
श्लोक 1
अनेकान्तिकं द्वन्द्वशून्यं विशुद्धं नितान्तं सुशान्तं गुणातीतमेकम्।
सदा निष्प्रपञ्चं मनोवागतीतं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
इस प्रथम श्लोक में आचार्य अपने वास्तविक स्वरूप अथवा ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो सभी सीमाओं से परे है। अनेकान्तिकं का शाब्दिक अर्थ है जो केवल एक ही अंत वाला हो या जिसमें कोई दूसरा पक्ष न हो अर्थात जो अद्वितीय और निरपेक्ष है। यह स्वरूप द्वन्द्वशून्य है जिसका अर्थ है कि इसमें सुख-दुख, शीत-उष्ण, पुण्य-पाप या लाभ-हानि जैसे सांसारिक द्वैत विद्यमान नहीं हैं। यह विशुद्ध है क्योंकि इसमें माया का कोई लेप नहीं है और यह नितान्त सुशान्त है क्योंकि यहाँ विक्षेपों का पूर्ण अभाव है। गुणातीत होने का अर्थ है कि यह प्रकृति के तीनों गुणों सत्त्व, रज और तम से परे है और यह एक है क्योंकि अद्वैत दर्शन में आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं है।
आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक बताता है कि हमारा मूल स्वरूप निष्प्रपञ्च है अर्थात यह प्रपञ्चात्मक जगत के विस्तारों और भ्रमों से रहित है। यह मन और वाणी की पहुँच से परे है क्योंकि मन केवल परिमित विषयों का चिंतन कर सकता है और वाणी केवल सीमित वस्तुओं का ही वर्णन कर सकती है जबकि ब्रह्म असीमित और अनिर्वचनीय है। चिदानन्दरूपं शब्द चित् अर्थात शुद्ध चेतना और आनन्द के शाश्वत मिलन को दर्शाता है। पौराणिक संदर्भ में यह उपनिषदों के नेति-नेति सिद्धांत का सार प्रस्तुत करता है जहाँ सब कुछ नकारने के बाद जो शेष रहता है वही वह स्वरूप है। इस स्वरूप का भजन करना वास्तव में स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया है जो साधक को पूर्णता की ओर ले जाती है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम शरीर या मन नहीं बल्कि वह एकरस तत्व हैं जो सर्वत्र व्याप्त है।
श्लोक 2
सदा स्वप्रभं दुःखहीनं ह्यमेयं निराकारमत्युज्ज्वलं भेदहीनम्।
स्वसंवेद्यमानन्दमाद्यं निरीहं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
यहाँ आत्मा की स्व-प्रकाशकता और उसके आनंदमय स्वभाव का अत्यंत सूक्ष्म वर्णन किया गया है। सदा स्वप्रभं का अर्थ है कि आत्मा स्वयं प्रकाशमान है जिसे प्रकाशित करने के लिए सूर्य, चन्द्र, अग्नि या किसी बाहरी दीपक की आवश्यकता नहीं होती बल्कि उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशित होता है। यह स्वरूप दुःखहीन है क्योंकि समस्त दुःख केवल देह और मन के तादात्म्य से उत्पन्न होते हैं जबकि आत्मा इन भौतिक उपाधियों से सर्वथा मुक्त है। अमेयं का अर्थ है जिसे किसी लौकिक प्रमाण, तर्क या नाप-तौल से नहीं जाना जा सकता क्योंकि जानने वाला स्वयं को जानने के लिए किसी बाहरी साधन पर निर्भर नहीं हो सकता। यह निराकार है क्योंकि रूप केवल मायावी और नाशवान वस्तुओं का होता है और यह अत्युज्ज्वल तथा भेदहीन है जिसमें सजातीय, विजातीय या स्वगत भेद का कोई स्थान नहीं है।
