
Lyrics:
अचतुराननमुस्वभुवं हरि-
महरमेव सुनादमहेश्वरम्।
परममुज्ज्वलबिन्दुसदाशिवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।1।।
अरचनाख्यकलामुसुपाकला-
मकृतिनाशकलां लयनादगाम्।
परमबिन्दुरनुग्रहगां कलां
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।2।।
अगणनाथमुकारजनार्दन-
मरविमेव सुनादकलाम्बिकाम्।
परमबिन्दुशिवं परमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।3।।
अपृथिवीमुजलामकृशानुकं
परमनादमयं परबिन्दुखम्।
भुवनबीजमहापरमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।4।।
अनिनदं क्षितिचक्रसमुद्भवं
हृदयचक्रजमुद्ध्वनिमुज्ज्वलम्।
मखजमेकसहस्रदले गतं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।5।।
पुनरमातृमयं तदुमानगं
शुभममेयमयं त्रिगुणात्मकम्।
परमनादपरां परबैन्दवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।6।।
त्रिपुरधाममयं परमात्मकं
परमहंसमयं लयमोक्षदम्।
सुनियमागमतत्त्वयुतं प्रभं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।7।।
ओङ्कारं परमात्मकं त्रिगुणकं चाम्बाम्बिकाम्बालिका-
रूपं नादमनादिशक्ति- विभवाविद्यासुविद्यायुतम्।
बिन्दुं ब्रह्ममयं तदन्तरगतां श्रीसुन्दरीं चिन्मयीं
साक्षाच्छ्रीप्रणवं सदैव शुभदं नित्यं परं नौम्यहम्।।8।।
Meaning:
Verse 1
अचतुराननमुस्वभुवं हरि-
महरमेव सुनादमहेश्वरम्।
परममुज्ज्वलबिन्दुसदाशिवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
इस श्लोक में कवि प्रणव अर्थात् ॐ के स्वरूप को प्रणाम करता है। 'अचतुराननम्' ब्रह्मा का सूचक है, जो सृष्टि के रचयिता हैं। 'हरिम्' भगवान विष्णु का द्योतक है, जो जगत का पालन करते हैं। 'हरम्' भगवान शिव का बोध कराता है, जो संहार के अधिपति हैं। इस प्रकार एक ही प्रणव में सृष्टि, स्थिति और संहार की सम्पूर्ण शक्ति समाहित है।
'सुनादमहेश्वरम्' का अर्थ है वह दिव्य आदिनाद जो महेश्वर के रूप में प्रकाशित होता है। उपनिषदों और तांत्रिक ग्रंथों में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ध्वनि की अभिव्यक्ति माना गया है। वह मूल ध्वनि ॐ है। सभी मंत्र, सभी वेद और सभी देवशक्तियाँ उसी से प्रकट होती हैं।
'परममुज्ज्वलबिन्दु' तंत्र का अत्यंत सूक्ष्म सिद्धांत है। बिन्दु सृष्टि का बीज है। यह वह सूक्ष्मतम चेतना केंद्र है जहाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अव्यक्त रूप में स्थित रहता है। 'सदाशिव' वह अवस्था है जहाँ शिव और शक्ति पूर्ण एकत्व में स्थित रहते हैं।
यह श्लोक सिखाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव अलग-अलग शक्तियाँ नहीं हैं। वे एक ही परम प्रणव के विविध कार्यात्मक रूप हैं। साधक जब ॐ का ध्यान करता है तो वह सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कारण का ध्यान करता है। धीरे-धीरे उसका मन नाम और रूप के भेदों से ऊपर उठता है और वह उस एक सत्य की ओर अग्रसर होता है जहाँ समस्त देवता एक ही परम चेतना में विलीन हो जाते हैं।
Verse 2
अरचनाख्यकलामुसुपाकला-
मकृतिनाशकलां लयनादगाम्।
परमबिन्दुरनुग्रहगां कलां
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
