ब्रह्मविद्या पंचक स्तोत्र

ब्रह्मविद्या पंचक स्तोत्र

Lyrics:

नित्यानित्यविवेकतो हि नितरां निर्वेदमापद्य सद्-
विद्वानत्र शमादिषट्कलसितः स्यान्मुक्तिकामो भुवि।
पश्चाद्ब्रह्मविदुत्तमं प्रणतिसेवाद्यैः प्रसन्नं गुरुं
पृच्छेत् कोऽहमिदं कुतो जगदिति स्वामिन्वद त्वं प्रभो।।1।।

त्वं हि ब्रह्म न चेन्द्रियाणि न मनो बुद्धिर्न चित्तं वपुः
प्राणाहङ्कृतयोऽन्यदप्यसदविद्याकल्पितं स्वात्मनि।
सर्वं दृश्यतया जडं जगदिदं त्वत्तः परं नान्यतो
जातं न स्वत एव भाति मृगतृष्णाभं दरीदृश्यताम्।।2।।

व्यप्तं येन चराचरं घटशरावादीव मृत्सत्तया
यस्यान्तःस्फुरितं यदात्मकमिदं जातं यतो वर्तते।
यस्मिन् यत् प्रलयेऽपि सद्घनमजं सर्वं यदन्वेति तत्
सत्यं विध्यमृताय निर्मलधियो यस्मै नमस्कुर्वते।।3।।

सृष्ट्वेदं प्रकृतेरनुप्रविशती येयं यया धार्यते
प्राणीति प्रविविक्तभुग्बहिरहं प्राज्ञः सुषुप्तौ यतः।
यस्यामात्मकला स्फुरत्यहमिति प्रत्यन्तरङ्गं जनै-
र्यस्यै स्वस्ति समर्थ्यते प्रतिपदा पूर्णा श‍ृणु त्वं हि सा।।4।।

प्रज्ञानं त्वहमस्मि तत्त्वमसि तद् ब्रह्मायमात्मेति सं-
गायन् विप्रचर प्रशान्तमनसा त्वं ब्रह्मबोधोदयात्।
प्रारब्धं क्वनु सञ्चितं तव किमागामि क्व कर्माप्यसत्
त्वय्यध्यस्तमतोऽखिलं त्वमसि सच्चिन्मात्रमेकं विभुः।।5।।

 Meaning:

Verse 1
नित्यानित्यविवेकतो हि नितरां निर्वेदमापद्य सद्-
विद्वानत्र शमादिषट्कलसितः स्यान्मुक्तिकामो भुवि।
पश्चाद्ब्रह्मविदुत्तमं प्रणतिसेवाद्यैः प्रसन्नं गुरुं
पृच्छेत् कोऽहमिदं कुतो जगदिति स्वामिन्वद त्वं प्रभो।।1।।

इस श्लोक में आध्यात्मिक मार्ग के अधिकारी साधक की योग्यताओं और साधना के चतुष्टय सोपानों का विशद वर्णन किया गया है। प्रथम चरण में साधक को नित्य और अनित्य के बीच विवेक करना चाहिए, जिसका अर्थ है यह समझना कि केवल ब्रह्म ही शाश्वत सत्य है और यह दृश्य जगत परिवर्तनशील तथा क्षणभंगुर है। इस विवेक के परिपक्व होने पर संसार के नश्वर विषयों के प्रति स्वाभाविक वैराग्य या निर्वेद उत्पन्न होता है। इसके उपरांत साधक को शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान नामक छह संपत्तियों से सुशोभित होना चाहिए, जो मन और इंद्रियों के पूर्ण निग्रह के लिए आवश्यक हैं।
जब साधक इन आंतरिक गुणों से संपन्न होकर मुमुक्षु बन जाता है, अर्थात मोक्ष की तीव्र इच्छा करने लगता है, तब वह एक योग्य गुरु की शरण में जाता है। गुरु को यहाँ ब्रह्मविदुत्तम कहा गया है, जिसका अर्थ है जो ब्रह्मविद्या के श्रेष्ठ ज्ञाता और स्वयं ब्रह्मनिष्ठ हों। साधक अत्यंत विनम्रता के साथ सेवा और दंडवत प्रणाम के माध्यम से गुरु को प्रसन्न करता है। वह अपने जीवन के मूल प्रश्नों को गुरु के सम्मुख रखता है कि मैं कौन हूँ, यह दृश्य जगत कहाँ से आया है, इसका कारण क्या है और मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है। गुरु को स्वामी और प्रभु कहकर संबोधित करना उनके प्रति साधक के पूर्ण शरणागति भाव को दर्शाता है।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक अद्वैत वेदान्त की परंपरा को रेखांकित करता है जहाँ ज्ञान प्राप्ति के लिए पात्रता अनिवार्य मानी गई है। बिना विवेक और वैराग्य के आध्यात्मिक सत्य को ग्रहण करना कठिन होता है। यहाँ जिज्ञासा को ही ज्ञान की प्रथम सीढ़ी माना गया है। साधक का प्रश्न केवल बौद्धिक कौतूहल नहीं है, बल्कि यह स्वयं के अस्तित्व की खोज की एक गहरी तड़प है। गुरु की प्रसन्नता का अर्थ यहाँ शिष्य की पात्रता और जिज्ञासा की गंभीरता से है, क्योंकि एक सच्चा गुरु तभी उपदेश देता है जब शिष्य पूर्णतः तैयार हो।

