निर्गुण मानस पूजा स्तोत्र

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निर्गुण मानस पूजा स्तोत्र

Lyrics:

शिष्य उवाच-

अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि।

स्थितेऽद्वितीयभावेऽपि कथं पूजा विधीयते।1।

पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम्।

स्वच्छाय पाद्यमर्घ्यं च स्वच्छस्याचमनं कुतः।2।

निर्मलस्य कुतः स्नानं वासो विश्वोदरस्य च।

अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम्।3।

निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च।

निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलङ्कारो निराकृतेः।4।

निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिणः।

निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह।5।

विश्वानन्दयितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते।

स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः।6।

गीयते श्रुतिभिस्तस्य नीराञ्जनविधिः कुतः।

प्रदक्षिणमनन्तस्य प्रमाणोऽद्वयवस्तुनः।

वेदवाचामवेद्यस्य किं वा स्तोत्रं विधीयते।7।

श्रीगुरुरुवाच-

आराधयामि मणिसन्निभमात्मलिङ्गं

मायापुरीहृदयपङ्कजसन्निविष्टम्।

श्रद्धानदीविमलचित्तजलाभिषेकै-

र्नित्यं समाधिकुसुमैरपुनर्भवाय।8।

अयमेतोऽवशिष्टोऽस्मीत्येवमावाहयेच्छिवम्।

आसनं कल्पयेत् पश्चात् स्वप्रतिष्ठात्मचिन्तनम्।9।

पुण्यपापरजःसङ्गो मम नास्तीति वेदनम्।

पाद्यं समर्पयेद्विद्वान् सर्वकल्मषनाशनम्।10।

अनादिकल्पविधृतमूलज्ञानजलाञ्जलिम्।

विसृजेदात्मलिङ्गस्य तदेवार्घ्यसमर्पणम्।11।

ब्रह्मानन्दाब्धिकल्लोलकणकोट्यंशलेशकम्।

पिबन्तीन्द्रादय इति ध्यानमाचमनं मतम्।12।

ब्रह्मानन्दजलेनैव लोकाः सर्वे परिप्लुताः।

अच्छेद्योऽयमिति ध्यानमभिषेचनमात्मनः।13।

निरावरणचैतन्यं प्रकाशोऽस्मीति चिन्तनम्।

आत्मलिङ्गस्य सद्वस्त्रमित्येवं चिन्तयेन्मुनिः।14।

त्रिगुणात्माशेषलोकमालिकासूत्रमस्म्यहम्।

इति निश्चयमेवात्र ह्युपवीतं परं मतम्।15।

अनेकवासनामिश्रप्रपञ्चोऽयं धृतो मया।

नान्येनेत्यनुसन्धानमात्मनश्चन्दनं भवेत्।16।

रजःसत्त्वतमोवृत्तित्यागरूपैस्तिलाक्षतैः।

आत्मलिङ्गं यजेन्नित्यं जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये।17।