दार्शनिक गहराई में देखें तो स्वसंवेद्यं शब्द यहाँ सबसे महत्वपूर्ण है जिसका अर्थ है कि इसे केवल स्वयं के अनुभव या अपरोक्ष अनुभूति से ही जाना जा सकता है यह बौद्धिक विमर्श या चर्चा का विषय नहीं है। यह आद्यं है जिसका अर्थ है कि यह सबका मूल कारण और सनातन है। यह निरीह है क्योंकि पूर्ण होने के कारण इसमें किसी भी प्रकार की इच्छा या कर्म की चेष्टा शेष नहीं रहती। चिदानन्दरूप का अर्थ है वह चेतना जो स्वयं में ही परमानन्द स्वरूप है। पौराणिक आख्यानों में भगवान शिव या निराकार ब्रह्म को जिस दिव्य ज्योति के रूप में वर्णित किया गया है यह श्लोक उसी अद्वैत भाव की पुष्टि करता है। इस स्वरूप के भजन से जीव अपने अज्ञान जनित संतापों का त्याग कर अपनी मौलिक उज्ज्वलता को प्राप्त करता है जो सृष्टि के आरम्भ से पूर्व भी विद्यमान थी और प्रलय के पश्चात भी रहेगी।
श्लोक 3
अहं प्रत्ययत्वादनेकान्तिकत्वादभेदस्वरूपात् स्वतःसिद्धभावात्।
अनन्याश्रयत्वात्सदा निष्प्रपञ्चं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
इस श्लोक में अद्वैत वेदांत के तार्किक और अनुभवात्मक पक्ष को बहुत प्रभावशाली ढंग से उजागर किया गया है। अहं प्रत्ययत्वात् का अर्थ है कि मैं होने का बोध प्रत्येक जीव में अनिवार्य और निरंतर रूप से विद्यमान रहता है। यह बोध ही उस ब्रह्म की उपस्थिति का सबसे बड़ा जीवित प्रमाण है। अनेकान्तिकत्वात् का अर्थ है कि यह आत्म-बोध कभी खंडित नहीं होता चाहे जाग्रत, स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था हो आत्मा का अस्तित्व सदैव एकरस बना रहता है। अभेदस्वरूपात् का अर्थ है कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय के बीच यहाँ कोई वास्तविक भेद नहीं है। स्वतःसिद्धभावात् यह स्पष्ट करता है कि आत्मा को सिद्ध करने के लिए किसी अन्य तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह स्वयं ही सभी प्रमाणों का आधार है।
आध्यात्मिक संकेत यह है कि आत्मा अनन्याश्रयत्वात् है अर्थात इसे टिकने के लिए किसी अन्य आधार की आवश्यकता नहीं है बल्कि समस्त जगत और चित्त की वृत्तियाँ इसी पर आश्रित हैं। यह सदा निष्प्रपञ्च और प्रपंचों से मुक्त है। भारतीय दर्शन के अनुसार व्यक्ति जब बाहर के प्रमाणों को छोड़कर अपने भीतर के इस निरंतर स्फुरित होने वाले अहं के वास्तविक स्रोत को खोजता है तब उसे चिदानन्दरूप का साक्षात्कार होता है। यहाँ अहं शब्द अहंकार या ईगो के लिए नहीं बल्कि शुद्ध अस्मिता के लिए प्रयुक्त हुआ है। यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह जिस परमेश्वर को बाहर खोज रहा है वह उसके भीतर ही स्वयं-सिद्ध चेतना के रूप में सदा जागृत है जिसे किसी बाह्य साधन से नहीं अपितु केवल अंतर्मुखी होकर ही पाया जा सकता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है।
श्लोक 4
अहं ब्रह्म भासादि मत्कार्यजातं स्वलक्ष्येऽद्वये स्फूर्तिशून्ये परे च।
विलाप्यप्रशान्ते सदैवैकरूपे चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
यह श्लोक ध्यान और विलीनीकरण की एक गहन यौगिक प्रक्रिया का वर्णन करता है। अहं ब्रह्म भासादि का अर्थ है कि मैं ही वह ब्रह्म हूँ जिसके प्रकाश से यह सारा संसार और मेरे द्वारा किए जाने वाले समस्त कार्यजाल प्रकाशित हो रहे हैं। मत्कार्यजातं का तात्पर्य उन सभी भौतिक और मानसिक कर्मों तथा प्रपंचों से है जो अज्ञान के कारण हमें सत्य प्रतीत होते हैं। साधक को यहाँ यह निर्देश दिया गया है कि वह इन सभी दृश्य प्रपंचों को अपने अद्वय लक्ष्य अर्थात उस अद्वितीय सत्य में विलीन कर दे। स्फूर्तिशून्ये वह अवस्था है जहाँ चित्त की वृत्तियों का स्पंदन पूर्णतः शांत हो जाता है और केवल शुद्ध चैतन्य का महासागर शेष रहता है। यह अवस्था परा और परम शांत है।
