
Lyrics:
षडाधारोर्ध्वसन्निष्ठं षडुत्कर्षस्थलेश्वरम् ।
षट्सभारमणं वन्दे षडध्वाराधनक्षमम् ॥1॥
श्रीमत्श्रीकुन्दमूलस्थललसितमहायोगपीठे निषण्णः
सर्वाधारो महात्माऽप्यनुपमितमहास्वादिकैलासवासी ।
यस्यास्ते कामिनी या नतजनवरदा योगमाता महेशी
सोऽव्यादात्मेश्वरो मां शिवपुररमणः सच्चिदानन्दमूर्तिः ॥2॥
यो वेदान्तविचिन्त्यरूपमहिमा यं याति सर्वं जगत्
येनेदं भुवनं भृतं विधिमुखाः कुर्वन्ति यस्मै नमः ।
यस्मात् सम्प्रभवन्ति भूतनिकराः यस्य स्मृतिर्मोक्षकृत्
यस्मिन् योगरतिःशिवेति स महानात्मेश्वरः पातु नः ॥3॥
तुर्यातीतपदोर्ध्वगं गुणपरं सत्तामयं सर्वगं
संवेद्यं श्रुतिशीर्षकैरनुपमं सर्वाधिकं शाश्वतम् ।
ओङ्कारान्तरबिन्दुमध्यसदनं ह्रीङ्कारलभ्यं नुमो
व्योमाकारशिखाविभाविमुनिसन्दृश्यं चिदात्मेश्वरम् ॥4॥
वेदान्तार्थविचक्षणैरतितरां ब्रह्मेति यः कथ्यतेऽ-
प्यन्यैर्योगिजनैर्महापुरुष इत्यष्टाङ्गिभिश्चिन्तितः ।
कैश्चिल्लोकविपत्तिकृत् त्रिनयनःश्रीनीलकण्ठः स्मृतः
तं वन्दे परमात्मनाथमनिशं कुन्दद्रुमाधः स्थितम् ॥5॥
Meaning:
षडाधारोर्ध्वसन्निष्ठं षडुत्कर्षस्थलेश्वरम् ।
षट्सभारमणं वन्दे षडध्वाराधनक्षमम् ॥
इस श्लोक में भगवान शिव की स्तुति की गई है, जो छह आधारों से ऊपर स्थित हैं। षडाधार का अर्थ है शरीर के छह प्रमुख चक्र – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा। ऊर्ध्वसन्निष्ठं बताता है कि वे इन सबके पार, सहस्रार से भी परे स्थित परम चैतन्य हैं। षडुत्कर्षस्थलेश्वरम् का आशय उन छह उच्च आध्यात्मिक स्तरों के अधिपति से है।
षट्सभारमणं एक प्रतीकात्मक पद है, जो दर्शाता है कि वे सृष्टि के विविध मंडलों में क्रीड़ा करने वाले हैं। षडध्वा का संबंध तत्त्वों, भुवनों और शक्तियों के छह मार्गों से है। भगवान इन सब मार्गों से आराध्य हैं। इस प्रकार शिव यहाँ योगमार्ग के चरम लक्ष्य, समस्त तत्त्वों के आधार और उनसे परे स्थित परम तत्व के रूप में प्रकट होते हैं।
श्रीमत्श्रीकुन्दमूलस्थललसितमहायोगपीठे निषण्णः
सर्वाधारो महात्माऽप्यनुपमितमहास्वादिकैलासवासी ।
यस्यास्ते कामिनी या नतजनवरदा योगमाता महेशी
सोऽव्यादात्मेश्वरो मां शिवपुररमणः सच्चिदानन्दमूर्तिः ॥
यहाँ भगवान को दिव्य योगपीठ में विराजमान बताया गया है। वे श्रीकुंड के मूल में स्थित हैं, जो सूक्ष्म शरीर में मूलाधार का भी संकेत करता है। वे सर्वाधार हैं, अर्थात सम्पूर्ण जगत उन्हीं पर आश्रित है। साथ ही वे कैलासवासी हैं, जो उनके दिव्य धाम का संकेत है।
उनकी अर्धांगिनी महेशी योगमाता हैं, जो भक्तों को वर प्रदान करती हैं। यह शिव और शक्ति की अखंड एकता का दार्शनिक रूप है। शिव चेतना हैं और शक्ति उसकी गतिशील अभिव्यक्ति।
