महाविष्णु शरणागति स्तोत्र

महाविष्णु शरणागति स्तोत्र

Lyrics:

अकारार्थो विष्णुर्जगदुदयरक्षाप्रलयकृन्-
मकारार्थो जीवस्तदुपकरणं वैष्णवमिदम् ।
उकारोऽनन्यर्हं नियमयति सम्बन्धमनयो-
स्त्रयीसारस्त्र्यात्मा प्रणव इममर्थं समदिशत् ॥१॥

मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंसःस्वरूपङ्गति-
र्गम्यं शिक्षितमीक्षितेन पुरतःपश्चादपि स्थानतः ।
स्वातन्त्र्यं निजरक्षणं समुचिता वृत्तिश्च नान्योचिता
तस्यैवेति हरेर्विविच्य कथितं स्वस्यापि नार्हं ततः ॥२॥

अकारार्थायैवस्वमहमथ मह्यं न निवहाः
नराणां नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।
यमाहास्मै कालं सकलमपि सर्वत्र सकला-
स्ववस्थास्वाविः स्युर्मम सहजकैङ्कर्यविधयः ॥३॥

देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदं साधु विद्यात्तृतीयं
स्वातन्त्र्यान्धो यदि स्यात्प्रथममितरशेषत्वधीश्चेद् द्वितीयम् ।
आत्मत्राणोन्मुखश्चेन्नम इति च पदं बान्धवाभासलोलः
शब्दं नारायणाख्यं विषयचपलधीश्चेच्चतुर्थीं प्रपन्नः ॥४॥

नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनञ्चो-
पायं कर्त्तव्यभागं त्वथ मिथुनपरं प्राप्यमेवं प्रसिद्धम् ।
स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणं दशैतान्
मन्तारं त्रायते चेत्यधिगतनियमः षट्पदोऽयं द्विखण्डः ॥५॥

ईशानाञ्जगतामधीशदयितां नित्यानपायां श्रियं
संश्रित्याश्रयणोचिताखिलगुणस्याङ्घ्री हरेराश्रये ।
इष्टोपायतया श्रिया च सहितायात्मेश्वरायार्थये
कर्तुं दास्यमशेषमप्रतिहतं नित्यं त्वहं निर्ममः ॥६॥

मत्प्राप्त्यर्थतया मयोक्तमखिलं सन्त्यज्य धर्मं पुनः
मामेकं मदवाप्तये शमणमित्यार्तोऽवसायं कुरु ।
त्वामेकं व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णो ह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितं कुर्यां शुचं मा कृथाः ॥७॥

निश्चित्य त्वदधीनतां मयि सदा कर्माद्युपायान् हरे
कर्तुं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलं सीदामि दुःखाकुलः ।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम पुनस्सर्वापराधक्षयं
कर्तासीति दृढोऽस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन्सारथेः ॥८॥

शाखानामुपरि स्थितेन मनुना मूलेन लब्धात्मकः
सत्ताहेतुसकृज्जपेन सकलं कालं द्वयेन क्षिपन् ।
वेदोत्तंसविहारसारथिदयागुम्फेन विस्त्रम्भितः
सारज्ञो यदि कश्चिदस्ति भुवने नाथः स यूथस्य नः ॥९॥

Meaning:

Verse 1
अकारार्थो विष्णुर्जगदुदयरक्षाप्रलयकृन्-
मकारार्थो जीवस्तदुपकरणं वैष्णवमिदम् ।
उकारोऽनन्यर्हं नियमयति सम्बन्धमनयो-
स्त्रयीसारस्त्र्यात्मा प्रणव इममर्थं समदिशत् ॥१॥

इस श्लोक में प्रणव अर्थात् ॐ के तीन अक्षरों अ, उ, म का गहरा अर्थ बताया गया है। अकार का अर्थ है विष्णु, जो इस जगत की सृष्टि, पालन और प्रलय करने वाले हैं। मकार जीव का प्रतीक है, जो भगवान का उपकरण या आश्रित है। उकार इन दोनों के बीच के अविभाज्य संबंध को दर्शाता है, जिसमें जीव पूर्णतः भगवान पर निर्भर है।

पौराणिक दृष्टि से देखें तो विष्णु को जगत का आधार माना गया है, और जीव को उनकी शक्ति का अंश। यह संबंध ऐसा है जैसे शरीर और आत्मा का, जहां आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जीव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। उसका वास्तविक स्वरूप भगवान से जुड़ा हुआ है। ॐ का उच्चारण केवल ध्वनि नहीं, बल्कि इस सत्य का स्मरण है कि हम भगवान के अधीन हैं और उन्हीं के लिए हैं।

Verse 2
मन्त्रब्रह्मणि मध्यमेन नमसा पुंसःस्वरूपङ्गति-
र्गम्यं शिक्षितमीक्षितेन पुरतःपश्चादपि स्थानतः ।
स्वातन्त्र्यं निजरक्षणं समुचिता वृत्तिश्च नान्योचिता
तस्यैवेति हरेर्विविच्य कथितं स्वस्यापि नार्हं ततः ॥२॥

