वेदव्यास अष्टक स्तोत्र

वेदव्यास अष्टक स्तोत्र

Lyrics:

सुजने मतितो विलोपिते निखिले गौतमशापतोमरैः।
कमलासनपूर्वकैस्स्ततो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।1।।

विमलोऽपि पराशरादभूद्भुवि भक्ताभिमतार्थ सिद्धये।
व्यभजद् बहुधा सदागमान् मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।2।।

सुतपोमतिशालिजैमिनि- प्रमुखानेकविनेयमण्डितः।
उरुभारतकृन्महायशा मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।3।।

निखिलागमनिर्णयात्मकं विमलं ब्रह्मसुसूत्रमातनोत्।
परिहृत्य महादुरागमान् मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।4।।

बदरीतरुमण्डिताश्रमे सुखतीर्थेष्टविनेयदेशिकः।
उरुतद्भजनप्रसन्नहृन्मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।5।।

अजिनाम्बररूपया क्रियापरिवीतो मुनिवेषभूषितः।
मुनिभावितपादपङ्कजो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।6।।

कनकाभजटो रविच्छविर्मुखलावण्यजितेन्दुमण्डलः।
सुखतीर्थदयानिरीक्षणो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।7।।

सुजनोद्धरणक्षणस्वकप्रतिमाभूतशिलाष्टकं स्वयम्।
परिपूर्णधिये ददौ हि यो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।8।।

वेदव्यासाष्टकस्तुत्या मुद्गलेन प्रणीतया।
गुरुहृत्पद्मसद्मस्थो वेदव्यासः प्रसीदतु।।9।।

Meaning:

Verse 1
सुजने मतितो विलोपिते निखिले गौतमशापतोमरैः।
कमलासनपूर्वकैस्स्ततो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।1।।

इस श्लोक में कवि भगवान वेदव्यास, जिन्हें बादरायण के नाम से भी जाना जाता है, की स्तुति करते हुए उनसे सद्बुद्धि की प्रार्थना करता है। श्लोक का शाब्दिक अर्थ यह है कि जब गौतम ऋषि के शापरूपी प्रहारों से सज्जनों की बुद्धि और धर्मज्ञान का लोप हो गया था, तब ब्रह्माजी सहित देवताओं और ऋषियों के कल्याण के लिए जिन्होंने पुनः ज्ञान का प्रकाश किया, वे बादरायण मुझे भी उत्तम बुद्धि प्रदान करें।

'गौतमशापतोमरैः' पद में शाप की तुलना तोमर अर्थात् भाले या प्रबल अस्त्र से की गई है। इसका तात्पर्य यह है कि अधर्म, अज्ञान और भ्रम कभी-कभी मनुष्य की बुद्धि को इस प्रकार आहत कर देते हैं कि सत्य का मार्ग दिखाई देना बंद हो जाता है। ऐसे समय में महापुरुष और ऋषि समाज को पुनः सही दिशा प्रदान करते हैं।

वेदव्यास का सम्पूर्ण जीवन इसी कार्य का प्रतीक है। उन्होंने वेदों का विभाजन किया, पुराणों की रचना की, महाभारत की रचना की और ब्रह्मविद्या को व्यवस्थित रूप में स्थापित किया। इस कारण वे केवल एक ग्रंथकार नहीं, बल्कि धर्म और ज्ञान के पुनर्संस्थापक माने जाते हैं।

दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि संसार में ज्ञान का प्रकाश कभी स्थायी रूप से नष्ट नहीं होता। जब भी अज्ञान बढ़ता है, तब कोई न कोई महापुरुष उसे पुनः प्रकाशित करता है। वेदव्यास उसी दिव्य ज्ञानशक्ति के मूर्त स्वरूप हैं। इसलिए भक्त उनसे केवल विद्या नहीं, बल्कि विवेक, धर्मबुद्धि और आत्मकल्याणकारी समझ की याचना करता है।

Verse 2
विमलोऽपि पराशरादभूद्भुवि भक्ताभिमतार्थ सिद्धये।
व्यभजद् बहुधा सदागमान् मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।2।।

इस श्लोक में भगवान वेदव्यास के दिव्य अवतरण और उनके महान कार्य का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि यद्यपि वे स्वभाव से निर्मल, निष्कलंक और दिव्य थे, फिर भी भक्तों की कामनाओं की पूर्ति तथा लोककल्याण के लिए उन्होंने पराशर ऋषि के पुत्र रूप में पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया। तत्पश्चात उन्होंने सनातन वैदिक ज्ञान को अनेक भागों में विभाजित कर संसार के लिए सुलभ बनाया।

