
Lyrics:
मग्ना यदाज्या प्रलये पयोधा बुद्धारितो येन तदा हि वेदः।
मीनावताराय गदाधराय तस्मै नमः श्रीमधुसूदनाय।।1।।
कल्पान्तकाले पृथिवीं दधार पृष्ठेऽच्युतो यः सलिले निमग्नाम्।
कूर्मावताराय नमोऽस्तु तस्मै पीताम्बराय प्रियदर्शनाय।।2।।
रसातलस्था धरणी किलैषा दंष्ट्राग्रभागेन धृता हि येन।
वराहरूपाय जनार्दनाय तस्मै नमः कैटभनाशनाय।।3।।
स्तम्भं विदार्य प्रणतं हि भक्तं रक्ष प्रह्लादमथो विनाश्य।
दैत्यं नमो यो नरसिंहमूर्तिर्दीप्तानलार्कद्युतये तु तस्मै।।4।।
छलेन योऽजश्च बलिं निनाय पातालदेशं ह्यतिदानशीलम्।
अनन्तरूपश्च नमस्कृतः स मया हरिर्वामनरूपधारी।।5।।
पितुर्वधामर्षरर्येण येन त्रिःसप्तवारान्समरे हताश्च।
क्षत्राः पितुस्तर्पणमाहितञ्च तस्मै नमो भार्गवरूपिणे ते।।6।।
दशाननं यः समरे निहत्य,बद्धा पयोधिं हरिसैन्यचारी।
अयोनिजां सत्वरमुद्दधार सीतापतिं तं प्रणमामि रामम्।।7।।
विलोलनेनं मधुसिक्तवक्त्रं प्रसन्नमूर्तिं ज्वलदर्कभासम्।
कृष्णाग्रजं तं बलभद्ररूपं नीलाम्बरं सीरकरं नमामि।।8।।
पद्मासनस्थः स्थिरबद्धदृष्टिर्जितेन्द्रियो निन्दितजीवघातः।
नमोऽस्तु ते मोहविनाशकाय जिनाय बुद्धाय च केशवाय।।9।।
म्लेच्छान् निहन्तुं लभते तु जन्म कलौ च कल्की दशमावतारः।
नमोऽस्तु तस्मै नरकान्तकाय देवादिदेवाय महात्मने च।।10।।
Meaning:
Verse 1
मग्ना यदाज्या प्रलये पयोधा बुद्धारितो येन तदा हि वेदः।
मीनावताराय गदाधराय तस्मै नमः श्रीमधुसूदनाय।।1।।
इस श्लोक में भगवान विष्णु के प्रथम अवतार मत्स्यावतार की स्तुति की गई है। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जब प्रलय के समय संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गई थी और वेद अथाह सागर में खो गए थे, तब जिस ईश्वर ने मछली का रूप धारण कर उन वेदों का उद्धार किया, उन गदाधारी और मधुसूदन भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ। पौराणिक कथा के अनुसार हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया था, जिससे सृष्टि का ज्ञान लुप्त हो गया था। तब भगवान ने मत्स्य रूप लेकर न केवल वेदों की रक्षा की, बल्कि राजा सत्यव्रत और सप्तऋषियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर आगामी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया।
दार्शनिक दृष्टि से मत्स्यावतार ज्ञान की रक्षा का प्रतीक है। प्रलय अज्ञान और जड़ता का सूचक है, जबकि वेद ईश्वरीय ज्ञान के प्रतीक हैं। जब मनुष्य का चित्त विकारों के सागर में डूबने लगता है, तब ईश्वर कृपा रूपी मत्स्य बनकर साधक के विवेक और ज्ञान को बचाते हैं। यहाँ प्रयुक्त मधुसूदन शब्द का अर्थ है मधु नामक दैत्य का वध करने वाला, जो यह दर्शाता है कि ईश्वर आंतरिक शत्रुओं का विनाश कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गदाधारी विशेषण उनकी शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है जो ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखते हैं। यह अवतार सिखाता है कि भीषण उथल-पुथल में भी ईश्वरीय तत्व सदैव रक्षक के रूप में विद्यमान रहता है।
Verse 2
कल्पान्तकाले पृथिवीं दधार पृष्ठेऽच्युतो यः सलिले निमग्नाम्।
कूर्मावताराय नमोऽस्तु तस्मै पीताम्बराय प्रियदर्शनाय।।2।।
