
Lyics:
आदावम्बुजसम्भवादिविनुतः शान्तोऽच्युतः शाश्वतः
सम्फुल्लामलपुण्डरीकनयनः पुण्यः पुराणः पुमान् ।
लोकेशः श्रुतिचोरसोमकहरो मत्स्यावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥1॥
सप्तद्वीपकुलाचलेन्द्रजलधिस्तोमाभिसङ्क्रान्तभू-
भारालीढफणीन्द्रमन्दरधरो मन्दारमालार्चितः ।
भावज्ञो बहुचक्रलाञ्छिततनुः कूर्मावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥2॥
लीलालोडितसर्वसागरजलः सम्पूर्णचन्द्रप्रभो
हेमाक्षासुरखण्डनो भुजगदः चक्राङ्कितः सन्ततम् ।
दंष्ट्राग्रोद्धृतमेदिनीभयहरः क्रोडावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥3॥
कुन्देन्दुस्फटिकप्रभो बहुभुजो भूषासहस्रोज्ज्वलो
दैत्येन्द्रोदरदारणेऽतिनिपुणः स्तम्भोद्भवो भीषणः ।
प्रह्लादार्तिहरोदयो नरमृगाकारावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥4॥
धातृक्षालितपादपङ्कजभवस्रोतोमहाशाम्बरः
प्रक्षालीकृतपादपद्मयुगलो बालो जगज्जीवनः ।
भिक्षार्थी बलिदर्पहा पटुवटुः खर्वावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥5॥
सद्यःखण्डितराजमण्डलशरीरोद्भूतरक्तापगा
संसिक्ताखिलभूतलः पितृवचःसम्पालने निष्ठितः ।
वेदज्ञो जमदग्निजः परशुभृद्रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥6॥
राजेन्द्रो रणरङ्गराजविनुतानेकासुराभासुरा-
कारो रावणकोटिखण्डनपटुः कोदण्डदीक्षागुरुः ।
सीतेशः सुरसज्जनामृतकरो रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥7॥
कालिन्दीजलभेदनो बहुभुजो भूषासमुद्भासुरः
प्रध्वंसी मुसलायुधो हलधरो नीलाम्बरो निर्मलः ।
लावण्याप्पतिरेवतीपतिरसौ रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा भङ्गलम् ॥8॥
धर्मज्ञत्रिपुराधिनाथवनिताधर्मोपदेष्टा च त-
त्पातिव्रत्यविशेषभञ्जनपरो वेदान्तवेद्यः सदा ।
दैत्यव्रातविनाशनादिचतुरो बुद्धावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥9॥
म्लेच्छव्रातविनाशकः कलियुगान्तेऽश्वाधिरूढो महा-
मायावी बहुभानुकोटिसदृशो भीमांशुचक्रायुधः ।
यश्चाङ्गीकृतकल्किरूपविभवो भूमौ अविष्यान्वयः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥10॥
Meaning:
Verse 1
आदावम्बुजसम्भवादिविनुतः शान्तोऽच्युतः शाश्वतः
सम्फुल्लामलपुण्डरीकनयनः पुण्यः पुराणः पुमान् ।
लोकेशः श्रुतिचोरसोमकहरो मत्स्यावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥1॥
इस श्लोक में भगवान श्री हरि के मत्स्यावतार की स्तुति की गई है। यहाँ उन्हें अम्बुजसम्भवादि विनुतः कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी और अन्य देवताओं द्वारा पूजित हैं। वे शान्त, अच्युत अर्थात कभी न गिरने वाले और शाश्वत सत्य के रूप में वर्णित हैं। उनके नेत्र खिले हुए श्वेत कमल के समान पवित्र और विशाल हैं। वे आदि पुरुष और समस्त पुण्यों के स्रोत हैं। पौराणिक सन्दर्भ में, भगवान ने मत्स्य का रूप धारण कर सोमकासुर नामक दैत्य का वध किया था, जिसने वेदों को चुरा लिया था। वेदों की रक्षा कर उन्होंने ब्रह्मांड में पुनः ज्ञान और धर्म की स्थापना की थी। वे लोकों के स्वामी और मंगल के दाता हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से अच्युत शब्द यह संकेत देता है कि माया के संसार में अवतार लेने पर भी उनकी दिव्यता अक्षुण्ण रहती है। मत्स्यावतार जल तत्व से सम्बन्धित है, जो सृष्टि के प्रलयकाल और नवीन जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। यह अवतार हमें सिखाता है कि जब ज्ञान की रक्षा संकट में होती है, तब ईश्वर स्वयं उसे सुरक्षित करते हैं। सिंहगिरीश्वर भगवान, जो सिंह पर्वत के अधिपति हैं, अपनी असीम करुणा से सभी का कल्याण करें। यहाँ उन्हें पुराण पुमान् कहना उनकी अनादि और सनातन सत्ता को स्पष्ट करता है, जो काल और परिस्थिति से परे है। उनकी दृष्टि भक्त के हृदय में उसी प्रकार शान्ति लाती है जैसे खिले हुए कमल के दर्शन से मन को प्रसन्नता मिलती है।
