
स्मितन्यक्कृतेन्दुप्रभाकुन्दपुष्पं सिताभ्रागरुप्रष्ठगन्धानुलिप्तम् ।
श्रिताशेषलोकेष्टदानामरद्रुं सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जो अपनी मुस्कान से चंद्रमा की चमक और कुंद पुष्प की सुंदरता को भी फीका कर देते हैं, जो सफेद बादलों और अगरु की सुगंध से लेपित हैं, और जो सभी लोकों की इच्छाओं को पूरा करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं, उन षण्मुख (कार्तिकेय) का मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘यह श्लोक भगवान षण्मुख के दिव्य रूप और गुणों का वर्णन करता है। उनकी मुस्कान की तुलना चंद्रमा और कुंद पुष्प से की गई है, जो उनकी सौम्यता और आकर्षण को दर्शाता है। सफेद बादलों और अगरु की सुगंध से लेपित होने का अर्थ है कि उनका शरीर अत्यंत पवित्र और सुगंधित है, जो उनकी दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है। उन्हें कल्पवृक्ष के समान बताया गया है, जो भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने की उनकी शक्ति को दर्शाता है। यह श्लोक भक्त को भगवान के इस मनमोहक रूप पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करता है।’
शरीरेन्द्रियादावहम्भावजातान् षडूर्मीर्विकारांश्च शत्रून्निहन्तुम् ।
नतानां दधे यस्तमास्याब्जषट्कं सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जो शरीर, इंद्रियों आदि में ‘मैं’ की भावना से उत्पन्न होने वाले छह शत्रुओं (षडूर्मी - भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा और मृत्यु) और विकारों को नष्ट करने के लिए अपने भक्तों को छह कमल जैसे मुख प्रदान करते हैं, उन षण्मुख का मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘इस श्लोक में भगवान षण्मुख को भक्तों के आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाला बताया गया है। षडूर्मी (भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा, मृत्यु) वे छह विकार हैं जो मनुष्य को भौतिक संसार में बांधे रखते हैं। ‘मैं’ की भावना (अहंभाव) इन विकारों का मूल कारण है। भगवान कार्तिकेय के छह मुखों को यहां इन शत्रुओं पर विजय पाने की शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा गया है। वे अपने भक्तों को इन आंतरिक शत्रुओं से मुक्ति दिलाने में सहायता करते हैं, जिससे उन्हें आत्मज्ञान और शांति प्राप्त हो सके।’
अपर्णाख्यवल्लीसमाश्लेषयोगात् पुरा स्थाणुतो योऽजनिष्टामरार्थम् ।
विशाखं नगे वल्लिकाऽऽलिङ्गितं तं सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जो अपर्णा नाम की लता (पार्वती) के आलिंगन से युक्त, पुराने स्थाणु (शिव) से देवताओं के प्रयोजन के लिए उत्पन्न हुए, उन विशाख (कार्तिकेय) का, जो पर्वत पर लता से आलिंगित हैं, मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘यह श्लोक भगवान कार्तिकेय की उत्पत्ति की कथा से संबंधित है। ‘अपर्णा’ देवी पार्वती का एक नाम है, जिन्होंने तपस्या के दौरान पत्तों का भी त्याग कर दिया था। ‘स्थाणु’ भगवान शिव का एक नाम है, जो स्थिर और अविचल हैं। कार्तिकेय का जन्म शिव और पार्वती के मिलन से देवताओं की रक्षा के लिए हुआ था। उन्हें ‘विशाख’ भी कहा जाता है। यहां ‘पर्वत पर लता से आलिंगित’ होने का प्रतीक है कि वे प्रकृति और शक्ति के साथ एकाकार हैं। यह श्लोक उनकी दिव्य उत्पत्ति और देवताओं के कल्याण के लिए उनके अवतार के महत्व को दर्शाता है।’
गुकारेण वाच्यं तमो बाह्यमन्तः स्वदेहाभया ज्ञानदानेन हन्ति ।
य एनं गुहं वेदशीर्षैकमेयं सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जो ‘गु’ अक्षर से वाच्य बाह्य और आंतरिक अज्ञान (तमस) को अपने ज्ञान दान से नष्ट करते हैं और अपने शरीर से अभय प्रदान करते हैं, जो इन गुह (कार्तिकेय) को वेदों के सार (ज्ञान) के रूप में जानते हैं, उन षण्मुख का मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘यह श्लोक भगवान कार्तिकेय के ‘गुह’ नाम का अर्थ स्पष्ट करता है। ‘गुह’ शब्द गुरु से संबंधित है, जहां ‘गु’ का अर्थ अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ उसे दूर करने वाला है। कार्तिकेय को यहां अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाले ज्ञानदाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, चाहे वह अज्ञान बाहरी हो या आंतरिक। वेदों का सार ज्ञान है, और कार्तिकेय को इस ज्ञान के प्रतीक के रूप में देखा गया है। वे अपने भक्तों को अभय प्रदान करते हैं, अर्थात भय से मुक्ति दिलाते हैं। यह श्लोक कार्तिकेय को परम गुरु और ज्ञान के प्रदाता के रूप में प्रस्तुत करता है।’