उन्हें सच्चिदानन्दमूर्ति कहा गया है – वे सत्, चित् और आनन्द के स्वरूप हैं। आत्मेश्वर के रूप में वे प्रत्येक जीव के अंतःकरण में विराजते हैं और शिवपुर के रमण, अर्थात मोक्षधाम के अधिपति हैं।
यो वेदान्तविचिन्त्यरूपमहिमा यं याति सर्वं जगत्
येनेदं भुवनं भृतं विधिमुखाः कुर्वन्ति यस्मै नमः ।
यस्मात् सम्प्रभवन्ति भूतनिकराः यस्य स्मृतिर्मोक्षकृत्
यस्मिन् योगरतिः शिवेति स महानात्मेश्वरः पातु नः ॥
इस श्लोक में शिव को वेदान्त द्वारा विचारणीय परम ब्रह्म कहा गया है। समस्त जगत उन्हीं की ओर अग्रसर होता है और उन्हीं से संचालित है। ब्रह्मा आदि देवता भी उन्हीं की शक्ति से अपने कार्य करते हैं।
सभी प्राणी उन्हीं से उत्पन्न होते हैं और अंततः उन्हीं में लीन होते हैं। उनकी स्मृति मोक्ष देने वाली है। यहाँ स्मरण मात्र को मुक्ति का साधन बताया गया है।
योग में जो आनन्द और लय का अनुभव होता है, वही शिवस्वरूप है। वे महान आत्मेश्वर हैं, जो जीव के भीतर परम आत्मा के रूप में स्थित हैं।
तुर्यातीतपदोर्ध्वगं गुणपरं सत्तामयं सर्वगं
संवेद्यं श्रुतिशीर्षकैरनुपमं सर्वाधिकं शाश्वतम् ।
ओङ्कारान्तरबिन्दुमध्यसदनं ह्रीङ्कारलभ्यं नुमो
व्योमाकारशिखाविभाविमुनिसन्दृश्यं चिदात्मेश्वरम् ॥
यहाँ शिव को तुरीय से भी परे बताया गया है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय – इन चार अवस्थाओं से ऊपर स्थित वह परम चेतना ही शिव हैं। वे त्रिगुणातीत हैं और शुद्ध सत्ता स्वरूप हैं।
उपनिषदों के मर्मज्ञ ऋषि जिनका अनुभव करते हैं, वही यह परम तत्व है। ओंकार के भीतर स्थित बिंदु में उनका निवास बताया गया है। ह्रींकार के द्वारा उनकी प्राप्ति का संकेत तांत्रिक साधना से जुड़ा है।
वे आकाश के समान व्यापक हैं और ध्यान में मुनियों को प्रकाश-ज्योति के रूप में प्रकट होते हैं। चिदात्मेश्वर के रूप में वे चेतना के भी अधिपति हैं।
वेदान्तार्थविचक्षणैरतितरां ब्रह्मेति यः कथ्यतेऽ
प्यन्यैर्योगिजनैर्महापुरुष इत्यष्टाङ्गिभिश्चिन्तितः ।
कैश्चिल्लोकविपत्तिकृत् त्रिनयनःश्रीनीलकण्ठः स्मृतः
तं वन्दे परमात्मनाथमनिशं कुन्दद्रुमाधः स्थितम् ॥
यहाँ विभिन्न दृष्टिकोणों का समन्वय है। वेदान्त के ज्ञानी उन्हें ब्रह्म कहते हैं। योगीजन उन्हें महापुरुष मानकर अष्टांग योग के माध्यम से ध्यान करते हैं।
कुछ लोग उन्हें त्रिनेत्रधारी नीलकण्ठ के रूप में स्मरण करते हैं, जिन्होंने समुद्र मंथन के समय विषपान कर लोकों की रक्षा की। यह कथा उनके करुणामय स्वरूप को दर्शाती है।
इस प्रकार वही परमात्मा विभिन्न मार्गों में विभिन्न नामों से पूजित है। वे ब्रह्म भी हैं, महापुरुष भी और लोक रक्षक भी। कुंद वृक्ष के नीचे स्थित उस परमात्मनाथ को मैं निरंतर प्रणाम करता हूँ।