ईश्वरो गुरुरात्मेति भेदत्रयविवर्जितैः।

बिल्वपत्रैरद्वितीयैरात्मलिङ्गं यजेच्छिवम्।18।

समस्तवासनात्यागं धूपं तस्य विचिन्तयेत्।

ज्योतिर्मयात्मविज्ञानं दीपं सन्दर्शयेद् बुधः।19।

नैवेद्यमात्मलिङ्गस्य ब्रह्माण्डाख्यं महोदनम्।

पिबानन्दरसं स्वादु मृत्युरस्योपसेचनम्।20।

अज्ञानोच्छिष्टकरस्य क्षालनं ज्ञानवारिणा।

विशुद्धस्यात्मलिङ्गस्य हस्तप्रक्षालनं स्मरेत्।21।

रागादिगुणशून्यस्य शिवस्य परमात्मनः।

सरागविषयाभ्यासत्यागस्ताम्बूलचर्वणम्।22।

अज्ञानध्वान्तविध्वंसप्रचण्डमतिभास्करम्।

आत्मनो ब्रह्मताज्ञानं नीराजनमिहात्मनः।23।

विविधब्रह्मसन्दृष्टिर्मालिकाभिरलङ्कृतम्।

पूर्णानन्दात्मतादृष्टिं पुष्पाञ्जलिमनुस्मरेत्।24।

परिभ्रमन्ति ब्रह्ममाण्डसहस्राणि मयीश्वरे।

कूटस्थाचलरूपोऽहमिति ध्यानं प्रदक्षिणम्।25।

विश्ववन्द्योऽहमेवास्मि नास्ति वन्द्यो मदन्यतः।

इत्यालोचनमेवात्र स्वात्मलिङ्गस्य वन्दनम्।26।

आत्मनः सत्क्रिया प्रोक्ता कर्तव्याभावभावना।

नामरूपव्यतीतात्मचिन्तनं नामकीर्तनम्।27।

श्रवणं तस्य देवस्य श्रोतव्याभावचिन्तनम्।

मननं त्वात्मलिङ्गस्य मन्तव्याभावचिन्तनम्।28।

ध्यातव्याभावविज्ञानं निदिध्यासनमात्मनः।

समस्तभ्रान्तिविक्षेपराहित्येनात्मनिष्ठता।29।

समाधिरात्मनो नाम नान्यच्चित्तस्य विभ्रमः।

तत्रैव ब्रह्मणि सदा चित्तविश्रान्तिरिष्यते।30।

एवं वेदान्तकल्पोक्तस्वात्मलिङ्गप्रपूजनम्।

कुर्वन्ना मरणं वाऽपि क्षणं वा सुसमाहितः।31।

सर्वदुर्वासनाजालं पादपांसुमिव त्यजेत्।

विधूयाज्ञानदुःखौघं मोक्षानन्दं समश्नुते।32।

Meaning:

