवान वन के हिंसक पशुओं का संहार करते हैं, उसी प्रकार वे भक्तों के हृदय में उत्पन्न भय, मोह, संशय, क्रोध, लोभ और मानसिक अशांति जैसे विकारों का भी विनाश करते हैं। "धीरस्मेरार्द्रवीक्षा" का अर्थ है उनकी शांत, करुणामयी और मधुर मुस्कान से युक्त दृष्टि। उनकी एक कृपामयी दृष्टि साधक के अंतःकरण को निर्मल और स्थिर बना देती है।

दार्शनिक रूप से वन मनुष्य के अंतर्मन का प्रतीक है, जहां अनेक प्रकार के भय और वासनाएं हिंसक पशुओं की भांति विचरती रहती हैं। भगवान का धनुष विवेक का प्रतीक है और उनके बाण ज्ञान के प्रतीक हैं। जब उनकी कृपा प्राप्त होती है, तब साधक के भीतर का अंधकार दूर होने लगता है। इस प्रकार भगवान केवल बाहरी रक्षक ही नहीं, बल्कि अंतःकरण के महान चिकित्सक और करुणासागर भी हैं।

Verse 4
विक्रान्तैरुग्रभावैः प्रतिभटनिवहैः सन्निरुद्धाः समन्ता-
दाक्रान्ताः क्षत्रमुख्याः शबरसुत भवद्ध्यानमग्नान्तरङ्गाः ।
लब्ध्वा तेजस्त्रिलोकीविजयपटुसस्तारिवंशप्ररोहान्
दग्ध्वाऽसन् पूर्णकामाः प्रदिशतु स भवान् मह्रमापद्विमोक्षम् ॥४॥

इस श्लोक में भगवान शबरसुत अर्थात किरातस्वरूपधारी शिवपुत्र की कृपा से प्राप्त होने वाले अदम्य पराक्रम का वर्णन किया गया है। अनेक वीर शत्रुओं से चारों ओर से घिरे हुए महान क्षत्रिय भी जब भगवान के ध्यान में अपने मन को स्थिर कर लेते हैं, तब उन्हें ऐसा दिव्य तेज प्राप्त होता है जिससे वे अपने विरोधियों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। यहां "त्रिलोकीविजयपटु" का अर्थ है ऐसा अलौकिक सामर्थ्य जो तीनों लोकों में भी विजय दिलाने में समर्थ हो।

पौराणिक दृष्टि से यह संदेश अनेक कथाओं में दिखाई देता है कि देवकृपा से साधारण मनुष्य भी असाधारण शक्ति का अधिकारी बन जाता है। अर्जुन, स्कंद, अय्यप्प और अनेक महापुरुषों ने ईश्वर के अनुग्रह से ही असंभव प्रतीत होने वाले कार्य संपन्न किए। विजय का वास्तविक आधार बाहुबल नहीं बल्कि ईश्वर में अटल विश्वास और धर्मनिष्ठा है।

"तारिवंशप्ररोहान् दग्ध्वा" का संकेत केवल बाहरी शत्रुओं के विनाश तक सीमित नहीं है। इसका गहरा अर्थ है कि भगवान शत्रुता के मूल कारणों, अर्थात अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, अन्याय और अधर्म के अंकुरों को ही भस्म कर देते हैं। जब मूल कारण समाप्त हो जाता है, तब स्थायी शांति और पूर्णता प्राप्त होती है। इसलिए भक्त "पूर्णकामाः" अर्थात सभी श्रेष्ठ अभिलाषाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से शत्रु बाहरी व्यक्ति से अधिक हमारे भीतर स्थित दोष हैं। भगवान के ध्यान से प्राप्त तेज आत्मबल, विवेक, धैर्य और निर्भयता का प्रतीक है। यही दिव्य शक्ति जीवन की प्रत्येक विपत्ति का सामना करने की क्षमता देती है। अंत में भक्त भगवान से प्रार्थना करता है कि वे उसे सभी संकटों और आपदाओं से मुक्त करें। यह केवल सांसारिक सुरक्षा की याचना नहीं, बल्कि जन्म-मरण, अज्ञान और कर्मबंधन से अंतिम मुक्ति की भी प्रार्थना है।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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