पुराणों के अनुसार वेदव्यास का जन्म महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र के रूप में हुआ था। उनका जन्म साधारण नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें भगवान नारायण का अंशावतार माना जाता है। जब उन्होंने देखा कि कलियुग के लोगों की स्मरणशक्ति, अध्ययनशक्ति और तपशक्ति कम होती जाएगी, तब उन्होंने एक विशाल वेदराशि को चार वेदों में विभाजित कर दिया।

'व्यभजद् बहुधा सदागमान्' पद इसी महान कार्य की ओर संकेत करता है। यदि वेद एक ही रूप में रहते, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका अध्ययन अत्यंत कठिन हो जाता। व्यासजी ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, सुरक्षित किया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने की व्यवस्था बनाई।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि सच्चा ज्ञान केवल स्वयं जानने के लिए नहीं होता। उसका उद्देश्य दूसरों का कल्याण करना होता है। वेदव्यास ज्ञान और करुणा के अद्भुत संगम हैं। इसलिए भक्त प्रार्थना करता है कि वे उसके भीतर भी ऐसी बुद्धि उत्पन्न करें जो स्वयं के साथ-साथ दूसरों के हित में भी प्रयुक्त हो।

Verse 3
सुतपोमतिशालिजैमिनि- प्रमुखानेकविनेयमण्डितः।
उरुभारतकृन्महायशा मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।3।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी को महान आचार्य और महाभारत के रचयिता के रूप में प्रणाम किया गया है। कवि कहता है कि वे जैमिनि जैसे अत्यंत विद्वान और तपस्वी शिष्यों से सुशोभित थे। उनके चारों ओर अनेक योग्य, विनीत और ज्ञानपिपासु शिष्य उपस्थित रहते थे। साथ ही वे महान यशस्वी महाभारत के रचयिता भी थे।

जैमिनि, वैशम्पायन, पैल और सुमन्तु जैसे शिष्य भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन शिष्यों ने वेदों और शास्त्रों की विभिन्न शाखाओं का संरक्षण और प्रचार किया। इससे स्पष्ट होता है कि वेदव्यास केवल स्वयं ज्ञानी नहीं थे, बल्कि महान शिक्षक भी थे।

श्लोक में उन्हें 'उरुभारतकृत्' कहा गया है, अर्थात् विशाल महाभारत की रचना करने वाले। महाभारत को केवल युद्ध का इतिहास समझना भूल होगी। इसमें धर्म, राजनीति, नीति, भक्ति, योग, मोक्ष और मानवीय जीवन के लगभग सभी पक्षों का गहन विश्लेषण मिलता है। भगवद्गीता जैसे अमूल्य ग्रंथ का उद्भव भी इसी महाकाव्य में हुआ।

दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को दर्शाता है। ज्ञान तभी जीवित रहता है जब वह योग्य शिष्यों तक पहुँचे। वेदव्यास ने केवल ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि ऐसी परंपरा स्थापित की जिसने हजारों वर्षों तक भारतीय संस्कृति को जीवित रखा। इसलिए भक्त उनसे ऐसी बुद्धि की याचना करता है जो ज्ञान को ग्रहण भी कर सके और आगे बाँट भी सके।

Verse 4
निखिलागमनिर्णयात्मकं विमलं ब्रह्मसुसूत्रमातनोत्।
परिहृत्य महादुरागमान् मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।4।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रों की महिमा का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि उन्होंने समस्त वेद, उपनिषद और आगमों के अंतिम निर्णय को संक्षिप्त और शुद्ध रूप में ब्रह्मसूत्रों में प्रस्तुत किया। साथ ही उन्होंने अनेक भ्रमपूर्ण और मिथ्या मतों का खंडन कर सत्य मार्ग को स्पष्ट किया।

ब्रह्मसूत्र वेदान्त दर्शन का आधार माने जाते हैं। उपनिषदों में बिखरे हुए ब्रह्मज्ञान को व्यवस्थित करके छोटे-छोटे सूत्रों के रूप में प्रस्तुत करना अत्यंत कठिन कार्य था। यह कार्य केवल वही कर सकता था जिसे सम्पूर्ण वैदिक साहित्य का प्रत्यक्ष अनुभव हो।

'परिहृत्य महादुरागमान्' का अर्थ है कि उन्होंने उन सिद्धांतों को अस्वीकार किया जो वेदों के वास्तविक अर्थ से विपरीत थे। ब्रह्मसूत्रों का उद्देश्य केवल सिद्धांत प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि सत्य और असत्य के बीच स्पष्ट भेद स्थापित करना भी है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक विवेक की महिमा का वर्णन करता है। जीवन में अनेक मत, विचार और धारणाएँ सामने आती हैं। परंतु उनमें से कौन-सा सत्य है, इसका निर्णय विवेक से ही होता है। वेदव्यास उसी दिव्य विवेक के प्रतीक हैं।

इसलिए भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसके मन से भ्रम दूर करें और उसे ऐसा ज्ञान प्रदान करें जो उसे परम सत्य तक पहुँचाने वाला हो।

