
Lyrics:
कुरुसदसि कृताभूद्द्रौपदीवस्त्रशेषा
सकलनृपवरेन्द्रा यत्र वक्तुं न शक्ताः ।
हरिचरणरताङ्गी येन तत्रात्मधीरा
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ १॥
प्रथमजननपापप्राप्तसम्प्रेतदेहौ
समय इह ममास्मिन्कृष्णभक्त्या समेतौ ।
गलितपतितवेषावुद्धतौ येन सद्यः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ २॥
कमलदलसुनेत्रेणैव भूतेशमाया-
ततिभिरिव हि येन भ्रामितः सर्वलोकः ।
अखिलजगति सर्वस्वीयभक्ताः कृतार्थाः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ३॥
सकलयदुकुलेन्द्रो येन कंसो हतोऽभूत्
जननसमयपूर्वं देवकीशूरयोश्च ।
परिहृतमपि दुःखं यामिका मोहिताश्च
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ४॥
तपनदुहितुरन्तः कालियो मारितः सन्
अलिगणसुहितेऽस्मिंस्तत्फणे येन नृत्यम् ।
कृतमपि च तदम्भो लम्भितं निर्विषत्वं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ५॥
कपटकृतशरीरा पूतना प्रापिताऽभ्रं
व्रजपतिगृहसुप्तावेकपादेन येन ।
शकट असुरवेषः प्रेषितः स्थाननाशं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ६॥
पदनतियुतहस्ता तोषिता येन कुन्ती
ह्यसुरकुलसमूहा हिंसिता वीर्यवन्तः ।
अखिलभुवनभारः प्रेषितः संलघुत्वं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ७॥
अखिलसुरकुलेन्द्रस्यैव येनाभिमानो
गिरिवरधरणेन क्षीणतां प्रापितश्च ।
जलधरभवधाराः संहृता ग्रावयुक्ताः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ८॥
विट्ठलेशाष्टकमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
भक्त्या नत्वा च सुमनाः स याति परमां गतिम् ॥ ९॥
Meaning:
Verse 1
कुरुसदसि कृताभूद्द्रौपदीवस्त्रशेषा
सकलनृपवरेन्द्रा यत्र वक्तुं न शक्ताः ।
हरिचरणरताङ्गी येन तत्रात्मधीरा
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ १॥
इस श्लोक में कुरु सभा का वह अत्यंत मार्मिक प्रसंग स्मरण कराया गया है जहाँ द्रौपदी अपमानित स्थिति में खड़ी थीं और सभी महान राजा मौन थे। ‘वस्त्रशेषा’ शब्द उनके उस संकट को दर्शाता है जब उनकी लाज पर आघात हुआ। कोई भी उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आया।
उस समय द्रौपदी ने अपने मन और शरीर को पूर्णतः हरि के चरणों में समर्पित कर दिया। ‘हरिचरणरताङ्गी’ का अर्थ है कि उनका सम्पूर्ण अस्तित्व भगवान में लीन हो गया। इसी समर्पण ने उन्हें भीतर से धैर्य दिया और भगवान ने उनकी रक्षा की।
यह प्रसंग केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक सच्चाई को प्रकट करता है। जब मनुष्य अपनी अहंकार शक्ति छोड़कर पूर्ण श्रद्धा से भगवान का आश्रय लेता है, तब दिव्य सहायता स्वतः प्रकट होती है।
इसलिए कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश मेरे जीवन में भी सहायक बनें, जो असहाय की रक्षा करते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं।
Verse 2
प्रथमजननपापप्राप्तसम्प्रेतदेहौ
समय इह ममास्मिन्कृष्णभक्त्या समेतौ ।
गलितपतितवेषावुद्धतौ येन सद्यः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ २॥
यह श्लोक जीव के पूर्व जन्मों के पापों और उनके परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली निम्न अवस्थाओं का वर्णन करता है। ‘सम्प्रेतदेह’ उस अशांत स्थिति को दर्शाता है जिसमें जीव अपनी असंतुष्ट इच्छाओं के कारण बंधा रहता है।
किन्तु ‘कृष्णभक्त्या समेतौ’ यह बताता है कि भगवान कृष्ण की भक्ति से यह स्थिति बदल सकती है। भक्ति केवल भाव नहीं है, बल्कि एक परिवर्तनकारी शक्ति है जो जीव को उसके पतित रूप से ऊपर उठाती है।