Verse 2
सप्तद्वीपकुलाचलेन्द्रजलधिस्तोमाभिसङ्क्रान्तभू-
भारालीढफणीन्द्रमन्दरधरो मन्दारमालार्चितः ।
भावज्ञो बहुचक्रलाञ्छिततनुः कूर्मावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥2॥
यह श्लोक भगवान के कूर्मावतार के वैभव का वर्णन करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने सात द्वीपों, पर्वतराजों और विशाल समुद्रों के साथ पृथ्वी के भार को सहन किया। उन्होंने समुद्र मन्थन के समय मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण किया था। वे मन्दार के पुष्पों की मालाओं से सुशोभित हैं। उनके शरीर पर चक्रों के चिन्ह अंकित हैं और वे भक्तों के मन के भावों को जानने वाले भावज्ञ हैं। भगवान कूर्मावतार ने कच्छप रूप लेकर देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के महान कार्य में आधार स्तम्भ की भूमिका निभाई थी।
दार्शनिक रूप से कूर्म अवतार स्थिरता और धैर्य का प्रतीक है। जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार योगी को अपनी इन्द्रियों को विषयों से हटाकर आत्मकेन्द्रित होना चाहिए। मन्दराचल पर्वत को धारण करना यह दर्शाता है कि संसार की उथल-पुथल के बीच भगवान ही एकमात्र स्थिर आधार हैं। मन्दार माला से अलंकृत होना उनके दिव्य सौन्दर्य को प्रकट करता है। 'बहुचक्रलाञ्छिततनुः' उनके विष्णु स्वरूप की विशिष्टता को दर्शाता है। सिंहगिरीश्वर भगवान के रूप में वे भक्तों के जीवन में स्थिरता लाते हैं और उन्हें कठिन परिस्थितियों में सहारा प्रदान करते हैं। उनकी करुणा ही जीव को संसार रूपी समुद्र के मन्थन में विजयी बनाती है।
Verse 3
लीलालोडितसर्वसागरजलः सम्पूर्णचन्द्रप्रभो
हेमाक्षासुरखण्डनो भुजगदः चक्राङ्कितः सन्ततम् ।
दंष्ट्राग्रोद्धृतमेदिनीभयहरः क्रोडावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥3॥
इस श्लोक में भगवान के वराहावतार या क्रोडावतार की महिमा गाई गई है। वराह रूप में भगवान ने अपनी लीला मात्र से समुद्र के समस्त जलों को आलोड़ित कर दिया था। उनकी आभा पूर्ण चन्द्रमा के समान शीतल और तेजस्वी है। उन्होंने सुवर्ण के समान नेत्रों वाले हिरण्याक्ष असुर का संहार किया। उनके पास भुज और गदा है तथा वे सदैव सुदर्शन चक्र से युक्त रहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण दृश्य वह है जब उन्होंने अपने दंष्ट्राग्र अर्थात दांतों की नोक पर पृथ्वी को उठाकर उसे पाताल लोक से बाहर निकाला और जगत् का भय दूर किया।
पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को चुराकर समुद्र की अगाध गहराइयों में छिपा दिया था। वराहावतार भगवान की रक्षात्मक शक्ति का परिचायक है। आध्यात्मिक स्तर पर मेदिनी या पृथ्वी को उठाना अज्ञान की कीचड़ में फंसी आत्मा के उद्धार का प्रतीक है। भगवान का क्रोड रूप यह दर्शाता है कि वे भक्तों के उद्धार के लिए किसी भी रूप में प्रकट हो सकते हैं। वे सिंहगिरीश्वर के रूप में अपनी करुणा की वर्षा करते हैं और पृथ्वी के दुखों को हर लेते हैं। चक्राङ्कित शब्द उनकी सार्वभौमिक सत्ता और समय के चक्र पर उनके नियंत्रण को इंगित करता है। वे न केवल दुष्टों का नाश करते हैं बल्कि अपनी प्रजा की भय से रक्षा भी करते हैं।
Verse 4