Verse 2
त्वं हि ब्रह्म न चेन्द्रियाणि न मनो बुद्धिर्न चित्तं वपुः
प्राणाहङ्कृतयोऽन्यदप्यसदविद्याकल्पितं स्वात्मनि।
सर्वं दृश्यतया जडं जगदिदं त्वत्तः परं नान्यतो
जातं न स्वत एव भाति मृगतृष्णाभं दरीदृश्यताम्।।2।।

गुरु शिष्य के संशयों का निवारण करते हुए उपदेश देते हैं कि तुम साक्षात ब्रह्म हो। तुम यह स्थूल शरीर नहीं हो और न ही तुम ज्ञानेंद्रियाँ या कर्मेंद्रियाँ हो। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से भी परे है। प्राण और पंचकोश भी तुम नहीं हो क्योंकि ये सभी जड़ हैं और तुम्हारी चेतना से ही प्रकाशित होते हैं। अविद्या या अज्ञान के कारण ही तुमने स्वयं को इन भौतिक और सूक्ष्म उपाधियों के साथ जोड़ लिया है। ये सभी उपाधियाँ मिथ्या हैं क्योंकि ये आत्मा पर कल्पित मात्र हैं और इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।
जगत के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए गुरु कहते हैं कि यह संपूर्ण संसार जिसे तुम अनुभव कर रहे हो, वह केवल दृश्य होने के कारण जड़ है। जो कुछ भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है, वह दृष्टा से पृथक और नश्वर होता है। यह जगत तुमसे अलग कहीं बाहर से उत्पन्न नहीं हुआ है, बल्कि यह तुम्हारी अपनी सत्ता पर वैसे ही आभासित हो रहा है जैसे मरुस्थल की तप्त रेत में मृगतृष्णा या मरीचिका दिखाई देती है। जिस प्रकार मरीचिका में जल का आभास तो होता है पर वहां जल की एक बूंद भी नहीं होती, उसी प्रकार यह प्रपंच केवल एक प्रतीति मात्र है जो अज्ञान के कारण सत्य प्रतीत होता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यहाँ नेति-नेति की प्रक्रिया का सुंदर उपयोग किया गया है, जहाँ आत्मा से भिन्न प्रत्येक वस्तु का निषेध किया जाता है। इंद्रियों और अंतःकरण का निषेध करके साधक को शुद्ध चैतन्य की ओर मोड़ा गया है। जगत को ब्रह्म से पृथक न मानना ही अद्वैत की पराकाष्ठा है। यहाँ यह समझाया गया है कि आत्मा स्वयं प्रकाशित है जबकि जगत पर-प्रकाशित है। जब तक जीव स्वयं को शरीर मानता है तब तक वह बंधनों में जकड़ा रहता है, परंतु आत्मज्ञान होते ही वह अपनी अनंत महिमा को प्राप्त कर लेता है।

