
Lyrics:
स्मितनिर्जितकुन्दसुमं ह्यसमं
मुखधूतसुधांशुमदं शमदम्।
सुखरूपपरात्मरतं निरतं
श्रितकल्पतरुं प्रणमामि गुरुम्।।1।।
जलबुद्बुदवत् क्षणभङ्गयुते
मलमूत्रवसासहिते वपुषि।
कुरुतेऽभिमतिं हृदयं हि मुधा
लघु वारय देशिक तां दयया।।2।।
धृतदण्डकमण्डलुजापसरं
सततं हृदये शशिखण्डधरम्।
दधतं नमतां वृजिनौघहरं
ददतं प्रतिभां प्रणमामि गुरुम्।।3।।
करणानि समानि भवन्ति कदा
तरणं नु कथं भववारिनिधेः।
शरणं मम नास्ति गुरो त्वदृते
निरुपाधिकृपाजलधेऽव जवात्।।4।।
चरितं न मयेषदपीह शुभं
भरितं जठरं बहुधाऽघचयात्।
छुरितं हृदयं नितरां तमसा
त्वरितं विमलं तनु तद्गुरुराट्।।5।।
गलितेऽपघने पलितेऽपि शिर-
स्यलितं मम देशिक नैव हृदा।
तव पादपयोजयुगे नु कदा
निरतं निरतं प्रलभेत मुदम्।।6।।
करुणार्द्रविलोचन मोचय मां
भवबन्धनतो बहुधा व्यथितम्।
क्वथितं प्रतिघादिकृशानुवशात्
करुणारससेचनतोऽव गुरो।।7।।
शिव एव भवानिति मे धिषणा
ह्युदपद्यत देशिक चेन्न तथा।
सकलं जगदप्यवबुध्यति ते
समतां सकलेष्वपि तत्तु कथम्।।8।।
विषयेषु सदा रमते हृदयं
विषतुल्यधियं दिश तत्र गुरो।
लषितत्वदपाङ्गझरी प्रसरत्व-
चिरान्मयि बन्धविनाशकरी।।9।।
सदसन्मतिरेव न मेऽस्ति गुरो
विरतिं प्रति सा करणं गदिता।
विरतिः क्व नु मे विषयाशहृदः
कथमाप्नुव एव विमुक्तिपथम्।।10।।
ब्रुवते निगमा बहुवारमिदं
जगदभ्रतलादिसदृक्षमिति।
मम तादृशधीः समुदेति कदा
वद देशिक मेऽङ्घ्रिजुषे कृपया।।11।।
जननी जनकः सुतदारमुखाः
स्वहिताय लषन्ति सदा मनुजम्।
गुरुरेव लषत्यखिलस्य हितं
तदहं तव पादयुगं श्रितवान्।।12।।
मदमोहमुखान्तरशत्रुगृहं
दमशान्तिविरक्तिसुहृद्रहितम्।
कथमेनमवेर्भवसागरतः
किमसाध्यमिदं वद देशिक ते।।13।।
धुनुषेऽघचयं पदनन्तृनृणां
तनुषे भविकं सकृदीक्षणतः।
जनुषे सदसच्च यथा न भवेन्
मम कर्म तथा कुरु देशिकराट्।।14।।
समवाप्य सुदुर्लभविप्रजनु-
र्यतितामपि को नु जनो मदृते।
व्यवहारवशत्वमुपैति गुरो
गतिरेव न मे तव पादमृते।।15।।
उददीधर एव बहून्मनुजान्
कृपया भवसागरमध्यगतान्।
किमयं तव भारती लोकगुरो
न हि भूभृदहेरणुरस्ति भरः।।16।।
दमुना यमुनाजनकश्च विधु-
र्मिलिताः शतशोऽपि न शक्नुवते।
यदपाकरणे तदचित्तिमिरं
त्वमपाकुरुषे वचसैव गुरो।।17।।
गुरुशङ्करनिर्मितभाष्यसुधा
सरिदीशनिमज्जनतृप्तमिमम्।
प्रविधाय गुरो भववारिनिधे-
र्लघु तारय मां करुणार्द्रदृशा।।18।।
पदनम्रजनौघपुमर्थकरी
प्रबलाघसमुद्रनिमग्नतरी।
मयि देशिक ते श्रुतिमूर्धचरी
प्रसरेन्नु कदा सुकटाक्षझरी।।19।।
बहुजन्मशतार्जितपुण्यवशाद्
भवदीयदया समवापि मया।
भवबन्धनतो न बिभेमि गुरो
करणीयमपीह न मेऽस्त्यपरम्।।20।।
स्वरेवऽघगिरेर्भजतां दिविषत्
तरवे प्रतिभाजितगोगुरवे।
पुरवैरिपदाब्जनिविष्टहृदे
करवै प्रणतिं जगतीगुरवे।।21।।
Meaning:
Verse 1
स्मितनिर्जितकुन्दसुमं ह्यसमं मुखधूतसुधांशुमदं शमदम्।
सुखरूपपरात्मरतं निरतं श्रितकल्पतरुं प्रणमामि गुरुम्।।1।।
इस प्रथम श्लोक में गुरु के दिव्य और आह्लादकारी स्वरूप का वन्दन किया गया है। कवि कहते हैं कि गुरु की मंद मुस्कान इतनी धवल और सुंदर है कि उसने कुंद के पुष्पों की श्वेत आभा को भी परास्त कर दिया है। कुंद का फूल अपनी कोमलता और सफेदी के लिए जाना जाता है लेकिन गुरु की मुस्कान में जो आत्मिक शांति और प्रसन्नता है वह अतुलनीय है। उनके मुखमंडल की कांति चंद्रमा के गौरव को भी फीका कर देती है। चंद्रमा जिसे अपनी शीतलता और प्रकाश पर गर्व है वह गुरु के तेज के सामने मद्धम पड़ जाता है। वे अपने शिष्यों को शम अर्थात मानसिक शांति प्रदान करने वाले हैं। उनका स्वरूप ही सुखमय है और वे सदैव उस परमतत्व या परमात्मा में लीन रहते हैं। जो भी व्यक्ति उनकी शरण में आता है उनके लिए वे कल्पवृक्ष के समान हैं जो साधक की सभी आध्यात्मिक और भौतिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते हैं। मैं ऐसे श्रेष्ठ गुरुदेव के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।
दार्शनिक रूप से यहाँ गुरु को साक्षात ब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। स्मित का अर्थ केवल शारीरिक मुस्कान नहीं बल्कि वह आंतरिक बोध है जो माया के आवरण को हटाकर सत्य का दर्शन कराता है। कुंद और चंद्रमा जैसे भौतिक उपमानों का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि संसार की सुंदरतम वस्तुएं भी गुरु के ज्ञान के प्रकाश के समक्ष तुच्छ हैं। शमदम् विशेषण महत्वपूर्ण है क्योंकि साधना मार्ग में इन्द्रिय निग्रह और मन की शांति ही प्राथमिक योग्यता है जिसे गुरु की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है। सुखरूप कहकर यह स्पष्ट किया गया है कि गुरु दुःख से परे तुरीय अवस्था में स्थित हैं। कल्पतरु का रूपक यह दर्शाता है कि गुरु केवल उपदेश ही नहीं देते बल्कि शरणागत का पूर्ण उत्तरदायित्व भी स्वीकार करते हैं।