कुन्देन्दुस्फटिकप्रभो बहुभुजो भूषासहस्रोज्ज्वलो
दैत्येन्द्रोदरदारणेऽतिनिपुणः स्तम्भोद्भवो भीषणः ।
प्रह्लादार्तिहरोदयो नरमृगाकारावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥4॥
यह श्लोक भगवान नरसिंह के उग्र और सौम्य दोनों रूपों का चित्रण करता है। उनकी कान्ति कुन्द पुष्प, चन्द्रमा और स्फटिक मणि के समान उज्जवल है। वे अनेक भुजाओं वाले और सहस्रों आभूषणों से देदीप्यमान हैं। वे दैत्यराज हिरण्यकशिपु के उदर को विदीर्ण करने में अत्यन्त निपुण हैं। वे खम्भे से प्रकट हुए और उनका रूप अत्यन्त भीषण था। परन्तु प्रह्लाद जैसे भक्तों के लिए वे दुखहर्ता के रूप में उदित हुए। नर और मृग अर्थात सिंह के मिश्रित आकार वाले इस अवतार ने असम्भव को सम्भव कर दिखाया।
भगवान नरसिंह का अवतार यह सिद्ध करता है कि ईश्वर सर्वव्यापी हैं और वे पत्थर के निर्जीव खम्भे से भी प्रकट हो सकते हैं। प्रह्लाद की भक्ति ने ईश्वर को विवश कर दिया कि वे एक ऐसा रूप धरें जो न पूर्ण मानव हो और न पूर्ण पशु। यह अवतार अहंकार के विनाश और शरणागति की महत्ता को दर्शाता है। दैत्य के उदर को फाड़ना केवल एक वध नहीं बल्कि अधर्म के उन्मूलन का प्रतीक है। सिंहगिरीश्वर का वास स्थान सिंह पर्वत इसी नरसिंह अवतार की स्मृति दिलाता है। उनकी करुणा उन भक्तों के लिए अमृत के समान है जो संकट में उन्हें पुकारते हैं। वे भीषण होकर भी अपने शरणागत के लिए परम स्नेही हैं।
Verse 5
धातृक्षालितपादपङ्कजभवस्रोतोमहाशाम्बरः
प्रक्षालीकृतपादपद्मयुगलो बालो जगज्जीवनः ।
भिक्षार्थी बलिदर्पहा पटुवटुः खर्वावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥5॥
इस श्लोक में वामनावतार की कथा और महिमा का वर्णन है। उनके चरण कमल इतने महान हैं कि जब ब्रह्माजी ने उन्हें धोया, तो उस जल के स्रोत से गंगा का प्राकट्य हुआ। वे एक छोटे बालक के रूप में आए जो सम्पूर्ण जगत् का जीवन आधार हैं। वे राजा बलि के पास एक भिक्षु के वेश में गए ताकि उनके अहंकार या दर्प को नष्ट कर सकें। उन्हें खर्वावतार या छोटे कद का अवतार कहा गया है, जो एक चतुर बटु अर्थात ब्रह्मचारी के रूप में प्रकट हुए। उनकी छोटी देह में ही सारा ब्रह्मांड समाया हुआ था।
वामन अवतार भगवान की लीला का एक अद्भुत उदाहरण है जहाँ वे सर्वशक्तिमान होकर भी दान माँगने जाते हैं। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जब व्यक्ति अपना सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर देता है, तभी उसे वास्तविक मुक्ति मिलती है। बलि का अहंकार दान देने में था, जिसे भगवान ने स्वयं उसके सामने हाथ फैलाकर तोड़ा। पटुवटु शब्द उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाता है। वे केवल तीन पग भूमि माँगकर तीन लोकों को नाप लेते हैं, जो यह बताता है कि ईश्वर की व्याप्ति छोटे से छोटे कण से लेकर विशालतम ब्रह्मांड तक है। सिंहगिरीश्वर के रूप में वे हमारे जीवन के अभिमान को दूर कर हमें अपनी शरण में स्थान देते हैं।
Verse 6
सद्यःखण्डितराजमण्डलशरीरोद्भूतरक्तापगा
संसिक्ताखिलभूतलः पितृवचःसम्पालने निष्ठितः ।
वेदज्ञो जमदग्निजः परशुभृद्रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥6॥
यहाँ परशुराम अवतार का वर्णन है। उन्होंने अधर्मी राजाओं के समूह का दमन किया, जिससे उत्पन्न रक्त की नदियों से सम्पूर्ण पृथ्वी सिंचित हो गई। वे जमदग्नि ऋषि के पुत्र हैं और अपने पिता के वचनों के पालन में पूर्णतः निष्ठित रहे। वे वेदों के ज्ञाता और हाथ में परशु अर्थात कुल्हाड़ा धारण करने वाले राम हैं। उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को आततायी क्षत्रियों से मुक्त किया था ताकि धर्म की पुनः स्थापना हो सके। उनका व्यक्तित्व तेज और ब्राह्मणत्व के साथ क्षत्रिय पराक्रम का मिश्रण है।
