गुरु पुष्पाञ्जलि स्तोत्र

शास्त्राम्बुधेर्नावमदभ्रबुद्धिं
सच्छिष्यहृत्सारसतीक्ष्णरश्मिम्।
अज्ञानवृत्रस्य विभावसुं तं
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।
विद्यार्थिशारङ्गबलाहकाख्यं
जाड्याद्यहीनां गरुडं सुरेज्यम्।
अशास्त्रविद्यावनवह्निरूपं
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।
न मेऽस्ति वित्तं न च मेऽस्ति शक्तिः
क्रेतुं प्रसूनानि गुरोः कृते भोः।
तस्माद्वरेण्यं करुणासमुद्रं
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।
कृत्वोद्भवे पूर्वतने मदीये
भूयांसि पापानि पुनर्भवेऽस्मिन्।
संसारपारङ्गतमाश्रितोऽहं
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।
आधारभूतं जगतः सुखानां
प्रज्ञाधनं सर्वविभूतिबीजम्।
पीडार्तलङ्कापतिजानकीशं
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।
विद्याविहीनाः कृपया हि यस्य
वाचस्पतित्वं सुलभं लभन्ते।
तं शिष्यधीवृद्धिकरं सदैव
मत्पद्यपुष्पैर्गुरुमर्चयामि।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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Comments Hindi

aewnd
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