Verse 3
व्यप्तं येन चराचरं घटशरावादीव मृत्सत्तया
यस्यान्तःस्फुरितं यदात्मकमिदं जातं यतो वर्तते।
यस्मिन् यत् प्रलयेऽपि सद्घनमजं सर्वं यदन्वेति तत्
सत्यं विध्यमृताय निर्मलधियो यस्मै नमस्कुर्वते।।3।।

इस श्लोक में ब्रह्म की सर्वव्यापकता और जगत के साथ उसके कारण-कार्य संबंध को अत्यंत तार्किक ढंग से समझाया गया है। जिस प्रकार मिट्टी के बर्तनों जैसे घड़े, सकोरे या ढक्कन में मिट्टी ही मूल सत्ता के रूप में व्याप्त रहती है और बिना मिट्टी के उन बर्तनों का कोई अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार इस संपूर्ण चराचर जगत में वह परमात्मा ही व्याप्त है। ब्रह्म ही इस सृष्टि का उपादान कारण है, जिससे सब कुछ बना है। यह जगत उसी में स्फुरित होता है, उसी की सत्ता से टिका हुआ है और अंत में उसी में विलीन हो जाता है।
ब्रह्म को यहाँ सद्घनम और अजं कहा गया है। सद्घनम का अर्थ है कि वह केवल सत्य ही सत्य है, जिसमें किसी अन्य वस्तु का सम्मिश्रण नहीं है। अजं का अर्थ है वह अजन्मा है, जिसका कभी जन्म नहीं होता और जो सदैव एकरस रहता है। प्रलय काल में जब नाम और रूप का विनाश हो जाता है, तब भी वह मूल तत्व यथावत विद्यमान रहता है। वह न केवल सृष्टि का आधार है बल्कि प्रत्येक जीव और वस्तु के भीतर अनुस्यूत है। जो पुरुष निर्मल बुद्धि वाले हैं और जिन्होंने अपने राग-द्वेष को त्याग दिया है, वे ही इस सत्य का साक्षात्कार कर पाते हैं।
दार्शनिक गहराई में यह श्लोक बताता है कि अमृतत्व अर्थात मोक्ष की प्राप्ति के लिए इसी सत्य का ज्ञान अनिवार्य है। विद्वान पुरुष इसी कारण तत्व को नमस्कार करते हैं क्योंकि वही एकमात्र सत्य है और शेष सब विकृति मात्र है। यहाँ उपासना का उद्देश्य बुद्धि को सूक्ष्म करना बताया गया है ताकि वह उस सूक्ष्म ब्रह्म का अनुभव कर सके जो स्थूल जगत के पीछे छिपा है। यह श्लोक उपनिषदों के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है जहाँ ब्रह्म को सत्यं ज्ञानं अनन्तं कहा गया है, जो काल की सीमाओं से परे है।

Verse 4
सृष्ट्वेदं प्रकृतेरनुप्रविशती येयं यया धार्यते
प्राणीति प्रविविक्तभुग्बहिरहं प्राज्ञः सुषुप्तौ यतः।
यस्यामात्मकला स्फुरत्यहमिति प्रत्यन्तरङ्गं जनै-
र्यस्यै स्वस्ति समर्थ्यते प्रतिपदा पूर्णा श‍ृणु त्वं हि सा।।4।।

