जयकर गजानन स्तोत्र

जय देव गजानन प्रभो जय सर्वासुरगर्वभेदक ।
जय सङ्कटपाशमोचन प्रणवाकार विनायकाऽव माम् ॥

'हे गजानन प्रभु, आपकी जय हो! आप सभी असुरों के अहंकार को नष्ट करने वाले हैं। आपकी जय हो! आप संकट रूपी बंधनों से मुक्त करने वाले और 'प्रणव' (ॐ) के स्वरूप विनायक हैं। मेरी रक्षा करें।'

'इस श्लोक में भक्त भगवान गणेश की स्तुति कर रहा है। 'गजानन' का अर्थ है गज (हाथी) के मुख वाले। उन्हें 'सर्वासुरगर्वभेदक' कहा गया है क्योंकि वे सभी राक्षसों और दुष्ट शक्तियों के अभिमान को तोड़ने वाले हैं। 'सङ्कटपाशमोचन' का अर्थ है संकटों और बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाले। 'प्रणवाकार' उन्हें इसलिए कहा गया है क्योंकि वे 'ॐ' के स्वरूप हैं, जो सभी मंत्रों का मूल और परम ब्रह्म का प्रतीक है। 'विनायक' गणेश जी का एक और नाम है, जिसका अर्थ है विशेष नायक या बाधाओं को दूर करने वाले। भक्त उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

तव देव जयन्ति मूर्तयः कलितागण्यसुपुण्यकीर्तयः ।
मनसा भजतां हतार्तयः कृतशीघ्राधिककामपूर्तयः ॥

'हे देव, आपकी मूर्तियों की जय हो! वे असंख्य शुभ और पुण्यकारी कीर्ति (यश) से युक्त हैं। जो मन से उनका भजन करते हैं, उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र पूरी हो जाती हैं।'

'यह श्लोक गणेश जी की महिमा का वर्णन करता है। भक्त कहता है कि उनकी विभिन्न मूर्तियां (रूप) जयवंत हैं और वे अनगिनत शुभ गुणों तथा प्रसिद्धि से भरी हुई हैं। यहां 'पुण्यकीर्तयः' का अर्थ है जिनकी कीर्ति (यश) पुण्यमय है। जो भक्त मन लगाकर गणेश जी की उपासना करते हैं, उनके सभी दुख-दर्द (आर्तयः) समाप्त हो जाते हैं। 'हतार्तयः' का अर्थ है जिनके कष्ट दूर हो गए हैं। इसके साथ ही, उनकी सभी इच्छाएं (कामपूर्तयः) भी बहुत जल्दी पूरी हो जाती हैं। यह श्लोक गणेश जी की भक्तवत्सलता और विघ्नहर्ता स्वरूप को दर्शाता है।'

तव रम्यकथास्वनादरः स नरो जन्मलयैकमन्दिरम् ।
न परत्र न चेह सौख्यभाङ्निजदुष्कर्मवशाद्विमोहभाक् ॥

'जो मनुष्य आपकी सुंदर कथाओं में अनादर (रुचि नहीं) रखता है, वह जन्म और मरण के चक्र का ही घर बन जाता है। वह न तो इस लोक में और न ही परलोक में सुख प्राप्त करता है, तथा अपने बुरे कर्मों के कारण मोह से ग्रस्त रहता है।'

'इस श्लोक में गणेश जी की कथाओं और उनकी भक्ति के महत्व पर जोर दिया गया है। 'रम्यकथासु अनादरः' का अर्थ है सुंदर कथाओं में रुचि न लेना या उनका अनादर करना। ऐसा व्यक्ति 'जन्मलयैकमन्दिरम्' होता है, अर्थात वह बार-बार जन्म-मृत्यु के बंधन में फंसा रहता है। 'लय' का अर्थ यहां मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से है। ऐसा व्यक्ति न तो इस लोक (इह) में और न ही परलोक (परत्र) में सुखी (सौख्यभाक्) होता है। 'निजदुष्कर्मवशात्' का अर्थ है अपने बुरे कर्मों के कारण। ऐसे व्यक्ति अपने कर्मों के कारण मोह (अज्ञान) में डूबे रहते हैं और भ्रमित रहते हैं। यह श्लोक हमें अच्छे कर्म करने और भगवान की कथाओं में श्रद्धा रखने का संदेश देता है।'