Verse 1
अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि।
स्थितेऽद्वितीयभावेऽपि कथं पूजा विधीयते।
यहाँ शिष्य एक गहरे दार्शनिक प्रश्न से शुरुआत करता है। वह कहता है कि जो परम सत्य अखण्ड है, जो सत्, चित् और आनन्द का एकमात्र रूप है, जिसमें कोई भेद या विकल्प नहीं है, उस अद्वितीय तत्त्व की पूजा कैसे की जा सकती है।
शब्दों का सीधा अर्थ यह है कि ब्रह्म न तो टूटा हुआ है, न उसमें कोई परिवर्तन है। वह एकरस है और द्वैत से रहित है। पूजा सामान्यतः किसी भिन्न वस्तु की होती है, जहाँ पूजक और पूज्य अलग होते हैं।
यह प्रश्न वेदान्त का मूल प्रश्न है। यदि सब कुछ वही ब्रह्म है, तो फिर पूजने वाला कौन और पूज्य कौन। यहाँ शिष्य यह समझना चाहता है कि अद्वैत में भक्ति या उपासना की क्या भूमिका है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि बाहरी पूजा की सीमाएँ हैं। जब तक हम द्वैत में हैं, तब तक पूजा सम्भव है। लेकिन जब ज्ञान होता है कि सब कुछ वही है, तब पूजा का स्वरूप बदल जाता है।
Verse 2
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम्।
स्वच्छाय पाद्यमर्घ्यं च स्वच्छस्याचमनं कुतः।
शिष्य आगे पूछता है कि जो पूर्ण है, उसे बुलाने की क्या आवश्यकता है। जो स्वयं सबका आधार है, उसे आसन कैसे दिया जा सकता है। जो स्वयं शुद्ध है, उसके लिए पाद्य, अर्घ्य और आचमन कैसे सम्भव हैं।
यहाँ शब्दों का अर्थ यह है कि सामान्य पूजा में हम देवता का आवाहन करते हैं, उन्हें आसन देते हैं, उनके चरण धोते हैं। लेकिन जो स्वयं सर्वव्यापी है, उसे किसी स्थान में बुलाना कैसे सम्भव है।
यहाँ शिष्य बाह्य पूजा की प्रक्रिया पर प्रश्न उठा रहा है। वह देख रहा है कि यह सब क्रियाएँ केवल सीमित देवता के लिए उचित हैं।
गहराई में यह प्रश्न हमें यह समझाने के लिए है कि ब्रह्म कोई सीमित सत्ता नहीं है। वह हर जगह है। इसलिए उसे बुलाने या बैठाने की बात केवल प्रतीकात्मक है।
Verse 3
निर्मलस्य कुतः स्नानं वासो विश्वोदरस्य च।
अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम्।
शिष्य कहता है कि जो पूरी तरह निर्मल है, उसे स्नान की क्या आवश्यकता। जो पूरे विश्व को अपने भीतर धारण करता है, उसे वस्त्र कैसे पहनाए जा सकते हैं। जिसका कोई गोत्र या वर्ण नहीं है, उसे यज्ञोपवीत कैसे दिया जाए।
यहाँ प्रत्येक शब्द एक गहरी सच्चाई दिखाता है। स्नान अशुद्धि को दूर करने के लिए होता है। लेकिन जो सदा शुद्ध है, उसे स्नान की आवश्यकता नहीं।
यहाँ वेदान्त का सिद्धान्त स्पष्ट होता है कि ब्रह्म किसी सामाजिक या शारीरिक पहचान में बंधा नहीं है। न उसका कोई वर्ण है, न गोत्र।
यह प्रश्न हमें यह सिखाता है कि परमात्मा को सीमित मानकर किए गए सभी कर्म केवल प्रतीक हैं। सच्ची समझ इन सीमाओं से परे है।
