जितं जितं तेऽजित यज्ञभावना त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः ।
यद्रोमगर्तेषु निलिल्युरध्वरास्तस्मै नमः कारणसूकराय ते ॥
हे अजित! आपकी जय हो, जय हो! आप यज्ञ के साक्षात स्वरूप हैं। वेदमय शरीर को झिटकारने वाले आपको नमस्कार है। जिनके रोमकूपों में समस्त यज्ञ विलीन हैं, उन आदि-कारण वराह भगवान को हमारा प्रणाम है।
यह श्लोक सनकादि ऋषियों द्वारा भगवान के वराह अवतार की स्तुति का मंगलाचरण है। वे भगवान को 'अजित' कहकर संबोधित करते हैं, जिसका अर्थ है कि उन्हें कोई जीत नहीं सकता। वे उनकी जय-जयकार करते हैं। भगवान का यह वराह रूप कोई साधारण पशु का नहीं, अपितु 'यज्ञभावना' अर्थात यज्ञ का ही मूर्तिमान स्वरूप है। जब भगवान ने अपने विशाल वेदमय ('त्रयीं तनुं' अर्थात ऋक्, यजुः, साम वेदमय) शरीर को कम्पित किया, तो मानो सम्पूर्ण यज्ञ-क्रिया ही प्रकट हो उठी। उनकी महिमा इतनी अगाध है कि उनके प्रत्येक रोमकूप में समस्त यज्ञ समाये हुए हैं। वे ही सृष्टि के आदि कारण हैं, जिन्होंने यह रूप धारण किया है, अतः ऋषिगण उन्हें नमन करते हैं।
रूपं तवैतन्ननु दुष्कृतात्मनां दुर्दर्शनं देव यदध्वरात्मकम् ।
छन्दांसि यस्य त्वचि बर्हिरोमस्वाज्यं दृशि त्वङ्घ्रिषु चातुर्होत्रम् ॥
हे देव! आपका यह यज्ञमय स्वरूप निश्चय ही पाप-बुद्धि मनुष्यों के लिए दुर्दर्शनीय है (अर्थात वे इसे देख नहीं सकते)। आपके इस स्वरूप में त्वचा ही वैदिक छन्द हैं, रोम कुश हैं, नेत्रों में घृत (घी) है और चारों चरणों में चातुर्होत्र कर्म (चारों ऋत्विजों की क्रिया) स्थित है।
ऋषिगण भगवान के यज्ञमय स्वरूप का रहस्य खोलते हैं। वे कहते हैं कि जो दुष्ट आत्माएं हैं, जिनकी बुद्धि पाप में लिप्त है, वे आपके इस दिव्य रूप के दर्शन नहीं कर सकतीं; उन्हें यह केवल एक पशु का रूप ही प्रतीत होगा। किन्तु ज्ञानीजन आपके इस शरीर में सम्पूर्ण यज्ञ को प्रतिष्ठित देखते हैं। आपकी त्वचा ही गायत्री, अनुष्टुप् आदि वैदिक छन्द हैं। आपके शरीर के रोम ही यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली पवित्र 'कुश' हैं। आपके नेत्रों में वही स्निग्धता और तेज है जो यज्ञ के 'आज्य' अर्थात घी में होता है। आपके चार चरण ही यज्ञ को सम्पन्न कराने वाले चार प्रमुख पुरोहित (होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा) के कर्मों का आधार हैं। इस प्रकार आपका सम्पूर्ण शरीर ही एक जीवंत यज्ञवेदी है।
स्रुक्तुण्ड आसीत्स्रुव ईश नासयोरिडोदरे चमसाः कर्णरन्ध्रे ।
प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु ते यच्चर्वणं ते भगवन्नग्निहोत्रम् ॥
हे ईश्वर! आपका तुण्ड (थूथन) 'स्रुक्' है, नासिका के छिद्र 'स्रुव' हैं, उदर 'इडापात्र' है और कर्ण-रन्ध्र 'चमस' पात्र हैं। आपका मुख 'प्राशित्र' पात्र है और आपकी ग्रसन-क्रिया (निगलना) ही सोमपान के 'ग्रह' (पात्र) हैं। हे भगवन्! आपका चर्वण (चबाना) ही 'अग्निहोत्र' यज्ञ है।