Verse 2
जलबुद्बुदवत् क्षणभङ्गयुते मलमूत्रवसासहिते वपुषि।
कुरुतेऽभिमतिं हृदयं हि मुधा लघु वारय देशिक तां दयया।।2।।
इस श्लोक में शरीर की नश्वरता और उसके प्रति होने वाले मिथ्या अहंकार का वर्णन किया गया है। मनुष्य का यह शरीर पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है जो किसी भी क्षण नष्ट हो सकता है। जिस प्रकार जल की सतह पर एक बुलबुला उठता है और क्षण भर में विलीन हो जाता है वैसी ही स्थिति मानव देह की है। इसके अतिरिक्त यह शरीर अपवित्रता का पुंज है जिसमें मल मूत्र और वसा आदि अशुद्ध पदार्थ भरे हुए हैं। कवि कहते हैं कि मेरा हृदय ऐसे नश्वर और अशुद्ध शरीर के प्रति व्यर्थ ही गर्व और ममता करता है। यह देह-अभिमान ही अज्ञान का मूल कारण है। हे गुरुदेव आप मुझ पर दया करें और मेरे हृदय से इस तुच्छ देह-अभिमान को शीघ्र ही दूर करें। क्योंकि जब तक देह के प्रति आसक्ति बनी रहेगी तब तक आत्मज्ञान संभव नहीं है।
वैराग्य के संदर्भ में यह श्लोक अत्यंत प्रभावशाली है। शास्त्र कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग वैराग्य से होकर गुजरता है और वैराग्य की उत्पत्ति शरीर की असारता को समझने से होती है। यहाँ वपुषि शब्द का प्रयोग शरीर की भौतिक संरचना को दर्शाने के लिए किया गया है जिसे हम मोहवश सुंदर और स्थायी मान बैठते हैं। मुधा शब्द व्यर्थता का बोध कराता है क्योंकि जो वस्तु कल नहीं रहेगी उसके लिए आज गर्व करना मूर्खता है। देशिक शब्द गुरु के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसका अर्थ है मार्ग दिखाने वाला। साधक गुरु से प्रार्थना कर रहा है कि वह उसे इस मायावी चक्र से बाहर निकाले। यह विनती आध्यात्मिक मार्ग की पहली सीढ़ी है जहाँ साधक अपनी कमियों को स्वीकार कर गुरु की शरण में सुधार की कामना करता है।
Verse 3
धृतदण्डकमण्डलुजापसरं सततं हृदये शशिखण्डधरम्।
दधतं नमतां वृजिनौघहरं ददतं प्रतिभां प्रणमामि गुरुम्।।3।।
यहाँ गुरु के सन्यास स्वरूप और उनके आंतरिक शिवत्व का चित्रण किया गया है। गुरु ने अपने हाथों में दण्ड कमण्डलु और जप की माला धारण की हुई है जो एक पूर्ण सन्यासी के बाह्य लक्षण हैं। दण्ड अनुशासन का प्रतीक है कमण्डलु अपरिग्रह का और जपमाला निरंतर ईश्वर स्मरण की सूचक है। उनके हृदय में सदैव शशिखण्डधर अर्थात भगवान शिव का निवास रहता है। वे अपने चरणों में झुकने वाले भक्तों के पापों के समूह का विनाश कर देते हैं। वृजिन का अर्थ है पाप या क्लेश और गुरु उनका हरण करने वाले हैं। साथ ही वे शिष्यों को प्रतिभा अर्थात वह सूक्ष्म प्रज्ञा प्रदान करते हैं जिससे सत्य और असत्य का विवेक जाग्रत होता है। मैं ऐसे तेजस्वी गुरु को नमन करता हूँ जो भीतर से शिव और बाहर से लोक कल्याणकारी सन्यासी हैं।
पौराणिक दृष्टि से गुरु को साक्षात शिव का अवतार माना जाता है। शशिखण्डधर का अर्थ है जिनके मस्तक पर चंद्रमा की कला सुशोभित है जो भगवान शिव का नाम है। गुरु के हृदय में शिव होने का तात्पर्य यह है कि उनका अंतःकरण पूर्णतः शुद्ध और कल्याणकारी है। वे केवल पापों को ही नष्ट नहीं करते बल्कि साधक की बुद्धि को भी कुशाग्र बनाते हैं। प्रतिभा का दान यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि बिना गुरु की दी हुई उस सूक्ष्म दृष्टि के वेदों और उपनिषदों के गंभीर रहस्य समझ में नहीं आ सकते। गुरु ही वह शक्ति हैं जो शिष्य की सुप्त शक्तियों को जाग्रत कर उसे आत्मबोध के योग्य बनाते हैं। यह श्लोक गुरु की बाह्य वेषभूषा और आंतरिक सामर्थ्य दोनों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है।
Verse 4
करणानि समानि भवन्ति कदा तरणं नु कथं भववारिनिधेः।
शरणं मम नास्ति गुरो त्वदृते निरुपाधिकृपाजलधेऽव जवात्।।4।।