Verse 4
निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च।
निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलङ्कारो निराकृतेः।
शिष्य पूछता है कि जो निर्लेप है, उसे गंध कैसे अर्पित की जाए। जो वासना से रहित है, उसे पुष्प क्यों चढ़ाए जाएँ। जो निराकार और निर्विशेष है, उसे आभूषण या अलंकार कैसे दिए जाएँ।
यहाँ निर्लेप का अर्थ है जो किसी भी वस्तु से प्रभावित नहीं होता। पुष्प और गंध इन्द्रियों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं।
लेकिन परमात्मा इन्द्रियों से परे है। उसे किसी बाहरी वस्तु से प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
इसका गहरा अर्थ यह है कि सच्ची पूजा बाहरी सजावट में नहीं है। वह आन्तरिक भाव में है।
Verse 5
निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिणः।
निजानन्दैकतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह।
शिष्य कहता है कि जो निरञ्जन है, उसे धूप और दीप की क्या आवश्यकता। जो स्वयं सबका साक्षी है, उसे प्रकाश दिखाने का क्या अर्थ। जो अपने ही आनन्द में तृप्त है, उसे नैवेद्य क्यों दिया जाए।
यहाँ निरञ्जन का अर्थ है जो माया से रहित है। दीपक अंधकार को हटाने के लिए होता है, लेकिन जो स्वयं प्रकाशस्वरूप है, उसे दीप दिखाना व्यर्थ है।
यहाँ शिष्य यह समझ रहा है कि भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं।
यह हमें यह सिखाता है कि पूजा भगवान के लिए नहीं, बल्कि हमारे मन को शुद्ध करने के लिए होती है।
Verse 6
विश्वानन्दयितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते।
स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः।
शिष्य पूछता है कि जो पूरे विश्व को आनन्द देता है, उसे ताम्बूल क्यों दिया जाए। जो स्वयं प्रकाश है और सूर्य आदि को भी प्रकाशित करता है, उसके लिए यह सब क्यों।
यहाँ स्पष्ट किया गया है कि परमात्मा सभी अनुभवों का आधार है।
वह न केवल प्रकाश देता है, बल्कि स्वयं ही प्रकाश का स्रोत है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि हम जो कुछ भी अर्पित करते हैं, वह सब उसी से आया है।
Verse 7
गीयते श्रुतिभिस्तस्य नीराञ्जनविधिः कुतः।
प्रदक्षिणमनन्तस्य प्रमाणोऽद्वयवस्तुनः।
वेदवाचामवेद्यस्य किं वा स्तोत्रं विधीयते।
शिष्य कहता है कि जिसे वेद भी पूरी तरह नहीं जान सकते, उसकी आरती कैसे की जाए। जो अनन्त है, उसकी परिक्रमा कैसे की जाए। जो वेदों से परे है, उसकी स्तुति कैसे हो सकती है।
यहाँ यह बताया गया है कि परमात्मा शब्दों और कर्मों से परे है।
वेद भी केवल उसकी ओर संकेत करते हैं।
इसका गहरा अर्थ यह है कि सच्चा अनुभव शब्दों और कर्मों से परे होता है।

