
नमामि देवं विश्वेशं वामनं विष्णुरूपिणम् ।
बलिदर्पहरं शान्तं शाश्वतं पुरुषोत्तमम् ॥1॥
धीरं शूरं महादेवं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
विशुद्धं ज्ञानसम्पन्नं नमामि हरिमच्युतम् ॥2॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वगं सर्वभावनम् ।
अनादिमजरं नित्यं नमामि गरुडध्वजम् ॥3॥
सुरासुरैर्भक्तिमद्भिः स्तुतो नारायणः सदा ।
पूजितं च हृषीकेशं तं नमामि जगद्गुरुम् ॥4॥
हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यायन्ति यतयः सदा ।
ज्योतीरूपमनौपम्यं नरसिंहं नमाम्यहम् ॥5॥
न जानन्ति परं रूपं ब्रह्माद्या देवतागणाः ।
यस्यावताररूपाणि समर्चन्ति नमामि तम् ॥6॥
एतत्समस्तं येनादौ सृष्टं दुष्टवधात्पुनः ।
त्रातं यत्र जगल्लीनं तं नमामि जनार्दनम् ॥7॥
भक्तैरभ्यर्चितो यस्तु नित्यं भक्तप्रियो हि यः ।
तं देवममलं दिव्यं प्रणमामि जगत्पतिम् ॥8॥
दुर्लभं चापि भक्तानां यः प्रयच्छति तोषितः ।
तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं प्रणमामि सनातनम् ॥9॥
Verse 1
नमामि देवं विश्वेशं वामनं विष्णुरूपिणम् ।
बलिदर्पहरं शान्तं शाश्वतं पुरुषोत्तमम् ॥
इस श्लोक में भक्त भगवान को प्रणाम करते हुए कहते हैं नमामि देवं, अर्थात् मैं उस दिव्य देवता को नमस्कार करता हूँ। विश्वेशं का अर्थ है सम्पूर्ण जगत का स्वामी, जो समस्त लोकों और प्राणियों का अधिपति है। वामनं शब्द भगवान विष्णु के वामन अवतार की ओर संकेत करता है। जब भगवान ने एक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण किया, तब भी वे वास्तव में विष्णु ही थे, इसलिए उन्हें विष्णुरूपिणम् कहा गया है।
बलिदर्पहरं का सम्बन्ध पुराणों में वर्णित वामन अवतार की कथा से है। राजा बलि अत्यन्त दानी और शक्तिशाली थे, परन्तु उनके भीतर अभिमान उत्पन्न हो गया था। भगवान वामन रूप में आए और तीन पग भूमि का दान माँगा। फिर उन्होंने विराट रूप धारण कर दो ही पगों में तीनों लोकों को नाप लिया और इस प्रकार राजा बलि का अहंकार दूर किया। यह दण्ड नहीं बल्कि आध्यात्मिक सुधार था।
श्लोक में भगवान को शान्तं भी कहा गया है, अर्थात् वे पूर्ण शान्त और स्थिर हैं। वे जब भी अधर्म का नाश करते हैं, तब भी उनके भीतर करुणा और संतुलन बना रहता है। शाश्वतं का अर्थ है जो सदा रहने वाला है। पुरुषोत्तमम् का अर्थ है सर्वोच्च पुरुष, जो समस्त जीवों और प्रकृति से परे परम सत्य है। इस प्रकार यह श्लोक भगवान को वामन रूप में भी और परम ब्रह्म के रूप में भी प्रणाम करता है।
Verse 2
धीरं शूरं महादेवं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
विशुद्धं ज्ञानसम्पन्नं नमामि हरिमच्युतम् ॥
इस श्लोक में भगवान के अनेक गुणों का वर्णन किया गया है। धीरं का अर्थ है धैर्यवान और स्थिर बुद्धि वाला। भगवान का मन किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता। शूरं का अर्थ है वीर और पराक्रमी। जब भी संसार में अधर्म बढ़ता है, भगवान धर्म की रक्षा के लिए वीरता से उसका सामना करते हैं।
