
Lyrics:
दैवतदैवत मङ्गलमङ्गल पावनपावन कारणकारण ।
वेङ्कटभूधरमौलिविभूषण माधव भूधव देव जयीभव ॥1॥
वारिदसन्निभ दयाकर शारदनीरजचारुविलोचन ।
देवशिरोमणिअपादसरोरुह वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥2॥
अञ्जनशैलनिवास निरञ्जन रञ्जितसर्वजनाञ्जनमेचक ।
मामभिषिञ्च कृपामृतशीतलशीकरवर्षिदृशा जगदीश्वर ॥3॥
वीतसमाधिक सारगुणाकर केवलसत्त्वतनो पुरुषोत्तम ।
भीमभवार्णवतारणकोविद वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥4॥
स्वामिसरोवरतीररमाकृतकेलिमहारसलालसमानस ।
सारतपोधनचित्तनिकेतन वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥5॥
आयुधभूषणकोटिनिवेशितशङ्खरथाङ्गजितामतसम्मत ।
स्वेतरदुर्घटसङ्घटनक्षम वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥6॥
पङ्कजनाकृतिसौरभवासितशैलवनोपवनान्तर ।
मन्द्रमहास्वनमङ्गलनिर्ज्झर वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥7॥
नन्दकुमारक गोकुलपालक गोपवधूवर कृष्ण ।
श्रीवसुदेव जन्मभयापह वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥8॥
शैशवपातितपातकिपूतन धेनुककेशिमुखासुरसूदन ।
कालियमर्दन कंसनिरासक मोहतमोपह कृष्ण जयीभव ॥9॥
पालितसङ्गर भागवतप्रिय सारथिताहिततोषपृथासुत ।
पाण्डवदूत पराकृतभूभर पाहि परावरनाथ परायण ॥10॥
शातमखासुविभञ्जनपाटव सत्रिशिरःखरदूषणदूषण ।
श्रीरघुनायक राम रमासख विश्वजनीन हरे विजयीभव ॥11॥
राक्षससोदरभीतिनिवारक शारदशीतमयूखमुखाम्बुज ।
रावणदारुणवारणदारणकेसरिपुङ्गव देव जयीभव ॥12॥
काननवानरवीरवनेचरकुञ्जरसिंहमृगादिषु वत्सल ।
श्रीवरसूरिनिरस्तभवादर वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥13॥
वादिसाध्वसकृत्सूरिकथितं स्तवनं महत् ।
वृषशैलपतेः श्रेयस्कामो नित्यं पठेत् सुधीः ॥14॥
Meaning:
Verse 1
दैवतदैवत मङ्गलमङ्गल पावनपावन कारणकारण ।
वेङ्कटभूधरमौलिविभूषण माधव भूधव देव जयीभव ॥१॥
इस श्लोक में भगवान वेंकटेश्वर को समस्त देवताओं के भी देवता कहा गया है। "दैवतदैवत" का अर्थ है देवों के देव। "मङ्गलमङ्गल" का अर्थ है वह जो समस्त शुभताओं का भी मूल शुभ है। "पावनपावन" का तात्पर्य है जो स्वयं पवित्र है और दूसरों को भी पवित्र करने वाला है। "कारणकारण" शब्द भगवान को समस्त सृष्टि के परम कारण के रूप में स्थापित करता है।
"वेङ्कटभूधरमौलिविभूषण" का अर्थ है वेंकट पर्वत के शिखर का अलंकार। जिस प्रकार मुकुट का रत्न उसके सौन्दर्य को बढ़ाता है, उसी प्रकार भगवान वेंकटाचल को दिव्यता प्रदान करते हैं। "माधव" लक्ष्मीपति विष्णु का प्रसिद्ध नाम है। "भूधव" पृथ्वी देवी के पति अर्थात् वराह और विष्णु स्वरूप की ओर संकेत करता है।
पुराणों में भगवान विष्णु को समस्त जगत का उपादान और निमित्त कारण बताया गया है। यही भाव यहाँ "कारणकारण" पद में निहित है। संसार के सभी कारण अन्ततः उन्हीं में जाकर समाप्त होते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि परम सत्य केवल किसी एक वस्तु का निर्माता नहीं है, बल्कि समस्त अस्तित्व का आधार है। वह शुभता का स्रोत है, पवित्रता का स्रोत है और समस्त देवशक्तियों का भी अधिष्ठाता है। भक्त यहाँ भगवान की सार्वभौमिक सत्ता का स्मरण करते हुए उनकी विजय की कामना करता है।
Verse 2
वारिदसन्निभ दयाकर शारदनीरजचारुविलोचन ।