Verse 8
श्रीगुरुरुवाच-
आराधयामि मणिसन्निभमात्मलिङ्गं
मायापुरीहृदयपङ्कजसन्निविष्टम्।
श्रद्धानदीविमलचित्तजलाभिषेकै-
र्नित्यं समाधिकुसुमैरपुनर्भवाय।
गुरु उत्तर देते हैं और बाहरी पूजा से ध्यान को भीतर की ओर मोड़ते हैं। वे कहते हैं कि मैं अपने ही आत्मस्वरूप रूपी लिंग की आराधना करता हूँ, जो मणि के समान उज्ज्वल है और हृदय रूपी कमल में स्थित है।
यहाँ ‘आत्मलिङ्ग’ का अर्थ है अपना ही चैतन्य स्वरूप। ‘मायापुरी’ का अर्थ है यह शरीर और संसार, जिसके भीतर हृदय कमल में यह आत्मा स्थित है।
गुरु बताते हैं कि श्रद्धा रूपी नदी से उत्पन्न शुद्ध चित्त के जल से उसका अभिषेक किया जाता है। और समाधि रूपी पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
इसका गहरा अर्थ यह है कि सच्ची पूजा बाहरी वस्तुओं से नहीं होती। वह श्रद्धा, शुद्ध मन और ध्यान के माध्यम से होती है।
यह पूजा पुनर्जन्म से मुक्ति देने वाली है, क्योंकि यह हमें अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कराती है।
Verse 9
अयमेतोऽवशिष्टोऽस्मीत्येवमावाहयेच्छिवम्।
आसनं कल्पयेत् पश्चात् स्वप्रतिष्ठात्मचिन्तनम्।
गुरु कहते हैं कि ‘मैं ही वह शेष तत्त्व हूँ’ ऐसा भाव करके शिव का आवाहन करना चाहिए।
यहाँ आवाहन का अर्थ बाहरी देवता को बुलाना नहीं है। बल्कि अपने भीतर यह अनुभव करना है कि सब कुछ हट जाने के बाद जो शेष रहता है, वही मैं हूँ।
इसके बाद ‘मैं आत्मा में ही स्थित हूँ’ ऐसा चिन्तन करना ही आसन देना है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि पूजा की हर क्रिया को भीतर के भाव में बदल दिया गया है।
यहाँ साधक को यह सिखाया जा रहा है कि वह अपने भीतर स्थित स्थिरता को पहचानें और उसी में टिक जाए।
Verse 10
पुण्यपापरजःसङ्गो मम नास्तीति वेदनम्।
पाद्यं समर्पयेद्विद्वान् सर्वकल्मषनाशनम्।
गुरु कहते हैं कि ‘मेरा पुण्य, पाप और रजोगुण से कोई सम्बन्ध नहीं है’ ऐसा ज्ञान ही पाद्य अर्पण करना है।
पाद्य सामान्यतः चरण धोने के लिए दिया जाता है। लेकिन यहाँ यह आन्तरिक क्रिया बन जाती है।
जब साधक यह समझता है कि वह कर्मों और गुणों से परे है, तब उसका मन शुद्ध हो जाता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा कभी भी कर्मों से बंधी नहीं होती। बंधन केवल अज्ञान के कारण है।
इस ज्ञान से सारे पाप और दोष नष्ट हो जाते हैं।
Verse 11
अनादिकल्पविधृतमूलज्ञानजलाञ्जलिम्।
विसृजेदात्मलिङ्गस्य तदेवार्घ्यसमर्पणम्।
गुरु कहते हैं कि अनादि काल से संचित अज्ञान रूपी जल को त्याग देना ही अर्घ्य अर्पण है।