इस श्लोक में एक व्याकुल शिष्य की पुकार है जो संसार रूपी सागर से पार होने के लिए गुरु की शरण में आया है। शिष्य पूछता है कि मेरी इन्द्रियाँ कब शांत और संयमित होंगी। ये इन्द्रियाँ सदैव विषयों की ओर भागती रहती हैं और चित्त को विचलित करती हैं। इन चंचल इन्द्रियों के रहते हुए इस विशाल और भयानक संसार रूपी समुद्र को पार करना कैसे संभव होगा। संसार को यहाँ वारिनिधि अर्थात अथाह सागर कहा गया है जहाँ जन्म मृत्यु और दुखों की लहरें निरंतर उठती रहती हैं। शिष्य कहता है कि हे गुरुदेव आपके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई सहारा नहीं है। आप बिना किसी स्वार्थ या कारण के कृपा करने वाले दया के समुद्र हैं। कृपया मुझे इस संसार चक्र से शीघ्र ही बचाइए।
आध्यात्मिक दर्शन में इन्द्रियों को करण कहा जाता है। जब तक इन्द्रियाँ अंतर्मुखी नहीं होतीं तब तक समाधि या आत्मशांति प्राप्त नहीं हो सकती। भववारिनिधि शब्द का प्रयोग यह बताने के लिए किया गया है कि संसार से पार उतरना स्वयं के बल पर असंभव है। इसके लिए गुरु रूपी नाविक और उनकी कृपा रूपी पतवार की आवश्यकता होती है। निरुपाधिकृपा शब्द अत्यंत गहन है। इसका अर्थ है ऐसी करुणा जिसके बदले में गुरु कुछ नहीं चाहते। ईश्वर और गुरु की कृपा अकारण होती है वे भक्त की योग्यता नहीं बल्कि उसकी शरणगति और आर्त पुकार देखते हैं। जवात् शब्द शिष्य की उस आतुरता को प्रकट करता है जो मोक्ष के लिए छटपटा रहा है। यह प्रार्थना शरणागति के सर्वोच्च भाव को प्रदर्शित करती है।
Verse 5
चरितं न मयेषदपीह शुभं भरितं जठरं बहुधाऽघचयात्।
छुरितं हृदयं नितरां तमसा त्वरितं विमलं तनु तद्गुरुराट्।।5।।
इस श्लोक में भक्त अपनी दीनता और दोषों को गुरु के समक्ष स्वीकार कर रहा है। वह कहता है कि इस जीवन में मैंने थोड़ा सा भी शुभ कार्य नहीं किया है। मेरा पूरा अस्तित्व और यह उदर केवल पापों के संचय से भरा हुआ है। जठर का अर्थ यहाँ केवल पेट नहीं बल्कि पूरे व्यक्तित्व के उपभोगों से है जो अधर्म के मार्ग से अर्जित किए गए हैं। मेरा हृदय पूरी तरह से तमस अर्थात अज्ञान और मोह के अंधकार से लिप्त हो चुका है। अंधकार ने सत्य को ढक लिया है और मन मलिन हो गया है। हे गुरुराज आप शीघ्र ही अपनी कृपा से मेरे इस कलुषित हृदय को निर्मल और स्वच्छ कर दीजिए। आपके ज्ञान के बिना यह अंधकार दूर होना असंभव है।
दार्शनिक रूप से यहाँ तमोगुण के प्रभाव का वर्णन है जो मनुष्य को सत्य मार्ग से भटकाता है। अघचयात् शब्द पापों के संचय को दर्शाता है जो मनुष्य के प्रारब्ध और वर्तमान कर्मों से बनता है। जब हृदय अंधकार या तमस से घिर जाता है तो उसमें विवेक का प्रकाश नहीं रह पाता। गुरु को गुरुराट् कहना यह सिद्ध करता है कि वे सभी शक्तियों और ज्ञान के अधिपति हैं। निर्मलीकरण की यह प्रक्रिया आध्यात्मिक शुद्धि की मांग है। बिना हृदय की शुद्धि के ज्ञान की ज्योति नहीं जल सकती। शिष्य यहाँ स्वयं को असमर्थ पाकर गुरु की अमोघ शक्ति का आह्वान कर रहा है ताकि उसके जन्म-जन्मांतर के पाप भस्म हो सकें।
Verse 6
गलितेऽपघने पलितेऽपि शिरस्यलितं मम देशिक नैव हृदा।
तव पादपयोजयुगे नु कदा निरतं निरतं प्रलभेत मुदम्।।6।।
यह श्लोक वृद्धावस्था और उसके साथ बनी रहने वाली तृष्णा का मार्मिक चित्रण करता है। कवि कहते हैं कि समय के साथ मेरा शरीर शिथिल हो गया है अंग गलने लगे हैं और सिर के बाल पूरी तरह सफेद अर्थात पलित हो गए हैं। वृद्धावस्था के सभी लक्षण प्रकट हो चुके हैं किंतु आश्चर्य और दुख की बात यह है कि मेरे हृदय से विषयों की आसक्ति और वासना अभी भी कम नहीं हुई है। मन अभी भी उन सांसारिक सुखों के पीछे भाग रहा है जिन्हें यह जर्जर शरीर अब भोगने में असमर्थ है। हे गुरुदेव वह समय कब आएगा जब मेरा यह भटकता हुआ मन निरंतर आपके चरण कमलों में लगा रहेगा और वहीं परम आनंद को प्राप्त करेगा।
यहाँ शंकराचार्य के भज गोविंदम के भावों की झलक मिलती है जहाँ कहा गया है कि अंग गल जाते हैं लेकिन आशा और तृष्णा नहीं मरती। अपघने का अर्थ शरीर के अंगों से है और पलित बुढ़ापे का प्रतीक है। वासना की जड़ें बहुत गहरी होती हैं जो मृत्यु के निकट होने पर भी नहीं छूटतीं। पादपयोज शब्द गुरु के चरणों की दिव्यता को दर्शाता है जो भक्त के लिए अमृत के समान हैं। निरतं शब्द निरंतरता पर बल देता है क्योंकि खंडित साधना से मोक्ष नहीं मिलता। जब तक मन पूर्णतः गुरु के चरणों में स्थिर नहीं होता तब तक सच्चा सुख या मुदम् प्राप्त नहीं हो सकता। यह श्लोक साधक की उस छटपटाहट को दर्शाता है जो अपनी इंद्रियजन्य गुलामी से मुक्त होना चाहता है।
Verse 7