गजवक्त्र तवाङ्घ्रिपङ्कजे ध्वजवज्राङ्कयुते सदा भजे ।
तव मूर्तिमहं परिष्वजे त्वयि हृन्मेऽस्तु सुमूषकध्वजे ॥

'हे गजमुख वाले, मैं आपके चरण कमलों की सदा पूजा करता हूं, जो ध्वज और वज्र के चिह्नों से युक्त हैं। मैं आपकी मूर्ति का आलिंगन करता हूं। हे सुंदर मूषकध्वज, मेरा हृदय आप में ही लीन रहे।'

'यह श्लोक भक्त की गहरी श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करता है। 'गजवक्त्र' का अर्थ है हाथी के मुख वाले। भक्त कहता है कि वह गणेश जी के चरण कमलों (अङ्घ्रिपङ्कजे) की हमेशा पूजा करता है। उनके चरणों पर 'ध्वज' (झंडा) और 'वज्र' (इंद्र का हथियार, शक्ति का प्रतीक) जैसे शुभ चिह्न अंकित हैं। 'परिष्वजे' का अर्थ है आलिंगन करना। भक्त कहता है कि वह उनकी मूर्ति को गले लगाता है, जो उनकी अटूट भक्ति को दर्शाता है। 'सुमूषकध्वजे' का अर्थ है जिनके रथ पर सुंदर चूहे का चिह्न (ध्वज) है। मूषक गणेश जी का वाहन है। भक्त प्रार्थना करता है कि उसका हृदय (हृत्) हमेशा गणेश जी में ही लीन रहे, जो पूर्ण समर्पण का भाव है।'

त्वदृते हि गजानन प्रभो न हि भक्तौघसुखौघदायकः ।
सुदृढा मम भक्तिरस्तु ते चरणाब्जे विबुधेश विश्वपाः ॥

'हे गजानन प्रभु, आपके सिवा निश्चित रूप से कोई और भक्तों के समूह को सुखों का समूह देने वाला नहीं है। हे देवताओं के स्वामी और विश्व के पालक, आपके चरण कमलों में मेरी भक्ति अत्यंत सुदृढ़ रहे।'

'इस श्लोक में भक्त गणेश जी को सभी सुखों का दाता और परमेश्वर के रूप में स्वीकार कर रहा है। 'त्वदृते हि' का अर्थ है 'आपके सिवा निश्चित रूप से'। भक्त कहता है कि गणेश जी के अतिरिक्त कोई अन्य देवता 'भक्तौघसुखौघदायकः' नहीं है, अर्थात भक्तों के समूह को अनेक प्रकार के सुख (सुखों का समूह) देने वाला नहीं है। 'विबुधेश' का अर्थ है देवताओं के स्वामी और 'विश्वपाः' का अर्थ है विश्व का पालन करने वाले। ये विशेषण गणेश जी की सर्वोपरिता को दर्शाते हैं। भक्त प्रार्थना करता है कि उसकी भक्ति गणेश जी के चरण कमलों (चरणाब्जे) में हमेशा 'सुदृढ़ा' (बहुत मजबूत) बनी रहे, जो अटूट विश्वास और श्रद्धा को व्यक्त करता है।'

फलपूरगदेक्षुकार्मुकैर्युत रुक्चक्रधराब्जपाशधृक् ।
अव वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड माम् ॥

'आप फलों से भरे पात्र, गदा, गन्ना और धनुष से युक्त हैं; शंख, चक्र, कमल और पाश (रस्सी) धारण किए हुए हैं। आप अपनी रत्नजड़ित सूंड में कमल, धान की बालियाँ और (एक) दाँत धारण करते हैं। मेरी रक्षा करें।'