यहाँ अर्घ्य का अर्थ है सम्मानपूर्वक जल अर्पित करना। लेकिन गुरु इसे अज्ञान के त्याग के रूप में बताते हैं।
अज्ञान ही संसार का मूल कारण है।
जब साधक इस अज्ञान को पहचान कर छोड़ देता है, तब वह सच्चे ज्ञान की ओर बढ़ता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि पूजा का सबसे बड़ा अर्पण अज्ञान का त्याग है।
Verse 12
ब्रह्मानन्दाब्धिकल्लोलकणकोट्यंशलेशकम्।
पिबन्तीन्द्रादय इति ध्यानमाचमनं मतम्।
गुरु कहते हैं कि इन्द्र आदि देवता भी ब्रह्मानन्द के महासागर की केवल एक बूँद का ही अनुभव करते हैं, ऐसा ध्यान करना ही आचमन है।
आचमन सामान्यतः जल पीने की क्रिया है।
यहाँ इसे ध्यान के रूप में बताया गया है।
यह हमें यह समझाता है कि ब्रह्मानन्द अनन्त है और देवता भी उसका पूरा अनुभव नहीं कर सकते।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा का आनन्द असीम है और उसकी तुलना किसी भी सांसारिक सुख से नहीं की जा सकती।
Verse 13
ब्रह्मानन्दजलेनैव लोकाः सर्वे परिप्लुताः।
अच्छेद्योऽयमिति ध्यानमभिषेचनमात्मनः।
गुरु कहते हैं कि यह पूरा संसार ब्रह्मानन्द के जल से भरा हुआ है, ऐसा ध्यान करना ही अभिषेक है।
अभिषेक का अर्थ स्नान कराना है।
यहाँ साधक को यह अनुभव करना है कि सब कुछ उसी आनन्द से भरा हुआ है।
और यह आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा सर्वव्यापी और अविनाशी है।
यह ध्यान साधक को स्थिरता और शान्ति देता है।
Verse 14
निरावरणचैतन्यं प्रकाशोऽस्मीति चिन्तनम्।
आत्मलिङ्गस्य सद्वस्त्रमित्येवं चिन्तयेन्मुनिः।
गुरु कहते हैं कि ‘मैं आवरण रहित चैतन्य प्रकाश हूँ’ ऐसा चिन्तन करना ही वस्त्र अर्पण है।
वस्त्र सामान्यतः शरीर को ढकने के लिए होते हैं।
लेकिन आत्मा को किसी आवरण की आवश्यकता नहीं।
यहाँ यह बताया गया है कि आत्मा स्वयं प्रकाश है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि अज्ञान के आवरण हट जाने पर आत्मा का प्रकाश स्वतः प्रकट हो जाता है।
Verse 15
त्रिगुणात्माशेषलोकमालिकासूत्रमस्म्यहम्।
इति निश्चयमेवात्र ह्युपवीतं परं मतम्।
गुरु कहते हैं कि ‘मैं ही तीनों गुणों और सभी लोकों को जोड़ने वाला सूत्र हूँ’ ऐसा दृढ़ निश्चय ही उपवीत है।
उपवीत एक पवित्र धागा होता है जो ज्ञान और कर्तव्य का प्रतीक है।
यहाँ इसे आत्मज्ञान के रूप में बताया गया है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा ही सबको जोड़ने वाला आधार है।
यह निश्चय साधक को एकता का अनुभव कराता है।