यह श्लोक भगवान के कूर्म अर्थात कछुआ अवतार को समर्पित है। इसका अर्थ है कि कल्प के अंत में जब पृथ्वी और बहुमूल्य रत्न क्षीर सागर में समा गए थे, तब जिस अच्युत भगवान ने अपनी पीठ पर पृथ्वी और मंदराचल पर्वत को धारण किया, उन पीताम्बर धारी और प्रिय दर्शन वाले कूर्मावतार को मेरा नमस्कार है। पौराणिक संदर्भों में समुद्र मंथन के समय जब मंदराचल पर्वत डूबने लगा था, तब भगवान ने विशाल कूर्म का रूप धरकर उसे अपनी पीठ पर सहारा दिया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर सृष्टि के आधार स्तंभ हैं, जो संकट के समय समस्त भार को स्वयं पर ले लेते हैं।
आध्यात्मिक और दार्शनिक रूप से कूर्म अवतार स्थिरता और इंद्रिय निग्रह का प्रतीक है। जैसे कछुआ अपने अंगों को अपनी खोल के भीतर समेट लेता है, वैसे ही एक योगी को अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी करना चाहिए। पीताम्बर और प्रियदर्शनाय विशेषण भगवान के सौम्य और कल्याणकारी स्वरूप को दर्शाते हैं। यह अवतार हमें यह सिखाता है कि किसी भी बड़े कार्य की सिद्धि के लिए धैर्य और सुदृढ़ आधार की आवश्यकता होती है। जब हम संसार रूपी सागर का मंथन करते हैं, तो हमारे भीतर का आत्म-बल ही वह कूर्म है जो हमें बिखरने से बचाता है और अमृत प्राप्ति में सहायक होता है।
Verse 3
रसातलस्था धरणी किलैषा दंष्ट्राग्रभागेन धृता हि येन।
वराहरूपाय जनार्दनाय तस्मै नमः कैटभनाशनाय।।3।।
इस श्लोक में भगवान के तृतीय अवतार वराह का वर्णन है। इसका अर्थ है कि जब पृथ्वी रसातल में डूब गई थी, तब जिस जनार्दन ने अपने दांतों के अग्र भाग से उसे उठाकर पुनः स्थापित किया, उन वराह रूप धारी और कैटभ दैत्य का विनाश करने वाले भगवान को मैं नमन करता हूँ। पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्याक्ष नामक असुर ने पृथ्वी को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया था, तब भगवान ने वराह अवतार लेकर उस असुर का वध किया और पृथ्वी को जल से बाहर निकाला। यह असुरों पर दैवीय शक्तियों की विजय का एक महान आख्यान है।
दार्शनिक धरातल पर वराह अवतार चेतना के उत्थान का प्रतिनिधित्व करता है। रसातल अज्ञान, मोह और तामसी प्रवृत्तियों का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य की बुद्धि और पृथ्वी रूपी भौतिक सत्ता फंस जाती है। भगवान का वराह रूप यह संदेश देता है कि ईश्वर भक्त को अज्ञान के अंधेरे से खींचकर बाहर लाते हैं। कैटभनाशनाय शब्द यहाँ अहंकार और तामसिकता के अंत का द्योतक है। जनार्दन शब्द का अर्थ है वह जो जन-जन की पुकार सुनता है और उनके कष्टों का निवारण करता है। यह अवतार भौतिक संसाधनों के संरक्षण और धर्म की पुनः स्थापना की प्रेरणा देता है, जिससे लोक कल्याण सुनिश्चित हो सके।
Verse 4
स्तम्भं विदार्य प्रणतं हि भक्तं रक्ष प्रह्लादमथो विनाश्य।
दैत्यं नमो यो नरसिंहमूर्तिर्दीप्तानलार्कद्युतये तु तस्मै।।4।।