करुणार्द्रविलोचन मोचय मां भवबन्धनतो बहुधा व्यथितम्।
क्वथितं प्रतिघादिकृशानुवशात् करुणारससेचनतोऽव गुरो।।7।।
इस श्लोक में गुरु की दयालु दृष्टि का सुंदर वर्णन है। कवि गुरु को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे करुणा से आर्द्र नेत्रों वाले गुरुदेव मुझे इस संसार के बंधनों से मुक्त कीजिए। मैं संसार के तापों और कष्टों से बहुत अधिक व्यथित और पीड़ित हूँ। मैं क्रोध विरोध और द्वेष की अग्नि में निरंतर जल रहा हूँ। संसार के संघर्ष और मानसिक क्लेश आग की लपटों के समान मुझे दग्ध कर रहे हैं। जिस प्रकार तपती हुई धरती को वर्षा की बूंदें शांति प्रदान करती हैं उसी प्रकार आप अपने करुणारूपी रस के सेचन से मुझे इस संताप से बचाइए। आपकी एक कृपा दृष्टि ही मेरे हृदय की इस जलन को शांत कर सकती है।
पौराणिक रूप से संसार को दावाग्नि कहा गया है जो जीवों को जलाती रहती है। प्रतिघादिकृशानु शब्द का अर्थ है प्रतिघात या क्रोध रूपी अग्नि। मनुष्य जीवन भर राग और द्वेष के द्वंद्व में फंसा रहता है जो उसके मानसिक शांति को नष्ट कर देते हैं। करुणार्द्रविलोचन पद गुरु की वात्सल्यमयी प्रकृति को दर्शाता है। गुरु की दृष्टि में वह शक्ति है जो शिष्य के आंतरिक ताप को हर लेती है। करुणारस का सेचन आध्यात्मिक अभिषेक के समान है जो जीवात्मा को शीतलता और अभय प्रदान करता है। यहाँ शिष्य पूर्णतः असहाय होकर गुरु से अपनी रक्षा की प्रार्थना कर रहा है जैसे कोई जलता हुआ व्यक्ति शीतल जल की याचना करता है।
Verse 8
शिव एव भवानिति मे धिषणा ह्युदपद्यत देशिक चेन्न तथा।
सकलं जगदप्यवबुध्यति ते समता सकलेष्वपि तत्तु कथम्।।8।।
यहाँ गुरु और ईश्वर की एकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। शिष्य कहता है कि हे गुरुदेव मेरी बुद्धि में यह दृढ़ निश्चय उत्पन्न हो गया है कि आप साक्षात भगवान शिव ही हैं। यदि आप शिव नहीं होते तो यह कैसे संभव होता कि आप संपूर्ण जगत को अपना स्वरूप समझते हैं और सभी प्राणियों के प्रति समान भाव रखते हैं। एक साधारण मनुष्य में राग द्वेष और भेद बुद्धि होती है लेकिन आप सभी में एक ही चेतना को देखते हैं। आपकी यह सर्वत्र समता ही इस बात का प्रमाण है कि आप उस परम शिव तत्व में स्थित हैं जहाँ कोई दूसरा नहीं है। आप साक्षात ब्रह्म स्वरूप हैं जो गुरु के रूप में मेरे सम्मुख प्रकट हुए हैं।
अद्वैत वेदांत के अनुसार गुरु तत्व और ईश्वर तत्व में कोई भेद नहीं है। धिषणा का अर्थ है वह स्थिर प्रज्ञा जो संशय रहित हो। समता का गुण ही एक आत्मज्ञानी की सबसे बड़ी पहचान है। गीता में भी समत्वं योग उच्यते कहा गया है। गुरु की दृष्टि में राजा और रंक मित्र और शत्रु यहाँ तक कि जड़ और चेतन में भी एक ही परमात्मा का वास होता है। सकलं जगदप्यवबुध्यति पद यह दर्शाता है कि गुरु का ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं है बल्कि वे जगत की एकता का साक्षात अनुभव करते हैं। यह श्लोक शिष्य के अटूट विश्वास को प्रकट करता है जो अपने गुरु में साक्षात महादेव के दर्शन कर रहा है।
Verse 9
विषयेषु सदा रमते हृदयं विषतुल्यधियं दिश तत्र गुरो।
लषितत्वदपाङ्गझरी प्रसरत्वचिरान्मयि बन्धविनाशकरी।।9।।
इस श्लोक में विषयों के प्रति आसक्ति को दूर करने की प्रार्थना की गई है। शिष्य स्वीकार करता है कि उसका हृदय निरंतर सांसारिक विषयों और भोगों में ही रमा रहता है। वह जानता है कि ये विषय अंततः दुःखदायी हैं फिर भी मन उनकी ओर खिंचा चला जाता है। वह प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव आप ऐसी कृपा करें कि मेरी बुद्धि इन विषयों को विष के समान समझने लगे। जब तक विषयों में सुख की बुद्धि रहेगी तब तक उनसे वैराग्य संभव नहीं है। आपकी करुणाभरी कटाक्ष की अविरल धारा मुझ पर प्रवाहित हो जो मेरे सभी बंधनों को क्षण भर में नष्ट कर दे। आपकी दृष्टि ही मेरे मोह के जाले को काटने में सक्षम है।
आध्यात्मिक शब्दावली में विषय को विष कहा गया है क्योंकि वे आत्मा के स्वरूप को ढक देते हैं। विषतुल्यधियं का अर्थ है यह बोध होना कि क्षणिक सुख वास्तव में आत्मघाती है। अपाङ्गझरी का अर्थ है गुरु के नेत्रों के कोनों से बहने वाली कृपा की धारा। गुरु की दृष्टि को शास्त्र अत्यंत शक्तिशाली मानते हैं जो शिष्य के पापों और बंधनों को दग्ध कर देती है। लषित शब्द शिष्य की उत्कट इच्छा को दर्शाता है। यहाँ बन्धविनाशकरी कहकर गुरु की शक्ति को रेखांकित किया गया है जो अज्ञान के पाश को काटकर जीवात्मा को मुक्त करने की सामर्थ्य रखते हैं। यह श्लोक विवेक और वैराग्य की प्राप्ति के लिए गुरु कृपा को अनिवार्य बताता है।