इसकी आध्यात्मिक सार्थकता यह है कि जब हम संसार की विविधताओं और भेदों को ब्रह्म की ही आभा मानकर उसे उसके मूल कारण में समाहित कर देते हैं तब केवल एकरूपता ही शेष रह जाती है। यह एक ऐसी प्रशांत स्थिति है जहाँ न कोई क्रिया है, न कोई प्रतिक्रिया और न ही कोई विक्षेप। चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम् के माध्यम से आचार्य कहते हैं कि उस एकरस, निर्विकार और शाश्वत स्वरूप का ही हमें भजन करना चाहिए। दार्शनिक रूप से यह वेदान्त के उस विचार को पुष्ट करता है जहाँ कार्य को उसके कारण में समाहित कर दिया जाता है जैसे मिट्टी के बर्तनों का ज्ञान अंततः मिट्टी के ज्ञान में ही समाप्त हो जाता है। यह स्वरूप ही हमारी वास्तविक शांति का आधार है जो समय और परिस्थिति के अनुसार बदलता नहीं बल्कि सदैव एक जैसा रहता है।
श्लोक 5
अहं ब्रह्मभावो ह्यविद्याकृतत्वाद् विभिन्नात्मकं भोक्तृभोग्यात्मबुध्या।
जडं सम्बभूवयि पूंस्स्त्र्यात्मना यत् चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
इस श्लोक में अज्ञान या अविद्या के प्रभाव का वर्णन किया गया है कि कैसे वह एक ही तत्व को अनेक रूपों में दिखाती है। अहं ब्रह्मभावो का अर्थ है कि वास्तव में मैं ब्रह्म ही हूँ लेकिन अविद्याकृतत्वात् अर्थात अविद्या के कारण यह सत्य छिप गया है। इसी अविद्या के कारण यह जगत विभिन्नात्मक प्रतीत होता है जहाँ हम स्वयं को भोक्ता और बाहरी संसार को भोग्य समझने लगते हैं। भोक्तृभोग्यात्मबुध्या का अर्थ है वह बुद्धि जो उपभोग करने वाले और उपभोग की वस्तु के बीच भेद करती है। यही अविद्या हमें स्त्री, पुरुष और जड़ पदार्थों के भेदों में उलझा देती है जिससे हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर इस द्वैतवादी संसार के दुखों में फंस जाते हैं।
दार्शनिक रूप से यह श्लोक माया की शक्ति को स्पष्ट करता है जो एक अखंड चेतना को कर्ता, कर्म और क्रिया के रूप में विभाजित कर देती है। पौराणिक संदर्भ में इसे शक्ति और शिव का लीला रूप भी कहा जाता है लेकिन ज्ञान मार्ग में इसे अज्ञान का विस्तार माना गया है। जडं सम्बभूवयि का अर्थ है कि वह चेतन तत्व ही अज्ञानवश जड़वत प्रतीत होने लगता है। आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य इसी अविद्या का नाश करना है ताकि हम पुरुष और स्त्री या जड़ और चेतन के इन कल्पित भेदों से ऊपर उठकर उस चिदानन्दरूप को देख सकें। जब साधक यह जान लेता है कि भेद केवल दृष्टि में है तत्व में नहीं तब वह इसी क्षण मुक्त हो जाता है। अतः उस भेदहीन स्वरूप का भजन ही वास्तविक साधना है जो अविद्या के बंधन को काट देती है।
श्लोक 6
अनित्यं जगच्चिद्विवर्तात्मकं यत् विशोध्य स्वतःसिद्धचिन्मात्ररूपम्।
विहायाखिलं यन्निजाज्ञानसिद्धं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
यहाँ जगत की नश्वरता और उसके विवर्तात्मक स्वभाव की चर्चा की गई है। अनित्यं जगत् का अर्थ है कि यह दृश्य संसार नाशवान है और निरंतर परिवर्तनशील है। चिद्विवर्तात्मकं एक बहुत ही गहरा वेदान्तिक शब्द है जिसका अर्थ है कि यह जगत चेतना का विवर्त है अर्थात यह ब्रह्म का वैसा ही आभास है जैसे रस्सी में सांप का होना। यहाँ कारण में कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं होता केवल देखने वाले को भ्रम होता है। विशोध्य का अर्थ है विवेक के द्वारा शोधन करना जिससे हम स्वतःसिद्ध चिन्मात्ररूप को पहचान सकें। हमें उन सभी चीजों का त्याग करना होगा जो निजाज्ञानसिद्धं हैं अर्थात जो केवल हमारे अपने अज्ञान के कारण हमें सत्य प्रतीत हो रही हैं।
