वसुधैव कुटुम्बकम् गीत

येषामतिशर्मदा सर्वान् प्रति सर्वदा गर्वाद्यतिदूरगा भान्ती हृदये दया ।
तेषाममलात्मनां याता वसुधाम्बतां पितृतां गतमम्बरं जगदेव कुटुम्बकम् ।।


जात्यादिषु डम्बरं हित्वा विश्वंभरं पश्यन् समवीक्षणः सञ्चर सुविचक्षण ।
चिन्तय हृदि शङ्करं सन्ततमभयङ्करं गतभेदविडम्बकं वसुधैव कुटुंबकम् ।।


जहतामसमानतां जगतां वहतां मुदां हृदये सकलात्मतां स्मरतां चरतां सताम् ।
सततं शुभकारिणां भयशोकनिवारिणां सकलेष्वनुकम्पया जगदेति कुटुम्बताम् ।।

Verse 1
येषामतिशर्मदा सर्वान् प्रति सर्वदा गर्वाद्यतिदूरगा भान्ती हृदये दया ।
तेषाममलात्मनां याता वसुधाम्बतां पितृतां गतमम्बरं जगदेव कुटुम्बकम् ।।


इस श्लोक में उन महान और निर्मल आत्माओं के लक्षणों का वर्णन किया गया है जो संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानते हैं। कवि कहते हैं कि जिनके हृदय में दया निरंतर प्रकाशमान रहती है और जो सभी प्राणियों को परम शांति और सुख प्रदान करने वाली है, वे ही वास्तविक अर्थों में दिव्य पुरुष हैं। ऐसी आत्माएं अहंकार, गर्व और मद जैसे विकारों से कोसों दूर रहती हैं। जब हृदय से संकीर्ण स्वार्थ और अहंकार पूरी तरह मिट जाता है, तब वहाँ केवल निस्वार्थ करुणा का वास होता है जो समस्त जगत को आलोकित करती है।
दार्शनिक दृष्टि से यहाँ अमलात्मनां शब्द का प्रयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ चित्त के समस्त मल जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य शांत हो चुके हैं। ऐसी पवित्र स्थिति प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित नहीं रहता। उसके लिए यह धरती माता के समान पालन-पोषण करने वाली और विस्तृत आकाश पिता के समान संरक्षण प्रदान करने वाला बन जाता है। यहाँ माता और पिता के बिम्ब का प्रयोग ब्रह्मांडीय संबंधों की प्रगाढ़ता को दर्शाने के लिए किया गया है जो प्राकृतिक तत्वों के साथ हमारे अभिन्न जुड़ाव को प्रकट करता है।
पौराणिक और आध्यात्मिक संदर्भ में यह वसुधैव कुटुंबकम् की भावना का चरमोत्कर्ष है। जब साधक अद्वैत भाव में स्थित होता है, तो उसे जड़ और चेतन सभी में एक ही परमात्मा के दर्शन होते हैं। उसके लिए पराए और अपने का भेद समाप्त हो जाता है। इस श्लोक का गहरा संदेश यह है कि जब हम दया को अपना मूल स्वभाव बना लेते हैं, तब पूरी सृष्टि हमारे आत्मीय जन बन जाते हैं और संसार का क्लेश समाप्त होकर परमानंद की प्राप्ति होती है। यह अवस्था जीवन्मुक्ति के समान है जहाँ साधक पूरे ब्रह्मांड को अपने घर के रूप में अनुभव करता है।

Verse 2
जात्यादिषु डम्बरं हित्वा विश्वंभरं पश्यन् समवीक्षणः सञ्चर सुविचक्षण ।
चिन्तय हृदि शङ्करं सन्ततमभयङ्करं गतभेदविडम्बकं वसुधैव कुटुंबकम् ।।