Verse 10
सदसन्मतिरेव न मेऽस्ति गुरो विरतिं प्रति सा करणं गदिता।
विरतिः क्व नु मे विषयाशहृदः कथमाप्नुव एव विमुक्तिपथम्।।10।।
यहाँ विवेक और वैराग्य के बीच के संबंध को समझाया गया है। शिष्य कहता है कि हे गुरुदेव मुझमें सत् और असत् का अंतर करने वाली बुद्धि ही नहीं है। शास्त्रों का कहना है कि इसी सदसन्मति अर्थात विवेक से ही वैराग्य की उत्पत्ति होती है। जब तक यह पता न हो कि क्या नित्य है और क्या अनित्य तब तक संसार से विरक्ति कैसे हो सकती है। मेरा हृदय तो अभी भी विषयों की आशाओं से भरा हुआ है। ऐसी स्थिति में मुझ जैसे विषयासक्त व्यक्ति को वैराग्य कहाँ प्राप्त होगा। और यदि वैराग्य नहीं होगा तो मैं मुक्ति के मार्ग पर कैसे कदम रख पाऊंगा। मैं अत्यंत असमंजस और संकट में हूँ कृपया मार्ग दिखाइए।
दार्शनिक रूप से विवेक चूडामणि जैसे ग्रंथों में विवेक को वैराग्य का कारण माना गया है। सत् वह है जो त्रिकाल अबाधित है और असत् वह है जो परिवर्तनशील है। विरति का अर्थ है विषयों से विमुख होना। शिष्य की दुविधा यह है कि उसका मन संसार में फंसा है और उसके पास वह औजार (विवेक) भी नहीं है जिससे वह इस जाल को काट सके। विमुक्तिपथ पर चलने के लिए मन का शुद्ध और निर्लिप्त होना आवश्यक है। यह श्लोक साधक की उस आंतरिक ईमानदारी को दिखाता है जहाँ वह अपनी अयोग्यता को स्वीकार कर गुरु से ज्ञान की भिक्षा माँग रहा है।
Verse 11
ब्रुवते निगमा बहुवारमिदं जगदभ्रतलादिसदृक्षमिति।
मम तादृशधीः समुदेति कदा वद देशिक मेऽङ्घ्रिजुषे कृपया।।11।।
इस श्लोक में जगत की मिथ्यात्व का वर्णन है। वेद और शास्त्र बार-बार यह घोषणा करते हैं कि यह दृश्य जगत आकाश के समान निराधार या बादलों के समान क्षणिक और मायावी है। जैसे आकाश में गंधर्व नगर या बादलों के महल दिखते हैं पर वे वास्तव में होते नहीं हैं वैसे ही यह संसार भी केवल एक आभास है। शिष्य पूछता है कि हे गुरुदेव मेरे भीतर ऐसी अभेदमयी और जगत को मिथ्या समझने वाली बुद्धि कब जागृत होगी। मैं आपके चरणों की सेवा करने वाला आपका दास हूँ मुझ पर कृपा करके बताइए कि मैं इस सत्य का साक्षात्कार कब कर पाऊंगा। मुझे संसार सत्य प्रतीत होता है और यही मेरे दुखों का कारण है।
वेदांत का मुख्य सिद्धांत है ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या। निगमा शब्द वेदों के लिए प्रयुक्त हुआ है जो अकाट्य प्रमाण हैं। अभ्रतलादिसदृक्षं का अर्थ है बादलों के प्रतिबिंब या मृगतृष्णा के समान। जब तक व्यक्ति जगत को सत्य मानता है तब तक उसे भय और दुख सताते रहते हैं। अङ्घ्रिजुषे शब्द का अर्थ है चरणों की सेवा में लगा हुआ। शिष्य का मानना है कि सेवा से ही चित्त शुद्ध होता है और तभी गुरु के उपदेश हृदय में उतरते हैं। वह उस अवस्था की प्रतीक्षा कर रहा है जहाँ उसे पूरा ब्रह्मांड एक स्वप्न की भांति प्रतीत हो और केवल आत्मतत्व ही शेष रहे।
Verse 12
जननी जनकः सुतदारमुखाः स्वहिताय लषन्ति सदा मनुजम्।
गुरुरेव लषत्यखिलस्य हितं तदहं तव पादयुगं श्रितवान्।।12।।
यहाँ सांसारिक संबंधों और गुरु के संबंध के बीच का अंतर स्पष्ट किया गया है। कवि कहते हैं कि माता पिता पुत्र पत्नी और अन्य संबंधी मनुष्य से प्रेम तो करते हैं लेकिन उस प्रेम के पीछे कहीं न कहीं स्वार्थ या अपना हित छिपा होता है। संसार के सभी रिश्ते लेन-देन पर आधारित हैं और वे व्यक्ति को सांसारिक मोह में ही बांधते हैं। केवल गुरु ही ऐसे निस्वार्थ महापुरुष हैं जो बिना किसी स्वार्थ के शिष्य और संपूर्ण जगत के कल्याण की कामना करते हैं। गुरु का प्रेम अहेतुक है और वे केवल शिष्य की मुक्ति चाहते हैं। इसीलिए मैंने अन्य सभी आश्रयों को छोड़कर आपके चरणों की शरण ली है।
नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है। अखिलस्य हितं का अर्थ है सबका कल्याण। गुरु का हृदय करुणा से इतना व्यापक होता है कि वे किसी एक व्यक्ति नहीं बल्कि प्राणी मात्र के उत्थान की सोचते हैं। सांसारिक प्रेम बंधन का कारण बनता है जबकि गुरु का प्रेम मुक्ति का द्वार खोलता है। माता-पिता केवल इस जन्म के शरीर के रक्षक हैं लेकिन गुरु जन्म-जन्मांतर के दुखों से छुड़ाने वाले हैं। पादयुगं श्रितवान् का अर्थ है पूर्ण समर्पण। शिष्य ने यह पहचान लिया है कि परमार्थ के मार्ग पर केवल गुरु ही सच्चे मित्र और हितैषी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़ते।
