गणेश नामाष्टक स्तोत्र

 श्रीकृष्ण उवाच -

श्रुणु देवि महाभागे वेदोक्तं वचनं मम ।
यच्छ्रुत्वा हर्षिता नूनं भविष्यसि न संशयः ॥

हे महाभागे देवी! मेरे वेदोक्त (वेदों में कहे गए) वचनों को सुनो, जिन्हें सुनकर तुम निश्चय ही आनंदित हो जाओगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, माता पार्वती को 'महाभागे' अर्थात् महान भाग्यशालिनी कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें अपने वचन सुनने के लिए आमंत्रित करते हैं। वे अपने वचनों को 'वेदोक्त' बताकर उनकी प्रामाणिकता और महत्व को स्थापित करते हैं। यह श्लोक एक दिव्य संवाद की प्रस्तावना है, जिसमें श्रीकृष्ण यह विश्वास दिलाते हैं कि आगे जो कुछ भी कहा जाएगा, वह पार्वती जी के लिए अत्यंत हर्ष और संतोष का कारण बनेगा।

यं कामः क्रोध उद्वेगो भयं नाविशते कदा ।
वेदस्मृतिपुराणेषु संहितासु च भामिनि ॥

हे भामिनि! इन्हें काम, क्रोध, उद्वेग और भय कभी भी अपने वश में नहीं कर पाते, ऐसा वेद, स्मृति, पुराण और संहिताओं में वर्णित है।

यहाँ श्रीकृष्ण भगवान गणेश के निर्विकार और स्थितप्रज्ञ स्वरूप का वर्णन करते हैं। वे पार्वती को 'भामिनि' (तेजस्वी स्त्री) कहकर संबोधित करते हुए बताते हैं कि गणेश जी सभी मानसिक विकारों से परे हैं। काम (भौतिक इच्छा), क्रोध, उद्वेग (मानसिक बेचैनी) और भय जैसी भावनाएं उन पर कभी हावी नहीं हो पातीं। यह कथन विभिन्न धर्मग्रंथों द्वारा समर्थित है और यह दर्शाता है कि गणेश जी परम योगी और आत्म-नियंत्रित देवता हैं।

नामान्यस्योपदिष्टानि सुपुण्यानि महात्मभिः ।
यानि तानि प्रवक्ष्यामि निखिलाघहराणि च ॥

महात्माओं ने इनके अनेक पुण्य प्रदान करने वाले नामों का उपदेश दिया है। मैं अब उन सभी नामों को कहूँगा जो समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्रीकृष्ण अब गणेश जी के नामों की महिमा का वर्णन करने की भूमिका तैयार कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी महात्माओं और ऋषियों ने गणेश जी के अनेक पवित्र नामों को प्रकट किया है। ये नाम इतने शक्तिशाली हैं कि केवल इनका स्मरण करने से ही मनुष्य के सभी पाप (अघ) नष्ट हो जाते हैं। यह श्लोक नाम-स्मरण के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रमथानां गणा ये च नानारूपा महाबलाः ।
तेषामीशस्त्वयं यस्माद्गणेशस्तेन कीर्त्तितः ॥

जो अनेक रूपों वाले और महान बलशाली प्रमथगण हैं, यह उनके 'ईश' अर्थात् स्वामी हैं, इसी कारण इन्हें 'गणेश' कहा गया है।

इस श्लोक में 'गणेश' नाम का अर्थ स्पष्ट किया गया है। भगवान शिव की सेवा में रहने वाले गण, जिन्हें 'प्रमथ' भी कहा जाता है, विभिन्न स्वरूपों और अपार शक्तियों से युक्त होते हैं। भगवान गणेश उन सभी गणों के अधिपति हैं। 'गण' (समूह) और 'ईश' (स्वामी) के संयोग से 'गणेश' नाम बना है, जिसका अर्थ है 'गणों के स्वामी'।

भूतानि च भविष्याणि वर्तमानानि यानि च ।
ब्रह्माण्डान्यखिलान्येव यस्मिंल्लम्बोदरः स तु ॥

भूत, भविष्य और वर्तमान काल के जो भी अखिल ब्रह्मांड हैं, वे सभी जिनमें समाये हुए हैं, इस कारण वे 'लंबोदर' हैं।

