स्तोत्रः
निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला
द्युतिनीराजितपादपङ्कजान्त ।
अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं
परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि ॥ 1 ॥
जय नामधेय मुनिवृन्दगेय हे
जनरञ्जनाय परमाक्षराकृते ।
त्वमनादरादपि मनाग् उदीरितं
निखिलोग्रतापपटलीं विलुम्पसि ॥ 2 ॥
यदाभासोऽप्युद्यन् कवलितभवध्वान्तविभवो
दृशं तत्त्वान्धानामपि दिशति भक्तिप्रणयिनीम् ।
जनस्तस्योदात्तं जगति भगवन्नामतरणे
कृती ते निर्वक्तुं क इह महिमानं प्रभवति ॥ 3 ॥
यद् ब्रह्मसाक्षात्कृतिनिष्ठयापि
विनाशमायाति विना न भोगैः ।
अपैति नाम स्फुरणेन तत् ते
प्रारब्धकर्मेति विरौति वेदः ॥ 4 ॥
अघदमनयशोदानन्दनौ नन्दसूनो
कमलनयनगोपीचन्द्रवृन्दावनेन्द्राः ।
प्रणतकरुणकृष्णावित्यनेकस्वरूपे
त्वयि मम रतिरुच्चैर्वर्धतां नामधेय ॥ 5 ॥
वाच्यो वाचकमित्युदेति भवतो नाम स्वरूपद्वयं
पूर्वस्मात् परमेव हन्त करुणा तत्रापि जानीमहे ।
यस्तस्मिन् विहितापराधनिवहः प्राणी समन्ताद् भवेद्
आस्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदानन्दाम्बुधौ मज्जति ॥ 6 ॥
सूदिताश्रितजनार्तिराशये
रम्यचिद्घनसुखस्वरूपिणे ।
नाम गोकुलमहोत्सवाय ते
कृष्णपूर्णवपुषे नमो नमः ॥ 7 ॥
नारदवीणोज्जीवनसुधोर्मिनिर्यासमाधुरीपूर ।
त्वं कृष्णनाम कामं स्फुर मे रसने रसेन सदा ॥ 8 ॥
अर्थः
1
इस श्लोक में कवि कहता है कि समस्त श्रुतियाँ, अर्थात् वेद, मानो अपने मस्तक पर रत्नों की माला धारण किए हुए हैं, और उन रत्नों की ज्योति भगवान के चरणकमलों की आरती कर रही है। हे हरिनाम, जिन्हें मुक्त आत्माओं का समुदाय चारों ओर से उपासता है, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।
शाब्दिक अर्थ में वेदों की परम महिमा को भी भगवान के नाम के चरणों में अर्पित कर दिया गया है। मुक्तजन, जिन्होंने संसार से पार पा लिया है, वे भी इसी नाम का आश्रय लेते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से यह बताता है कि भगवान का नाम वेदों का सार है। चरणकमल परम शरण का प्रतीक हैं। जब साधक नाम में शरण लेता है, तब वह समस्त शास्त्रज्ञान के अंतिम निष्कर्ष को स्वीकार करता है। नाम ही वह सेतु है जो ज्ञान को भक्ति में और भक्ति को मुक्ति में परिणत करता है।
2
यहाँ नाम की विजय का गुणगान है। हे नाम, जिन्हें मुनियों का समूह गाता है, जो समस्त प्राणियों को आनन्द प्रदान करते हैं और जो परम अक्षर ब्रह्म के स्वरूप हैं, आप यदि अनादर से भी थोड़ा उच्चारित कर दिए जाएँ तो भी समस्त भयंकर तापों को नष्ट कर देते हैं।
मुनिवृन्दगेय का अर्थ है कि ऋषिगण भी जिनका कीर्तन करते हैं। परमाक्षर का तात्पर्य उस अविनाशी सत्य से है जिसे उपनिषद ब्रह्म कहते हैं।
पुराणों में अजामिल की कथा इसका उदाहरण है, जहाँ अनजाने में भी नारायण नाम लेने से उसका उद्धार हुआ। आध्यात्मिक रूप से यह दर्शाता है कि नाम और नामी में भेद नहीं है। नाम स्वयं ईश्वर की शक्ति से परिपूर्ण है। इसलिए साधारण उच्चारण भी साधक के जीवन में परिवर्तन का बीज बन सकता है।
3
भगवान के नाम का केवल आभास भी संसाररूपी अन्धकार को निगल लेता है। वह उन लोगों की दृष्टि को भी, जो तत्त्वज्ञान से अन्धे हैं, भक्ति से परिपूर्ण बना देता है। ऐसे उदात्त नाम की महिमा को इस संसार में कौन पूर्ण रूप से कह सकता है?