परशुराम अवतार पितृभक्ति और कठोर अनुशासन का प्रतीक है। रक्त की नदियों का वर्णन यह संकेत देता है कि जब समाज में अन्याय चरम पर पहुँच जाता है, तब भगवान का क्रोध रुधिर की धारा के रूप में फूटता है ताकि धरती शुद्ध हो सके। वे वेदों के ज्ञाता होकर भी शस्त्र उठाते हैं, जिसका अर्थ है कि शस्त्र और शास्त्र दोनों का सन्तुलन आवश्यक है। सिंहगिरीश्वर भगवान के इस रूप में अन्यायियों के लिए काल और भक्तों के लिए रक्षक का भाव निहित है। यह अवतार सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए कभी-कभी कठोर निर्णय लेना और शक्ति का प्रदर्शन करना अनिवार्य हो जाता है। उनकी करुणा धर्म की मर्यादा अक्षुण्ण रखने में निहित है।
Verse 7
राजेन्द्रो रणरङ्गराजविनुतानेकासुराभासुरा-
कारो रावणकोटिखण्डनपटुः कोदण्डदीक्षागुरुः ।
सीतेशः सुरसज्जनामृतकरो रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥7॥
यह श्लोक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी की स्तुति करता है। वे राजाओं के राजा राजेन्द्र हैं, जिन्होंने युद्ध भूमि में अनेक भयानक असुरों का विनाश किया। उनकी आभा दिव्य है और वे रावण जैसे करोड़ों दुष्टों का संहार करने में चतुर हैं। वे कोदण्ड धनुष चलाने की विद्या में दीक्षा गुरु के समान श्रेष्ठ हैं। वे माता सीता के स्वामी हैं और देवताओं तथा सज्जनों के लिए अमृत की वर्षा करने वाले चन्द्रमा के समान हैं। रामावतार में भगवान ने एक आदर्श मनुष्य का जीवन जीकर धर्म की सूक्ष्म व्याख्या की थी।
राम का चरित्र मर्यादा और आदर्श का उच्चतम शिखर है। 'कोदण्डदीक्षागुरु' शब्द उनके अजेय कौशल और नेतृत्व का सूचक है। आध्यात्मिक रूप से, रावण का वध दस इन्द्रियों के संयम और अहंकार की समाप्ति का प्रतीक है। सीताजी की खोज और प्राप्ति जीव और ब्रह्म के पुनर्मिलन को दर्शाती है। वे सज्जनों के लिए 'अमृतकर' हैं क्योंकि उनकी उपस्थिति ही शान्ति और आनन्द प्रदान करती है। सिंहगिरीश्वर के रूप में वे वही राम हैं जो अपने भक्तों के कष्टों को हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। उनका राज्य रामराज्य आज भी न्याय और सुख का पर्याय माना जाता है। उनकी करुणा से ही जीवन में मर्यादा और सत्य का आगमन होता है।
Verse 8
कालिन्दीजलभेदनो बहुभुजो भूषासमुद्भासुरः
प्रध्वंसी मुसलायुधो हलधरो नीलाम्बरो निर्मलः ।
लावण्याप्पतिरेवतीपतिरसौ रामावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा भङ्गलम् ॥8॥
यहाँ बलराम अवतार का वर्णन है, जिन्हें 'राम' भी कहा जाता है। उन्होंने यमुना अर्थात कालिन्दी के जल के मार्ग को अपने हल से बदल दिया था। वे अनेक आभूषणों से सुशोभित और बलशाली भुजाओं वाले हैं। वे मुसल और हल को धारण करने वाले हलधर हैं। उन्होंने नीले रंग के वस्त्र धारण किए हैं और उनका स्वरूप अत्यन्त निर्मल है। वे लावण्य के स्वामी और माता रेवती के पति हैं। बलराम जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है और वे भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में प्रकट हुए थे।
