
ओमित्यशेषविबुधाः शिरसा यदाज्ञां
सम्बिभ्रते सुममयीमिव नव्यमालाम्।
ओङ्कारजापरतलभ्यपदाब्ज स त्वं
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।1।।
नम्रालिहृत्तिमिरचण्डमयूखमालिन्
कम्रस्मितापहृतकुन्दसुधांशुदर्प।
सम्राट यदीयदयया प्रभवेद्दरिद्रः
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।2।।
मस्ते दुरक्षरततिर्लिखिता विधात्रा
जागर्तु साध्वसलवोऽपि न मेऽस्ति तस्याः।
लुम्पामि ते करुणया करुणाम्बुधे तां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।3।।
शम्पालतासदृशभास्वरदेहयुक्त
सम्पादयाम्यखिलशास्त्रधियं कदा वा।
शङ्कानिवारणपटो नमतां नराणां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।4।।
कन्दर्पदर्पदलनं कितवैरगम्यं
कारुण्यजन्मभवनं कृतसर्वरक्षम्।
कीनाशभीतिहरणं श्रितवानहं त्वां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।5।।
राकासुधाकरसमानमुखप्रसर्प-
द्वेदान्तवाक्यसुधया भवतापतप्तम्।
संसिच्य मां करुणया गुरुराज शीघ्रं
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।6।।
यत्नं विना मधुसुधासुरदीर्घिकाव-
धीरिण्य आशु वृणते स्वयमेव वाचः।
तं त्वत्पदाब्जयुगलं बिभृते हृदा यः
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।7।।
विक्रीता मधुना निजा मधुरता दत्ता मुदा द्राक्षया
क्षीरैः पात्रधियाऽर्पिता युधि जिताल्लब्धा बलादिक्षुतः।
न्यस्ता चोरभयेन हन्त सुधया यस्मादतस्तद्गिरां
माधुर्यस्य समृद्धिरद्भुततरा नान्यत्र सा वीक्ष्यते।।8।।
ओमित्यशेषविबुधाः शिरसा यदाज्ञां
सम्बिभ्रते सुममयीमिव नव्यमालाम्।
ओङ्कारजापरतलभ्यपदाब्ज स त्वं
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।1।।
अर्थ:
समस्त देवता आपकी आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं, जैसे कोई व्यक्ति प्रेम से नई पुष्पमाला धारण करता है। जिनके चरणकमल ‘ॐ’ के जप से प्राप्त होते हैं, ऐसे श्री शंकराचार्य! मुझे भी अपना हाथ पकड़ाकर सहारा दीजिए।
नम्रालिहृत्तिमिरचण्डमयूखमालिन्
कम्रस्मितापहृतकुन्दसुधांशुदर्प।
सम्राट यदीयदयया प्रभवेद्दरिद्रः
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।2।।
अर्थ:
आपकी तेजस्वी किरणें नम्र भक्तों के हृदय के अंधकार को नष्ट कर देती हैं। आपकी मधुर मुस्कान चंद्रमा और कुंद पुष्प के सौंदर्य के अभिमान को भी मिटा देती है। आपकी कृपा से निर्धन व्यक्ति भी राजा के समान महान बन सकता है। हे श्री शंकराचार्य! मुझे अपना सहारा दीजिए।
मस्ते दुरक्षरततिर्लिखिता विधात्रा
जागर्तु साध्वसलवोऽपि न मेऽस्ति तस्याः।
लुम्पामि ते करुणया करुणाम्बुधे तां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।3।।
अर्थ:
विधाता ने मेरे भाग्य में मानो बहुत सी दुर्भाग्य की रेखाएँ लिख दी हैं। उनमें थोड़ा सा भी शुभ फल जागृत नहीं होता दिखाई देता। हे करुणासागर! अपनी कृपा से उन रेखाओं को मिटा दीजिए। हे श्री शंकराचार्य! मुझे अपना सहारा दीजिए।
शम्पालतासदृशभास्वरदेहयुक्त
सम्पादयाम्यखिलशास्त्रधियं कदा वा।
शङ्कानिवारणपटो नमतां नराणां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।4।।
अर्थ:
कब मुझे ऐसा तेजस्वी ज्ञान प्राप्त होगा जो बिजली की लता की तरह प्रकाशमान हो और जिससे मैं सभी शास्त्रों को समझ सकूँ? आप तो आपके चरणों में झुकने वालों के सभी संदेह दूर करने में निपुण हैं। हे श्री शंकराचार्य! मुझे अपना सहारा दीजिए।
कन्दर्पदर्पदलनं कितवैरगम्यं
कारुण्यजन्मभवनं कृतसर्वरक्षम्।
कीनाशभीतिहरणं श्रितवानहं त्वां
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।5।।
अर्थ:
आप कामदेव के अभिमान को भी नष्ट करने वाले हैं। छल करने वालों के लिए आप तक पहुँचना संभव नहीं है। आप करुणा के निवास हैं और सबकी रक्षा करते हैं। मृत्यु के भय को भी दूर करने वाले हैं। मैंने आपकी शरण ली है। हे श्री शंकराचार्य! मुझे अपना सहारा दीजिए।
राकासुधाकरसमानमुखप्रसर्प-
द्वेदान्तवाक्यसुधया भवतापतप्तम्।
संसिच्य मां करुणया गुरुराज शीघ्रं
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।6।।
अर्थ:
आपका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल है, और उससे वेदान्त के वचनों का अमृत प्रवाहित होता है। संसार के दुःखों से तपे हुए मुझ पर कृपा करके उस ज्ञानरूपी अमृत का छिड़काव कीजिए। हे गुरुश्रेष्ठ! मुझे शीघ्र अपना सहारा दीजिए।
यत्नं विना मधुसुधासुरदीर्घिकाव-
धीरिण्य आशु वृणते स्वयमेव वाचः।
तं त्वत्पदाब्जयुगलं बिभृते हृदा यः
श्रीशङ्करार्य मम देहि करावलम्बम्।।7।।
अर्थ:
जो व्यक्ति आपके चरणकमलों को अपने हृदय में धारण करता है, उसकी वाणी बिना प्रयास के ही मधु, अमृत और दिव्य पेय से भी अधिक मधुर हो जाती है। हे श्री शंकराचार्य! मुझे अपना सहारा दीजिए।
विक्रीता मधुना निजा मधुरता दत्ता मुदा द्राक्षया
क्षीरैः पात्रधियाऽर्पिता युधि जिताल्लब्धा बलादिक्षुतः।
न्यस्ता चोरभयेन हन्त सुधया यस्मादतस्तद्गिरां
माधुर्यस्य समृद्धिरद्भुततरा नान्यत्र सा वीक्ष्यते।।8।।
अर्थ:
मानो मधु ने अपनी मिठास अमृत को बेच दी हो, अंगूर ने प्रसन्न होकर अपनी मिठास दे दी हो, दूध ने अपनी मधुरता पात्र को सौंप दी हो, और गन्ने ने पिसकर अपनी मिठास छोड़ दी हो। परन्तु आपकी वाणी की मधुरता इन सबसे भी अधिक अद्भुत है। ऐसी अद्भुत मधुरता कहीं और देखने को नहीं मिलती।