भवध्वान्त का अर्थ है जन्म-मरण का अज्ञान। तत्त्वान्ध वे हैं जो परम सत्य को नहीं देख पाते।
आध्यात्मिक अर्थ में नाम प्रकाश के समान है। जैसे सूर्योदय से अन्धकार मिट जाता है, वैसे ही नाम का स्मरण अज्ञान को दूर करता है। भक्ति यहाँ केवल भावना नहीं, बल्कि शुद्ध दृष्टि है। नाम स्वयं भवसागर से पार ले जाने वाली नौका है। इसकी महिमा वाणी से परे है, क्योंकि यह अनन्त करुणा का साक्षात् स्वरूप है।
4
वेद घोषणा करते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कार प्राप्त साधक को भी प्रारब्ध कर्मों का भोग करना पड़ता है। वे अनुभव किए बिना समाप्त नहीं होते। परन्तु आपके नाम के प्रकट होते ही वे प्रारब्ध कर्म भी नष्ट हो जाते हैं।
यहाँ ब्रह्मसाक्षात्कार का अर्थ है परम सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव। सामान्यतः ऐसा ज्ञानी भी शरीर रहते हुए कर्मफल भोगता है।
किन्तु नाम का स्फुरण कर्म के नियम को भी पार कर जाता है। यह भक्ति परम्परा का विशिष्ट सिद्धान्त है कि नाम में इतनी शक्ति है कि वह कर्मबंधन को जला देता है। यह केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि अनुग्रह की घोषणा है। नाम का स्मरण ईश्वर की कृपा को सक्रिय कर देता है, जो कर्म के कठोर नियमों से भी ऊपर है।
5
हे नाम, जो अघों का नाश करने वाले, यशोदा के पुत्र, नन्दनन्दन, कमलनयन, गोपियों के चन्द्रमा, वृन्दावन के स्वामी और प्रणतजनों पर करुणा करने वाले कृष्ण के अनेक रूपों का धारण करते हैं, आप में मेरी रति दिनोदिन बढ़ती रहे।
प्रत्येक विशेषण एक लीला का स्मरण कराता है। यशोदानन्दन बाललीला का संकेत है, गोपीचन्द्र माधुर्यभाव का, और प्रणतकरुण करुणा का प्रतीक है।
दार्शनिक रूप से यह दर्शाता है कि नाम में भगवान के समस्त रूप समाहित हैं। साधक का लक्ष्य केवल मुक्ति नहीं, बल्कि प्रेम की वृद्धि है। नाम का जप स्मृति को लीला से जोड़ता है और हृदय में अनुराग को प्रगाढ़ करता है।
6
आपके स्वरूप के दो पक्ष बताए जाते हैं—वाच्य और वाचक, अर्थात् नाम और नामी। पर हम जानते हैं कि नाम तो उससे भी अधिक करुणामय है। जो जीव असंख्य अपराधों से घिरा हो, वह भी मुख से इस नाम का उपासक बनकर सदा आनन्द के समुद्र में डूब जाता है।
सामान्य भाषा में शब्द और उसका अर्थ भिन्न होते हैं। यहाँ यह भेद मिट जाता है।
भक्ति सिद्धान्त कहता है कि नाम स्वयं भगवान है। यहाँ तक कि यदि किसी ने भगवान के रूप में अपराध किया हो, तब भी नाम उसे आश्रय देता है। यह करुणा की पराकाष्ठा है। नाम जप के द्वारा साधक शुद्ध होता है और आनन्दसागर में प्रवेश करता है।
7
हे नाम, जो शरणागतों के दुःख का नाश करते हैं, जो रमणीय चिद्घन आनन्दस्वरूप हैं, जो गोकुल के लिए महान उत्सव हैं, पूर्ण स्वरूप कृष्ण के नाम, आपको बार-बार नमस्कार है।
चिद्घन का अर्थ है चेतना का सघन स्वरूप। नाम को ही आनन्द का मूर्त रूप कहा गया है।
गोकुल में कृष्ण का नाम ही उत्सव बन जाता है। आध्यात्मिक रूप से नाम साधक के जीवन को भी उत्सव में बदल देता है। दुःख का नाश और आनन्द का प्राकट्य—ये दोनों नाम के प्रभाव हैं। बार-बार नमस्कार का अर्थ है पूर्ण समर्पण।
8
हे कृष्णनाम, आप नारद की वीणा को जीवित करने वाली अमृत तरंगों का मधुर सार हैं। आप सदा मेरे रसना पर पूर्ण रस के साथ प्रकट होते रहें।
नारद मुनि सदा वीणा लेकर नामगान करते हैं। उनकी वीणा का प्राण ही नाम है।
नाम को यहाँ अमृत का सार कहा गया है। रसना साधक की वीणा बन जाती है। जब नाम रस सहित जिह्वा पर नृत्य करता है, तब जीवन संगीत बन जाता है। यह निरंतर स्मरण की प्रार्थना है। नाम ही साधन है, नाम ही साध्य। इसी में आनन्द, मुक्ति और परम शांति समाहित हैं।