यह श्लोक भगवान नरसिंह के रौद्र और करुणामयी स्वरूप की वंदना करता है। इसका अर्थ है कि जिस नरसिंह मूर्ति ने खंभे को चीरकर अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा की और दैत्यराज हिरण्यकशिपु का विनाश किया, उन प्रज्ज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले भगवान को मेरा प्रणाम है। यह अवतार ईश्वर की सर्वव्यापकता को सिद्ध करता है, क्योंकि प्रह्लाद के अटूट विश्वास के कारण भगवान एक निर्जीव खंभे से प्रकट हुए थे। हिरण्यकशिपु को मिले वरदानों की सीमाओं को पार करते हुए भगवान ने न पूर्ण मनुष्य और न पूर्ण पशु का रूप लिया, जो उनकी असीम बुद्धिमत्ता को दर्शाता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नरसिंह अवतार यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर अपने भक्त के लिए कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। खंभा अविद्या और जड़ता का प्रतीक है, जिसे फाड़कर ज्ञान का उदय होता है। भक्त प्रह्लाद शुद्ध अंतःकरण का प्रतीक है, जबकि हिरण्यकशिपु देह-अभिमान और अहंकार का रूप है। दीप्तानलार्कद्युतये विशेषण बताता है कि ईश्वर का तेज अज्ञान के अंधकार को भस्म करने वाली अग्नि के समान है। यह अवतार सिखाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विषम क्यों न हों, यदि विश्वास अडिग है, तो परमात्मा की शक्ति हर बाधा को दूर कर रक्षा अवश्य करती है।
Verse 5
छलेन योऽजश्च बलिं निनाय पातालदेशं ह्यतिदानशीलम्।
अनन्तरूपश्च नमस्कृतः स मया हरिर्वामनरूपधारी।।5।।
इस श्लोक में वामन अवतार की महिमा गाई गई है। इसका अर्थ है कि जिस अजन्मा और अनंत रूप वाले भगवान ने वामन का वेष धारण कर छलकपट के माध्यम से अति दानशील राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया, उन श्रीहरि को मैं नमस्कार करता हूँ। यद्यपि यहाँ छल शब्द का प्रयोग हुआ है, परंतु यह लोक कल्याण के लिए किया गया एक दैवीय कौतुक था। राजा बलि अत्यंत दानी था, किंतु उसमें अपने ऐश्वर्य और दानवीरता का सूक्ष्म अहंकार उत्पन्न हो गया था। वामन अवतार ने तीन पग भूमि मांगकर न केवल बलि का मद मर्दन किया, बल्कि देवताओं को उनका खोया हुआ स्वर्ग भी लौटाया।
दार्शनिक रूप से वामन अवतार सूक्ष्म से विराट होने की प्रक्रिया का प्रतीक है। वामन रूप छोटा है, जो विनम्रता को दर्शाता है, परंतु उनका त्रिविक्रम रूप ब्रह्मांड को मापने वाला है, जो आत्मा की अनंत व्यापकता का सूचक है। बलि द्वारा सर्वस्व दान करना यह सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए केवल वस्तुएं ही नहीं, बल्कि अपना अहंकार भी समर्पित करना पड़ता है। अनन्तरूप शब्द ईश्वर की असीमित क्षमताओं को प्रकट करता है जो छोटे से छोटे और बड़े से बड़े रूप में समाहित हैं। यह अवतार हमें सिखाता है कि धर्म की रक्षा के लिए समर्पण और विनम्रता परम आवश्यक गुण हैं।
Verse 6
पितुर्वधामर्षरर्येण येन त्रिःसप्तवारान्समरे हताश्च।
क्षत्राः पितुस्तर्पणमाहितञ्च तस्मै नमो भार्गवरूपिणे ते।।6।।
यह श्लोक भगवान परशुराम जिन्हें भार्गव भी कहा जाता है, को समर्पित है। इसका अर्थ है कि जिन्होंने अपने पिता जमदग्नि की हत्या के क्रोध में आकर युद्धभूमि में इक्कीस बार अत्याचारी क्षत्रियों का संहार किया और अपने पिता का तर्पण किया, उन भार्गव रूपधारी भगवान को मैं नमन करता हूँ। परशुराम का अवतार ब्राह्मण तेज और क्षत्रिय बल के अद्भुत समन्वय का प्रतीक है। उस समय के शासक जब अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर अधर्म के मार्ग पर चलने लगे थे, तब परशुराम ने शस्त्र उठाकर सामाजिक न्याय और धर्म की व्यवस्था को पुनः स्थापित किया था।