देवशिरोमणिअपादसरोरुह वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥२॥
इस श्लोक में भगवान के सौन्दर्य और करुणा का वर्णन किया गया है। "वारिदसन्निभ" का अर्थ है वर्षा के मेघ के समान श्याम वर्ण। भगवान विष्णु का यह नीलमेघश्याम स्वरूप अनेक ग्रन्थों में वर्णित है। "दयाकर" अर्थात् करुणा का भण्डार। "शारदनीरजचारुविलोचन" का अर्थ है शरद ऋतु में खिले हुए कमल के समान सुन्दर नेत्र।
"देवशिरोमणि" का तात्पर्य है कि सभी देवता उनके चरणों में नतमस्तक होते हैं। "अपादसरोरुह" का अर्थ उनके कमल समान चरण हैं। भारतीय भक्ति परम्परा में भगवान के चरण कमल ज्ञान, शरणागति और मोक्ष के प्रतीक माने जाते हैं।
मेघ की उपमा केवल वर्ण के कारण नहीं दी गई है। जैसे मेघ बिना भेदभाव के वर्षा करता है, वैसे ही भगवान अपनी कृपा सभी प्राणियों पर बरसाते हैं। उनके कमलनयन करुणा और प्रेम के प्रतीक हैं।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक ईश्वर के दो पक्षों को प्रस्तुत करता है। एक ओर वे परम पूज्य हैं जिनके सामने देवता भी झुकते हैं, दूसरी ओर वे असीम करुणामय हैं जो भक्तों की पुकार सुनते हैं। उनके चरणों की शरण ग्रहण करना अहंकार का त्याग और दिव्य सत्य की ओर अग्रसर होना है। इस प्रकार भगवान वेंकटेश्वर भक्ति और करुणा के आदर्श रूप में चित्रित होते हैं।
Verse 3
अञ्जनशैलनिवास निरञ्जन रञ्जितसर्वजनाञ्जनमेचक ।
मामभिषिञ्च कृपामृतशीतलशीकरवर्षिदृशा जगदीश्वर ॥३॥
इस श्लोक में भक्त भगवान से प्रत्यक्ष कृपा की याचना करता है। "अञ्जनशैलनिवास" का अर्थ है अञ्जनाद्रि पर्वत में निवास करने वाले। यह तिरुमला के पवित्र पर्वतों की ओर संकेत करता है। "निरञ्जन" का अर्थ है माया और दोषों से रहित शुद्ध परमात्मा।
"रञ्जितसर्वजन" का तात्पर्य है कि भगवान सभी प्राणियों के हृदय को आनन्द से भर देते हैं। "अञ्जनमेचक" उनके गहरे श्याम स्वरूप का वर्णन करता है। आगे भक्त कहता है कि हे जगदीश्वर, अपनी कृपारूपी अमृत की शीतल बूँदों की वर्षा करने वाली दृष्टि से मुझे अभिषिक्त कीजिए।
पुराणों में भगवान की कृपादृष्टि को जीवन परिवर्तन का कारण बताया गया है। केवल एक कृपाकटाक्ष से ध्रुव, प्रह्लाद और गजेन्द्र जैसे भक्तों का उद्धार हुआ।
आध्यात्मिक दृष्टि से यहाँ अभिषेक जल का नहीं बल्कि कृपा का माँगा गया है। संसार की तपन, दुःख, भय और मोह से जला हुआ जीव भगवान की शीतल दृष्टि में विश्राम चाहता है। "निरञ्जन" पद यह स्मरण कराता है कि परमात्मा संसार में उपस्थित होकर भी संसार के दोषों से अछूता रहता है।
यह श्लोक भक्ति की उस अवस्था को व्यक्त करता है जहाँ साधक किसी भौतिक वस्तु की नहीं, केवल भगवान की कृपादृष्टि की याचना करता है। वही कृपा उसके लिए अमृत और परम कल्याण का साधन बन जाती है।
Verse 4
वीतसमाधिक सारगुणाकर केवलसत्त्वतनो पुरुषोत्तम ।
भीमभवार्णवतारणकोविद वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥४॥
इस श्लोक में भगवान को समस्त श्रेष्ठ गुणों का भण्डार कहा गया है। "वीतसमाधिक" का अर्थ है जो सभी सीमाओं और बन्धनों से परे हैं। "सारगुणाकर" अर्थात् श्रेष्ठ और दिव्य गुणों के खजाने। "केवलसत्त्वतनो" का तात्पर्य है शुद्ध सत्त्वमय स्वरूप धारण करने वाले। "पुरुषोत्तम" वह जो समस्त पुरुषों में सर्वोच्च है।