‘गलितपतितवेषौ’ का अर्थ है कि गिरा हुआ स्वरूप स्वतः नष्ट हो जाता है और जीव तुरंत ऊर्ध्वगति को प्राप्त करता है। यह परिवर्तन तत्काल हो सकता है जब भक्ति सच्ची और गहरी हो।
यह श्लोक इस बात को स्थापित करता है कि चाहे जीव कितना भी नीचे गिरा हो, भगवान की कृपा उसे ऊपर उठा सकती है। कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसकी उन्नति और कल्याण के कारण बनें।
Verse 3
कमलदलसुनेत्रेणैव भूतेशमाया-
ततिभिरिव हि येन भ्रामितः सर्वलोकः ।
अखिलजगति सर्वस्वीयभक्ताः कृतार्थाः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ३॥
इस श्लोक में भगवान की मोहिनी शक्ति का वर्णन है। ‘कमलदलसुनेत्र’ भगवान की सुंदरता और आकर्षण को दर्शाता है। उनके नेत्र कमल के समान कोमल और आकर्षक हैं।
भगवान अपनी माया के द्वारा समस्त जगत को भ्रमित करते हैं। ‘भूतेशमाया’ उस शक्ति को दर्शाती है जो संसार को संचालित करती है और जीवों को कर्मों के बंधन में रखती है।
किन्तु यह माया भक्तों को बंधन में नहीं रखती। ‘सर्वस्वीयभक्ताः कृतार्थाः’ का अर्थ है कि जो भगवान के सच्चे भक्त हैं, वे इस माया से परे होकर जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त कर लेते हैं।
यह श्लोक यह स्पष्ट करता है कि भगवान ही बंधन और मुक्ति दोनों के कारण हैं। जो उनके निकट जाते हैं, वे मुक्त होते हैं। अतः कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसकी जीवन यात्रा में सहायक बनें।
Verse 4
सकलयदुकुलेन्द्रो येन कंसो हतोऽभूत्
जननसमयपूर्वं देवकीशूरयोश्च ।
परिहृतमपि दुःखं यामिका मोहिताश्च
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ४॥
इस श्लोक में भगवान कृष्ण के जन्म और कंस वध की कथा का उल्लेख है। कंस ने अपने भय के कारण देवकी और वसुदेव को बंदी बना लिया और उनके पुत्रों का वध किया।
‘जननसमयपूर्वं’ यह संकेत करता है कि भगवान के जन्म से पहले ही कंस का अंत निश्चित हो चुका था। भगवान की लीला में सब कुछ पहले से नियोजित होता है।
जब कृष्ण का जन्म हुआ, तब कारागार के द्वार खुल गए और पहरेदार ‘मोहित’ हो गए। यह भगवान की माया का प्रभाव था जिससे वसुदेव बालक को सुरक्षित स्थान पर ले जा सके।
यह प्रसंग यह दर्शाता है कि भगवान कठिन परिस्थितियों में भी अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और दुःख को दूर करते हैं। कवि उसी विठ्ठलेश से अपने जीवन में सहायता की प्रार्थना करता है।
Verse 5
तपनदुहितुरन्तः कालियो मारितः सन्
अलिगणसुहितेऽस्मिंस्तत्फणे येन नृत्यम् ।
कृतमपि च तदम्भो लम्भितं निर्विषत्वं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ५॥
यह श्लोक कालिय नाग की कथा का वर्णन करता है जिसने यमुना नदी को विषाक्त कर दिया था। ‘तपनदुहितुः’ यमुना नदी का संकेत है।
भगवान कृष्ण ने कालिय को पराजित किया और उसके फनों पर नृत्य किया। यह नृत्य केवल विजय नहीं, बल्कि नियंत्रण और संतुलन का प्रतीक है।
‘निर्विषत्वं’ का अर्थ है कि नदी का जल पुनः शुद्ध हो गया। भगवान केवल बुराई को नष्ट नहीं करते, बल्कि वातावरण को भी शुद्ध करते हैं।
यह कथा आंतरिक दृष्टि से बताती है कि हमारे भीतर के विष जैसे क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार को भगवान की कृपा से शांत किया जा सकता है।
कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसके जीवन के विष को दूर करें और उसे शुद्ध और शांत बनाएं।
Verse 6
कपटकृतशरीरा पूतना प्रापिताऽभ्रं
व्रजपतिगृहसुप्तावेकपादेन येन ।