वैचारिक स्तर पर परशुराम अवतार अन्याय के प्रति शून्य सहनशीलता और तप की शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। पितुर्वधामर्षरर्येण पद यह दर्शाता है कि मर्यादा का उल्लंघन होने पर ईश्वर स्वयं न्यायदंड धारण करते हैं। इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का अर्थ है समाज से दूषित और निरंकुश सत्ता का पूर्ण उन्मूलन। भार्गवरूपिणे विशेषण उनकी महान वंशावली और ज्ञान की परंपरा को इंगित करता है। यह अवतार सिखाता है कि शांति और क्षमा श्रेष्ठ गुण हैं, किंतु जब अधर्म अपनी सीमाएं लांघ जाए, तो धर्म की रक्षा के लिए कठोर पुरुषार्थ और शस्त्र का प्रयोग भी अनिवार्य हो जाता है।
Verse 7
दशाननं यः समरे निहत्य,बद्धा पयोधिं हरिसैन्यचारी।
अयोनिजां सत्वरमुद्दधार सीतापतिं तं प्रणमामि रामम्।।7।।
इस श्लोक में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की स्तुति है। इसका अर्थ है कि जिन्होंने युद्ध में दस सिर वाले रावण का वध किया, वानर सेना के साथ समुद्र पर सेतु बांधा और अयोनिजा अर्थात पृथ्वी से उत्पन्न माता सीता का शीघ्रता से उद्धार किया, उन सीतापति राम को मैं प्रणाम करता हूँ। राम अवतार मानवीय मूल्यों और आदर्शों की पराकाष्ठा है। समुद्र पर पुल बांधना असंभव को संभव बनाने के सामूहिक प्रयास का प्रतीक है, जबकि रावण का वध बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय की घोषणा करता है।
दार्शनिक दृष्टि से राम अवतार जीव और ईश्वर के मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है। सीता भक्ति और शांति की प्रतीक हैं, जिनका अपहरण रावण रूपी अहंकार और काम द्वारा किया जाता है। राम रूपी चैतन्य हनुमान रूपी प्राण शक्ति और वानर सेना रूपी इंद्रियों के सहयोग से उस अहंकार को नष्ट कर पुनः शांति को प्राप्त करते हैं। अयोनिजा शब्द सीता की दिव्यता और पवित्रता को दर्शाता है। राम का जीवन यह संदेश देता है कि मर्यादाओं के भीतर रहकर भी उच्चतम पुरुषार्थ सिद्ध किया जा सकता है। वे केवल एक राजा नहीं, बल्कि धर्म के साक्षात स्वरूप हैं जो प्रत्येक युग के मनुष्य के लिए प्रेरणा पुंज हैं।
Verse 8
विलोलनेनं मधुसिक्तवक्त्रं प्रसन्नमूर्तिं ज्वलदर्कभासम्।
कृष्णाग्रजं तं बलभद्ररूपं नीलाम्बरं सीरकरं नमामि।।8।।
यह श्लोक भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र अर्थात बलराम जी की वंदना करता है। इसका अर्थ है कि जिनके नेत्र चंचल हैं, मुख मधु के समान मीठा है, जिनकी मूर्ति प्रसन्नचित्त है और जो चमकते हुए सूर्य के समान आभा वाले हैं, उन नीलाम्बर धारी और हाथ में हल धारण करने वाले कृष्णाग्रज बलराम को मैं नमस्कार करता हूँ। बलराम जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है, जो सदा श्री कृष्ण की सेवा में तत्पर रहते हैं। उनका हल (सीर) कृषि और परिश्रम का प्रतीक है, जो जीवन के आधारभूत कर्म को गौरव प्रदान करता है।