"भीमभवार्णवतारणकोविद" का अर्थ है संसार रूपी भयानक समुद्र से जीवों को पार कराने में कुशल। वेङ्कटशैलपति भगवान केवल उपासना के विषय नहीं, बल्कि मोक्षमार्ग के मार्गदर्शक भी हैं।
भगवद्गीता में भी भगवान स्वयं को पुरुषोत्तम कहते हैं। वे क्षर और अक्षर दोनों से परे परम पुरुष हैं। संसार की जन्म-मृत्यु की धारा को यहाँ "भवार्णव" कहा गया है।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि संसार का दुःख केवल बाहरी परिस्थितियों का नहीं, बल्कि अज्ञान का परिणाम है। भगवान का शुद्ध सत्त्व स्वरूप ज्ञान, शान्ति और विवेक का प्रतीक है। जो उनकी शरण ग्रहण करता है, वह धीरे-धीरे इस भयंकर संसार-सागर से मुक्त होने लगता है। इस प्रकार भगवान केवल रक्षक नहीं, बल्कि मुक्तिदाता भी हैं।
Verse 5
स्वामिसरोवरतीररमाकृतकेलिमहारसलालसमानस ।
सारतपोधनचित्तनिकेतन वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥५॥
इस श्लोक में भगवान की दिव्य लीलाओं और ऋषियों के साथ उनके सम्बन्ध का वर्णन है। "स्वामिसरोवरतीर" तिरुमला के पवित्र स्वामी पुष्करिणी सरोवर की ओर संकेत करता है। "रमाकृतकेलि" का अर्थ है लक्ष्मीजी के साथ दिव्य क्रीड़ा करने वाले।
"महारसलालसमानस" बताता है कि भगवान का मन दिव्य आनन्दरस में निरन्तर स्थित रहता है। "सारतपोधनचित्तनिकेतन" का अर्थ है महान तपस्वियों और ऋषियों के हृदय में निवास करने वाले।
पुराणों में स्वामी पुष्करिणी को अत्यन्त पवित्र तीर्थ माना गया है। कहा जाता है कि देवताओं ने भी वहाँ स्नान और उपासना की है। भगवान का लक्ष्मीजी के साथ निवास समृद्धि और करुणा की एकता का प्रतीक है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि भगवान बाहरी मन्दिरों में ही नहीं, बल्कि तप, भक्ति और शुद्धि से परिपूर्ण हृदयों में भी निवास करते हैं। जिनका मन संसार के विषयों से हटकर भगवान में स्थित होता है, वे स्वयं भगवान का निवासस्थान बन जाते हैं। लक्ष्मी और नारायण की लीला सृष्टि में प्रेम, सौन्दर्य और सामंजस्य की अभिव्यक्ति है।
Verse 6
आयुधभूषणकोटिनिवेशितशङ्खरथाङ्गजितामतसम्मत ।
स्वेतरदुर्घटसङ्घटनक्षम वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥६॥
इस श्लोक में भगवान के दिव्य ऐश्वर्य और सर्वशक्तिमत्ता का वर्णन है। "आयुधभूषणकोटिनिवेशित" का अर्थ है जिनके अनन्त आयुध और अलंकार दिव्य तेज से युक्त हैं। "शङ्ख" उनका पाञ्चजन्य है और "रथाङ्ग" सुदर्शन चक्र का संकेत है।
"जितामतसम्मत" का अर्थ है जिनकी महिमा को विद्वान, ऋषि और विजयी ज्ञानी स्वीकार करते हैं। "स्वेतरदुर्घटसङ्घटनक्षम" बताता है कि जो कार्य दूसरों के लिए असम्भव हैं, उन्हें भगवान सहज ही सम्पन्न कर सकते हैं।
विष्णु के शङ्ख और चक्र केवल अस्त्र नहीं हैं। शङ्ख धर्म और दिव्य आह्वान का प्रतीक है, जबकि चक्र काल, व्यवस्था और धर्मरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता का स्मरण कराता है। मनुष्य जहाँ सीमित साधनों और सीमित बुद्धि से कार्य करता है, वहीं परमात्मा असम्भव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों को भी बदलने में समर्थ हैं। भक्त इस विश्वास से भगवान की शरण ग्रहण करता है कि उनकी कृपा से कठिनतम बाधाएँ भी दूर हो सकती हैं। इस प्रकार भगवान विश्वव्यवस्था के परम नियन्ता के रूप में चित्रित होते हैं।