यहाँ भगवान के एक-एक अंग को यज्ञ की सामग्री और पात्रों के रूप में देखा जा रहा है। उनका थूथन 'स्रुक्' (घी डालने का बड़ा चम्मच) है और नासिका के छिद्र 'स्रुव' (छोटा चम्मच) हैं। उनका विशाल उदर 'इडापात्र' है, जिसमें यज्ञ की हविष्य सामग्री रखी जाती है। उनके कान के छिद्र 'चमस' हैं, जो सोम रस पीने के पात्र होते हैं। उनका मुख 'प्राशित्र' पात्र है और उनका निगलना ही सोमपान के पात्र 'ग्रह' हैं। यहाँ तक कि उनकी साधारण सी चबाने की क्रिया भी नित्य किए जाने वाले 'अग्निहोत्र' यज्ञ के समान पवित्र और महत्वपूर्ण है।
दीक्षानुजन्मोपसदः शिरोधरं त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः ।
जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतोः सभ्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥
आपका प्राकट्य ही यज्ञ की 'दीक्षा' है, आपकी गर्दन 'उपसद' नामक इष्टियाँ हैं और आपकी दाढ़ें 'प्रायणीय' तथा 'उदयनीय' इष्टियाँ हैं। आपकी जिह्वा 'प्रवर्ग्य' नामक कर्म है, आपका मस्तक 'क्रतु' (सोमयज्ञ) है और आपकी प्राणवायु ही 'चिति' (अग्नियों का समूह) है।
यज्ञ की विभिन्न क्रियाओं को भगवान के शरीर में स्थापित किया जा रहा है। यज्ञ के लिए यजमान का 'दीक्षा' संस्कार एक आध्यात्मिक जन्म माना जाता है, वही आपका इस रूप में प्रकट होना है। 'उपसद' नामक यज्ञ-क्रियाएँ आपकी गर्दन हैं। यज्ञ के आरम्भ में 'प्रायणीय' और अंत में 'उदयनीय' नामक जो इष्टियाँ होती हैं, वे ही आपकी वे भयंकर दाढ़ें हैं, जिनसे आपने पृथ्वी का उद्धार किया। आपकी जिह्वा 'प्रवर्ग्य' नामक एक महत्वपूर्ण यज्ञ-कर्म है। आपका सिर ही मुख्य 'क्रतु' (यज्ञ) है और आपकी श्वास-प्रश्वास की वायु ही यज्ञ-वेदी में स्थापित की जाने वाली विभिन्न प्रकार की अग्नियां हैं।
सोमस्तु रेतः सवनान्यवस्थितिः संस्थाविभेदास्तव देव धातवः ।
सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धिस्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धनः ॥
हे देव! सोम ही आपका वीर्य (परम सार) है, आपकी विभिन्न अवस्थाएं ही प्रातः, माध्यन्दिन और सायं 'सवन' हैं। आपके शरीर की धातुएं ही यज्ञों के विभिन्न भेद ('संस्था') हैं, आपके शरीर के समस्त जोड़ ही 'सत्र' (दीर्घकालीन यज्ञ) हैं। आप ही समस्त यज्ञ और क्रतु स्वरूप हैं तथा सभी इष्टियाँ आपसे ही बंधी हुई हैं।