यहाँ 'लंबोदर' नाम का गूढ़ और आध्यात्मिक अर्थ समझाया गया है। सामान्यतः इसका अर्थ 'लंबे या बड़े उदर (पेट) वाला' होता है, किंतु इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि संपूर्ण सृष्टि, जिसमें तीनों काल और समस्त ब्रह्मांड समाहित हैं, वह सब उनके उदर में ही स्थित है। उनका विशाल उदर उनकी सर्व-समावेशी और विराट प्रकृति का प्रतीक है।

यः शिरो देवयोगेन छिन्नं संयोजितं पुनः ।
गजस्य शिरसा देवि तेन प्रोक्तो गजाननः ॥

हे देवी! दैवयोग से जिनका मस्तक कट गया था और फिर हाथी के मस्तक के साथ पुनः जोड़ दिया गया, इस कारण वे 'गजानन' कहलाए।

यह श्लोक 'गजानन' नाम के पीछे की प्रसिद्ध पौराणिक कथा का संदर्भ देता है। 'गज' का अर्थ है हाथी और 'आनन' का अर्थ है मुख। जब भगवान शिव ने क्रोधवश बालक गणेश का मस्तक उनके धड़ से अलग कर दिया, तब एक हाथी का सिर उनके धड़ पर स्थापित किया गया था। हाथी का मुख धारण करने के कारण ही वे 'गजानन' नाम से विख्यात हुए।

चतुर्थ्यामुदितश्चन्द्रो दर्भिणा शप्त आतुरः ।
अनेन विधृतो भाले भालचन्द्रस्ततः स्मृतः ॥

जब गणेश द्वारा शापित होने पर चंद्रमा व्याकुल हो गया, तब इन्होंने उसे अपने भाल (मस्तक) पर धारण कर लिया, इसलिए ये 'भालचंद्र' कहलाए।

इस श्लोक में 'भालचंद्र' नाम का कारण बताया गया है, जिसका अर्थ है 'जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो'। कथा के अनुसार, एक बार चंद्रमा ने गणेश जी के स्वरूप का उपहास किया, जिससे रुष्ट होकर गणेश जी ने उसे श्राप दे दिया। बाद में चंद्रमा द्वारा क्षमा मांगने पर, गणेश जी ने उसे अपने मस्तक पर स्थान दिया। यह घटना दर्शाती है कि गणेश जी क्षमाशील हैं और शरणागत को आश्रय देते हैं।

शप्तः पुरा सप्तभिस्तु मुनिभिः सङ्क्षयं गतः ।
जातवेदा दीपितोऽभूद्येनासौ शूर्पकर्णकः ॥

पूर्वकाल में सात मुनियों द्वारा शापित होकर जब अग्निदेव (जातवेदा) का तेज क्षीण हो गया था, तब इन्होंने ही उसे पुनः प्रदीप्त किया, इस कारण ये 'शूर्पकर्णक' हैं।

यहाँ 'शूर्पकर्णक' (सूप जैसे कानों वाला) नाम की एक अनूठी व्याख्या प्रस्तुत की गई है। 'शूर्प' यानी सूप का कार्य अनाज को भूसे से अलग करना है। गणेश जी के कान ज्ञान और सार को ग्रहण करने और निरर्थक बातों को त्यागने का प्रतीक हैं। इस श्लोक में वर्णित कथा के अनुसार, जब सप्तर्षियों के श्राप से अग्नि का तेज समाप्त हो गया, तब गणेश जी ने अपने सूप जैसे कानों से हवा करके अग्नि को पुनः प्रज्वलित किया था।

पुरा देवासुरे युद्धे पूजितो दिविषद्गणैः ।
विघ्नं निवारयामास विघ्ननाशस्ततः स्मृतः ॥

प्राचीन काल में देवासुर संग्राम के समय देवताओं द्वारा पूजित होने पर इन्होंने समस्त विघ्नों का निवारण किया, इसलिए ये 'विघ्ननाश' के नाम से जाने गए।

यह श्लोक गणेश जी के 'विघ्ननाश' या 'विघ्नहर्ता' स्वरूप को प्रकट करता है। देवताओं और असुरों के बीच युद्ध के प्रारंभ में, देवताओं ने कार्य की सफलता के लिए सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की। उनकी पूजा के प्रभाव से युद्ध में आने वाली सभी बाधाएं और संकट दूर हो गए, जिससे देवताओं की विजय हुई। इसी कारण वे सभी कार्यों में आने वाले विघ्नों को हरने वाले देवता माने जाते हैं।