'यह श्लोक गणेश जी के विभिन्न हाथों में धारण किए गए आयुधों और उनकी सूंड के वर्णन के माध्यम से उनके दिव्य रूप का चित्रण करता है। यहां 'फलपूरगदेक्षुकार्मुकैः' का अर्थ है फलों से भरा पात्र, गदा, गन्ना और धनुष। 'रुक्चक्रधराब्जपाशधृक्' का अर्थ है शंख, चक्र, कमल और पाश (रस्सी) धारण करने वाले। ये सभी प्रतीक उनकी शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और नियंत्रण को दर्शाते हैं। 'वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड' यह वर्णन गणेश जी की सूंड का है। 'वारिज' यानी कमल, 'शालिमञ्जरी' यानी धान की बालियां (समृद्धि का प्रतीक), और 'रदधृक्' यानी अपना एक दाँत धारण करने वाले। 'रत्नघटाढ्यशुण्ड' का अर्थ है रत्नजड़ित सूंड। गणेश जी का एक दांत टूटा हुआ है, जो उनके ज्ञान और त्याग का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर ।
शशिसुप्रभ विद्यया युत स्तनभारानमितेड्य रक्ष माम् ॥

'आपके दोनों हाथ सुंदर सोने की जंजीरों से युक्त हैं, आप चंद्रमा से सुशोभित हैं और आपका उदर (पेट) विशाल है। आप चंद्रमा के समान चमकीले हैं, विद्या से युक्त हैं, और (ज्ञान के) भार से विनम्र पूजनीय हैं। मेरी रक्षा करें।'

'यह श्लोक गणेश जी के शारीरिक स्वरूप का और अधिक विस्तृत वर्णन करता है। 'करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल' का अर्थ है जिनके दोनों हाथ सुंदर सोने की जंजीरों से युक्त हैं। यह उनकी शोभा और ऐश्वर्य को दर्शाता है। 'द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर' का अर्थ है जो चंद्रमा (द्विजराज) से सुशोभित हैं और जिनका पेट विशाल (तुन्दिल) है। गणेश जी का बड़ा पेट ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जिसमें सब कुछ समाहित है। 'शशिसुप्रभ' का अर्थ है चंद्रमा के समान कांति वाले। 'विद्यया युत' यानी विद्या से परिपूर्ण। 'स्तनभारानमितेड्य' का अर्थ यहां ज्ञान के भार से थोड़ा झुका हुआ या विनम्र, और अत्यंत पूजनीय है। यह वर्णन गणेश जी के ज्ञानी, तेजस्वी और विनम्र स्वरूप को प्रस्तुत करता है। भक्त उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

शशिभास्करवीतिहोत्रदृक् शुभसिन्दूररुचे विनायक ।
द्विपवक्त्र महाहिभूषण त्रिदिवेशासुरवन्द्य पाहि माम् ॥

'आप चंद्रमा, सूर्य और अग्नि को नेत्रों के रूप में धारण करने वाले हैं, शुभ सिन्दूर के समान कांति वाले हैं, हे विनायक। आप गजमुख वाले हैं, बड़े सर्पों से सुशोभित हैं, और देवताओं तथा असुरों द्वारा पूजे जाते हैं। मेरी रक्षा करें।'

'इस श्लोक में गणेश जी के शक्तिशाली और पूजनीय स्वरूप का वर्णन किया गया है। 'शशिभास्करवीतिहोत्रदृक्' का अर्थ है जिनके नेत्र चंद्रमा (शशि), सूर्य (भास्कर) और अग्नि (वीतिहोत्र) हैं। यह त्रिनेत्र स्वरूप उनकी सर्वज्ञता और ब्रह्मांडीय शक्ति को दर्शाता है। 'शुभसिन्दूररुचे' का अर्थ है जिनकी कांति शुभ सिन्दूर के समान लाल है। सिन्दूर गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। 'द्विपवक्त्र' यानी हाथी के मुख वाले। 'महाहिभूषण' का अर्थ है बड़े सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करने वाले। यह शक्ति और रहस्य का प्रतीक है। 'त्रिदिवेशासुरवन्द्य' का अर्थ है देवताओं (त्रिदिवेश) और असुरों दोनों द्वारा वंदित (पूजे जाने वाले)। यह दर्शाता है कि वे सभी शक्तियों द्वारा पूजे जाते हैं, चाहे वे दिव्य हों या आसुरी। भक्त उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

सृणिपाशवरद्विजैर्युत द्विजराजार्धक मूषकध्वज ।
शुभलोहितचन्दनोक्षित श्रुतिवेद्याभयदायकाऽव माम् ॥