Verse 5
बदरीतरुमण्डिताश्रमे सुखतीर्थेष्टविनेयदेशिकः।
उरुतद्भजनप्रसन्नहृन्मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।5।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी के पवित्र आश्रम और उनके गुरु स्वरूप का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि बदरी वृक्षों से सुशोभित आश्रम में निवास करने वाले, अपने प्रिय शिष्यों के महान गुरु तथा भजन करने वालों पर प्रसन्न रहने वाले बादरायण मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।

बदरिकाश्रम भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अत्यंत पवित्र स्थान माना जाता है। यहीं वेदव्यास ने तप किया, शास्त्रों का संकलन किया और अनेक शिष्यों को शिक्षा दी। इसलिए उनका नाम ही बादरायण पड़ गया।

'विनेयदेशिकः' शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ है विनीत शिष्यों को शिक्षा देने वाले आचार्य। भारतीय परंपरा में केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं माना गया; सच्चा गुरु वह है जो अपने ज्ञान को योग्य शिष्यों तक पहुँचा सके।

श्लोक यह भी बताता है कि वे भजन और श्रद्धा से प्रसन्न होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तविक ज्ञान विनम्रता और भक्ति को जन्म देता है।

दार्शनिक रूप से बदरिकाश्रम साधक के अंतःकरण का प्रतीक है। जब मन शुद्ध, शांत और एकाग्र हो जाता है, तब उसमें ज्ञान का उदय होता है। वेदव्यास ऐसे ही निर्मल अंतःकरण में प्रकट होने वाली ज्ञानशक्ति के प्रतीक हैं।

Verse 6
अजिनाम्बररूपया क्रियापरिवीतो मुनिवेषभूषितः।
मुनिभावितपादपङ्कजो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।6।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी के तपस्वी स्वरूप का वर्णन मिलता है। वे मृगचर्म धारण करते हैं, वैदिक कर्मों में निरंतर लगे रहते हैं और मुनियों के अनुरूप वेश से विभूषित हैं। उनके चरणकमलों का ध्यान स्वयं महान ऋषि-मुनि करते हैं।

'अजिनाम्बर' का अर्थ है मृगचर्म वस्त्र। प्राचीन भारत में अनेक ऋषि तप, संयम और वैराग्य के प्रतीक रूप में इसे धारण करते थे। यह बाहरी सादगी और आंतरिक समृद्धि का प्रतीक है।

वेदव्यास का जीवन हमें सिखाता है कि महानता बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मानुशासन में होती है। उनके पास राजसत्ता नहीं थी, विशाल संपत्ति नहीं थी, फिर भी उनका प्रभाव हजारों वर्षों तक बना हुआ है।

'मुनिभावितपादपङ्कजः' का अर्थ है कि जिनके चरणकमलों का चिंतन स्वयं मुनिगण करते हैं। यह उनके आध्यात्मिक गौरव को दर्शाता है। ऋषियों द्वारा पूजनीय होना किसी साधारण व्यक्ति के लिए संभव नहीं।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि ज्ञान और चरित्र का संबंध अविभाज्य है। यदि जीवन में संयम, सत्य और साधना नहीं है, तो ज्ञान केवल बौद्धिक जानकारी बनकर रह जाता है। वेदव्यास के जीवन में ज्ञान और आचरण का पूर्ण सामंजस्य दिखाई देता है।

इसलिए भक्त उनसे प्रार्थना करता है कि वे उसे भी ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा दें जिसमें ज्ञान और आचरण दोनों एक हो जाएँ।

Verse 7
कनकाभजटो रविच्छविर्मुखलावण्यजितेन्दुमण्डलः।
सुखतीर्थदयानिरीक्षणो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।7।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी के दिव्य और तेजस्वी स्वरूप का वर्णन किया गया है। उनकी जटाएँ स्वर्ण के समान चमकती हैं, उनका तेज सूर्य के समान है और उनके मुख की शोभा चन्द्रमा को भी पराजित कर देती है। उनकी करुणामयी दृष्टि भक्तों पर कृपा बरसाती है।

यह वर्णन केवल बाहरी सौंदर्य का नहीं है। भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में प्रकाश, तेज और सौंदर्य का उपयोग आंतरिक ज्ञान और आत्मिक पवित्रता के प्रतीक के रूप में किया जाता है।

सूर्य की उपमा ज्ञान का प्रतीक है क्योंकि सूर्य अंधकार को दूर करता है। चन्द्रमा की उपमा शांति, सौम्यता और करुणा का प्रतीक है। वेदव्यास में दोनों गुण एक साथ विद्यमान हैं। वे अज्ञान को दूर करने वाले भी हैं और साधकों को सांत्वना देने वाले भी।