महादेवं का अर्थ है महान देवता। यहाँ भगवान विष्णु की सर्वोच्च दिव्यता का वर्णन किया गया है। शङ्खचक्रगदाधरम् का अर्थ है वह जो अपने हाथों में शंख, चक्र और गदा धारण करते हैं। शंख सृष्टि के आदि नाद का प्रतीक है। चक्र धर्म की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति का प्रतीक है। गदा शक्ति और न्याय का प्रतीक है जो अधर्म को समाप्त करती है।
विशुद्धं का अर्थ है पूर्णतः पवित्र और निर्मल। भगवान किसी भी प्रकार की माया या दोष से परे हैं। ज्ञानसम्पन्नं का अर्थ है जो सम्पूर्ण ज्ञान से युक्त है। वास्तव में भगवान ज्ञान के स्रोत हैं।
श्लोक के अंत में नमामि हरिमच्युतम् कहा गया है। हरि वह हैं जो दुःख और अज्ञान को हर लेते हैं। अच्युत का अर्थ है जो कभी अपने सत्य स्वरूप से नहीं गिरता। इस प्रकार भगवान सदा पूर्ण और अचल रहते हैं।
Verse 3
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वगं सर्वभावनम् ।
अनादिमजरं नित्यं नमामि गरुडध्वजम् ॥
इस श्लोक में भगवान के व्यापक और अनन्त स्वरूप का वर्णन है। सर्वशक्तिमयं का अर्थ है वह जो सभी शक्तियों का आधार है। संसार में जो भी शक्ति कार्य कर रही है, वह अन्ततः भगवान से ही उत्पन्न होती है।
सर्वगं का अर्थ है जो सर्वत्र उपस्थित है। भगवान किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। सर्वभावनम् का अर्थ है जो सभी प्राणियों का पालन करने वाला है। संसार के प्रत्येक जीव का जीवन भगवान की कृपा से ही चल रहा है।
अनादि का अर्थ है जिसका कोई आरम्भ नहीं है। भगवान किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुए। वे स्वयं ही परम कारण हैं। अजरं का अर्थ है जो कभी वृद्ध नहीं होता और जिसमें क्षय नहीं होता। नित्यं का अर्थ है सदा रहने वाला, जो समय के प्रभाव से परे है।
गरुडध्वजम् का अर्थ है वह जिसके ध्वज पर गरुड़ का चिन्ह है। गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है। पुराणों में गरुड़ को शक्ति, वेग और ऊँचे आध्यात्मिक उन्नयन का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार यह श्लोक भगवान को सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सनातन सत्ता के रूप में प्रणाम करता है।
Verse 4
सुरासुरैर्भक्तिमद्भिः स्तुतो नारायणः सदा ।
पूजितं च हृषीकेशं तं नमामि जगद्गुरुम् ॥
इस श्लोक में भगवान नारायण की महिमा का वर्णन है। नारायण शब्द का अर्थ है वह जिसमें समस्त जीव स्थित हैं और जो सबका अंतिम आश्रय है। यह नाम भगवान की व्यापकता और करुणा को दर्शाता है।
श्लोक कहता है कि सुर और असुर दोनों ही भक्तिभाव से भगवान की स्तुति करते हैं। सुर देवताओं को कहते हैं और असुर वे शक्तियाँ हैं जो देवताओं के विरोध में रहती हैं। फिर भी अन्ततः वे सभी भगवान की शक्ति को स्वीकार करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भगवान सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं।