Verse 13
मदमोहमुखान्तरशत्रुगृहं दमशान्तिविरक्तिसुहृद्रहितम्।
कथमेनमवेर्भवसागरतः किमसाध्यमिदं वद देशिक ते।।13।।
इस श्लोक में मन के भीतर छिपे शत्रुओं और सद्गुणों के अभाव का चित्रण है। मेरा यह मन मद अहंकार और मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं का घर बन गया है। काम क्रोध लोभ और मोह यहाँ डेरा डाले हुए हैं। दूसरी ओर मेरे पास दम इंद्रिय निग्रह शांति और विरक्ति जैसे मित्र नहीं हैं। सद्गुणों के अभाव में यह मन असुरक्षित है। ऐसी विकट स्थिति में आप मुझे इस संसार रूपी समुद्र से कैसे बचाएंगे। किंतु फिर मैं सोचता हूँ कि आपके लिए क्या असाध्य है। आप सर्वशक्तिमान हैं और आपकी कृपा से बड़े से बड़ा पापी और दुर्गुणी भी मुक्त हो सकता है। आप असंभव को भी संभव करने वाले हैं।
मनुष्य के भीतर के विकारों को षड्रिपु या आंतरिक शत्रु कहा जाता है। दम और शांति योग मार्ग के आवश्यक अंग हैं। सुहृद्रहितम् कहकर यह बताया गया है कि साधना के मार्ग पर सद्गुण ही सच्चे मित्र होते हैं जो विपत्ति में रक्षा करते हैं। शिष्य अपनी निर्बलता स्वीकार कर गुरु की असीम शक्ति पर विश्वास प्रकट कर रहा है। किमसाध्यमिदं ते यह वाक्य गुरु की सर्वव्यापकता और सामर्थ्य की वंदना है। गुरु की एक दृष्टि मात्र से वर्षों का अंधकार और हृदय के विकार नष्ट हो सकते हैं। यह श्लोक आत्मविश्वास और गुरु-भक्ति का अद्भुत मिश्रण है।
Verse 14
धनुषेऽघचयं पदनन्तृनृणां तनुषे भविकं सकृदीक्षणतः।
जनुषे सदसच्च यथा न भवेन् मम कर्म तथा कुरु देशिकराट्।।14।।
यहाँ गुरु के द्वारा कर्मों के विनाश की प्रार्थना की गई है। गुरु अपने चरणों में झुकने वाले मनुष्यों के पापों के समूह को नष्ट कर देते हैं। उनकी केवल एक कृपा दृष्टि ईक्षणतः ही भक्त का परम कल्याण कर देती है। वे मंगल और सौभाग्य का विस्तार करने वाले हैं। शिष्य प्रार्थना करता है कि हे गुरुराज मेरे कर्मों का लेखा-जोखा इस प्रकार समाप्त कर दीजिए कि मुझे पुनः जन्म न लेना पड़े। मेरे कर्मों को ज्ञान की अग्नि में इस तरह भस्म कर दें कि न सत्कर्म शेष रहें और न दुष्कर्म क्योंकि दोनों ही जन्म का कारण बनते हैं। मुझे इस आवागमन के चक्र से पूर्णतः मुक्त कर दीजिए।
कर्म सिद्धांत के अनुसार अच्छे कर्म स्वर्ग ले जाते हैं और बुरे कर्म नर्क लेकिन दोनों ही आत्मा को शरीर में बांधते हैं। सदसच्च कर्म का अर्थ है शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्म। मोक्ष की अवस्था वह है जहाँ संचित और आगामी कर्म शून्य हो जाते हैं। गुरु को देशिकराट् कहना उनकी प्रभुता को दर्शाता है। सकृदीक्षणतः पद यह स्पष्ट करता है कि पूर्ण गुरु के लिए एक क्षण की दृष्टि ही शिष्य के उद्धार के लिए पर्याप्त है। वह दृष्टि ही दीक्षा है जो अज्ञान को जला देती है। यह श्लोक आवागमन से मुक्ति और जीवन्मुक्ति की कामना का प्रतीक है।
Verse 15
समवाप्य सुदुर्लभविप्रजनुर्यतितामपि को नु जनो मदृते।
व्यवहारवशत्वमुपैति गुरो गतिरेव न मे तव पादमृते।।15।।
इस श्लोक में साधक अपनी वर्तमान स्थिति पर खेद प्रकट कर रहा है। वह कहता है कि अत्यंत दुर्लभ ब्राह्मण जन्म प्राप्त करने के बाद और फिर सन्यास यतिताम को अंगीकार करने के बाद भी मुझ जैसा अभागा कोई दूसरा नहीं होगा जो अभी भी सांसारिक व्यवहारों और मोह-माया के वशीभूत है। सन्यासी का धर्म केवल परमात्मा का चिंतन है लेकिन मेरा मन अभी भी लोक-व्यवहार की उलझनों में फंसा है। हे गुरुदेव मेरी इस विडंबना को आप ही समाप्त कर सकते हैं। आपके चरणों के अतिरिक्त मेरा कोई अन्य आश्रय या गति नहीं है। मैं सर्वथा आप पर ही आश्रित हूँ।
भारतीय दर्शन में मनुष्य जन्म दुर्लभ है और उसमें भी मुमुक्षा और महापुरुषों का संग मिलना और भी दुर्लभ है। विप्रजनु और यतिताम उच्चतम आध्यात्मिक सोपान माने गए हैं। इसके बावजूद माया का प्रभाव इतना प्रबल है कि व्यक्ति साधना के शिखर पर पहुँचकर भी गिर सकता है। व्यवहारवशत्वं का अर्थ है सांसारिक प्रपंचों में उलझना। शिष्य यहाँ आत्म-ग्लानि का अनुभव कर रहा है जो वास्तव में आध्यात्मिक प्रगति का एक लक्षण है। पादमृते का अर्थ है कि गुरु के चरण ही एकमात्र सत्य और अंतिम लक्ष्य हैं। यह श्लोक पूर्ण आत्म-समर्पण और अनन्य भक्ति का संदेश देता है।