'आप अंकुश, पाश, श्रेष्ठ दांत (एकदंत) से युक्त हैं, चंद्रमा के आधे भाग के समान हैं, मूषकध्वज (मूषक है ध्वज पर जिनके) हैं। आप शुभ लाल चंदन से लेपित हैं, वेदों द्वारा जानने योग्य हैं और अभय प्रदान करने वाले हैं। मेरी रक्षा करें।'

'यह श्लोक गणेश जी के दिव्य गुणों और स्वरूप को और स्पष्ट करता है। 'सृणिपाशवरद्विजैर्युत' का अर्थ है जो अंकुश (हाथी को नियंत्रित करने वाला), पाश (रस्सी) और अपने श्रेष्ठ दांत (वरद्विज) से युक्त हैं। यहां 'वरद्विज' उनके एक दंत को संदर्भित करता है। 'द्विजराजार्धक' का अर्थ है चंद्रमा के आधे भाग के समान, जो उनकी सुंदरता और दिव्यता को दर्शाता है। 'मूषकध्वज' यानी जिनके ध्वज पर मूषक है। 'शुभलोहितचन्दनोक्षित' का अर्थ है शुभ लाल चंदन से लेपित। लाल चंदन उनकी शक्ति और शुभता का प्रतीक है। 'श्रुतिवेद्य' का अर्थ है वेदों द्वारा जानने योग्य, जो दर्शाता है कि वे परम ज्ञान के स्रोत हैं। 'अभयदायक' यानी अभय प्रदान करने वाले। भक्त उनसे अपनी रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

स्मरणात्तव शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः कृतार्थताम् ।
गणपाऽऽपुरघौघभञ्जन द्विपराजास्य सदैव पाहि माम् ॥

'आपके स्मरण मात्र से ही शिव, ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि देवता कृतार्थ हो जाते हैं। हे गणपति, पापों के समूह को नष्ट करने वाले, गजमुख वाले, मेरी सदा रक्षा करें।'

'इस श्लोक में गणेश जी की सर्वोच्चता और उनके स्मरण की शक्ति का वर्णन किया गया है। 'स्मरणात्तव' का अर्थ है आपके स्मरण मात्र से। 'शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः' का अर्थ है शिव (शम्भु), ब्रह्मा (विध्याज), विष्णु (इन्दु), इंद्र (शक्र) आदि देवता। यहां 'इन्दु' विष्णु का एक नाम है। ये सभी प्रमुख देवता भी गणेश जी का स्मरण करके 'कृतार्थताम् आपुः' यानी कृतार्थ हो जाते हैं या अपने उद्देश्य को प्राप्त कर लेते हैं। यह गणेश जी की महत्ता को दर्शाता है कि बड़े-बड़े देवता भी उनकी कृपा प्राप्त करते हैं। 'गणपा' यानी गणों के स्वामी (गणपति)। 'अघौघभञ्जन' का अर्थ है पापों के समूह (अघौघ) को नष्ट करने वाले (भञ्जन)। 'द्विपराजास्य' यानी गजराज के मुख वाले। भक्त उनसे अपनी सदा रक्षा करने की प्रार्थना कर रहा है।'

शरणं भगवान् विनायकः शरणं मे सततं च सिद्धिका ।
शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं नान्यदुपैमि दैवतम् ॥

'भगवान विनायक मेरी शरण हैं, और सिद्धि भी मेरी सदा शरण हैं। पुनः वे दोनों ही मेरी शरण हैं, मैं किसी अन्य देवता के पास शरण के लिए नहीं जाता।'