शकट असुरवेषः प्रेषितः स्थाननाशं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ६॥
इस श्लोक में कृष्ण के बाल्यकाल की लीलाओं का वर्णन है। पूतना नामक राक्षसी ने छलपूर्वक बालक कृष्ण को मारने का प्रयास किया। ‘कपटकृतशरीरा’ उसके कपट को दर्शाता है।
भगवान ने उसे मारकर भी उसे मोक्ष प्रदान किया। यह उनकी करुणा का परिचायक है।
‘एकपादेन’ से संकेत मिलता है कि कृष्ण ने केवल एक पैर से ही शकटासुर का नाश कर दिया। यह उनकी सहज शक्ति को दर्शाता है।
यह प्रसंग यह बताता है कि भगवान छिपे हुए खतरों को भी पहचानते हैं और उन्हें समाप्त करते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से पूतना झूठे आकर्षणों का प्रतीक है और शकटासुर हमारे भीतर के बोझ का। भगवान इन दोनों को दूर करते हैं।
कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसकी रक्षा करें और उसे सुरक्षित रखें।
Verse 7
पदनतियुतहस्ता तोषिता येन कुन्ती
ह्यसुरकुलसमूहा हिंसिता वीर्यवन्तः ।
अखिलभुवनभारः प्रेषितः संलघुत्वं
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ७॥
इस श्लोक में कुन्ती की भक्ति और भगवान के द्वारा अधर्म का नाश वर्णित है। कुन्ती ने भगवान के प्रति विनम्र होकर कृतज्ञता प्रकट की।
‘असुरकुलसमूहा हिंसिता’ दर्शाता है कि भगवान ने शक्तिशाली दुष्टों का नाश किया और धर्म की रक्षा की।
‘अखिलभुवनभारः संलघुत्वं’ का अर्थ है कि पृथ्वी पर बढ़े हुए अधर्म का भार कम किया गया।
यह श्लोक यह सिखाता है कि भगवान केवल व्यक्तिगत सहायता नहीं करते, बल्कि समष्टि स्तर पर संतुलन स्थापित करते हैं।
कुन्ती की तरह जब मनुष्य कृतज्ञता और समर्पण रखता है, तब उसे भगवान की कृपा स्पष्ट दिखाई देती है।
कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसके जीवन में भी संतुलन और संरक्षण प्रदान करें।
Verse 8
अखिलसुरकुलेन्द्रस्यैव येनाभिमानो
गिरिवरधरणेन क्षीणतां प्रापितश्च ।
जलधरभवधाराः संहृता ग्रावयुक्ताः
स भवतु मम भूत्यै विठ्ठलेशः सहायः ॥ ८॥
यह श्लोक गोवर्धन पर्वत धारण की लीला का वर्णन करता है। इन्द्र के अहंकार को भगवान ने समाप्त किया।
‘गिरिवरधरण’ का अर्थ है गोवर्धन पर्वत को उठाना। इस लीला से भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा की और इन्द्र का अभिमान तोड़ा।
भारी वर्षा को रोककर उन्होंने व्रजवासियों को सुरक्षित रखा।
यह प्रसंग यह सिखाता है कि भगवान अपने भक्तों के लिए असंभव कार्य भी सहजता से कर सकते हैं।
आध्यात्मिक रूप से गोवर्धन स्थिर विश्वास का प्रतीक है। जब विश्वास मजबूत होता है, तब बाहरी संकट प्रभाव नहीं डालते।
कवि प्रार्थना करता है कि वही विठ्ठलेश उसकी रक्षा करें और उसे स्थिरता प्रदान करें।
Verse 9
विट्ठलेशाष्टकमिदं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
भक्त्या नत्वा च सुमनाः स याति परमां गतिम् ॥ ९॥
यह अंतिम श्लोक इस स्तोत्र के फल का वर्णन करता है। जो व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह भगवान की कृपा प्राप्त करता है।
‘भक्त्या’ का अर्थ है सच्चे भाव से और ‘सुमनाः’ का अर्थ है शांत और निर्मल मन से।
यह केवल यांत्रिक पाठ नहीं होना चाहिए, बल्कि श्रद्धा और एकाग्रता के साथ होना चाहिए।
‘परमां गतिम्’ का अर्थ है सर्वोच्च अवस्था, जो मोक्ष या आंतरिक शांति दोनों हो सकती है।
यह श्लोक यह बताता है कि नियमित साधना और भक्ति से जीवन में स्थिरता, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
कवि अंत में यही कामना करता है कि विठ्ठलेश की कृपा से साधक को परम लक्ष्य की प्राप्ति हो।