प्रणव अष्टक स्तोत्र

अचतुराननमुस्वभुवं हरि-
महरमेव सुनादमहेश्वरम्|
परममुज्ज्वलबिन्दुसदाशिवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
अरचनाख्यकलामुसुपाकला-
मकृतिनाशकलां लयनादगाम्|
परमबिन्दुरनुग्रहगां कलां
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
अगणनाथमुकारजनार्दन-
मरविमेव सुनादकलाम्बिकाम्|
परमबिन्दुशिवं परमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
अपृथिवीमुजलामकृशानुकं
परमनादमयं परबिन्दुखम्|
भुवनबीजमहापरमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
अनिनदं क्षितिचक्रसमुद्भवं
हृदयचक्रजमुद्ध्वनिमुज्ज्वलम्|
मखजमेकसहस्रदले गतं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
पुनरमातृमयं तदुमानगं
शुभममेयमयं त्रिगुणात्मकम्|
परमनादपरां परबैन्दवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
त्रिपुरधाममयं परमात्मकं
परमहंसमयं लयमोक्षदम्|
सुनियमागमतत्त्वयुतं प्रभं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्|
ओङ्कारं परमात्मकं त्रिगुणकं चाम्बाम्बिकाम्बालिका-
रूपं नादमनादिशक्ति- विभवाविद्यासुविद्यायुतम्|
बिन्दुं ब्रह्ममयं तदन्तरगतां श्रीसुन्दरीं चिन्मयीं
साक्षाच्छ्रीप्रणवं सदैव शुभदं नित्यं परं नौम्यहम्|

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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