'यह श्लोक भक्त की अनन्य निष्ठा और पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। 'शरणं भगवान् विनायकः' का अर्थ है भगवान विनायक मेरी शरण (आश्रय) हैं। 'शरणं मे सततं च सिद्धिका' का अर्थ है सिद्धि (गणेश जी की पत्नी, सफलता की देवी) भी मेरी सदा शरण हैं। यहां 'सिद्धिका' सिद्धि देवी को संदर्भित करता है, जो गणेश जी के साथ पूजी जाती हैं। भक्त स्पष्ट रूप से कहता है कि 'पुनरेव तावुभौ शरणं' यानी फिर से वे दोनों ही (गणेश और सिद्धि) मेरी शरण हैं। 'शरणं नान्यदुपैमि दैवतम्' का अर्थ है मैं किसी अन्य देवता के पास शरण के लिए नहीं जाता। यह व्यक्त करता है कि भक्त केवल गणेश और सिद्धि में ही अपनी आस्था रखता है और किसी और की पूजा नहीं करता, जो उनकी एकाग्र भक्ति का प्रमाण है।'

गणनाथ निबन्धसंस्तवं कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम् ।
इदमेव सदा प्रदीयतां करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा ॥

'हे गणनाथ, मेरे द्वारा रचित इस स्तोत्र को कृपया स्वीकार करें। यही मुझे सदा प्रदान करें, मुझ पर आपकी अतुलनीय करुणा हमेशा बनी रहे।'

'यह अंतिम श्लोक भक्त की विनम्र प्रार्थना और समर्पण को दर्शाता है। 'गणनाथ' यानी गणों के स्वामी। 'निबन्धसंस्तवं' का अर्थ है मेरे द्वारा रचित यह स्तोत्र या स्तुति। 'कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम्' का अर्थ है कृपया मेरे द्वारा किए गए इस स्तोत्र को स्वीकार करें। भक्त विनम्रतापूर्वक अपने प्रयास को स्वीकार करने का अनुरोध करता है। 'इदमेव सदा प्रदीयतां' का अर्थ है यही (आपकी स्वीकृति और भक्ति) मुझे सदा प्रदान की जाए। 'करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा' का अर्थ है मुझ पर आपकी अतुलनीय (जिसकी तुलना न हो) करुणा (दया) हमेशा बनी रहे। यह भक्त की परम इच्छा है कि गणेश जी की असीम कृपा उस पर सदा बनी रहे। यह श्लोक स्तोत्र पाठ के फल और उद्देश्य को बताता है।'

 

जय देव गजानन प्रभो जय सर्वासुरगर्वभेदक ।
जय सङ्कटपाशमोचन प्रणवाकार विनायकाऽव माम् ॥
तव देव जयन्ति मूर्तयः कलितागण्यसुपुण्यकीर्तयः ।
मनसा भजतां हतार्तयः कृतशीघ्राधिककामपूर्तयः ॥
तव रम्यकथास्वनादरः स नरो जन्मलयैकमन्दिरम् ।
न परत्र न चेह सौख्यभाङ्निजदुष्कर्मवशाद्विमोहभाक् ॥
गजवक्त्र तवाङ्घ्रिपङ्कजे ध्वजवज्राङ्कयुते सदा भजे ।
तव मूर्तिमहं परिष्वजे त्वयि हृन्मेऽस्तु सुमूषकध्वजे ॥
त्वदृते हि गजानन प्रभो न हि भक्तौघसुखौघदायकः ।
सुदृढा मम भक्तिरस्तु ते चरणाब्जे विबुधेश विश्वपाः ॥
फलपूरगदेक्षुकार्मुकैर्युत रुक्चक्रधराब्जपाशधृक् ।
अव वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड माम् ॥
करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर ।
शशिसुप्रभ विद्यया युत स्तनभारानमितेड्य रक्ष माम् ॥
शशिभास्करवीतिहोत्रदृक् शुभसिन्दूररुचे विनायक ।
द्विपवक्त्र महाहिभूषण त्रिदिवेशासुरवन्द्य पाहि माम् ॥
सृणिपाशवरद्विजैर्युत द्विजराजार्धक मूषकध्वज ।
शुभलोहितचन्दनोक्षित श्रुतिवेद्याभयदायकाऽव माम् ॥
स्मरणात्तव शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः कृतार्थताम् ।
गणपाऽऽपुरघौघभञ्जन द्विपराजास्य सदैव पाहि माम् ॥
शरणं भगवान् विनायकः शरणं मे सततं च सिद्धिका ।
शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं नान्यदुपैमि दैवतम् ॥
गणनाथ निबन्धसंस्तवं कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम् ।
इदमेव सदा प्रदीयतां करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा ॥

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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