गजमुख स्तुति

विचक्षणमपि द्विषां भयकरं विभुं शङ्करं
विनीतमजमव्ययं विधिमधीतशास्त्राशयम्।
विभावसुमकिङ्करं जगदधीशमाशाम्बरं
गणप्रमुखमर्चये गजमुखं जगन्नायकम्।
अनुत्तममनामयं प्रथितसर्वदेवाश्रयं
विविक्तमजमक्षरं कलिनिबर्हणं कीर्तिदम्।
विराट्पुरुषमक्षयं गुणनिधिं मृडानीसुतं
गणप्रमुखमर्चये गजमुखं जगन्नायकम्।
अलौकिकवरप्रदं परकृपं जनैः सेवितं
हिमाद्रितनयापतिप्रियसुरोत्तमं पावनम्।
सदैव सुखवर्धकं सकलदुःखसन्तारकं
गणप्रमुखमर्चये गजमुखं जगन्नायकम्।
कलानिधिमनत्ययं मुनिगतायनं सत्तमं
शिवं श्रुतिरसं सदा श्रवणकीर्तनात्सौख्यदम्।
सनातनमजल्पनं सितसुधांशुभालं भृशं
गणप्रमुखमर्चये गजमुखं जगन्नायकम्।
गणाधिपतिसंस्तुतिं निरपरां पठेद्यः पुमान्-
अनारतमुदाकरं गजमुखं सदा संस्मरन्।
लभेत सततं कृपां मतिमपारसनतारिणीं
जनो हि नियतं मनोगतिमसाध्यसंसाधिनीम्।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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