वरद विष्णु स्तोत्र

जगत्सृष्टिहेतो द्विषद्धूमकेतो
रमाकान्त सद्भक्तवन्द्य प्रशान्त|
त्वमेकोऽतिशान्तो जगत्पासि नूनं
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|
भुवः पालकः सिद्धिदस्त्वं मुनीनां
विभो कारणानां हि बीजस्त्वमेकः|
त्वमस्युत्तमैः पूजितो‌ लोकनाथ
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|
अहङ्कारहीनोऽसि भावैर्विहीन-
स्त्वमाकारशून्योऽसि नित्यस्वरूपः|
त्वमत्यन्तशुद्धोऽघहीनो नितान्तं
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|
विपद्रक्षक श्रीश कारुण्यमूर्ते
जगन्नाथ सर्वेश नानावतार|
अहञ्चाल्पबुद्धिस्त्वमव्यक्तरूपः
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|
सुराणां पते भक्तकाम्यादिपूर्त्ते
मुनिव्यासपूर्वैर्भृशं गीतकीर्ते|
परानन्दभावस्थ यज्ञस्वरूप
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|
ज्वलद्रत्नकेयूरभास्वत्किरीट-
स्फुरत्स्वर्णहारादिभिर्भूषिताङ्ग|
भुजङ्गाधिशायिन् पयःसिन्धुवासिन्
प्रभो देव मह्यं वरं देहि विष्णो|

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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