नृत्य विजय नटराज स्तोत्र

नृत्य विजय नटराज स्तोत्र

Lyrics:

नमोऽस्तु नटराजाय सर्वसिद्धिप्रदायिने । 

सदाशिवाय शान्ताय नृत्यशास्त्रैकसाक्षिणे ॥1॥

भो नटेश सुरश्रेष्ठ मां पश्य कृपया हर । 

कौशलं मे प्रदेह्याऽऽशु नृत्ये नित्यं जटाधर ॥2॥

सर्वाङ्गसुन्दरं देहि भावनां शुद्धिमुत्तमाम् । 

नृत्येऽहं विजयी जाये त्वदनुग्रहलाभतः ॥3॥

शिवाय ते नमो नित्यं नटराज विभो प्रभो । 

द्रुतं सिद्धिं प्रदेहि त्वं नृत्ये नाट्ये महेश्वर ॥4॥

नमस्करोमि श्रीकण्ठ तव पादारविन्दयोः । 

नृत्यसिद्धिं कुरु स्वामिन् नटराज नमोऽस्तु ते ॥5॥

सुस्तोत्रं नटराजस्य प्रत्यहं यः पठेत् सुधीः‌ । 

नृत्ये विजयमाप्नोति लोकप्रीतिं च विन्दति ॥6॥

Meaning:

Verse 1
नमोऽस्तु नटराजाय सर्वसिद्धिप्रदायिने ।
सदाशिवाय शान्ताय नृत्यशास्त्रैकसाक्षिणे ॥1॥

इस श्लोक में भगवान शिव को नटराज रूप में नमस्कार किया गया है। ‘नटराज’ का अर्थ है नृत्य के राजा, जो सम्पूर्ण सृष्टि के गति और लय के स्वामी हैं। ‘सर्वसिद्धिप्रदायिने’ का अर्थ है सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाले, चाहे वह कला की हो, ज्ञान की हो या आध्यात्मिक उन्नति की। ‘सदाशिव’ का अर्थ है सदा कल्याणकारी और शाश्वत चेतना स्वरूप, जबकि ‘शान्त’ उनके उस रूप को दर्शाता है जो भीतर से पूर्ण स्थिर और निर्विकार है।

पौराणिक दृष्टि से नटराज का ताण्डव नृत्य सृष्टि, स्थिति और संहार का प्रतीक है। यह नृत्य केवल कला नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड की धड़कन है। शिव ही नृत्यशास्त्र के साक्षी हैं, अर्थात् वे ही उसके मूल स्रोत और प्रमाण हैं।

आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक बताता है कि जीवन की हर गति, हर परिवर्तन एक दिव्य नृत्य का हिस्सा है। जब साधक शिव को इस रूप में स्वीकार करता है, तो वह समझता है कि सफलता केवल बाहरी कौशल से नहीं, बल्कि उस परम चेतना से जुड़ने से मिलती है जो सबको संचालित करती है।

Verse 2
भो नटेश सुरश्रेष्ठ मां पश्य कृपया हर ।
कौशलं मे प्रदेह्याऽऽशु नृत्ये नित्यं जटाधर ॥2॥

इस श्लोक में भक्त भगवान शिव से विनम्र निवेदन करता है। ‘भो नटेश’ कहकर उन्हें संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है हे नृत्य के स्वामी। ‘सुरश्रेष्ठ’ से उनका देवताओं में सर्वोच्च स्थान व्यक्त होता है। भक्त कहता है कि हे हर, मुझ पर कृपा दृष्टि डालो और मुझे देखो।

‘जटाधर’ शिव का वह स्वरूप है जिसमें वे जटाओं से अलंकृत हैं, जो उनकी तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। यहाँ भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वह उसे नृत्य में कौशल प्रदान करें। यह केवल शारीरिक कला की बात नहीं है, बल्कि मन, भाव और चेतना के संतुलन की भी बात है।

पौराणिक रूप में शिव ने ताण्डव के माध्यम से अनेक बार सृष्टि के संतुलन को पुनर्स्थापित किया। उनका नृत्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि दिव्य ऊर्जा का प्रवाह है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि कोई भी कला तभी पूर्ण होती है जब उसमें ईश्वरीय अनुग्रह जुड़ता है। केवल अभ्यास से नहीं, बल्कि कृपा से ही कौशल में चमक आती है।

Verse 3
सर्वाङ्गसुन्दरं देहि भावनां शुद्धिमुत्तमाम् ।
नृत्येऽहं विजयी जाये त्वदनुग्रहलाभतः ॥3॥

इस श्लोक में साधक भगवान से केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण अंगों की सुन्दरता और शुद्ध भावना की प्रार्थना करता है। ‘सर्वाङ्गसुन्दरम्’ का अर्थ है शरीर के प्रत्येक अंग में संतुलन और आकर्षण। ‘भावनां शुद्धिम्’ का अर्थ है मन की पवित्रता और भावों की निर्मलता।