यह श्लोक नमः शब्द के माध्यम से मनुष्य के वास्तविक स्वरूप की शिक्षा देता है। नमः का अर्थ है झुकना, समर्पण करना। इससे यह स्पष्ट होता है कि जीव का स्वभाव भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है।

शास्त्रों में बार-बार यह बताया गया है कि जीव स्वतंत्र नहीं है। वह भगवान की इच्छा से चलता है। जैसे महाभारत में अर्जुन ने अंततः श्रीकृष्ण के सामने अपना अहंकार त्याग दिया और उनके निर्देश को स्वीकार किया।

यहां यह भी कहा गया है कि आत्मरक्षा, स्वतंत्रता और उचित आचरण का अधिकार भी भगवान का ही है। जीव को यह अधिकार अपने लिए नहीं मानना चाहिए। यह विचार गहराई से अहंकार को तोड़ता है।

आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक सिखाता है कि जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, तब तक वह बंधन में रहता है। जब वह नमः के भाव को अपनाता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।

Verse 3
अकारार्थायैवस्वमहमथ मह्यं न निवहाः
नराणां नित्यानामयनमिति नारायणपदम् ।
यमाहास्मै कालं सकलमपि सर्वत्र सकला-
स्ववस्थास्वाविः स्युर्मम सहजकैङ्कर्यविधयः ॥३॥

इस श्लोक में नारायण शब्द का गहरा अर्थ बताया गया है। नारायण वह है जो सभी जीवों का अंतिम आश्रय है। यहां कहा गया है कि मैं केवल उसी के लिए हूं, मेरे लिए कुछ भी अलग नहीं है।

पौराणिक संदर्भ में नारायण को सभी लोकों का आधार माना गया है। वे ही सबके शरणदाता हैं। जैसे गजेन्द्र मोक्ष की कथा में हाथी ने अंततः नारायण को पुकारा और उन्हें ही अपना रक्षक माना।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि जीव का स्वभाव सेवा करना है। यह सेवा कोई मजबूरी नहीं, बल्कि उसकी सहज प्रवृत्ति है। जब जीव इस सत्य को स्वीकार करता है, तब उसका जीवन अर्थपूर्ण बनता है।

यह भी कहा गया है कि हर समय, हर स्थान और हर अवस्था में यह सेवा प्रकट होनी चाहिए। यही सच्चा भक्ति मार्ग है, जहां जीवन का हर क्षण भगवान के लिए समर्पित होता है।

Verse 4
देहासक्तात्मबुद्धिर्यदि भवति पदं साधु विद्यात्तृतीयं
स्वातन्त्र्यान्धो यदि स्यात्प्रथममितरशेषत्वधीश्चेद् द्वितीयम् ।
आत्मत्राणोन्मुखश्चेन्नम इति च पदं बान्धवाभासलोलः
शब्दं नारायणाख्यं विषयचपलधीश्चेच्चतुर्थीं प्रपन्नः ॥४॥

इस श्लोक में चार अवस्थाओं का वर्णन है, जिनमें जीव विभिन्न प्रकार की भ्रांतियों में फंसा रहता है। यदि वह शरीर को ही आत्मा मानता है, तो यह तीसरी अवस्था है। यदि वह स्वयं को स्वतंत्र मानता है, तो यह पहली अवस्था है।

दूसरी अवस्था वह है जब जीव स्वयं को भगवान का अंश मानता है, लेकिन अभी पूर्ण समर्पण नहीं करता। चौथी अवस्था वह है जब मन विषयों में भटकता रहता है और नारायण नाम का सही अर्थ नहीं समझता।

पौराणिक रूप से यह स्थिति संसार में हर जीव की है। कोई अहंकार में है, कोई मोह में, कोई अज्ञान में।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक चेतावनी देता है कि इन अवस्थाओं से बाहर निकलना आवश्यक है। जब तक जीव इन भ्रांतियों में फंसा है, तब तक वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकता।

सच्चा मार्ग वही है जिसमें जीव इन सभी अवस्थाओं को पार करके भगवान की शरण में जाता है।

Verse 5
नेतृत्वं नित्ययोगं समुचितगुणजातं तनुख्यापनञ्चो-
पायं कर्त्तव्यभागं त्वथ मिथुनपरं प्राप्यमेवं प्रसिद्धम् ।
स्वामित्वं प्रार्थनां च प्रबलतरविरोधिप्रहाणं दशैतान्
मन्तारं त्रायते चेत्यधिगतनियमः षट्पदोऽयं द्विखण्डः ॥५॥

इस श्लोक में दस तत्वों का वर्णन है जो साधना के मार्ग में महत्वपूर्ण हैं। इनमें नेतृत्व, भगवान से नित्य संबंध, उचित गुण, साधन, कर्तव्य, प्राप्ति, स्वामित्व, प्रार्थना और बाधाओं का नाश शामिल है।

