आनन्दरूपे निजबोधरूपे ब्रह्मस्वरूपे श्रुतिमूर्तिरूपे ।
शशाङ्करूपे रमणीयरूपे श्रीरङ्गरूपे रमतां मनो मे ॥
जो आनंद स्वरूप हैं, आत्म-ज्ञान स्वरूप हैं, ब्रह्म स्वरूप हैं और वेदों के साकार रूप हैं। जो चन्द्रमा के समान शीतल और मनोहर हैं, ऐसे रमणीय श्री रंगनाथ के स्वरूप में मेरा मन रमण करे।
इस श्लोक में भक्त भगवान श्री रंगनाथ के तात्विक एवं लौकिक स्वरूपों का एक साथ ध्यान कर रहा है। वे केवल एक मूर्ति नहीं, अपितु साक्षात आनंद और ज्ञान के पुंज हैं। उन्हें 'ब्रह्मस्वरूप' कहकर सृष्टि का परम कारण बताया गया है और 'श्रुतिमूर्तिरूप' कहकर यह दर्शाया गया है कि समस्त वैदिक ज्ञान उन्हीं में समाहित है। 'शशाङ्करूप' अर्थात चन्द्रमा का स्वरूप, उनकी शीतलता, शांति और सौंदर्य को प्रकट करता है, जो भक्तों के संतप्त मन को शांति प्रदान करता है। भक्त की यही प्रार्थना है कि उसका चित्त इन्हीं मंगलमय स्वरूपों में लीन हो जाए।
कावेरितीरे करुणाविलोले मन्दारमूले धृतचारुचेले ।
दैत्यान्तकालेऽखिललोकलीले श्रीरङ्गलीले रमतां मनो मे ॥
जो कावेरी के तट पर, मंदार वृक्ष के नीचे सुंदर वस्त्र धारण किए हुए विराजमान हैं, जिनकी दृष्टि करुणा से परिपूर्ण है। जो दैत्यों का संहार करने वाले हैं और जिनकी लीला समस्त लोकों में व्याप्त है, ऐसे लीला-पुरुष श्री रंगनाथ में मेरा मन रमण करे।
यह श्लोक भगवान के श्रीरंगम स्थित धाम का एक सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। 'कावेरितीरे' से उनके स्थान का संकेत मिलता है। 'करुणाविलोले' का अर्थ है कि उनकी दृष्टि मात्र से भक्तों पर करुणा की वर्षा होती है। एक ओर वे परम दयालु हैं, तो दूसरी ओर 'दैत्यान्तकाले' अर्थात् दुष्टों और दैत्यों का संहार कर धर्म की स्थापना करने वाले भी वे ही हैं। 'अखिललोकलीले' यह दर्शाता है कि यह संपूर्ण सृष्टि और इसमें होने वाली घटनाएं भगवान का एक खेल या लीला मात्र हैं। भक्त स्वयं को उसी दिव्य लीला का अंग मानकर उनके ध्यान में मग्न होना चाहता है।
लक्ष्मीनिवासे जगतां निवासे हृत्पद्मवासे रविबिम्बवासे ।
कृपानिवासे गुणवृन्दवासे श्रीरङ्गवासे रमतां मनो मे ॥
जिनके हृदय में लक्ष्मी निवास करती हैं, जो समस्त जगत के आश्रय हैं, जो भक्तों के हृदय-कमल में और सूर्य के बिम्ब में भी वास करते हैं। जो कृपा के सागर हैं और समस्त सद्गुणों के भंडार हैं, ऐसे श्रीरंगम के स्वामी में मेरा मन रमण करे।
इस श्लोक में भगवान की सर्वव्यापकता और उनके आश्रय-स्वरूप का गुणगान किया गया है। 'लक्ष्मीनिवासे' कहकर उन्हें ऐश्वर्य और सौभाग्य का स्वामी बताया गया है। वे केवल ब्रह्मांड के 'जगतां निवासे' ही नहीं, बल्कि हर भक्त के 'हृत्पद्मवासे' भी हैं, जो उनके भक्त-वात्सल्य को दर्शाता है। 'रविबिम्बवासे' का अर्थ है कि सूर्य को भी तेज और प्रकाश उन्हीं से प्राप्त होता है। वे कृपा और समस्त दिव्य गुणों के परम आश्रय हैं, इसीलिए भक्त उनके श्रीरंगम स्थित स्वरूप में अपने मन को लगाना चाहता है।
ब्रह्मादिवन्द्ये जगदेकवन्द्ये मुकुन्दवन्द्ये सुरनाथवन्द्ये ।
व्यासादिवन्द्ये सनकादिवन्द्ये श्रीरङ्गवन्द्ये रमतां मनो मे ॥
जो ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा, संपूर्ण जगत द्वारा, मुकुन्द (शिव) द्वारा और देवराज इंद्र द्वारा वंदनीय हैं। जो व्यास आदि ऋषियों और सनक आदि कुमारों द्वारा वंदनीय हैं, ऐसे परम पूज्य श्री रंगनाथ में मेरा मन रमण करे।