यज्ञ का प्राण 'सोम' आपका ही तेज या वीर्य है। यज्ञ में तीन समय होने वाले 'सवन' (सोम निकालने की क्रिया) आपकी ही विभिन्न अवस्थाएं हैं। शरीर की रस, रक्त आदि सात धातुएं ही यज्ञों की समाप्ति के सात प्रकार ('संस्था') हैं। आपके शरीर की सभी संधियाँ (जोड़) ही 'सत्र' हैं, जो कई दिनों या वर्षों तक चलने वाले महायज्ञ होते हैं। अंत में ऋषिगण सार रूप में कहते हैं कि आप ही सभी यज्ञों, क्रतुओं और इष्टियों के आधार और बंधन हैं; अर्थात सब कुछ आपमें ही स्थित है और आप ही के लिए है।
नमो नमस्तेऽखिलयन्त्रदेवताद्रव्याय सर्वक्रतवे क्रियात्मने ।
वैराग्यभक्त्यात्मजयानुभावितज्ञानाय विद्यागुरवे नमो नमः ॥
आपको बार-बार नमस्कार है। आप ही समस्त यज्ञ-प्रणाली, उसके देवता, सामग्री, समस्त क्रतु और स्वयं क्रिया की आत्मा हैं। वैराग्य, भक्ति और आत्म-संयम से अनुभव होने वाले ज्ञान के आप ही उपदेष्टा हैं, हे विद्या के परम गुरु! आपको बार-बार नमस्कार है।
अब स्तुति यज्ञ के स्थूल वर्णन से आगे बढ़कर दार्शनिक धरातल पर पहुँचती है। ऋषि कहते हैं कि आप केवल यज्ञ के अंग ही नहीं, बल्कि यज्ञ की सम्पूर्ण व्यवस्था ('अखिल-यन्त्र'), यज्ञ में आहुति पाने वाले देवता, यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सामग्री ('द्रव्य') और स्वयं यज्ञ की क्रिया ('क्रियात्मने') के भी आत्मा हैं। आप ही वह परम ज्ञान हैं, जो वैराग्य, भक्ति और इन्द्रिय-विजय से अनुभव में आता है, और उस ज्ञान को प्रदान करने वाले परम गुरु ('विद्यागुरु') भी आप ही हैं। अतः वे आपको बार-बार प्रणाम करते हैं।
दंष्ट्राग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृता विराजते भूधर भूः सभूधरा ।
यथा वनान्निःसरतो दता धृता मतङ्गजेन्द्रस्य सपत्रपद्मिनी ॥
हे भगवन्, हे पृथ्वी को धारण करने वाले! आपकी दाढ़ के अग्रभाग पर रखी हुई यह पृथ्वी, पर्वतों सहित, वैसी ही शोभा पा रही है, जैसे कोई गजराज वन से बाहर निकलते समय अपनी दाढ़ पर पत्तों सहित कमलिनी को धारण किये हुए हो।
अब ऋषिगण उस अद्भुत दृश्य का वर्णन कर रहे हैं, जिसे वे साक्षात देख रहे हैं। भगवान वराह ने रसातल से पृथ्वी को अपनी दाढ़ की नोक पर उठा लिया है। इस दृश्य की एक अत्यंत सुंदर उपमा दी गई है। जैसे कोई विशालकाय हाथी किसी सरोवर से क्रीड़ा करके बाहर निकले और उसकी दाढ़ पर एक छोटा-सा कमल का फूल पत्तों सहित टिका हो, तो वह जितना सुंदर और सहज लगता है, वैसे ही आपके विराट स्वरूप की दाढ़ पर यह पर्वतों सहित विशाल पृथ्वी सुशोभित हो रही है। यह उपमा भगवान की असीम शक्ति और उनके कार्य के सौंदर्य को एक साथ प्रकट करती है।
त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते ।
चकास्ति शृङ्गोढघनेन भूयसा कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रमः ॥
आपका यह वेदमय वराह रूप, दाढ़ पर धारण किये हुए पृथ्वीमण्डल के साथ, ऐसा सुशोभित हो रहा है, जैसे किसी महान पर्वतराज के शिखर पर टिका हुआ कोई विशाल श्वेत मेघ शोभायमान होता है।