पौराणिक दृष्टि से यह वही मार्ग है जिसे ऋषियों और भक्तों ने अपनाया। उन्होंने भगवान को अपना स्वामी माना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण किया।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि साधना केवल भाव नहीं है, बल्कि एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। इसमें ज्ञान, आचरण और समर्पण तीनों की आवश्यकता होती है।

यह भी स्पष्ट करता है कि भगवान ही रक्षक हैं। जो इस नियम को समझ लेता है, वह जीवन के बंधनों से मुक्त हो सकता है।

Verse 6
ईशानाञ्जगतामधीशदयितां नित्यानपायां श्रियं
संश्रित्याश्रयणोचिताखिलगुणस्याङ्घ्री हरेराश्रये ।
इष्टोपायतया श्रिया च सहितायात्मेश्वरायार्थये
कर्तुं दास्यमशेषमप्रतिहतं नित्यं त्वहं निर्ममः ॥६॥

इस श्लोक में भगवान के चरणों में शरण लेने की भावना व्यक्त की गई है। यहां श्री लक्ष्मी के साथ भगवान की उपासना की बात कही गई है, क्योंकि वे करुणा और कृपा की प्रतीक हैं।

पौराणिक रूप से लक्ष्मी और विष्णु का संबंध अटूट है। लक्ष्मी के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक सिखाता है कि जीव को अहंकार छोड़कर भगवान का दास बनना चाहिए। यह दासत्व बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग है।

जब जीव स्वयं को निर्मम बनाता है, अर्थात् मेरा भाव छोड़ देता है, तब वह सच्चे अर्थ में भगवान के निकट पहुंचता है।

Verse 7
मत्प्राप्त्यर्थतया मयोक्तमखिलं सन्त्यज्य धर्मं पुनः
मामेकं मदवाप्तये शमणमित्यार्तोऽवसायं कुरु ।
त्वामेकं व्यवसाययुक्तमखिलज्ञानादिपूर्णो ह्यहं
मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकैर्विरहितं कुर्यां शुचं मा कृथाः ॥७॥

यह श्लोक भगवान का सीधा संदेश है। वे कहते हैं कि सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ। यह भगवद्गीता के उपदेश की याद दिलाता है।

पौराणिक रूप से यह वही स्थिति है जब अर्जुन ने कृष्ण को अपना मार्गदर्शक स्वीकार किया।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि जब तक जीव अपने कर्मों और ज्ञान पर निर्भर रहता है, तब तक वह पूर्ण शांति नहीं पाता।

भगवान आश्वासन देते हैं कि वे सभी बाधाओं को दूर करेंगे। यह पूर्ण विश्वास और समर्पण की मांग करता है।

यहां संदेश स्पष्ट है कि भय और चिंता छोड़कर भगवान पर विश्वास करो।

Verse 8
निश्चित्य त्वदधीनतां मयि सदा कर्माद्युपायान् हरे
कर्तुं त्यक्तुमपि प्रपत्तुमनलं सीदामि दुःखाकुलः ।
एतज्ज्ञानमुपेयुषो मम पुनस्सर्वापराधक्षयं
कर्तासीति दृढोऽस्मि ते तु चरमं वाक्यं स्मरन्सारथेः ॥८॥

इस श्लोक में भक्त अपनी असमर्थता स्वीकार करता है। वह कहता है कि मैं कर्म और अन्य उपायों में सक्षम नहीं हूं, इसलिए आपकी शरण में आता हूं।

पौराणिक रूप से यह वही भावना है जो द्रौपदी ने कृष्ण के सामने व्यक्त की थी। जब सभी उपाय समाप्त हो गए, तब उसने पूर्ण समर्पण किया।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि सच्चा समर्पण तभी होता है जब मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है।

भगवान का वचन है कि वे सभी पापों का नाश करेंगे। इस पर दृढ़ विश्वास ही भक्ति का आधार है।

यह श्लोक पूर्ण आत्मसमर्पण का चरम उदाहरण है।

Verse 9
शाखानामुपरि स्थितेन मनुना मूलेन लब्धात्मकः
सत्ताहेतुसकृज्जपेन सकलं कालं द्वयेन क्षिपन् ।
वेदोत्तंसविहारसारथिदयागुम्फेन विस्त्रम्भितः
सारज्ञो यदि कश्चिदस्ति भुवने नाथः स यूथस्य नः ॥९॥

इस अंतिम श्लोक में उस ज्ञानी पुरुष का वर्णन है जो इस ज्ञान को समझ चुका है। वह वेदों के सार को जानता है और भगवान की कृपा से स्थिर रहता है।

पौराणिक रूप से ऐसे व्यक्ति को ऋषि या महात्मा कहा जाता है। वे संसार में रहते हुए भी उससे ऊपर होते हैं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो भगवान की शरण में ले जाए।

ऐसा व्यक्ति समाज का मार्गदर्शक बनता है। वह दूसरों को भी इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

अंततः यह श्लोक बताता है कि भगवान की कृपा और ज्ञान का संगम ही जीवन की पूर्णता है।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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