शिव पंचाक्षर स्तोत्र

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' की महिमा गाता है। इसका प्रत्येक अक्षर ब्रह्मांड के एक तत्व और शिव के एक विशेष गुण को दर्शाता है। आइए, भक्ति के रस में डूबकर इसका अर्थ समझते हैं।

१. प्रथम अक्षर 'न' (नकार): विस्मय और अनंतता

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥

भावानुवाद:
हम उस 'महेश्वर' के सामने नतमस्तक हैं, जिनका श्रृंगार ही विस्मयकारी है। विचार कीजिए—जिनके गले में नागराज लिपटे हैं, जो काल का प्रतीक हैं, फिर भी शिव निर्भय हैं। उनके तीन नेत्र हमें यह बोध कराते हैं कि वे न केवल इस दृश्य जगत को देखते हैं, बल्कि हमारे भीतर छिपे सत्य को भी जानते हैं। उनके शरीर पर लगी भस्म हमें जीवन की नश्वरता सिखाती है—कि अंततः सब कुछ राख है, केवल वे ही 'नित्य' (शाश्वत) और 'शुद्ध' हैं। वे 'दिगम्बर' हैं, जिनका कोई वस्त्र नहीं क्योंकि सारा आकाश ही उनका स्वरूप है। ऐसे असीम और दिव्य 'न' अक्षर स्वरूप शिव को मेरा प्रणाम है।

२. द्वितीय अक्षर 'म' (मकार): शीतलता और समर्पण

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय ॥

भावानुवाद:
यहाँ शिव का अत्यंत सौम्य और प्रेममय रूप प्रकट होता है। कल्पना कीजिए—गंगा (मन्दाकिनी) की शीतल धाराओं से अभिसिंचित और सुगंधित चंदन से महकते हुए महादेव। वे नंदी के प्रिय स्वामी हैं और 'प्रमथों' (गणों) के नाथ हैं। शिव की करुणा देखिए, वे उन्हें भी अपनाते हैं जिन्हें समाज त्याग देता है। वे पारिजात और मंदार के सुगंधित पुष्पों से पूजे जाते हैं। यह श्लोक हृदय में एक कोमल भक्ति जगाता है, जहाँ हम अपने अहंकार को चंदन की तरह घिसकर उनके चरणों में अर्पित कर देते हैं। उस सुंदर 'म' अक्षर स्वरूप शिव को मेरा नमन है।

३. तृतीय अक्षर 'शि' (शिकारक): प्रेम और करुणा

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय ॥

भावानुवाद:
यह श्लोक प्रेम की पराकाष्ठा है। शिव उस सूर्य के समान हैं, जिनकी आभा से माता पार्वती (गौरी) का मुख-कमल खिल उठता है। यह उनके अर्धनारीश्वर रूप की कोमलता को दर्शाता है। लेकिन वे केवल कोमल ही नहीं, वे 'दक्ष' के अहंकार रूपी यज्ञ का विनाश करने वाले महाप्रलयंकारी भी हैं। वे 'नीलकंठ' हैं—सृष्टि को बचाने के लिए विष पी जाने वाले परम कृपालु। उनका नीला कंठ उनके बलिदान और हमसे उनके निस्वार्थ प्रेम का प्रमाण है। ऐसे रक्षक और प्रेमी 'शि' अक्षर स्वरूप शिव को मेरा बारंबार वंदन है।

४. चतुर्थ अक्षर 'व' (वकार): ज्ञान और प्रकाश

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय ॥

भावानुवाद:
शिव केवल वैरागियों के ही नहीं, परम ज्ञानियों के भी आराध्य हैं। वसिष्ठ, अगस्त्य और गौतम जैसे महान ऋषि, जिनके ज्ञान का कोई अंत नहीं, वे भी शिव के चरणों में मौन हो जाते हैं। शिव की तीन आँखें सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं—जो पूरे ब्रह्मांड को प्रकाश और ऊर्जा देती हैं। वे ज्ञान के उस शिखर पर विराजमान हैं जहाँ पहुँचकर देवता भी नतमस्तक होते हैं। जब हम इस रूप का ध्यान करते हैं, तो हम एक असीम श्रद्धा (Awe) से भर जाते हैं कि सारा ब्रह्मांड उनकी एक दृष्टि में समाया है। उस प्रकाशपुंज 'व' अक्षर स्वरूप शिव को मेरा प्रणाम है।

५. पंचम अक्षर 'य' (यकार): एकाकार और पूर्णता

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय ॥

भावानुवाद:
अंतिम अक्षर 'य' हमें बताता है कि शिव ही 'यज्ञ' हैं—वे ही पूजा हैं, वे ही अर्पण हैं। वे 'सनातन' हैं, जिनका न आदि है न अंत। उनके हाथों में 'पिनाक' धनुष है जो धर्म की रक्षा करता है और उनकी उलझी हुई जटाएं प्रकृति की अनंत ऊर्जा का प्रतीक हैं। वे 'दिव्य' हैं, स्वयं प्रकाशमान हैं। इस श्लोक तक आते-आते भक्त को आभास होता है कि शिव उससे दूर नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व के कण-कण में रमे हैं। इस पूर्णता के अनुभव के साथ, हम उस 'य' अक्षर स्वरूप शिव को अपना सर्वस्व समर्पित करते हैं।

फलश्रुति: भक्ति का उपहार

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

जो भक्त इस पावन पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ शिव की उपस्थिति (हृदय के मंदिर) में करता है, वह समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। वह 'शिवलोक' को प्राप्त करता है—यह कोई भौतिक स्थान नहीं, बल्कि वह परम आनंद (Bliss) की अवस्था है जहाँ जीवात्मा परमात्मा के साथ एकाकार होकर अनंत सुख का अनुभव करती है।

निष्कर्ष:
यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि शिव जितने भयानक (नाग और भस्म वाले) हैं, उतने ही सुंदर (चंदन और पुष्प वाले) भी हैं। वे संहारक भी हैं और परम प्रेमी भी। 'नमः शिवाय' केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि शिव के विराट सागर में उतरने की एक पुकार है।

ॐ नमः शिवाय। 

 

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय|
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय|
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द-
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय|
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य-
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय|
यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय|

 

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