हृषीकेश का अर्थ है इन्द्रियों के स्वामी। मनुष्य संसार का अनुभव अपनी इन्द्रियों के माध्यम से करता है, परन्तु उन इन्द्रियों के पीछे भी भगवान की ही शक्ति कार्य करती है। आध्यात्मिक साधना में इन्द्रियों को नियंत्रित करने का महत्व इसी कारण बताया गया है।
जगद्गुरु का अर्थ है सम्पूर्ण जगत का गुरु। भगवान ही वेद, शास्त्र और अवतारों के माध्यम से मानवता को धर्म का मार्ग सिखाते हैं। इसलिए भक्त उन्हें जगत के महान गुरु के रूप में प्रणाम करता है।
Verse 5
हृदि संकल्प्य यद्रूपं ध्यायन्ति यतयः सदा ।
ज्योतीरूपमनौपम्यं नरसिंहं नमाम्यहम् ॥
इस श्लोक में भगवान के उस स्वरूप का वर्णन है जिसका ध्यान साधक अपने हृदय में करते हैं। हृदि संकल्प्य का अर्थ है हृदय में भगवान की कल्पना करना। आध्यात्मिक साधक ध्यान के माध्यम से भगवान के स्वरूप को अपने भीतर स्थापित करते हैं।
यतयः शब्द उन तपस्वियों के लिए प्रयुक्त हुआ है जिन्होंने संसार के आकर्षणों से दूर होकर आत्मज्ञान की खोज की है। वे निरन्तर भगवान के स्वरूप का ध्यान करते हैं।
ज्योतीरूपम् का अर्थ है प्रकाशमय स्वरूप। इसका संकेत यह है कि भगवान का वास्तविक स्वरूप दिव्य चेतना और प्रकाश के समान है। यह कोई सामान्य भौतिक रूप नहीं है।
नरसिंह भगवान विष्णु का वह अवतार है जिसमें उन्होंने आधा मनुष्य और आधा सिंह का रूप धारण किया। यह अवतार भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए प्रकट हुआ था और अत्याचारी हिरण्यकशिपु का अंत किया था।
अनौपम्यं का अर्थ है जिसका कोई तुल्य नहीं है। नरसिंह अवतार की अद्भुतता इसी में है कि वह किसी भी सामान्य रूप से तुलना नहीं की जा सकती। इस प्रकार यह श्लोक उस दिव्य और अद्वितीय नरसिंह भगवान को प्रणाम करता है।
Verse 6
न जानन्ति परं रूपं ब्रह्माद्या देवतागणाः ।
यस्यावताररूपाणि समर्चन्ति नमामि तम् ॥
इस श्लोक में भगवान की परम और अगम्य प्रकृति का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि ब्रह्मा आदि देवता भी भगवान के परम स्वरूप को पूरी तरह नहीं जानते। ब्रह्माद्या देवतागणाः का अर्थ है ब्रह्मा से लेकर अन्य सभी देवताओं का समूह।
परं रूपं का अर्थ है भगवान का सर्वोच्च और वास्तविक स्वरूप। यह स्वरूप इतना गूढ़ और अनन्त है कि महान देवता भी उसे पूर्ण रूप से समझ नहीं पाते।
फिर भी भगवान अपनी करुणा से अवतार लेते हैं। अवतार रूपों के माध्यम से वे संसार में प्रकट होते हैं ताकि जीव उनके साथ संबंध स्थापित कर सकें। इन अवतारों की पूजा देवता भी करते हैं।
पुराणों में भगवान के अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है जैसे वामन, नरसिंह, राम और कृष्ण। ये अवतार धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए प्रकट होते हैं।
इस प्रकार श्लोक यह बताता है कि भगवान का परम स्वरूप अत्यन्त रहस्यमय है, परन्तु उनके अवतार मानव और देवताओं के लिए उपासना का माध्यम बनते हैं।
Verse 7
एतत्समस्तं येनादौ सृष्टं दुष्टवधात्पुनः ।
त्रातं यत्र जगल्लीनं तं नमामि जनार्दनम् ॥