Verse 16
अनेकवासनामिश्रप्रपञ्चोऽयं धृतो मया।
नान्येनेत्यनुसन्धानमात्मनश्चन्दनं भवेत्।
गुरु कहते हैं कि यह समस्त संसार अनेक वासनाओं से मिश्रित है और इसे मैंने ही धारण किया है, ऐसा दृढ़ चिन्तन करना ही चन्दन अर्पण है।
यहाँ ‘वासनाएँ’ मन के संस्कार और इच्छाएँ हैं, जिनसे यह जगत अनुभव में आता है। साधक को यह समझना है कि बाहरी जगत वास्तव में उसके ही चित्त की अभिव्यक्ति है।
चन्दन शीतलता देता है। उसी प्रकार यह ज्ञान मन को शान्त करता है कि सब कुछ आत्मा में ही स्थित है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि जब साधक अपनी ही चेतना को जगत का आधार मानता है, तब द्वैत का भ्रम धीरे-धीरे मिटने लगता है।
Verse 17
रजःसत्त्वतमोवृत्तित्यागरूपैस्तिलाक्षतैः।
आत्मलिङ्गं यजेन्नित्यं जीवन्मुक्तिप्रसिद्धये।
गुरु कहते हैं कि रज, सत्त्व और तम इन तीनों गुणों की वृत्तियों का त्याग ही तिल और अक्षत अर्पण करना है।
तिल और अक्षत पूजा में पवित्रता और पूर्णता के प्रतीक होते हैं।
यहाँ इनका अर्थ है गुणों से ऊपर उठना। सत्त्व भी अन्ततः बंधन ही है, क्योंकि वह भी एक अवस्था है।
जब साधक इन तीनों गुणों से परे जाता है, तब वह जीवन्मुक्ति की ओर बढ़ता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि सच्ची मुक्ति गुणों के पार जाकर ही सम्भव है।
Verse 18
ईश्वरो गुरुरात्मेति भेदत्रयविवर्जितैः।
बिल्वपत्रैरद्वितीयैरात्मलिङ्गं यजेच्छिवम्।
गुरु कहते हैं कि ईश्वर, गुरु और आत्मा में कोई भेद नहीं है, ऐसा ज्ञान ही बिल्वपत्र अर्पण करना है।
बिल्वपत्र शिव पूजा में अत्यन्त प्रिय माना जाता है।
यहाँ इसका अर्थ है अद्वैत का अनुभव।
जब साधक यह देखता है कि ईश्वर, गुरु और स्वयं में कोई अन्तर नहीं है, तब उसका दृष्टिकोण बदल जाता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि सच्चा गुरु हमें अपने ही आत्मस्वरूप की ओर ले जाता है।
Verse 19
समस्तवासनात्यागं धूपं तस्य विचिन्तयेत्।
ज्योतिर्मयात्मविज्ञानं दीपं सन्दर्शयेद् बुधः।
गुरु कहते हैं कि सभी वासनाओं का त्याग ही धूप है, और आत्मज्ञान रूपी प्रकाश ही दीप है।
धूप वातावरण को सुगन्धित करता है। उसी प्रकार वासनाओं का त्याग मन को शुद्ध करता है।
दीपक अन्धकार को दूर करता है। यहाँ आत्मज्ञान अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि साधना का उद्देश्य मन को शुद्ध करना और ज्ञान को प्रकट करना है।
Verse 20
नैवेद्यमात्मलिङ्गस्य ब्रह्माण्डाख्यं महोदनम्।
पिबानन्दरसं स्वादु मृत्युरस्योपसेचनम्।
गुरु कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही आत्मलिङ्ग का नैवेद्य है, और आनन्द रस का अनुभव ही उसका स्वाद लेना है।
यहाँ ‘महोदन’ का अर्थ विशाल भोजन है।
साधक को यह देखना है कि पूरा जगत ही भगवान को अर्पित है।
मृत्यु को भी यहाँ उपसेचन कहा गया है, अर्थात् वह भी इस अनुभव का एक भाग है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही आत्मा में घटित हो रहे हैं और दोनों का साक्षी आत्मा ही है।
Verse 21
अज्ञानोच्छिष्टकरस्य क्षालनं ज्ञानवारिणा।
विशुद्धस्यात्मलिङ्गस्य हस्तप्रक्षालनं स्मरेत्।
गुरु कहते हैं कि अज्ञान से दूषित हाथों को ज्ञान रूपी जल से धोना ही हस्तप्रक्षालन है।
यहाँ हाथ कर्म का प्रतीक हैं।
अज्ञान के कारण किए गए कर्म बन्धन का कारण बनते हैं।
जब ज्ञान आता है, तब कर्म शुद्ध हो जाते हैं।
इसका गहरा अर्थ यह है कि ज्ञान ही सभी दोषों को धो देता है और मनुष्य को शुद्ध करता है।
Verse 22
रागादिगुणशून्यस्य शिवस्य परमात्मनः।
सरागविषयाभ्यासत्यागस्ताम्बूलचर्वणम्।
गुरु कहते हैं कि राग और विषयों के अभ्यास का त्याग ही ताम्बूल चर्वण है।
ताम्बूल पूजा के अन्त में दिया जाता है और संतोष का प्रतीक होता है।
यहाँ इसका अर्थ है इन्द्रियों के आकर्षण से मुक्त होना।
जब साधक विषयों में आसक्ति छोड़ देता है, तब उसे सच्ची शान्ति मिलती है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा स्वभाव से ही पूर्ण है और उसे बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं।
Verse 23
अज्ञानध्वान्तविध्वंसप्रचण्डमतिभास्करम्।
आत्मनो ब्रह्मताज्ञानं नीराजनमिहात्मनः।
गुरु कहते हैं कि अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाला प्रचण्ड ज्ञान सूर्य ही आरती है।
नीराजन का अर्थ दीप घुमाकर आरती करना है।
यहाँ ज्ञान को सूर्य के समान बताया गया है।
जब यह ज्ञान प्रकट होता है, तब अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो जाता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा और ब्रह्म एक हैं, यह ज्ञान ही सच्ची आरती है।
Verse 24
विविधब्रह्मसन्दृष्टिर्मालिकाभिरलङ्कृतम्।
पूर्णानन्दात्मतादृष्टिं पुष्पाञ्जलिमनुस्मरेत्।
गुरु कहते हैं कि विभिन्न रूपों में ब्रह्म को देखना ही माला है, और पूर्ण आनन्द स्वरूप आत्मा का अनुभव ही पुष्प अर्पण है।
यहाँ पुष्प अर्पण का अर्थ है हृदय की शुद्ध भावना।
जब साधक हर जगह ब्रह्म को देखता है, तब उसकी दृष्टि बदल जाती है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि संसार में भेद केवल दृष्टि का है, सत्य एक ही है।