यह श्लोक भगवान की परम सत्ता और सार्वभौमिक वंदनीयता को प्रकट करता है। वे केवल मनुष्यों द्वारा ही नहीं, अपितु सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा से लेकर संहारकर्ता शिव तक, देवराज इंद्र से लेकर महर्षि व्यास तक, सभी के द्वारा पूजे जाते हैं। 'जगदेकवन्द्ये' शब्द यह स्थापित करता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में उनके अतिरिक्त कोई और परम वंदना के योग्य नहीं है। यह उनकी सर्वोच्चता को दर्शाता है, जिसके समक्ष ज्ञान, शक्ति और सृष्टि की समस्त सत्ताएं नतमस्तक हैं।
ब्रह्माधिराजे गरुडाधिराजे वैकुण्ठराजे सुरराजराजे ।
त्रैलोक्यराजेऽखिललोकराजे श्रीरङ्गराजे रमतां मनो मे ॥
जो ब्रह्मा के भी अधिपति हैं, गरुड़ के भी स्वामी हैं, वैकुंठ के राजा हैं और देवराज इंद्र के भी राजा हैं। जो त्रिलोक के राजा हैं, अखिल ब्रह्मांड के राजा हैं, ऐसे महाराजाधिराज श्री रंगनाथ में मेरा मन रमण करे।
यहाँ भगवान को 'राजाधिराज' अर्थात् सम्राटों के सम्राट के रूप में स्तुत किया गया है। वे केवल किसी एक लोक के नहीं, बल्कि प्रत्येक सत्ता के भी स्वामी हैं। वे ब्रह्मा को नियुक्त करने वाले हैं, इसलिए 'ब्रह्माधिराज' हैं। वे अपने दिव्य धाम वैकुंठ के और देवताओं के राजा इंद्र के भी राजा हैं, इसलिए 'वैकुण्ठराज' और 'सुरराजराज' हैं। वस्तुतः, वे ही तीनों लोकों और संपूर्ण ब्रह्मांड के एकमात्र शासक हैं। यह श्लोक उनके परम ऐश्वर्य और अनुलंघनीय आधिपत्य को दर्शाता है।
अमोघमुद्रे परिपूर्णनिद्रे श्रीयोगनिद्रे ससमुद्रनिद्रे ।
श्रितैकभद्रे जगदेकनिद्रे श्रीरङ्गभद्रे रमतां मनो मे ॥
जिनकी योगमाया रूपी मुद्रा अमोघ (अचूक) है, जो परिपूर्ण निद्रा में हैं, जो श्री योगनिद्रा में हैं और जो क्षीरसागर में शयन करते हैं। जो अपने आश्रितों का एकमात्र कल्याण करने वाले हैं, जो जगत की एक मात्र निधि (आधार) हैं, ऐसे मंगलमय श्री रंगनाथ में मेरा मन रमण करे।
यह श्लोक भगवान के रहस्यमयी योगनिद्रा स्वरूप का वर्णन करता है। यह कोई साधारण निद्रा नहीं, बल्कि एक सचेतन विश्राम की अवस्था है, जिसमें लीन रहते हुए भी वे संपूर्ण सृष्टि का संचालन करते हैं। 'अमोघमुद्रे' का अर्थ है कि उनका संकल्प कभी विफल नहीं होता। 'ससमुद्रनिद्रे' उनके क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करने वाले प्रसिद्ध स्वरूप का स्मरण कराता है। 'श्रितैकभद्रे' का अर्थ है कि जो भी उनकी शरण में आ जाता है, उसका कल्याण सुनिश्चित है, वे ही अपने भक्तों के एकमात्र रक्षक और मंगलकर्ता हैं।
स चित्रशायी भुजगेन्द्रशायी नन्दाङ्कशायी कमलाङ्कशायी ।
क्षीराब्धिशायी वटपत्रशायी श्रीरङ्गशायी रमतां मनो मे ॥
जो अनेकों अद्भुत मुद्राओं में शयन करते हैं, जो सर्पराज शेषनाग पर शयन करते हैं, जो नंदजी की गोद में शयन करते थे और जो देवी कमला की गोद में शयन करते हैं। जो क्षीरसागर में शयन करते हैं और जो वट के पत्ते पर शयन करते हैं, ऐसे श्रीरंगम में शयन करने वाले भगवान में मेरा मन रमण करे।
इस श्लोक में भगवान के विराट और वात्सल्यपूर्ण, दोनों शयन-स्वरूपों का एक साथ स्मरण किया गया है। एक ओर उनका 'भुजगेन्द्रशायी' और 'क्षीराब्धिशायी' रूप उनके परम ऐश्वर्य और ब्रह्मांडीय सत्ता को दर्शाता है, तो दूसरी ओर 'नन्दाङ्कशायी' रूप उनके कृष्ण अवतार की बाल-लीला का स्मरण कराकर उनके माधुर्य और सौलभ्य को प्रकट करता है। 'वटपत्रशायी' रूप प्रलयकाल का द्योतक है, जब संपूर्ण सृष्टि जलमग्न हो जाती है और एकमात्र भगवान ही बालक रूप में वट के पत्ते पर तैरते रहते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि वे ही सृष्टि के आदि और अंत हैं।