यहाँ आत्मा के अनुप्रवेश के सिद्धांत और उसकी विभिन्न अवस्थाओं का दार्शनिक विवेचन किया गया है। परमात्मा ने अपनी प्रकृति के माध्यम से इस जगत की रचना की और फिर स्वयं ही जीव रूप में इसमें प्रवेश किया। वही परमात्मा इस जगत का धारण-पोषण करता है और प्रत्येक प्राणी में प्राणों के रूप में चेतना का संचार करता है। जाग्रत अवस्था में वह बाहरी इंद्रियों के माध्यम से स्थूल विषयों का भोग करता है, स्वप्न में वह सूक्ष्म विषयों का आनंद लेता है और सुषुप्ति अर्थात गहरी नींद में वह प्रज्ञा के रूप में शांत रहता है जहाँ कोई द्वैत नहीं होता।
मनुष्य के भीतर जो मैं की निरंतर भावना स्फुरित होती है, वह वास्तव में उसी आत्मा की एक अभिव्यक्ति है। प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण में जो अहं प्रत्यय उठता है, उसका मूल प्रकाश वह अविनाशी ब्रह्म ही है। संसार में लोग जिसे स्वस्ति या परम कल्याण कहते हैं, वह वास्तव में उस पूर्ण चैतन्य सत्ता का ही स्वरूप है। वह चैतन्य तत्व ही है जो हर क्षण हमारी रक्षा करता है और हमारे होने का एकमात्र प्रमाण है। वह पूर्ण है क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार की सीमा, स्थान या काल का कोई बंधन नहीं है।
पौराणिक और आध्यात्मिक संदर्भ में यहाँ जीव और ईश्वर की तात्विक एकता का निर्देश दिया गया है। यद्यपि आत्मा निर्गुण है, फिर भी वह सगुण जगत के व्यवहारों में साक्षी के रूप में सदैव विद्यमान रहता है। गुरु शिष्य को समझाते हैं कि तुम वही पूर्ण चैतन्य हो जिसे श्रुतियों ने सत्य घोषित किया है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के माध्यम से आत्मा के विश्लेषण की यह प्रक्रिया मांडूक्य उपनिषद के सार को समाहित करती है, जहाँ तुरीय अवस्था को ही वास्तविक स्वरूप माना गया है जो सभी अवस्थाओं का आधार है।

Verse 5
प्रज्ञानं त्वहमस्मि तत्त्वमसि तद् ब्रह्मायमात्मेति सं-
गायन् विप्रचर प्रशान्तमनसा त्वं ब्रह्मबोधोदयात्।
प्रारब्धं क्वनु सञ्चितं तव किमागामि क्व कर्माप्यसत्
त्वय्यध्यस्तमतोऽखिलं त्वमसि सच्चिन्मात्रमेकं विभुः।।5।।

अंतिम श्लोक में वेदान्त के चार प्रमुख महावाक्यों का सार प्रस्तुत करते हुए साधक को आत्म-साक्षात्कार की स्थिति का उपदेश दिया गया है। प्रज्ञानं ब्रह्म, अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि और अयमात्मा ब्रह्म - इन महान सूत्रों का निरंतर चिंतन और कीर्तन करते हुए साधक को शांत मन से इस संसार में विचरण करना चाहिए। ब्रह्म के बोध का उदय होने पर अज्ञान का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है। गुरु शिष्य से कहते हैं कि जब तुम स्वयं ब्रह्म हो, तो फिर कर्मों का बंधन तुम्हें कैसे छू सकता है? यहाँ प्रारब्ध, संचित और आगामी तीनों प्रकार के कर्मों को आत्मा के लिए असत्य घोषित कर दिया गया है।
जिस प्रकार जागने पर स्वप्न में किए गए कर्म और उनके सुख-दुख मिथ्या हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान प्राप्त होने पर जीवात्मा के पूर्वकृत कर्मों का कोई प्रभाव नहीं रह जाता। तुम वास्तव में सच्चिदानंद स्वरूप, अद्वितीय और सर्वव्यापी विभु हो। जो कुछ भी संताप या बंधन तुम पर आरोपित थे, वे केवल अज्ञानजन्य अध्यास थे। अब उस भ्रम के मिटने से तुम अपनी वास्तविक स्वरूपगत महिमा में स्थित हो। तुम्हारे भीतर न कोई कर्तापन है और न ही कोई भोक्तापन, तुम तो केवल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त प्रकाश हो।
यह श्लोक जीवन्मुक्ति की उस आनंदमयी अवस्था का सुंदर चित्रण करता है जहाँ साधक को यह बोध हो जाता है कि वह देश, काल और वस्तु की सभी सीमाओं से परे है। वह संसार के व्यवहारों को निभाते हुए भी उनसे अछूता रहता है। यहाँ अद्वैत दर्शन की वह पराकाष्ठा है जहाँ द्वैत का पूर्णतः लोप हो जाता है। शांति का वास्तविक अनुभव केवल उसी को हो सकता है जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को जान लिया है। यह उपदेश शिष्य को अज्ञान की निद्रा से जगाकर आत्म-साक्षात्कार के परम पद पर प्रतिष्ठित कर देता है।

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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