Verse 25
परिभ्रमन्ति ब्रह्ममाण्डसहस्राणि मयीश्वरे।
कूटस्थाचलरूपोऽहमिति ध्यानं प्रदक्षिणम्।
गुरु कहते हैं कि असंख्य ब्रह्माण्ड मुझमें ही घूम रहे हैं, और मैं कूटस्थ, अचल, अडिग स्वरूप हूँ। इस भाव में स्थित होना ही प्रदक्षिणा है।
यहाँ ‘कूटस्थ’ का अर्थ है जो सदा एक जैसा रहता है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं आता। संसार में सब कुछ बदलता है, लेकिन आत्मा अचल रहती है।
प्रदक्षिणा सामान्यतः देवता के चारों ओर घूमने की क्रिया है। लेकिन यहाँ इसका अर्थ है इस सत्य का ध्यान करना कि सब कुछ आत्मा में ही स्थित है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि साधक को बाहर घूमने की आवश्यकता नहीं है। उसे अपने भीतर स्थिर होना है। वही सच्ची प्रदक्षिणा है।
Verse 26
विश्ववन्द्योऽहमेवास्मि नास्ति वन्द्यो मदन्यतः।
इत्यालोचनमेवात्र स्वात्मलिङ्गस्य वन्दनम्।
गुरु कहते हैं कि ‘मैं ही विश्व द्वारा वन्दनीय हूँ, मेरे अतिरिक्त कोई वन्दनीय नहीं है’ ऐसा चिन्तन करना ही वन्दन है।
यहाँ अहंकार की बात नहीं है। यह आत्मज्ञान की स्थिति है, जहाँ साधक यह अनुभव करता है कि सब कुछ उसी आत्मा का विस्तार है।
वन्दन का अर्थ है नमस्कार करना।
जब साधक अपने भीतर उसी परम तत्त्व को पहचान लेता है, तब वह हर जगह उसी को नमस्कार करता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा ही परम सत्य है और वही सर्वत्र पूजनीय है।
Verse 27
आत्मनः सत्क्रिया प्रोक्ता कर्तव्याभावभावना।
नामरूपव्यतीतात्मचिन्तनं नामकीर्तनम्।
गुरु कहते हैं कि आत्मा के लिए सच्ची क्रिया यह है कि ‘मुझे कुछ भी करना शेष नहीं है’ ऐसा भाव रखना।
यहाँ कर्तव्य का अभाव आलस्य नहीं है। बल्कि यह ज्ञान है कि आत्मा सदा पूर्ण है और उसे कुछ प्राप्त करना नहीं है।
नामकीर्तन का अर्थ यहाँ बाहरी जप नहीं है।
बल्कि नाम और रूप से परे आत्मा का चिन्तन ही सच्चा नामस्मरण है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि जब साधक अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तब सभी कर्म स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
Verse 28
श्रवणं तस्य देवस्य श्रोतव्याभावचिन्तनम्।
मननं त्वात्मलिङ्गस्य मन्तव्याभावचिन्तनम्।
गुरु कहते हैं कि श्रवण का अर्थ है यह समझना कि सुनने के लिए कुछ भी शेष नहीं है।
मनन का अर्थ है यह अनुभव करना कि विचार करने के लिए कुछ भी नहीं बचा है।
यहाँ यह स्थिति तब आती है जब साधक पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
वह जान लेता है कि सब कुछ पहले से ही स्पष्ट है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मज्ञान में कोई नया ज्ञान प्राप्त नहीं होता। केवल अज्ञान दूर होता है।
Verse 29
ध्यातव्याभावविज्ञानं निदिध्यासनमात्मनः।
समस्तभ्रान्तिविक्षेपराहित्येनात्मनिष्ठता।
गुरु कहते हैं कि ध्यान का अर्थ है यह जानना कि ध्यान करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है।
और जब सभी भ्रांतियाँ और विक्षेप समाप्त हो जाते हैं, तब आत्मा में स्थिर होना ही निदिध्यासन है।
यहाँ साधक पूरी तरह शान्त हो जाता है।
मन के सभी भ्रम समाप्त हो जाते हैं।
इसका गहरा अर्थ यह है कि आत्मा में स्थित होना ही सर्वोच्च ध्यान है।
Verse 30
समाधिरात्मनो नाम नान्यच्चित्तस्य विभ्रमः।
तत्रैव ब्रह्मणि सदा चित्तविश्रान्तिरिष्यते।
गुरु कहते हैं कि आत्मा में स्थित होना ही समाधि है।
इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह मन का भ्रम है।
जब मन ब्रह्म में विश्राम करता है, तब वही सच्ची शान्ति है।
यहाँ कोई प्रयास नहीं रहता।
सब कुछ स्वाभाविक हो जाता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि समाधि कोई विशेष अवस्था नहीं है, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप में टिके रहना है।
Verse 31
एवं वेदान्तकल्पोक्तस्वात्मलिङ्गप्रपूजनम्।
कुर्वन्ना मरणं वाऽपि क्षणं वा सुसमाहितः।
गुरु कहते हैं कि इस प्रकार वेदान्त में बताए गए आत्मलिङ्ग की पूजा करते हुए, चाहे मृत्यु का समय हो या जीवन का कोई भी क्षण, साधक सदा समाहित रहता है।
यह पूजा किसी विशेष समय या स्थान तक सीमित नहीं है।
यह हर समय की साधना है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि जब ज्ञान स्थिर हो जाता है, तब जीवन और मृत्यु दोनों समान हो जाते हैं।
Verse 32
सर्वदुर्वासनाजालं पादपांसुमिव त्यजेत्।
विधूयाज्ञानदुःखौघं मोक्षानन्दं समश्नुते।
गुरु अन्त में कहते हैं कि सभी बुरी वासनाओं को धूल की तरह त्याग देना चाहिए।
और अज्ञान तथा दुःख के समूह को दूर करके मोक्ष रूपी आनन्द को प्राप्त करना चाहिए।
यहाँ वासनाएँ ही बन्धन का कारण हैं।
जब वे समाप्त होती हैं, तब मनुष्य स्वतः मुक्त हो जाता है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि मुक्ति कोई बाहरी वस्तु नहीं है।
वह हमारे भीतर ही है, बस अज्ञान के हटते ही वह प्रकट हो जाती है।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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