यतः कर्ममार्गो भुवि ख्यापितस्तं स्वनृत्ये निमित्तस्य हेतुं विदित्वा ।
वहत्यादरान्मेघनादानुलासी सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जिन्होंने पृथ्वी पर कर्म मार्ग को ख्यापित किया, अपने नृत्य में निमित्त के हेतु को जानकर, जो आदरपूर्वक मेघ गर्जना के समान ध्वनि करते हुए प्रसन्न होते हैं, उन षण्मुख का मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘यह श्लोक भगवान कार्तिकेय को कर्म मार्ग के प्रवर्तक के रूप में दर्शाता है। कर्म मार्ग का अर्थ है निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना। यहां उनके नृत्य को निमित्त (कारण) के रूप में बताया गया है, जिसका अर्थ है कि उनके कार्य और क्रियाएं किसी विशेष उद्देश्य या प्रेरणा से संचालित होती हैं। मेघ गर्जना के समान ध्वनि का अर्थ है उनकी शक्ति और प्रभाव। यह श्लोक बताता है कि भगवान कार्तिकेय स्वयं कर्म के महत्व को समझते हैं और अपने कार्यों से दूसरों को प्रेरणा देते हैं। वे भक्तों को सही कर्म पथ पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।’
कृपावारिराशिर्नृणामास्तिकत्वं दृढं कर्तुमद्यापि यः कुक्कुटादीन् ।
भृशं पाचितान् जीवयन्राजते तं सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
‘जो कृपा के सागर हैं, मनुष्यों की आस्तिकता को दृढ़ करने के लिए आज भी कुक्कुट (मुर्गे) आदि को, जो बहुत पके हुए थे, जीवित करके शोभायमान होते हैं, उन षण्मुख का मैं अपने हृदय कमल में सदा ध्यान करता हूँ।’
‘यह श्लोक भगवान कार्तिकेय की असीम कृपा और चमत्कारी शक्ति का वर्णन करता है। उन्हें ‘कृपावारिराशि’ (कृपा का सागर) कहा गया है। इसमें एक कथा का संदर्भ हो सकता है जहां कार्तिकेय ने अपनी शक्ति से मृत प्राणियों को पुनर्जीवित किया था, विशेष रूप से कुक्कुट को, जो उनके ध्वज पर भी अंकित है। यह घटना उनकी सर्वशक्तिमत्ता और भक्तों के प्रति उनकी गहन करुणा को दर्शाती है। यह उनके भक्तों में आस्था और विश्वास को मजबूत करने का प्रतीक है। यह श्लोक उनकी चमत्कारिक क्षमताओं और करुणापूर्ण स्वभाव पर प्रकाश डालता है।’
भुजङ्गप्रयातेन वृत्तेन क्लृप्तां स्तुतिं षण्मुखस्यादराद्ये पठन्ति ।
सुपुत्रायुरारोग्यसम्पद्विशिष्टान् करोत्येव तान् षण्मुखः सद्विदग्र्यान् ॥
‘जो भुजङ्गप्रयात छंद में रचित षण्मुख की इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, उन भक्तों को षण्मुख निश्चित रूप से अच्छे पुत्र, दीर्घायु, आरोग्य, धन-संपत्ति और सद्ज्ञान से युक्त बनाते हैं।’
‘यह श्लोक इस स्तुति के पाठ के फल का वर्णन करता है। ‘भुजङ्गप्रयात’ एक संस्कृत छंद का नाम है। इसमें बताया गया है कि जो भक्त इस स्तुति को श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ते हैं, उन्हें भगवान षण्मुख की कृपा प्राप्त होती है। उन्हें अच्छे पुत्र, लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य, धन-संपत्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। यह श्लोक भक्तों को इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए प्रेरित करता है, यह विश्वास दिलाते हुए कि भगवान उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगे और उन्हें एक पूर्ण तथा समृद्ध जीवन प्रदान करेंगे।’
स्मितन्यक्कृतेन्दुप्रभाकुन्दपुष्पं
सिताभ्रागरुप्रष्ठगन्धानुलिप्तम् ।
श्रिताशेषलोकेष्टदानामरद्रुं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
शरीरेन्द्रियादावहम्भावजातान्
षडूर्मीर्विकारांश्च शत्रून्निहन्तुम् ।
नतानां दधे यस्तमास्याब्जषट्कं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
अपर्णाख्यवल्लीसमाश्लेषयोगात्
पुरा स्थाणुतो योऽजनिष्टामरार्थम् ।
विशाखं नगे वल्लिकाऽऽलिङ्गितं तं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
गुकारेण वाच्यं तमो बाह्यमन्तः
स्वदेहाभया ज्ञानदानेन हन्ति ।
य एनं गुहं वेदशीर्षैकमेयं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
यतः कर्ममार्गो भुवि ख्यापितस्तं
स्वनृत्ये निमित्तस्य हेतुं विदित्वा ।
वहत्यादरान्मेघनादानुलासी
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
कृपावारिराशिर्नृणामास्तिकत्वं
दृढं कर्तुमद्यापि यः कुक्कुटादीन् ।
भृशं पाचितान् जीवयन्राजते तं
सदा षण्मुखं भावये हृत्सरोजे ॥
भुजङ्गप्रयातेन वृत्तेन क्लृप्तां
स्तुतिं षण्मुखस्यादराद्ये पठन्ति ।
सुपुत्रायुरारोग्यसम्पद्विशिष्टान्
करोत्येव तान् षण्मुखः सद्विदग्र्यान् ॥