यहाँ एक और मनोहारी उपमा प्रस्तुत की गई है। भगवान का श्याम वर्ण का, वेदमय, विशाल शरीर एक महान पर्वत ('कुलाचलेन्द्र') के समान है। उस पर्वत रूपी शरीर की दाढ़ पर रखी हुई पृथ्वी एक श्वेत बादल के टुकड़े ('शृङ्गोढघनेन') के समान प्रतीत हो रही है। जैसे किसी ऊँचे पर्वत के शिखर पर टिका हुआ बादल एक अद्भुत छटा बिखेरता है, वैसी ही शोभा आपके इस रूप की हो रही है। यह भगवान के विराट, भव्य और सुंदर स्वरूप का काव्यात्मक चित्रण है।
संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता ।
विधेम चास्यै नमसा सह त्वया यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः ॥
आप इस पृथ्वी को, जो चर-अचर सभी प्राणियों का निवास स्थान है, पुनः स्थापित करें। आप इस लोक की माता (पृथ्वी) के पति, अर्थात् पिता हैं। हम आपके साथ इसे भी नमस्कार करते हैं, जिसमें आपने अपनी धारण-शक्ति रूपी तेज को उसी प्रकार स्थापित किया है, जैसे अरणि की लकड़ी में अग्नि को स्थापित किया जाता है।
अब ऋषिगण भगवान से प्रार्थना करते हैं कि इस पृथ्वी को, जिसे आपने रसातल से उबारा है, सभी जीवों के कल्याण के लिए उसकी कक्षा में पुनः स्थापित कर दें। वे भगवान और पृथ्वी के दिव्य संबंध को स्पष्ट करते हैं - पृथ्वी आपकी 'पत्नी' (शक्ति) है, और इस नाते आप समस्त जीवों के 'पिता' हैं और पृथ्वी 'माता' है। इसलिए हम आपके साथ-साथ माता पृथ्वी को भी प्रणाम करते हैं। आपने ही इस पृथ्वी में अपनी धारण-शक्ति रूपी तेज को वैसे ही गुप्त रूप से स्थापित किया है, जैसे यज्ञ के लिए 'अरणि' नामक काष्ठ में अग्नि गुप्त रहती है और मंथन करने पर प्रकट होती है।
कः श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो रसां गताया भुव उद्विबर्हणम् ।
न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्वविस्मये यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम् ॥
हे प्रभो! आपके अतिरिक्त और कौन रसातल में गयी हुई पृथ्वी का उद्धार करने में विश्वास भी कर सकता था? वैसे, आपमें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि आप तो स्वयं 'विश्वविस्मय' हैं। आपने ही अपनी माया से इस अत्यंत विस्मयकारी ब्रह्माण्ड की रचना की है।
ऋषिगण भगवान की अचिन्त्य शक्ति पर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं कि आपके सिवा कोई और इस असंभव कार्य को करने का विचार भी नहीं कर सकता था। फिर वे स्वयं ही अपनी बात को सुधारते हुए कहते हैं कि आपके लिए यह कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि आप तो स्वयं ही सम्पूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़ा आश्चर्य हैं। जिस परमेश्वर ने अपनी योगमाया की शक्ति से इस इतने बड़े और अद्भुत ब्रह्मांड की रचना कर दी हो, उसके लिए पृथ्वी का उद्धार करना कौन सी बड़ी बात है!