इस श्लोक में प्रणव की विविध कलाओं का वर्णन है। तांत्रिक दर्शन में 'कला' शक्ति के विशेष कार्य या आयाम को कहा जाता है। यहाँ उन शक्तियों की चर्चा है जो सृष्टि, पालन, संहार, लय और अनुग्रह का संचालन करती हैं।
'अकृतिनाशकला' वह शक्ति है जो अविद्या, दोष और सीमितता का नाश करती है। संसार में जो कुछ अस्थायी है, वह इसी शक्ति के प्रभाव से समाप्त होता है। यह केवल विनाश नहीं है बल्कि अपूर्णता से पूर्णता की ओर यात्रा है।
'लयनादगाम्' का अर्थ है वह शक्ति जो सभी वस्तुओं को उनके मूल स्रोत में लौटा देती है। जैसे नदियाँ समुद्र में जाकर अपना पृथक अस्तित्व छोड़ देती हैं, वैसे ही समस्त नाम-रूप अंततः परम तत्त्व में विलीन हो जाते हैं।
'परमबिन्दु' उस सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है जो सृष्टि का मूल कारण है। 'अनुग्रहगां कला' दिव्य कृपा की शक्ति का संकेत है। शैव दर्शन में अनुग्रह को सर्वोच्च दिव्य क्रिया माना गया है क्योंकि उसी के द्वारा जीव आत्मज्ञान प्राप्त करता है।
यह श्लोक बताता है कि संसार केवल भौतिक नियमों से संचालित नहीं होता। इसके पीछे चेतन शक्तियों का दिव्य संचालन है। सृष्टि, पालन, संहार, लय और मोक्ष सब प्रणव की विभिन्न कलाओं के माध्यम से घटित होते हैं। साधक जब ॐ का ध्यान करता है तो वह इन समस्त शक्तियों के स्रोत से जुड़ता है और धीरे-धीरे उसी अनुग्रह का पात्र बनता है जो मुक्ति का द्वार खोलता है।
Verse 3
अगणनाथमुकारजनार्दन-
मरविमेव सुनादकलाम्बिकाम्।
परमबिन्दुशिवं परमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
यहाँ प्रणव के भीतर स्थित देवशक्तियों का वर्णन है। 'अगणनाथ' गणपति का सूचक है। गणेश विघ्नों को दूर करने वाले और आरंभ के अधिष्ठाता हैं। इसलिए सभी मंत्रों की जड़ में उनकी शक्ति मानी गई है।
'उकारजनार्दनम्' ॐ के 'उ' अक्षर में स्थित विष्णुतत्त्व का संकेत है। विष्णु संरक्षण, संतुलन और व्यवस्था के प्रतीक हैं। सम्पूर्ण जगत के पालन की शक्ति उन्हीं से प्रवाहित होती है।
'सुनादकलाम्बिका' देवी अम्बिका का बोध कराती है। शक्ति के बिना न सृष्टि संभव है और न ही उसका संचालन। अम्बिका सम्पूर्ण ऊर्जा, सृजनशीलता और चेतना की अधिष्ठात्री हैं।
'परमबिन्दुशिवम्' और 'परमेश्वरम्' उस अवस्था की ओर संकेत करते हैं जहाँ सभी देवशक्तियाँ एक ही चेतना में एकीकृत हो जाती हैं। वहाँ गणेश, विष्णु, शक्ति और शिव पृथक नहीं रहते।
दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक अद्वैत का संदेश देता है। अनेक देवताओं के पीछे एक ही परम सत्ता कार्य कर रही है। साधक जब बाहरी रूपों से आगे बढ़ता है तब उसे सभी रूपों के भीतर वही एक सत्य दिखाई देता है। प्रणव इसी एकत्व का प्रत्यक्ष प्रतीक है।
Verse 4
अपृथिवीमुजलामकृशानुकं
परमनादमयं परबिन्दुखम्।
भुवनबीजमहापरमेश्वरं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
यह श्लोक प्रणव को पंचमहाभूतों से परे बताता है। पृथ्वी, जल और अग्नि का उल्लेख करके कवि संकेत देता है कि प्रणव किसी स्थूल तत्व तक सीमित नहीं है। वह उन सभी का कारण है।
सम्पूर्ण सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित मानी जाती है। किन्तु वे स्वयं अंतिम सत्य नहीं हैं। उनका भी एक मूल कारण है। प्रणव उसी मूल कारण का प्रतीक है।