प्रस्तुत श्लोक में मनुष्य को सामाजिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर आध्यात्मिक एकता का अनुभव करने का निर्देश दिया गया है। कवि एक विवेकी और चतुर पुरुष को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उसे जाति, वर्ण, कुल और पंथ आदि के झूठे आडंबरों और अहंकार का पूर्णतः त्याग कर देना चाहिए। ये सामाजिक भेद केवल बाहरी आवरण हैं जो सत्य की व्यापकता को ढक देते हैं। एक सुविज्ञ व्यक्ति वही है जो चराचर जगत के कण-कण में उस विश्वंभर परमात्मा के दर्शन करता है जो समस्त सृष्टि का भरण-पोषण करने वाला है।
यहाँ समवीक्षणः शब्द का प्रयोग समत्व योग को दर्शाता है, जिसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलता है। यह वह दिव्य दृष्टि है जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण में एक ही परम चेतना को देखती है। श्लोक में भगवान शंकर का हृदय में निरंतर चिंतन करने के लिए कहा गया है। शंकर का अर्थ ही कल्याण करने वाला है। वे अभयंकर हैं अर्थात् जो भक्त के हृदय से मृत्यु और संसार का भय समूल नष्ट कर देते हैं। पौराणिक रूप से भगवान शिव को अर्धनारीश्वर के रूप में भी जाना जाता है, जो पुरुष और प्रकृति के समन्वय का प्रतीक हैं।
आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक भेदभावरूपी विडंबना को समाप्त करने का आह्वान करता है। जब साधक के हृदय में मंगलकारी शिव का चिंतन स्थिर हो जाता है, तब उसे ज्ञात होता है कि संसार की विविधता केवल एक मायावी नाटक है। वास्तविकता में केवल एक ही अद्वैत तत्व सर्वत्र व्याप्त है। इस सत्य को जान लेने पर ही व्यक्ति विश्व बंधुत्व की सच्ची अवधारणा को आत्मसात कर पाता है। वसुधैव कुटुंबकम् का आदर्श तभी फलीभूत होता है जब हम सामाजिक भेदों के मिथ्या डंबरों को छोड़कर अभेद की साधना में संलग्न होते हैं।

Verse 3
जहतामसमानतां जगतां वहतां मुदां हृदये सकलात्मतां स्मरतां चरतां सताम् ।
सततं शुभकारिणां भयशोकनिवारिणां सकलेष्वनुकम्पया जगदेति कुटुम्बताम् ।।


इस अंतिम श्लोक में उन महापुरुषों की जीवनशैली और मानसिक अवस्था का चित्रण है जो विश्व शांति और वैश्विक एकता के वास्तविक प्रणेता हैं। कवि कहते हैं कि जो लोग संसार से असमानता और ऊंच-नीच के भाव को पूरी तरह त्याग चुके हैं और जिनके हृदय में सदा प्रसन्नता और हर्ष का प्रवाह रहता है, वे ही समाज का वास्तविक मंगल करते हैं। यहाँ सकलात्मतां का अर्थ है स्वयं को सभी प्राणियों में और सभी प्राणियों को अपने भीतर अनुभव करना। यह उपनिषदों के उस महान उद्घोष का प्रतिपादन करता है जिसमें आत्मवत् सर्वभूतेषु की शिक्षा दी गई है।
सज्जन व्यक्ति वह है जो निरंतर शुभकारी कर्मों में लगा रहता है और जिसके सान्निध्य मात्र से पीड़ित लोगों के भय और शोक दूर हो जाते हैं। पौराणिक ग्रंथों में संतों को कल्पवृक्ष और गंगा के समान बताया गया है जो बिना किसी भेदभाव के सभी के दुखों का निवारण करते हैं। अनुकम्पा या करुणा ही वह अदृश्य सूत्र है जो विभिन्न मनुष्यों, जातियों और संस्कृतियों को एक प्रेममयी माला में पिरोता है। जब तक हृदय में संवेदना नहीं होती, तब तक वैश्विक परिवार की कल्पना अधूरी रहती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक निस्वार्थ सेवा और सर्वभूतहिते रतः के भाव को मोक्ष का मार्ग बताता है। जब हम दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं, तो हम केवल उनकी सहायता नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी आत्मा की सीमाओं का विस्तार कर रहे होते हैं। इसी विस्तार की पराकाष्ठा ही जगत का कुटुंब बन जाना है। जब प्रत्येक व्यक्ति शुभकारी कर्मों में रत होकर दूसरों के शोक निवारण का माध्यम बनता है, तब संसार से कलह और वैमनस्य का स्वतः अंत हो जाता है। अतः विश्व की एकता केवल वैचारिक स्तर पर नहीं, बल्कि व्यवहार और करुणा के धरातल पर संभव है।

 

 

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