विधुन्वता वेदमयं निजं वपुर्जनस्तपःसत्यनिवासिनो वयम् ।
सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभिर्विमृज्यमाना भृशमीश पाविताः ॥
हे ईश्वर! जब आपने अपने वेदमय शरीर को कंपाया, तो आपके अयाल (गर्दन के बाल) के अग्रभाग से उड़ी हुई पवित्र जल की बूँदें हम पर पड़ीं। हम, जो जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक के निवासी हैं, उन बूँदों से सिंचकर अत्यंत पवित्र हो गये हैं।
यह श्लोक भगवान की कृपा और उनके स्पर्श की महिमा को दर्शाता है। जब भगवान वराह जल से बाहर निकलकर अपने शरीर को झिटकारते हैं, तो उनके गर्दन के बालों ('सटा') से जल की बूँदें बहुत ऊपर तक उड़ती हैं। वे बूँदें इतनी पवित्र हैं कि वे ऊपर के लोकों - जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक - में बैठे हुए ऋषियों पर भी पड़ती हैं। ऋषिगण कहते हैं कि आपके शरीर का स्पर्श पाकर वे जल-बिंदु परम पवित्र हो गए और उनके स्पर्श मात्र से हम धन्य और पवित्र हो गए।
स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैष ते यः कर्मणां पारमपारकर्मणः ।
यद्योगमायागुणयोगमोहितं विश्वं समस्तं भगवन् विधेहि शम् ॥
हे अपार कर्म करने वाले भगवन्! वह व्यक्ति निश्चय ही मंदबुद्धि है जो आपके कर्मों का पार पाना चाहता है। यह सम्पूर्ण विश्व आपकी योगमाया के गुणों के प्रभाव से मोहित है। हे भगवन्! आप इस विश्व का कल्याण करें।
स्तुति के अंत में, ऋषिगण अपनी लघुता और भगवान की महानता को स्वीकार करते हुए एक विनम्र प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि आप 'अपारकर्मा' हैं, आपके कर्मों और लीलाओं की कोई सीमा नहीं है। जो मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि से आपकी लीलाओं का रहस्य जानना चाहता है, वह निश्चय ही 'भ्रष्टमति' है। यह सम्पूर्ण जगत आपकी ही योगमाया के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) से मोहित होकर अपने-अपने कर्मों में लगा है। अतः हम आपकी लीला को समझने का प्रयास नहीं करते, बल्कि आपसे केवल यही प्रार्थना करते हैं कि आप इस मोहित विश्व का 'शम्' अर्थात कल्याण करें।
जितं जितं तेऽजित यज्ञभावना त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः ।
यद्रोमगर्तेषु निलिल्युरध्वरास्तस्मै नमः कारणसूकराय ते ॥
रूपं तवैतन्ननु दुष्कृतात्मनां दुर्दर्शनं देव यदध्वरात्मकम् ।
छन्दांसि यस्य त्वचि बर्हिरोमस्वाज्यं दृशि त्वङ्घ्रिषु चातुर्होत्रम् ॥
स्रुक्तुण्ड आसीत्स्रुव ईश नासयोरिडोदरे चमसाः कर्णरन्ध्रे ।
प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु ते यच्चर्वणं ते भगवन्नग्निहोत्रम् ॥
दीक्षानुजन्मोपसदः शिरोधरं त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः ।
जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतोः सभ्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥
सोमस्तु रेतः सवनान्यवस्थितिः संस्थाविभेदास्तव देव धातवः ।
सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धिस्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धनः ॥
नमो नमस्तेऽखिलयन्त्रदेवताद्रव्याय सर्वक्रतवे क्रियात्मने ।
वैराग्यभक्त्यात्मजयानुभावितज्ञानाय विद्यागुरवे नमो नमः ॥
दंष्ट्राग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृता विराजते भूधर भूः सभूधरा ।
यथा वनान्निःसरतो दता धृता मतङ्गजेन्द्रस्य सपत्रपद्मिनी ॥
त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते ।
चकास्ति शृङ्गोढघनेन भूयसा कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रमः ॥
संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता ।
विधेम चास्यै नमसा सह त्वया यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः ॥
कः श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो रसां गताया भुव उद्विबर्हणम् ।
न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्वविस्मये यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम् ॥
विधुन्वता वेदमयं निजं वपुर्जनस्तपःसत्यनिवासिनो वयम् ।
सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभिर्विमृज्यमाना भृशमीश पाविताः ॥
स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैष ते यः कर्मणां पारमपारकर्मणः ।
यद्योगमायागुणयोगमोहितं विश्वं समस्तं भगवन् विधेहि शम् ॥