अद्यायं देवि रामेण कुठारेण निपात्य च ।
दशनं दैवतो भद्रे ह्येकदन्तः कृतोऽमुना ॥

हे कल्याणी देवी! आज ही परशुराम ने अपने कुठार (फरसे) से प्रहार करके इनके एक दांत को खंडित कर दिया है, जिससे ये 'एकदंत' कहलाएंगे।

'एकदंत' (एक दांत वाला) नाम के पीछे की कथा का यहाँ उल्लेख है। एक बार जब परशुराम भगवान शिव से मिलने कैलाश आए, तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक दिया। इस पर हुए विवाद में परशुराम ने अपने फरसे से गणेश जी पर प्रहार किया। भगवान शिव द्वारा दिए गए उस अस्त्र का मान रखने के लिए गणेश जी ने वह प्रहार अपने एक दांत पर झेल लिया, जिससे उनका दांत टूट गया। यह घटना उनकी विनम्रता और त्याग को दर्शाती है।

भविष्यत्यथ पर्याये ब्रह्मणो हरवल्लभः ।
वक्रीभविष्यत्तुण्डत्वाद्वक्रतुण्डः स्मृतो बुधैः ॥

हे शिवप्रिये! भविष्य में एक समय पर इनकी सूंड वक्र (टेढ़ी) हो जाएगी, इसलिए विद्वानों द्वारा ये 'वक्रतुंड' कहलाएंगे।

'वक्रतुंड' (टेढ़ी सूंड वाले) नाम के भविष्य में प्रकट होने की यहाँ बात कही गई है। गणेश जी की वक्र सूंड अधर्म के मार्ग पर चलने वालों को दंड देने और धर्म के जटिल मार्ग पर चलने वालों का मार्गदर्शन करने का प्रतीक है। उनकी टेढ़ी सूंड को प्रणव (ॐ) का प्रतीक भी माना जाता है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का नाद है।

एवं तवास्य पुत्रस्य सन्ति नामानि पार्वति ।
स्मरणात्पापहारीणि त्रिकालानुगतान्यपि ॥

हे पार्वती! इस प्रकार तुम्हारे इस पुत्र के अनेक नाम हैं, जो तीनों कालों (भूत, वर्तमान और भविष्य) में स्मरण करने मात्र से ही पापों का हरण करने वाले हैं।

श्रीकृष्ण उपसंहार करते हुए कहते हैं कि पार्वती-पुत्र गणेश के ऐसे ही अनगिनत नाम हैं। इन नामों का प्रभाव शाश्वत है; किसी भी काल में इनका श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। यह गणेश जी के नामों की सार्वकालिक महिमा को सिद्ध करता है।

अस्मात्त्रयोदशीकल्पात्पूर्वस्मिन्दशमीभवे ।
मयास्मै तु वरो दत्तः सर्गदेवाग्रपूजने ॥

इस वर्तमान तेरहवें कल्प से पूर्व, दसवें कल्प में, मैंने ही इन्हें यह वरदान दिया था कि सृष्टि के सभी देवों में इनकी पूजा सबसे पहले होगी।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण उस वरदान का रहस्योद्घाटन करते हैं जिसके कारण गणेश जी 'प्रथम पूज्य' कहलाए। वे बताते हैं कि बहुत समय पूर्व, उन्होंने स्वयं गणेश जी को यह वरदान दिया था कि किसी भी शुभ कार्य और देवी-देवताओं की पूजा के आरम्भ में सबसे पहले गणेश का ही पूजन किया जाएगा। इस वरदान ने उन्हें देवताओं में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया।

जातकर्मादिसंस्कारे गर्भाधानादिकेऽपि च ।
यात्रायां च वणिज्यादौ युद्धे देवार्चने शुभे ॥

जातकर्म आदि संस्कारों में, गर्भाधान आदि में, यात्रा, वाणिज्य (व्यापार), युद्ध और देवताओं की शुभ पूजा के अवसरों पर।