इस श्लोक में भगवान को सृष्टि के रचयिता, रक्षक और संहारकर्ता के रूप में नमस्कार किया गया है। एतत्समस्तं का अर्थ है यह सम्पूर्ण जगत। येनादौ सृष्टं का अर्थ है जिसने प्रारम्भ में इस सृष्टि की रचना की।
दुष्टवध का अर्थ है दुष्ट शक्तियों का नाश। पुराणों में भगवान बार-बार अवतार लेकर अधर्म का अंत करते हैं और धर्म की रक्षा करते हैं। यह कार्य संसार में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है।
त्रातं का अर्थ है संरक्षण करना। भगवान केवल दुष्टों का नाश ही नहीं करते बल्कि सज्जनों और धर्म की रक्षा भी करते हैं।
यत्र जगल्लीनं का अर्थ है वह अवस्था जिसमें सम्पूर्ण जगत अन्ततः भगवान में विलीन हो जाता है। सृष्टि के अंत में सब कुछ उसी परम सत्ता में लौट जाता है।
जनार्दन नाम का अर्थ है वह जो प्राणियों की रक्षा करता है और उनके दुःखों को दूर करता है। इस प्रकार भक्त उस भगवान को प्रणाम करता है जो सृष्टि का निर्माण करता है, उसका संरक्षण करता है और अंत में उसे अपने भीतर समाहित कर लेता है।
Verse 8
भक्तैरभ्यर्चितो यस्तु नित्यं भक्तप्रियो हि यः ।
तं देवममलं दिव्यं प्रणमामि जगत्पतिम् ॥
इस श्लोक में भगवान और भक्तों के बीच के प्रेमपूर्ण संबंध का वर्णन है। भक्तैरभ्यर्चितः का अर्थ है जो भक्तों द्वारा निरन्तर पूजा जाता है। यह पूजा मंत्र, ध्यान, सेवा और भक्ति के रूप में हो सकती है।
नित्यं भक्तप्रियो का अर्थ है कि भगवान सदैव अपने भक्तों से प्रेम करते हैं। शास्त्रों में अनेक कथाएँ हैं जिनमें भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा की और उनकी पुकार का उत्तर दिया।
अमलं का अर्थ है निर्मल और दोषरहित। भगवान किसी भी प्रकार के सांसारिक दोषों से परे हैं। दिव्यं का अर्थ है उनका स्वरूप अलौकिक और पवित्र है।
जगत्पतिम् का अर्थ है जगत का स्वामी। भगवान सम्पूर्ण संसार के अधिपति हैं, फिर भी वे अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त स्नेहपूर्ण रहते हैं।
यह श्लोक यह संदेश देता है कि भगवान की कृपा पाने के लिए केवल सच्ची भक्ति और समर्पण ही पर्याप्त है।
Verse 9
दुर्लभं चापि भक्तानां यः प्रयच्छति तोषितः ।
तं सर्वसाक्षिणं विष्णुं प्रणमामि सनातनम् ॥
इस अंतिम श्लोक में भगवान की कृपा और उनकी सर्वज्ञता का वर्णन किया गया है। दुर्लभं का अर्थ है वह वस्तु जो प्राप्त करना कठिन हो। जब भगवान भक्तों से प्रसन्न होते हैं तो वे उन्हें ऐसे दुर्लभ वरदान भी प्रदान कर देते हैं।
तोषितः का अर्थ है प्रसन्न होना। सच्ची भक्ति भगवान को प्रसन्न करती है और तब वे भक्तों की कामनाएँ पूरी करते हैं। यह वरदान केवल सांसारिक सुख नहीं बल्कि आध्यात्मिक उन्नति भी हो सकता है।
सर्वसाक्षिणं का अर्थ है सबका साक्षी। भगवान हर विचार, हर कर्म और हर भावना को जानते हैं। उनसे कुछ भी छिपा नहीं रहता।
विष्णु का अर्थ है सर्वव्यापी सत्ता जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। सनातन का अर्थ है अनादि और अनन्त।
इस प्रकार भक्त उस सनातन विष्णु को प्रणाम करता है जो सबका साक्षी है, भक्तों पर कृपा करता है और सदा से सम्पूर्ण जगत का आधार बना हुआ है।