इदं हि रङ्गं त्यजतामिहाङ्गं पुनर्नचाङ्गं यदि चाङ्गमेति ।
पाणौ रथाङ्गं चरणेम्बु गाङ्गम् याने विहङ्गं शयने भुजङ्गम् ॥
जो व्यक्ति इस श्रीरंगम धाम में अपने शरीर का त्याग करता है, उसे पुनः शरीर धारण नहीं करना पड़ता (अर्थात् वह मोक्ष को प्राप्त होता है)। और यदि उसे शरीर मिलता भी है, तो उसके हाथ में चक्र, चरणों से गंगा, सवारी के लिए गरुड़ और शयन के लिए शेषनाग होते हैं (अर्थात् वह स्वयं विष्णु स्वरूप हो जाता है)।
यह श्लोक श्रीरंगम क्षेत्र के महात्म्य और फलश्रुति को दर्शाता है। पहली पंक्ति यह आश्वासन देती है कि इस पवित्र भूमि पर देह त्यागने वाले को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। दूसरी पंक्ति एक अद्भुत काव्यात्मक वर्णन है, जिसका गहरा अर्थ है कि यदि किसी कारणवश उसे जन्म लेना भी पड़े तो वह साधारण जीव नहीं होता, बल्कि भगवान के स्वरूप को ही प्राप्त कर लेता है, क्योंकि चक्र, चरण से गंगा, गरुड़ और शेषनाग - ये सभी भगवान विष्णु के ही दिव्य चिह्न हैं। यह उस आत्मा के भगवान से एकाकार हो जाने की अवस्था है।
रङ्गनाथाष्टकं पुण्यम् प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति रङ्गिसायुज्यमाप्नुयात् ॥
जो व्यक्ति इस पुण्यदायी रङ्गनाथाष्टक का प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं और अंत में वह श्री रंगनाथ के सायुज्य पद को प्राप्त करता है।
यह स्तोत्र का अंतिम और फलश्रुति का श्लोक है। यह इस स्तोत्र के नित्य पाठ का फल बताता है। इसके पाठ से भक्त की सभी प्रकार की लौकिक कामनाएं ('सर्वान् कामान्') तो पूर्ण होती ही हैं, साथ ही उसे परम आध्यात्मिक लक्ष्य की भी प्राप्ति होती है। वह 'रङ्गिसायुज्यम्' अर्थात् सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करता है, जिसे चार प्रकार की मुक्तियों में सर्वोच्च माना जाता है। इस मुक्ति में जीवात्मा परमात्मा में पूर्ण रूप से एकाकार होकर उसी का स्वरूप बन जाती है।
आनन्दरूपे निजबोधरूपे ब्रह्मस्वरूपे श्रुतिमूर्तिरूपे ।
शशाङ्करूपे रमणीयरूपे श्रीरङ्गरूपे रमतां मनो मे ॥
कावेरितीरे करुणाविलोले मन्दारमूले धृतचारुचेले ।
दैत्यान्तकालेऽखिललोकलीले श्रीरङ्गलीले रमतां मनो मे ॥
लक्ष्मीनिवासे जगतां निवासे हृत्पद्मवासे रविबिम्बवासे ।
कृपानिवासे गुणवृन्दवासे श्रीरङ्गवासे रमतां मनो मे ॥
ब्रह्मादिवन्द्ये जगदेकवन्द्ये मुकुन्दवन्द्ये सुरनाथवन्द्ये ।
व्यासादिवन्द्ये सनकादिवन्द्ये श्रीरङ्गवन्द्ये रमतां मनो मे ॥
ब्रह्माधिराजे गरुडाधिराजे वैकुण्ठराजे सुरराजराजे ।
त्रैलोक्यराजेऽखिललोकराजे श्रीरङ्गराजे रमतां मनो मे ॥
अमोघमुद्रे परिपूर्णनिद्रे श्रीयोगनिद्रे ससमुद्रनिद्रे ।
श्रितैकभद्रे जगदेकनिद्रे श्रीरङ्गभद्रे रमतां मनो मे ॥
स चित्रशायी भुजगेन्द्रशायी नन्दाङ्कशायी कमलाङ्कशायी ।
क्षीराब्धिशायी वटपत्रशायी श्रीरङ्गशायी रमतां मनो मे ॥
इदं हि रङ्गं त्यजतामिहाङ्गं पुनर्नचाङ्कं यदि चाङ्गमेति ।
पाणौ रथाङ्गं चरणेम्बु गाङ्गम् याने विहङ्गं शयने भुजङ्गम् ॥
रङ्गनाथाष्टकं पुण्यम् प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।
सर्वान् कामानवाप्नोति रङ्गिसायुज्यमाप्नुयात् ॥