Verse 7
पङ्कजनाकृतिसौरभवासितशैलवनोपवनान्तर ।
मन्द्रमहास्वनमङ्गलनिर्ज्झर वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥७॥
इस श्लोक में वेंकटाचल पर्वत की दिव्य प्राकृतिक शोभा का वर्णन है। "पङ्कजनाकृतिसौरभवासित" का अर्थ है कमलों की सुगन्ध से सुवासित। "शैलवनोपवनान्तर" पर्वत, वन और उपवनों से युक्त पवित्र क्षेत्र का संकेत करता है।
"मन्द्रमहास्वनमङ्गलनिर्ज्झर" का अर्थ है मधुर ध्वनि करने वाले शुभ जलप्रपात। वेंकट पर्वत का सम्पूर्ण वातावरण भगवान की उपस्थिति से पवित्र और मंगलमय माना गया है।
भारतीय परम्परा में तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं होते। वे आध्यात्मिक शक्ति के केन्द्र माने जाते हैं। पर्वत, नदियाँ, वन और सरोवर सब भगवान की उपस्थिति से दिव्यता प्राप्त करते हैं।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि सम्पूर्ण प्रकृति ईश्वर की महिमा का विस्तार है। कमल की सुगन्ध, जलप्रपात की ध्वनि और पर्वत की स्थिरता साधक को परमात्मा की याद दिलाते हैं। जब मन शुद्ध होता है, तब प्रकृति का प्रत्येक दृश्य ईश्वर के दर्शन का माध्यम बन जाता है। इस प्रकार वेंकटाचल केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि दिव्य अनुभूति का जीवित प्रतीक बन जाता है।
Verse 8
नन्दकुमारक गोकुलपालक गोपवधूवर कृष्ण ।
श्रीवसुदेव जन्मभयापह वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥८॥
इस श्लोक में भगवान के कृष्णावतार का स्मरण किया गया है। "नन्दकुमारक" अर्थात् नन्द महाराज के पुत्र। "गोकुलपालक" गोकुल की रक्षा करने वाले। "गोपवधूवर" गोपियों के प्रियतम।
"श्रीवसुदेव जन्मभयापह" का अर्थ है जन्म के समय वसुदेव और देवकी के भय को दूर करने वाले भगवान। कंस के अत्याचारों के बीच भगवान का अवतरण धर्म की पुनर्स्थापना के लिए हुआ।
भागवत पुराण में वर्णित है कि भगवान के जन्म के समय कारागार के बन्धन टूट गए, द्वार खुल गए और यमुना ने मार्ग दिया। यह सब उनकी दिव्य शक्ति का परिचायक है।
आध्यात्मिक रूप से कृष्ण केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं। वे प्रेम, आनन्द और करुणा के परम स्वरूप हैं। गोपियों का प्रेम आत्मा की परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण भावना का प्रतीक माना जाता है। गोकुल की रक्षा भगवान की उस प्रतिज्ञा को दर्शाती है कि वे अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं। इस प्रकार श्लोक भक्त को कृष्ण की वात्सल्य और माधुर्य से भरी दिव्य लीलाओं का स्मरण कराता है।
Verse 9
शैशवपातितपातकिपूतन धेनुककेशिमुखासुरसूदन ।
कालियमर्दन कंसनिरासक मोहतमोपह कृष्ण जयीभव ॥९॥
इस श्लोक में भगवान कृष्ण की बाल्य और किशोर लीलाओं का वर्णन है। "पातकिपूतन" उस पूतना राक्षसी की ओर संकेत करता है जिसका उद्धार भगवान ने बाल्यावस्था में किया। "धेनुक" और "केशि" असुरों का वध भी कृष्ण ने किया।
"कालियमर्दन" कालिय नाग के दमन का स्मरण कराता है। "कंसनिरासक" अर्थात् कंस का विनाश करने वाले। "मोहतमोपह" का अर्थ है मोह और अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करने वाले।