यह श्लोक उन प्रमुख अवसरों का उल्लेख करता है जहाँ गणेश जी की अग्रपूजा अनिवार्य है। मनुष्य के जन्म से लेकर (जातकर्म), किसी यात्रा के आरम्भ में, व्यापार की शुरुआत में, युद्ध में विजय के लिए, और किसी भी अन्य देवता के पूजन से पहले गणेश जी का पूजन आवश्यक है, ताकि कार्य निर्विघ्न संपन्न हो।

सङ्कष्टे काम्यसिद्‍ध्यर्थं पूजयेद्यो गजाननम् ।
तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्‍ध्यन्त्येव न संशयः ॥

संकट के समय में अथवा किसी कामना की सिद्धि के लिए जो भी व्यक्ति गजानन का पूजन करता है, उसके सभी कार्य अवश्य ही सिद्ध हो जाते हैं, इसमें कोई भी संदेह नहीं है।

अंतिम श्लोक में श्रीकृष्ण गणेश-पूजा के परम फल का आश्वासन देते हैं। वे कहते हैं कि चाहे कोई व्यक्ति संकट से घिरा हो या किसी विशेष इच्छा की पूर्ति चाहता हो, यदि वह भगवान गजानन की आराधना करता है, तो उसके सभी कार्य सफल होते ही हैं। 'न संशयः' (कोई संदेह नहीं) कहकर श्रीकृष्ण इस वचन की सत्यता पर अपनी मुहर लगाते हैं।

 

श्रीकृष्ण उवाच -
श्रुणु देवि महाभागे वेदोक्तं वचनं मम ।
यच्छ्रुत्वा हर्षिता नूनं भविष्यसि न संशयः ।

यं कामः क्रोध उद्वेगो भयं नाविशते कदा ।
वेदस्मृतिपुराणेषु संहितासु च भामिनि ॥

नामान्यस्योपदिष्टानि सुपुण्यानि महात्मभिः ।
यानि तानि प्रवक्ष्यामि निखिलाघहराणि च ॥

प्रमथानां गणा ये च नानारूपा महाबलाः ।
तेषामीशस्त्वयं यस्माद्गणेशस्तेन कीर्त्तितः ॥

भूतानि च भविष्याणि वर्तमानानि यानि च ।
ब्रह्माण्डान्यखिलान्येव यस्मिंल्लम्बोदरः स तु ॥

यः शिरो देवयोगेन छिन्नं संयोजितं पुनः ।
गजस्य शिरसा देवि तेन प्रोक्तो गजाननः ॥

चतुर्थ्यामुदितश्चन्द्रो दर्भिणा शप्त आतुरः ।
अनेन विधृतो भाले भालचन्द्रस्ततः स्मृतः ॥

शप्तः पुरा सप्तभिस्तु मुनिभिः सङ्क्षयं गतः ।
जातवेदा दीपितोऽभूद्येनासौ शूर्पकर्णकः ॥

पुरा देवासुरे युद्धे पूजितो दिविषद्गणैः ।
विघ्नं निवारयामास विघ्ननाशस्ततः स्मृतः ॥

अद्यायं देवि रामेण कुठारेण निपात्य च ।
दशनं दैवतो भद्रे ह्येकदन्तः कृतोऽमुना ॥

भविष्यत्यथ पर्याये ब्रह्मणो हरवल्लभः ।
वक्रीभविष्यत्तुण्डत्वाद्वक्रतुण्डः स्मृतो बुधैः ॥

एवं तवास्य पुत्रस्य सन्ति नामानि पार्वति ।
स्मरणात्पापहारीणि त्रिकालानुगतान्यपि ॥

अस्मात्त्रयोदशीकल्पात्पूर्वस्मिन्दशमीभवे ।
मयास्मै तु वरो दत्तः सर्गदेवाग्रपूजने ॥

जातकर्मादिसंस्कारे गर्भाधानादिकेऽपि च ।
यात्रायां च वणिज्यादौ युद्धे देवार्चने शुभे ॥

सङ्कष्टे काम्यसिद्‍ध्यर्थं पूजयेद्यो गजाननम् ।
तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्‍ध्यन्त्येव न संशयः ॥

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

Other stotras

Copyright © 2026 | Vedadhara | All Rights Reserved. | Designed & Developed by Claps and Whistles
| | | | |
Vedahdara - Personalize

We use cookies