'दयानिरीक्षणः' विशेष रूप से महत्वपूर्ण शब्द है। इसका अर्थ है कृपापूर्ण दृष्टि रखने वाला। भारतीय गुरु-परंपरा में गुरु की कृपादृष्टि को अत्यंत महत्व दिया गया है क्योंकि वही साधक के भीतर आध्यात्मिक जागरण का कारण बनती है।

दार्शनिक रूप से यह श्लोक बताता है कि सच्चा ज्ञान कठोरता नहीं लाता, बल्कि करुणा लाता है। जितना अधिक ज्ञान बढ़ता है, उतनी ही अधिक सहानुभूति विकसित होती है। वेदव्यास ज्ञान और करुणा के इस दिव्य संतुलन के आदर्श हैं।

Verse 8
सुजनोद्धरणक्षणस्वकप्रतिमाभूतशिलाष्टकं स्वयम्।
परिपूर्णधिये ददौ हि यो मतिदो मेस्तु स बादरायणः।।8।।

इस श्लोक में वेदव्यासजी की लोककल्याणकारी भावना का वर्णन किया गया है। कवि कहता है कि उन्होंने सज्जनों के उद्धार और कल्याण के लिए स्वयं अपनी प्रतिमास्वरूप आठ शिलामूर्तियाँ प्रदान कीं। ऐसे पूर्ण ज्ञान वाले बादरायण मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।

परंपराओं में यह उल्लेख मिलता है कि महान ऋषि अपने शरीर के रहते ही ऐसे साधन छोड़ जाते थे जिनके माध्यम से भविष्य की पीढ़ियाँ भी उनका स्मरण और उपासना कर सकें। यहाँ आठ शिलामूर्तियों का उल्लेख उसी भावना को प्रकट करता है।

'परिपूर्णधिये' का अर्थ है पूर्ण ज्ञान से सम्पन्न। वेदव्यास का ज्ञान केवल शास्त्रीय नहीं था, बल्कि अनुभूत सत्य पर आधारित था। उन्होंने जो कुछ भी किया, वह लोकहित की भावना से किया।

यह श्लोक एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धांत भी सिखाता है। महापुरुष अपने लिए नहीं जीते। वे अपने बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग तैयार करते हैं। वेदव्यास ने वेद, पुराण, महाभारत, ब्रह्मसूत्र और गुरु-परंपरा के रूप में ऐसा अमूल्य खजाना छोड़ दिया जो आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन कर रहा है।

दार्शनिक दृष्टि से उनकी वास्तविक प्रतिमा पत्थर की मूर्तियाँ नहीं, बल्कि उनके द्वारा स्थापित ज्ञान की परंपरा है। जब कोई व्यक्ति उनके ग्रंथों का अध्ययन करता है, तब वह वास्तव में वेदव्यास के सान्निध्य में ही होता है।

Verse 9
वेदव्यासाष्टकस्तुत्या मुद्गलेन प्रणीतया।
गुरुहृत्पद्मसद्मस्थो वेदव्यासः प्रसीदतु।।9।।

यह इस स्तोत्र का फलश्रुति और समापन श्लोक है। कवि मुद्गल कहते हैं कि उनके द्वारा रचित इस वेदव्यासाष्टक स्तुति से प्रसन्न होकर वेदव्यासजी कृपा करें। यह केवल एक औपचारिक समापन नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण स्तोत्र का सार भी है।

'गुरुहृत्पद्मसद्मस्थः' अत्यंत सुंदर पद है। इसका अर्थ है कि वेदव्यास गुरु के हृदयकमल में निवास करते हैं। भारतीय परंपरा में गुरु को ज्ञान का माध्यम माना जाता है। गुरु के माध्यम से प्रवाहित होने वाला दिव्य ज्ञान अंततः वेदव्यास की ही परंपरा से आता है।

वेदव्यास को गुरु-परंपरा का मूल स्तंभ माना जाता है। वेदों का विभाजन, पुराणों की रचना, महाभारत की रचना और ब्रह्मसूत्रों की स्थापना के कारण उन्हें भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति का महान निर्माता कहा जा सकता है।

यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं रहता। वह जीवित गुरु-शिष्य परंपरा में प्रवाहित होता है। जब तक यह परंपरा जीवित है, तब तक वेदव्यास भी जीवित हैं।

दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक गुरु-तत्त्व की महिमा का वर्णन करता है। गुरु बाहरी व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि वह चेतना है जो अज्ञान को हटाकर सत्य का प्रकाश करती है। वेदव्यास उसी गुरु-तत्त्व के सर्वोच्च प्रतिनिधियों में से एक हैं।

अंत में भक्त प्रार्थना करता है कि वेदव्यास प्रसन्न हों और उसे विवेक, ज्ञान, भक्ति, वैराग्य तथा परमात्मा की अनुभूति की दिशा में अग्रसर करें।

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