नृत्य में केवल शरीर का संचालन पर्याप्त नहीं होता, उसमें भाव, अभिव्यक्ति और अंतःकरण की शुद्धता आवश्यक होती है। यही कारण है कि भक्त कहता है कि आपकी कृपा से मैं नृत्य में विजयी बनूं।

पौराणिक रूप से देखा जाए तो शिव का नृत्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भाव और चेतना का संपूर्ण समन्वय है। उनका प्रत्येक भाव एक गहरा अर्थ रखता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक सिखाता है कि सफलता का मूल कारण बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि भीतर की शुद्धता है। जब भाव शुद्ध होते हैं, तब कार्य में स्वतः ही उत्कृष्टता आती है और वही सच्ची विजय है।

Verse 4
शिवाय ते नमो नित्यं नटराज विभो प्रभो ।
द्रुतं सिद्धिं प्रदेहि त्वं नृत्ये नाट्ये महेश्वर ॥4॥

इस श्लोक में भक्त निरंतर भगवान शिव को नमस्कार करता है। ‘विभो’ और ‘प्रभो’ उनके सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान स्वरूप को दर्शाते हैं। ‘महेश्वर’ का अर्थ है महान ईश्वर, जो सभी देवताओं के भी स्वामी हैं।

यहाँ साधक उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसे नृत्य और नाट्य दोनों में शीघ्र सिद्धि प्रदान करें। नृत्य और नाट्य दोनों ही भारतीय परंपरा में केवल कला नहीं, बल्कि साधना के माध्यम माने जाते हैं।

पौराणिक रूप से नाट्यशास्त्र की उत्पत्ति भी देवताओं की प्रेरणा से हुई मानी जाती है, जिसमें शिव का विशेष योगदान है। उनका ताण्डव और पार्वती का लास्य मिलकर सम्पूर्ण नाट्यकला का आधार बनते हैं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक दर्शाता है कि जीवन स्वयं एक नाट्य है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति एक पात्र है। जब वह इस नाट्य को ईश्वर को समर्पित करता है, तब उसका हर कार्य सिद्धि की ओर बढ़ता है।

Verse 5
नमस्करोमि श्रीकण्ठ तव पादारविन्दयोः ।
नृत्यसिद्धिं कुरु स्वामिन् नटराज नमोऽस्तु ते ॥5॥

इस श्लोक में भक्त भगवान शिव के चरणों में नमस्कार करता है। ‘श्रीकण्ठ’ नाम उस घटना को दर्शाता है जब उन्होंने समुद्र मंथन के विष को अपने कण्ठ में धारण किया। यह त्याग और करुणा का प्रतीक है।

‘पादारविन्द’ का अर्थ है उनके चरणकमल, जो शरण और मुक्ति का प्रतीक हैं। भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसे नृत्य में सिद्धि प्रदान करें।

पौराणिक दृष्टि से शिव का यह स्वरूप हमें सिखाता है कि वे केवल संहारक नहीं, बल्कि रक्षक भी हैं, जो संसार के कल्याण के लिए स्वयं कष्ट सहते हैं।

आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक बताता है कि जब साधक अपने अहंकार को त्यागकर ईश्वर के चरणों में झुकता है, तभी उसे सच्ची सिद्धि प्राप्त होती है। नम्रता ही सफलता का द्वार खोलती है।

Verse 6
सुस्तोत्रं नटराजस्य प्रत्यहं यः पठेत् सुधीः‌ ।
नृत्ये विजयमाप्नोति लोकप्रीतिं च विन्दति ॥6॥

इस अंतिम श्लोक में इस स्तोत्र के फल का वर्णन किया गया है। ‘सुधीः’ का अर्थ है बुद्धिमान व्यक्ति। जो व्यक्ति प्रतिदिन इस नटराज स्तोत्र का पाठ करता है, वह नृत्य में विजय प्राप्त करता है और लोगों की प्रियता भी प्राप्त करता है।

यह केवल बाहरी सफलता की बात नहीं है। ‘लोकप्रीति’ का अर्थ है समाज में सम्मान और प्रेम मिलना, जो केवल कौशल से नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की आंतरिक गुणवत्ता से आता है।

पौराणिक दृष्टि से स्तोत्रों का जप साधना का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है, जिससे देवता की कृपा प्राप्त होती है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि नियमित साधना और स्मरण से व्यक्ति के भीतर एक दिव्य परिवर्तन होता है। उसका कार्य निखरता है, उसका व्यवहार मधुर होता है, और वह समाज में सम्मानित बनता है। यही सच्ची सफलता है, जहाँ कला, चरित्र और चेतना तीनों एक हो जाते हैं।

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