भागवत कथा में ये सभी घटनाएँ धर्म की विजय और अधर्म की पराजय का प्रतीक हैं। प्रत्येक असुर किसी न किसी आन्तरिक दोष का प्रतिनिधित्व करता है। पूतना कपट का, केशी अहंकार का, धेनुक अज्ञान का और कालिय विषैले द्वेष का प्रतीक माना जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से भगवान का असुर-वध केवल बाहरी संघर्ष नहीं है। यह साधक के भीतर उपस्थित नकारात्मक वृत्तियों के विनाश का भी संकेत है। जब भगवान की कृपा प्राप्त होती है, तब मोह, भय, अहंकार और अज्ञान का अन्धकार दूर होने लगता है। इसलिए भक्त भगवान से केवल बाहरी रक्षा ही नहीं, बल्कि आन्तरिक शुद्धि की भी प्रार्थना करता है।
Verse 10
पालितसङ्गर भागवतप्रिय सारथिताहिततोषपृथासुत ।
पाण्डवदूत पराकृतभूभर पाहि परावरनाथ परायण ॥१०॥
इस श्लोक में महाभारत में भगवान कृष्ण की भूमिका का वर्णन है। "भागवतप्रिय" अर्थात् भक्तों से प्रेम करने वाले। "सारथि" अर्जुन के रथ के सारथी बनने की लीला का संकेत है। "पृथासुत" कुन्तीपुत्र अर्जुन को सन्तुष्ट करने वाले।
"पाण्डवदूत" का अर्थ है पाण्डवों की ओर से शान्ति प्रस्ताव लेकर जाने वाले भगवान। "पराकृतभूभर" पृथ्वी के भार को दूर करने वाले। "परावरनाथ" समस्त प्राणियों के स्वामी।
महाभारत में भगवान ने स्वयं शस्त्र न उठाने का व्रत लिया, किन्तु धर्म की स्थापना के लिए पाण्डवों का मार्गदर्शन किया। भगवद्गीता का उपदेश इसी सन्दर्भ में दिया गया।
आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक भगवान के सख्य और मार्गदर्शक रूप को दर्शाता है। वे केवल पूजनीय देवता नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों में साथ चलने वाले मित्र भी हैं। अर्जुन की तरह जब मनुष्य मोह और भ्रम में पड़ता है, तब भगवान ज्ञान के माध्यम से उसका मार्ग प्रकाशित करते हैं। यही गीता का शाश्वत संदेश है।
Verse 11
शातमखासुविभञ्जनपाटव सत्रिशिरःखरदूषणदूषण ।
श्रीरघुनायक राम रमासख विश्वजनीन हरे विजयीभव ॥११॥
इस श्लोक में भगवान राम की महिमा का वर्णन है। "शातमख" इन्द्र का नाम है। "सुविभञ्जनपाटव" असुरों की शक्ति को नष्ट करने में कुशल। "त्रिशिरः, खर और दूषण" राम द्वारा पराजित राक्षसों के नाम हैं।
"श्रीरघुनायक" रघुवंश के स्वामी राम। "रमासख" लक्ष्मीपति विष्णु स्वरूप। "विश्वजनीन" समस्त जगत के हितकारी। "हरे" पाप और दुःख हरने वाले।
रामायण में खर, दूषण और त्रिशिरा का वध धर्म की रक्षा के लिए हुआ। भगवान राम मर्यादा, सत्य और कर्तव्य के आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हैं।
दार्शनिक रूप से राम केवल एक वीर राजा नहीं हैं। वे धर्म की सजीव अभिव्यक्ति हैं। उनका जीवन बताता है कि शक्ति का उपयोग केवल धर्म और न्याय की रक्षा के लिए होना चाहिए। भक्त राम में आदर्श पुत्र, आदर्श राजा, आदर्श पति और आदर्श पुरुष का दर्शन करता है। यही कारण है कि उनका चरित्र युगों से प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
Verse 12
राक्षससोदरभीतिनिवारक शारदशीतमयूखमुखाम्बुज ।
रावणदारुणवारणदारणकेसरिपुङ्गव देव जयीभव ॥१२॥
इस श्लोक में भगवान राम के सौम्य और वीर दोनों स्वरूपों का वर्णन है। "राक्षससोदरभीतिनिवारक" का अर्थ है विभीषण जैसे धर्मनिष्ठ राक्षसों का भय दूर करने वाले। "शारदशीतमयूखमुखाम्बुज" शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान शीतल मुखकमल वाले।