Verse 16
उददीधर एव बहून्मनुजान् कृपया भवसागरमध्यगतान्।
किमयं तव भारती लोकगुरो न हि भूभृदहेरणुरस्ति भरः।।16।।
शिष्य गुरु के गौरव का गान करते हुए कहता है कि हे लोकगुरु आपने अपनी असीम करुणा से संसार रूपी समुद्र के बीच फंसे हुए अनगिनत मनुष्यों का उद्धार किया है। आपने हजारों डूबते हुए लोगों को पार लगाया है। क्या मेरे जैसे एक साधारण मनुष्य का भार आपके लिए बहुत अधिक है। यह संभव नहीं है। जैसे एक विशाल पर्वत को उठाने वाले के लिए धूल का एक छोटा सा कण कोई भार नहीं होता वैसे ही संपूर्ण जगत का कल्याण करने वाले आपके लिए मेरा उद्धार करना अत्यंत सरल कार्य है। आप समर्थ हैं और मुझ पर कृपा करना आपके लिए कोई कठिन कार्य नहीं है।
लोकगुरो शब्द गुरु की सार्वभौमिकता को दर्शाता है। वे केवल एक व्यक्ति के नहीं बल्कि संपूर्ण मानवता के शिक्षक हैं। भूभृदहे शब्द यहाँ संभवतः गोवर्धनधारी कृष्ण या हिमालय जैसे महान पर्वत के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है जो महान शक्ति का प्रतीक है। अणु का अर्थ है परमाणु या धूल का अत्यंत छोटा हिस्सा। शिष्य स्वयं को तुच्छ मानकर गुरु की महत्ता को प्रतिपादित कर रहा है। यह तर्क भक्ति मार्ग का एक सुंदर अंग है जहाँ भक्त भगवान या गुरु को उनके सामर्थ्य की याद दिलाकर कृपा की याचना करता है। यह श्लोक गुरु की शक्ति में अटूट विश्वास का प्रमाण है।
Verse 17
दमुना यमुनाजनकश्च विधुर्मिलिताः शतशोऽपि न शक्नुवते।
यदपाकरणे तदचित्तिमिरं त्वमपाकुरुषे वचसैव गुरो।।17।।
इस श्लोक में गुरु के ज्ञान की तुलना भौतिक प्रकाश स्रोतों से की गई है। दमुना अर्थात अग्नि यमुनाजनक अर्थात सूर्य और विधु अर्थात चंद्रमा यदि ये तीनों और इनके जैसे सैकड़ों प्रकाश पुंज एक साथ मिल जाएं तब भी वे उस अंधकार को दूर नहीं कर सकते जो अज्ञान अचित् के कारण हृदय में व्याप्त है। ये भौतिक प्रकाश केवल बाहरी वस्तुओं को दिखा सकते हैं लेकिन आत्मा पर पड़े अज्ञान के परदे को नहीं हटा सकते। किंतु हे गुरुदेव आप उस गहन अज्ञान रूपी अंधकार को केवल अपने वचनों के द्वारा ही क्षण भर में दूर कर देते हैं। आपका उपदेश ही वह दिव्य प्रकाश है जो भीतर के अंधेरे को समाप्त करता है।
दार्शनिक रूप से अज्ञान को तिमिर या अंधकार कहा गया है। सूर्य और चंद्रमा जड़ प्रकाश हैं जबकि अज्ञान एक आध्यात्मिक समस्या है जिसका समाधान केवल ज्ञान ही हो सकता है। वचसैव शब्द उपदेश के महत्व को बताता है जिसे श्रुति या शब्द प्रमाण कहा जाता है। गुरु का वाक्य महावाक्य बनकर शिष्य के अज्ञान को काट देता है। यहाँ गुरु को सूर्य और अग्नि से भी श्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि वे न केवल दिखाते हैं बल्कि भस्म भी करते हैं अज्ञान को। यह श्लोक ज्ञान की सर्वोच्चता और गुरु की वाणी के अमोघ प्रभाव की स्तुति करता है।
Verse 18
गुरुशङ्करनिर्मितभाष्यसुधा सरिदीशनिमज्जनतृप्तमिमम्।
प्रविधाय गुरो भववारिनिधेर्लघु तारय मां करुणार्द्रदृशा।।18।।
इस श्लोक में आदि गुरु शंकराचार्य और उनके भाष्यों की महिमा का गान है। शिष्य प्रार्थना करता है कि हे गुरुदेव मुझे भगवान शंकर के स्वरूप गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित भाष्य रूपी अमृत की नदी में गोता लगाने दें। उन भाष्यों का ज्ञान अमृत के समान है जो जन्म-मृत्यु के रोग को दूर करता है। मुझे उस ज्ञान सरिता में स्नान कराकर तृप्त कर दीजिए। जब मैं उस ज्ञान से पूर्ण हो जाऊं तो आप अपनी करुणा से भरी दृष्टि से मुझे इस संसार रूपी महासागर से सरलता से पार लगा दें। शंकराचार्य के सिद्धांतों का समझना ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करना है।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से शंकराचार्य के प्रस्थानत्रयी भाष्यों को वेदांत का आधार माना जाता है। भाष्यसुधा का अर्थ है वह व्याख्या जो अमृत प्रदान करे। सरिदीशनिमज्जन का अर्थ है गहरे डूबकर आत्मसात करना। शिष्य मानता है कि केवल शुष्क ज्ञान पर्याप्त नहीं है अपितु गुरु की करुणार्द्रदृशा अर्थात अनुग्रह की भी आवश्यकता है। गुरु ही उन कठिन भाष्यों के रहस्यों को सरल बनाकर शिष्य के हृदय में उतार सकते हैं। यह श्लोक गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा और शास्त्र ज्ञान के माध्यम से मुक्ति की इच्छा को प्रकट करता है।