'परमनादमयम्' का अर्थ है कि वह पूर्णतः दिव्य नाद स्वरूप है। योगियों ने ध्यान में जिस सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव किया, उसे परमनाद कहा। वही नाद सम्पूर्ण सृष्टि का मूल स्पंदन है।
'परबिन्दुखम्' उस परम आनन्द का संकेत है जो आत्मस्वरूप में स्थित है। यह इन्द्रियजन्य सुख नहीं बल्कि चैतन्य की पूर्णता का अनुभव है।
'भुवनबीज' का अर्थ है सम्पूर्ण जगत का बीज। जिस प्रकार एक छोटे से बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, उसी प्रकार प्रणव में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सूक्ष्म रूप में निहित है।
यह श्लोक साधक को स्थूल जगत से परे देखने की प्रेरणा देता है। जब वह बाहरी वस्तुओं के पीछे स्थित चेतना को पहचानता है, तब उसे ज्ञात होता है कि समस्त अस्तित्व एक ही दिव्य स्रोत से उत्पन्न हुआ है।
Verse 5
अनिनदं क्षितिचक्रसमुद्भवं
हृदयचक्रजमुद्ध्वनिमुज्ज्वलम्।
मखजमेकसहस्रदले गतं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
इस श्लोक में प्रणव की योगिक यात्रा का वर्णन है। 'अनिनदम्' अथवा अनाहत नाद वह ध्वनि है जो किसी बाहरी आघात से उत्पन्न नहीं होती। वह चेतना के भीतर स्वयं प्रकट होती है।
'क्षितिचक्रसमुद्भवम्' मूलाधार चक्र का संकेत है। साधक की आध्यात्मिक यात्रा यहीं से प्रारंभ होती है। जब कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है तब सूक्ष्म नाद का अनुभव होने लगता है।
'हृदयचक्रजमुद्ध्वनिमुज्ज्वलम्' बताता है कि यह नाद हृदय चक्र में और अधिक स्पष्ट तथा प्रकाशमान हो जाता है। हृदय प्रेम, करुणा और दिव्य अनुभूति का केंद्र है।
'मखजम्' आंतरिक यज्ञ का प्रतीक है। साधक अपने अहंकार, इच्छाओं और सीमाओं को ज्ञानाग्नि में अर्पित करता है। 'एकसहस्रदले गतम्' सहस्रार चक्र की प्राप्ति का संकेत है जहाँ चेतना परम प्रकाश का अनुभव करती है।
यह श्लोक दर्शाता है कि प्रणव केवल उच्चारण की ध्वनि नहीं बल्कि साधना की जीवंत अनुभूति है। मूलाधार से सहस्रार तक की सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा उसी दिव्य नाद के मार्गदर्शन में पूर्ण होती है।
Verse 6
पुनरमातृमयं तदुमानगं
शुभममेयमयं त्रिगुणात्मकम्।
परमनादपरां परबैन्दवं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
यहाँ प्रणव के शक्ति स्वरूप का वर्णन है। 'मातृमयम्' समस्त वर्णमाला और मंत्रशक्तियों का संकेत करता है। सभी अक्षर मातृका शक्तियों के रूप माने जाते हैं और उनका मूल स्रोत प्रणव है।
'उमानगम्' उमा अर्थात् पार्वती की ओर संकेत करता है। शिव और शक्ति का अभिन्न संबंध यहाँ व्यक्त किया गया है। दोनों एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।
'शुभममेयमयम्' बताता है कि परम सत्य अनन्त है। उसे पूर्णतः मापा या सीमित नहीं किया जा सकता। वह केवल अनुभव किया जा सकता है।
'त्रिगुणात्मकम्' सत्त्व, रजस् और तमस् का संकेत है। सम्पूर्ण प्रकृति इन्हीं तीन गुणों के माध्यम से कार्य करती है। किन्तु प्रणव इन गुणों से परे भी है।
'परमनाद' और 'परबिन्दु' सृष्टि के सूक्ष्मतम कारण हैं। नाद स्पंदन है और बिन्दु चेतना का केंद्र। दोनों मिलकर सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का आधार बनते हैं।