"रावणदारुणवारणदारण" अर्थात् रावण जैसे प्रबल शत्रु का विनाश करने वाले। "केसरिपुङ्गव" सिंह के समान पराक्रमी।
रामायण में विभीषण ने राम की शरण लेकर सुरक्षा प्राप्त की। यह घटना शरणागति के सिद्धान्त का महान उदाहरण मानी जाती है।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि भगवान सज्जनों के लिए चन्द्रमा के समान शीतल हैं, किन्तु अधर्मियों के लिए सिंह के समान प्रचण्ड। शरणागत की रक्षा और दुष्ट का दमन दोनों ही धर्म के अंग हैं। भगवान का यह संतुलित स्वरूप न्याय और करुणा की पूर्ण एकता को प्रकट करता है।
Verse 13
काननवानरवीरवनेचरकुञ्जरसिंहमृगादिषु वत्सल ।
श्रीवरसूरिनिरस्तभवादर वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥१३॥
इस श्लोक में भगवान की सर्वव्यापक करुणा का वर्णन है। "काननवानरवीर" वन में रहने वाले वानर वीरों की ओर संकेत करता है। "वनेचर", "कुञ्जर", "सिंह" और "मृग" सभी प्रकार के वन्य जीवों का उल्लेख है।
"वत्सल" का अर्थ है अत्यन्त स्नेह करने वाले। भगवान केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के रक्षक हैं। "श्रीवरसूरि" महान आचार्यों और भक्तों की ओर संकेत करता है। "निरस्तभवादर" अर्थात् संसार के बन्धनों को दूर करने वाले।
रामायण और पुराणों में अनेक प्रसंग हैं जहाँ पशु, पक्षी और वनवासी भी भगवान की कृपा प्राप्त करते हैं। जटायु, गजेन्द्र और वानर सेना इसके उदाहरण हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक सिखाता है कि ईश्वर की करुणा किसी जाति, वर्ग या प्राणी विशेष तक सीमित नहीं है। समस्त जीवन उन्हीं की अभिव्यक्ति है। जो इस सत्य को समझ लेता है, उसके भीतर दया, करुणा और समभाव का उदय होता है। यही भाव उसे संसार के बन्धनों से ऊपर उठाता है।
Verse 14
वादिसाध्वसकृत्सूरिकथितं स्तवनं महत् ।
वृषशैलपतेः श्रेयस्कामो नित्यं पठेत् सुधीः ॥१४॥
यह फलश्रुति श्लोक है। इसमें इस स्तोत्र के पाठ का महत्त्व बताया गया है। "वादिसाध्वसकृत्सूरि" उस महान आचार्य की ओर संकेत करता है जिसने इस स्तुति की रचना की। "स्तवनं महत्" अर्थात् यह महान स्तुति।
"वृषशैलपतेः" वृषशैल या वेंकटाचल के स्वामी भगवान वेंकटेश्वर का नाम है। "श्रेयस्कामः" वह जो परम कल्याण की इच्छा रखता है। "नित्यं पठेत् सुधीः" अर्थात् बुद्धिमान व्यक्ति को इसका नित्य पाठ करना चाहिए।
भारतीय स्तोत्र साहित्य में फलश्रुति केवल लौकिक फल का वर्णन नहीं करती। उसका उद्देश्य साधक को नियमित स्मरण और उपासना के लिए प्रेरित करना होता है।
दार्शनिक दृष्टि से "श्रेयस" शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह केवल सांसारिक सफलता नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति, ईश्वरप्राप्ति और मोक्ष का द्योतक है। जो व्यक्ति नियमित रूप से भगवान के गुणों का स्मरण करता है, उसका मन धीरे-धीरे उन्हीं गुणों को ग्रहण करने लगता है। स्तोत्र का वास्तविक फल बाहरी उपलब्धियों से अधिक आन्तरिक रूपान्तरण है। यही कारण है कि बुद्धिमान साधक को इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक नित्य पाठ करने की प्रेरणा दी गई है।