Verse 19
पदनम्रजनौघपुमर्थकरी प्रबलाघसमुद्रनिमग्नतरी।
मयि देशिक ते श्रुतिमूर्धचरी प्रसरेन्नु कदा सुकटाक्षझरी।।19।।
यहाँ गुरु के कटाक्ष अर्थात कृपा दृष्टि की महिमा गाई गई है। गुरु के चरणों में झुकने वाले लोगों के लिए उनकी दृष्टि चारों पुरुषार्थों धर्म अर्थ काम और मोक्ष को प्रदान करने वाली है। यह दृष्टि उन लोगों के लिए एक मजबूत नौका के समान है जो पापों के प्रबल समुद्र में डूब रहे हैं। यह दृष्टि श्रुतिमूर्धचरी है अर्थात यह वेदों के शिखर उपनिषदों के ज्ञान में विचरण करने वाली है। शिष्य पूछता है कि हे गुरुदेव आपके करुणामयी कटाक्षों की वह अविरल धारा मुझ पर कब प्रवाहित होगी। आपकी एक शुभ दृष्टि ही मेरे जीवन के सभी अभावों और पापों का अंत कर सकती है।
पुमर्थकरी का अर्थ है पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली। आध्यात्मिक जीवन में मोक्ष अंतिम लक्ष्य है लेकिन गुरु की कृपा से सांसारिक बाधाएं भी दूर होती हैं। अघसमुद्रनिमग्नतरी एक सुंदर रूपक है जहाँ गुरु कृपा को डूबते हुए के लिए नाव बताया गया है। श्रुतिमूर्धचरी पद अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि गुरु का ज्ञान वेदों के अंतिम सत्य ब्रह्मविद्या पर आधारित है। कटाक्षझरी शब्द कृपा की निरंतरता और वेग को दर्शाता है। शिष्य उस क्षण की प्रतीक्षा में है जब गुरु का अनुग्रह उसके समस्त अस्तित्व को प्लावित कर देगा।
Verse 20
बहुजन्मशतार्जितपुण्यवशाद् भवदीयदया समवापि मया।
भवबन्धनतो न बिभेमि गुरो करणीयमपीह न मेऽस्त्यपरम्।।20।।
इस श्लोक में गुरु कृपा प्राप्त होने के बाद की निर्भयता और कृतज्ञता का वर्णन है। शिष्य कहता है कि सैकड़ों जन्मों तक किए गए सत्कर्मों और पुण्यों के फलस्वरूप ही मुझे आपकी यह दुर्लभ दया और शरण प्राप्त हुई है। गुरु का मिलना ही सबसे बड़ा पुण्य फल है। अब जबकि मैं आपकी शरण में हूँ तो मुझे इस संसार के बंधनों से कोई भय नहीं रह गया है। आपकी कृपा ने मुझे अभय प्रदान किया है। अब मेरे लिए इस संसार में कुछ भी अन्य करना शेष नहीं रह गया है। आपकी भक्ति और ज्ञान प्राप्त करना ही अंतिम लक्ष्य था जिसे मैंने पा लिया है। मैं अब पूर्णतः कृतार्थ हूँ।
आध्यात्मिक विकास में गुरु की प्राप्ति को साधना की पूर्णता माना जाता है। बहुजन्मशतार्जितपुण्य यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक उन्नति एक लंबी प्रक्रिया है। जब शिष्य को गुरु मिल जाते हैं तो उसके सभी संशय मिट जाते हैं जिसे न बिभेमि कहा गया है। करणीयमपि न मेऽस्ति यह जीवन्मुक्त की अवस्था का सूचक है जहाँ व्यक्ति को अब कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। वह गुरुमय होकर आनंद में स्थित हो जाता है। यह श्लोक गुरु की महिमा और उनके प्रति पूर्ण संतोष और समर्पण के भाव को व्यक्त करता है।
Verse 21
स्वरेवऽघगिरेर्भजतां दिविषत् तरवे प्रतिभाजितगोगुरवे।
पुरवैरिपदाब्जनिविष्टहृदे करवै प्रणतिं जगतीगुरवे।।21।।
अंतिम श्लोक में गुरु को विभिन्न उपमाओं के साथ नमन किया गया है। गुरु उन लोगों के लिए वज्र के समान हैं जो पाप रूपी पहाड़ों को नष्ट करना चाहते हैं। भजने वालों के लिए वे कल्पवृक्ष दिविषत् तरवे के समान हैं जो स्वर्गिक सुख और मोक्ष देते हैं। उनकी प्रतिभा और ज्ञान ने साक्षात बृहस्पति गोगुरवे को भी जीत लिया है अर्थात वे ज्ञान में देवगुरु से भी श्रेष्ठ हैं। उनका हृदय सदैव भगवान शिव पुरवैरि के चरण कमलों में स्थिर रहता है। मैं ऐसे जगत के गुरु जगतीगुरवे को सादर प्रणाम करता हूँ। वे संपूर्ण ब्रह्मांड के मार्गदर्शक और सत्य के साक्षात स्वरूप हैं।
पौराणिक संदर्भ में पुरवैरि भगवान शिव का नाम है जिन्होंने त्रिपुरासुर का वध किया था। गुरु का हृदय शिव में होने का अर्थ है उनका पूर्णतः आत्मस्थ होना। अघगिरेः पद यह बताता है कि पाप पहाड़ जैसे विशाल हो सकते हैं लेकिन गुरु का ज्ञान वज्र की भांति उन्हें छिन्न-भिन्न कर देता है। प्रतिभाजितगोगुरवे यह दर्शाता है कि गुरु का अनुभवजन्य ज्ञान केवल शास्त्रार्थ तक सीमित नहीं है बल्कि वह दिव्य है। जगतीगुरवे कहकर यह स्थापित किया गया है कि सच्चा गुरु किसी जाति या देश का नहीं बल्कि पूरी सृष्टि का होता है। यह श्लोक एक महान स्तुति का मंगलमय समापन है जो गुरु को सर्वोपरि मानता है।