विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे
महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
हृदये कलये विमलं चरणं
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
करुणावरुणालय पालय मां
भवसागरदुःखविदूनहृदम्।
रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
भवता जनता सुहिता भविता
निजबोधविचारणचारुमते।
कलयेश्वरजीवविवेकविदं
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
भव एव भवानिति मे नितरां
समजायत चेतसि कौतुकिता।
मम वारय मोहमहाजलधिं
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो
भविता समदर्शनलालसता।
अतिदीनमिमं परिपालय मां
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
जगतीमवितुं कलिताकृतयो
विचरन्ति महामहसश्छलतः।
अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
गुरुपुङ्गव पुङ्गवकेतन ते
समतामयतन्नहि कोऽपि सुधीः।
शरणागतवत्सल तत्त्वनिधे
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
विदिता न मया विशदैककला
न च किञ्चन काञ्चनमस्ति गुरो ।
द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां
भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
क्या आप जानते हैं कि सबसे बड़ी शक्ति क्या है? वह है 'प्रेम'। बहुत समय पहले एक शिष्य था जिसका नाम गिरि था। जहाँ बाकी सब पढ़ाई में लगे रहते थे, गिरि बस अपने गुरु आदि शंकराचार्य जी की सेवा करता था। बाकी शिष्यों को लगता था कि गिरि को कुछ नहीं आता। लेकिन गुरु की कृपा से एक दिन गिरि के मुख से ऐसे अद्भुत शब्द निकले कि बड़े-बड़े विद्वान देखते रह गए। यह 'तोटकाष्टकम्' उसी श्रद्धा की कहानी है।
श्लोक 1:
विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे महितोपनिषत्कथितार्थनिधे।
हृदये कलये विमलं चरणं भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'हे मेरे प्यारे गुरुदेव! आप ज्ञान के एक ऐसे समुद्र हैं जिसमें खारा पानी नहीं, बल्कि मीठा अमृत भरा है। आपके पास उपनिषदों का वह खजाना है जो दुनिया के किसी भी सोने-चांदी से बढ़कर है। मैं आँखें बंद करके आपके उन कोमल चरणों को अपने नन्हे से दिल में बैठाता हूँ जो सफेद फूल की तरह सुंदर और पवित्र हैं। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 2:
करुणावरुणालय पालय मां भवसागरदुःखविदूनहृदम्।
रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'हे गुरु, आप दया के सागर हैं! यह दुनिया कभी-कभी एक डरावने समुद्र जैसी लगती है जहाँ दुःख की बड़ी-बड़ी लहरें आती हैं। जब मैं घबरा जाता हूँ, तो आप एक मजबूत जहाज बनकर मुझे बचा लेते हैं। आप मुझे वह ज्ञान दीजिये जिससे मैं डरे बिना इस जीवन को जी सकूँ। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 3:
भवता जनता सुहिता भविతा निजबोधविचारणचारुमते।
कलयेश्वरजीवविवेकविदं भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'आपकी वजह से पूरी दुनिया में उजाला फैल रहा है। आपकी बुद्धि बहुत सुंदर है क्योंकि आप हमेशा सच के बारे में सोचते हैं। मुझे भी वह रहस्य समझाइये कि मैं और भगवान अलग नहीं हैं, बल्कि हम सब एक ही प्रकाश के बने हैं। हे गुरु शंकर, मुझे अपनी गोद में रखिये।'
श्लोक 4:
भव एव भवानिति मे नितरां समजायत चेतसि कौतुकिता।
मम वारय मोहमहाजलधिं भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'मेरे मन में एक बहुत प्यारा राज़ है! मुझे पूरा यकीन है कि आप साक्षात भगवान शिव ही हैं! यह सोचकर मेरा दिल खुशी से नाचने लगता है। मैं कभी-कभी भूल जाता हूँ कि मैं कौन हूँ, आप मेरी इस कन्फ्यूजन को दूर कर दीजिये। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 5:
सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो भविता समदर्शनलालसता।
अतिदीनमिमं परिपालय मां भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'पिछले जन्मों के अच्छे कामों की वजह से ही मुझे आप मिले हैं। अब मेरी बस एक ही इच्छा है—कि मैं सबको एक ही प्यार भरी नजर से देख सकूँ, चाहे वह छोटा सा कीड़ा हो या कोई इंसान। मैं एक छोटा सा बालक हूँ, मेरी रक्षा कीजिये। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 6:
जगतीमवितुं कलिताकृतयो विचरन्ति महामहसश्छलतः।
अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'लोग कहते हैं कि बड़ी-बड़ी दिव्य आत्माएं हमारी मदद के लिए साधारण इंसान बनकर आती हैं। मेरे लिए तो आप आसमान में चमकते हुए सूरज की तरह हैं। जैसे सूरज अंधेरे को भगा देता है, वैसे ही आपकी मुस्कुराहट मेरे सारे डर को दूर कर देती है। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 7:
गुरुपुङ्गव पुङ्गवकेतन ते समतामयतन्नहि कोऽपि सुधीः।
शरणागतवत्सल तत्त्वनिधे भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'हे गुरुओं में सबसे महान! आप भगवान शिव की ध्वजा के समान हैं। कोई कितना भी पढ़ ले, वह आपकी जैसी शांति कभी नहीं पा सकता। आप अपनी शरण में आने वालों को माँ की तरह प्यार करते हैं। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
श्लोक 8:
विदिता न मया विशदैककला न च किञ्चन काञ्चनमस्ति गुरो ।
द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां भव शङ्करदेशिक मे शरणम्।
अर्थ:
'गुरुजी, सच तो यह है कि मुझे न तो कोई कला आती है, न मैंने शास्त्र पढ़े हैं और न ही मेरे पास आपको देने के लिए सोना है। मेरे पास बस आपके लिए बहुत सारा प्यार है। अपनी दया मुझ पर जल्दी से बरसा दीजिये। हे गुरु शंकर, आप ही मेरी शरण हैं।'
निष्कर्ष:
गिरि की कहानी हमें सिखाती है कि श्रद्धा और सेवा ही भगवान तक पहुँचने का सबसे आसान रास्ता है। गुरु के चरणों में ही सारा सुख है।