यह श्लोक बताता है कि प्रणव समस्त शक्तियों, समस्त मंत्रों और समस्त देवियों का मूल स्रोत है। साधक उसके ध्यान द्वारा शक्ति और शिव के उस दिव्य मिलन का अनुभव करता है जिससे सम्पूर्ण अस्तित्व प्रकट हुआ है।
Verse 7
त्रिपुरधाममयं परमात्मकं
परमहंसमयं लयमोक्षदम्।
सुनियमागमतत्त्वयुतं प्रभं
प्रणवकारमहं प्रणमामि तम्।।
यह श्लोक प्रणव को मोक्ष का द्वार बताता है। 'त्रिपुरधाममयम्' तीन अवस्थाओं — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — तथा तीन लोकों में व्याप्त सत्ता का संकेत है।
'परमात्मकम्' बताता है कि प्रणव समस्त जीवों के भीतर स्थित परमात्मा का प्रतीक है। वह किसी एक व्यक्ति या एक रूप तक सीमित नहीं है।
'परमहंसमयम्' उस उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था का द्योतक है जहाँ साधक सत्य और असत्य के बीच पूर्ण विवेक प्राप्त कर लेता है। परमहंस वह है जो ब्रह्मज्ञान में स्थित हो गया हो।
'लयमोक्षदम्' का अर्थ है कि प्रणव अहंकार का लय कर मोक्ष प्रदान करता है। जब सीमित व्यक्तित्व समाप्त होता है तब वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
'आगमतत्त्वयुतम्' बताता है कि योग, तंत्र, वेद और आगम सभी अंततः उसी प्रणव की ओर ले जाते हैं।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि प्रणव केवल उपासना का विषय नहीं बल्कि आत्मसाक्षात्कार का साधन है। जो उसके वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, वह जन्म-मरण के भय से मुक्त हो जाता है।
Verse 8
ओङ्कारं परमात्मकं त्रिगुणकं चाम्बाम्बिकाम्बालिका-
रूपं नादमनादिशक्ति-विभवाविद्यासुविद्यायुतम्।
बिन्दुं ब्रह्ममयं तदन्तरगतां श्रीसुन्दरीं चिन्मयीं
साक्षाच्छ्रीप्रणवं सदैव शुभदं नित्यं परं नौम्यहम्।।
यह समापन श्लोक सम्पूर्ण स्तोत्र का सार है। कवि उस ॐ को प्रणाम करता है जो परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप है। वही त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में कार्य करता है और वही उनसे परे भी स्थित है।
'अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका' देवी शक्ति के विविध स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। सम्पूर्ण शक्ति तत्त्व प्रणव में निहित है। वह नाद का स्रोत है और अनादि शक्ति का आधार भी।
'अविद्यासुविद्यायुतम्' अत्यंत गहन पद है। अज्ञान और ज्ञान दोनों उसी परम सत्ता की अभिव्यक्तियाँ हैं। जब जीव अपनी वास्तविक प्रकृति को भूलता है तो अविद्या अनुभव करता है। जब वही सत्य प्रकट होता है तो विद्या प्राप्त होती है।
'बिन्दुं ब्रह्ममयम्' उस परम चेतन बीज का वर्णन करता है जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रकट होता है। 'श्रीसुन्दरीं चिन्मयीम्' त्रिपुरसुन्दरी की ओर संकेत है जो शुद्ध चेतना की अधिष्ठात्री शक्ति हैं।
यह श्लोक बताता है कि वेदान्त का ब्रह्म, तंत्र की शक्ति, योग का नाद और भक्ति का परम देवता — सब उसी प्रणव में एकीकृत हैं। ॐ कोई साधारण अक्षर नहीं है। वह सम्पूर्ण अस्तित्व का सार है। उसी से सृष्टि उत्पन्न होती है, उसी में स्थित रहती है और अंततः उसी में विलीन हो जाती है। इसलिए कवि उसे नित्य, परम, शुभदायक और प्रत्यक्ष ब्रह्मस्वरूप मानकर निरंतर प्रणाम करता है।