आध्यात्मिक रूप से बलराम जी बल और ज्ञान के अधिष्ठाता हैं। विलोलनेनं और प्रसन्नमूर्ति विशेषण उनकी आनंदमयी और चित्त को आकर्षित करने वाली अवस्था को दर्शाते हैं। नीलाम्बर होना उनके गंभीर और अगाध व्यक्तित्व का सूचक है, जैसे नीला आकाश या गहरा समुद्र। हल धारण करना इस बात का प्रतीक है कि वे मनुष्य के हृदय रूपी खेत को जोतकर उसे भक्ति के बीज बोने योग्य बनाते हैं। वे आध्यात्मिक मार्ग के बड़े भाई के समान हैं जो साधक को शक्ति और दिशा प्रदान करते हैं। यह अवतार हमें कर्मठता और ईश्वर के प्रति अनन्य भ्रातृत्व भाव एवं सेवा की शिक्षा देता है।
Verse 9
पद्मासनस्थः स्थिरबद्धदृष्टिर्जितेन्द्रियो निन्दितजीवघातः।
नमोऽस्तु ते मोहविनाशकाय जिनाय बुद्धाय च केशवाय।।9।।
इस श्लोक में भगवान बुद्ध के रूप में विष्णु की स्तुति की गई है। इसका अर्थ है कि जो पद्मासन में स्थित हैं, जिनकी दृष्टि एक बिंदु पर स्थिर है, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है और जिन्होंने पशु वध या जीव हिंसा की निंदा की है, उन मोह का नाश करने वाले बुद्ध रूपी केशव को नमस्कार है। भगवान बुद्ध का अवतार करुणा और अहिंसा के मार्ग को पुनर्जीवित करने के लिए हुआ था। जब धर्म के नाम पर पाखंड और हिंसा बढ़ गई थी, तब उन्होंने शांति और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाकर मानवता का कल्याण किया।
दार्शनिक धरातल पर बुद्ध अवतार आंतरिक शांति और निर्वाण का प्रतीक है। जितेन्द्रियो और स्थिरबद्धदृष्टि शब्द ध्यान की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं, जहाँ मनुष्य संसार की चंचलता को त्याग कर स्वयं में स्थित हो जाता है। मोहविनाशकाय विशेषण यह बताता है कि दुखों का मूल कारण अज्ञान और आसक्ति है, जिसे ज्ञान के माध्यम से ही मिटाया जा सकता है। बुद्ध को केशव कहना इस बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न मतों के बावजूद परम तत्व एक ही है। यह अवतार सिखाता है कि अहिंसा परम धर्म है और सच्चा विजय वह है जो मनुष्य अपने स्वयं के मन और इच्छाओं पर प्राप्त करता है।
Verse 10
म्लेच्छान् निहन्तुं लभते तु जन्म कलौ च कल्की दशमावतारः।
नमोऽस्तु तस्मै नरकान्तकाय देवादिदेवाय महात्मने च।।10।।
इस अंतिम श्लोक में भविष्य के दसवें अवतार कल्कि का वर्णन है। इसका अर्थ है कि कलयुग के अंत में म्लेच्छों और दुष्टों का विनाश करने के लिए जो अवतार जन्म लेगा, उन नरक का अंत करने वाले, देवों के देव और महात्मा कल्कि को मेरा नमन है। ऐसी मान्यता है कि जब कलयुग में अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा, मानवता विलुप्त होने लगेगी और केवल अंधकार शेष होगा, तब भगवान कल्कि सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लिए प्रकट होंगे और एक नए सतयुग का सूत्रपात करेंगे।
दार्शनिक रूप से कल्कि अवतार समय के चक्र और शुद्धि की प्रक्रिया को दर्शाता है। म्लेच्छ यहाँ केवल बाहरी शत्रुओं के लिए नहीं, बल्कि मानव मन की उन दूषित प्रवृत्तियों के लिए प्रयुक्त है जो उसे पाशविक बना देती हैं। नरकान्तकाय शब्द का अर्थ है दुखों और निम्न योनियों के भय को मिटाने वाला। यह अवतार एक आशा की किरण है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, अंततः ईश्वरीय न्याय और सत्य की ही विजय होती है। कल्कि अवतार हमें वर्तमान के अंधकार में भी भविष्य के प्रकाश के प्रति आश्वस्त करता है और पवित्र जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है ताकि हम आगामी परिवर्तन के योग्य बन सकें।