हल और मुसल का धारण करना कृषि और शक्ति के समन्वय का प्रतीक है। बलराम जी का स्वरूप श्वेत वर्ण का है, जो सात्विकता और शुद्धता को दर्शाता है। यमुना को अपने हल से खींचना यह बताता है कि प्रकृति की शक्तियाँ भी भगवान के अधीन हैं। वे संकर्षण कहलाते हैं जो सबको अपनी ओर आकर्षित करते हैं और साथ जोड़ते हैं। सिंहगिरीश्वर भगवान के इस स्वरूप का ध्यान करने से व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक बल प्राप्त होता है। उनकी करुणा भक्त के जीवन के विकारों को उसी प्रकार जोत देती है जैसे हल भूमि को उपजाऊ बनाता है। वे निर्मलता के सागर हैं और उनकी कृपा से भक्तों का जीवन निष्पाप और सफल हो जाता है।
Verse 9
धर्मज्ञत्रिपुराधिनाथवनिताधर्मोपदेष्टा च त-
त्पातिव्रत्यविशेषभञ्जनपरो वेदान्तवेद्यः सदा ।
दैत्यव्रातविनाशनादिचतुरो बुद्धावतारो हरिः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥9॥
इस श्लोक में भगवान के बुद्धावतार की चर्चा की गई है, जिसकी व्याख्या यहाँ पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार दी गई है। उन्हें धर्म का ज्ञाता बताया गया है जिन्होंने त्रिपुरासुर के नगर की स्त्रियों को उपदेश दिया था। इस अवतार का एक उद्देश्य असुरों को सन्मार्ग से भटकाना भी था ताकि उनके बल को कम किया जा सके। वे सदा वेदान्त द्वारा जानने योग्य हैं। वे दैत्य समूहों के विनाश की रणनीतियों में चतुर हैं। बुद्ध का अर्थ है वह जो जागृत है और जिसके पास परम ज्ञान है।
आध्यात्मिक और दार्शनिक रूप से बुद्धावतार अहिंसा, करुणा और शान्ति का संदेश लेकर आता है। यद्यपि यहाँ कुछ पौराणिक आख्यानों का उल्लेख है, परन्तु बुद्ध का मूल स्वरूप करुणा का है। वे सिखाते हैं कि इच्छाओं का त्याग ही दुखों से मुक्ति का मार्ग है। 'वेदान्तवेद्य' शब्द यह स्पष्ट करता है कि बुद्ध कोई अलग सत्ता नहीं वरन् वही विष्णु हैं जिन्हें उपनिषद् सत्य बताते हैं। सिंहगिरीश्वर भगवान बुद्ध के रूप में हमें विवेक और आत्मज्ञान प्रदान करते हैं। उनकी कृपा से भक्त मोह-माया के बन्धनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है। यह अवतार बुद्धि की प्रखरता और धर्म के सूक्ष्म मर्म को समझने की प्रेरणा देता है।
Verse 10
म्लेच्छव्रातविनाशकः कलियुगान्तेऽश्वाधिरूढो महा-
मायावी बहुभानुकोटिसदृशो भीमांशुचक्रायुधः ।
यश्चाङ्गीकृतकल्किरूपविभवो भूमौ अविष्यान्वयः
श्रीमान् सिंहगिरीश्वरः करुणया दद्यात्सदा मङ्गलम् ॥10॥
अन्तिम श्लोक भविष्य के कल्कि अवतार का वर्णन करता है। कलियुग के अन्त में जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा, तब भगवान अश्व अर्थात सफेद घोड़े पर सवार होकर प्रकट होंगे। वे म्लेच्छों और अधर्मियों का विनाश करेंगे। उनकी कान्ति करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी होगी और वे भयंकर चक्र रूपी अस्त्र धारण करेंगे। वे महामायावी हैं जिनके कार्यों को समझना कठिन है। वे कल्कि के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर पुनः सत्ययुग की स्थापना करेंगे। यह अवतार ईश्वर के न्याय और समय चक्र की पूर्णता का प्रतीक है।
कल्कि अवतार यह विश्वास दिलाता है कि अन्धकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की जीत निश्चित है। करोड़ों सूर्यों की आभा यह संकेत देती है कि जब ज्ञान का उदय होगा, तब अज्ञान के सारे बादल छँट जाएंगे। सिंहगिरीश्वर भगवान ही वह कल्कि हैं जो भविष्य के रक्षक हैं। उनकी करुणा हमें कलियुग के दोषों से बचाने में समर्थ है। यह स्तोत्र यहाँ समाप्त होता है जहाँ भक्त प्रार्थना करता है कि भगवान के ये सभी रूप हमें सदा मंगल प्रदान करें। कल्कि का स्वरूप संहारक होकर भी सृजन का आधार है क्योंकि पुराने सड़े-गले मूल्यों के विनाश के बाद ही नवीन और धर्मयुक्त समाज का निर्माण सम्भव होता है। उनकी करुणा ही अन्तिम सत्य है।