इस श्लोक का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह हमें दृश्य जगत से मोह हटाने और अदृश्य सत्य की ओर मुड़ने की प्रेरणा देता है। विहायाखिलं का अर्थ है समस्त अनात्म वस्तुओं और धारणाओं का त्याग करना। जब हम अज्ञान से उत्पन्न इस प्रपंच को छोड़ देते हैं तब जो बचता है वही हमारा शुद्ध स्वरूप है। पौराणिक ग्रंथों में इस प्रक्रिया को विवेक और वैराग्य कहा गया है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सत्य को कहीं बाहर से लाना नहीं है बल्कि केवल उस अज्ञान को हटाना है जिसने सत्य को ढका हुआ है। चिदानन्दरूप वह प्रकाश है जो अज्ञान के हटते ही स्वयं प्रकट हो जाता है। यह स्वरूप कभी उत्पन्न नहीं होता और न कभी नष्ट होता है यह तो सदैव विद्यमान है केवल हमारी दृष्टि अशुद्ध होने के कारण हमें दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 7
स्वभासा सदा यत्स्वरूपं स्वदीप्तं निजानन्दरूपाद्यदानन्दमात्रम्।
स्वरूपानुभूत्या सदा यत्स्वमात्रं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
इस श्लोक में आत्मा के स्वयं-प्रकाशित और परमानंद स्वरूप की पुनः पुष्टि की गई है। स्वभासा का अर्थ है अपनी ही आभा या चमक से जो सदैव प्रकाशित है। स्वदीप्तं का तात्पर्य है कि इस चेतना को जानने के लिए किसी बुद्धि या इंद्रिय के प्रकाश की भी आवश्यकता नहीं है क्योंकि बुद्धि स्वयं इसी से प्रकाश ग्रहण करती है। निजानन्दरूपाद्य का अर्थ है कि यह अपना निजी आनंद है जो किसी बाहरी विषय या इंद्रिय सुख पर निर्भर नहीं है। यह आनन्दमात्र है अर्थात इसमें आनंद के अलावा कुछ और है ही नहीं। यह संसार के क्षणिक सुखों जैसा नहीं है जो आने-जाने वाले होते हैं बल्कि यह स्थिर और शाश्वत है।
स्वरूपानुभूत्या का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यक्ष अनुभूति। जब साधक इस स्थिति में पहुँचता है तब उसे ज्ञात होता है कि वह सदा से ही स्वमात्रं अर्थात केवल स्वयं ही रहा है और दूसरा कुछ था ही नहीं। यह अद्वैत की चरम स्थिति है जहाँ साधक और साध्य का भेद मिट जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह श्लोक बताता है कि वास्तविक सुख हमारे भीतर ही है जिसे हम बाहर की वस्तुओं में खोज रहे हैं। पौराणिक संदर्भ में इसे ही सच्चिदानंद कहा गया है जो सभी आनंदों का स्रोत है। इस स्वरूप का भजन करने का अर्थ है अपनी अंतरात्मा में विश्राम करना और बाहरी भटकन को समाप्त करना। यह अवस्था ही परम शांति और निर्भयता प्रदान करती है क्योंकि जहाँ दूसरा कोई नहीं है वहाँ भय कैसा।
श्लोक 8
जगन्नेति वा खल्विदं ब्रह्मवृत्त्या निजात्मानमेवावशिष्याद्वयं यत्।
अभिन्नं सदा निर्विकल्पं प्रशान्तं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
यह श्लोक उपनिषदों के महावाक्य नेति-नेति और सर्वं खल्विदं ब्रह्म के समन्वय को प्रस्तुत करता है। जगन्नेति का अर्थ है यह जगत वह सत्य नहीं है जिसकी हमें तलाश है। जब हम ब्रह्मवृत्त्या अर्थात इस बोध के साथ विचार करते हैं कि सब कुछ ब्रह्म ही है तब यह प्रपञ्च विलीन हो जाता है। निजात्मानमेवावशिष्याद्वयं का अर्थ है कि अंत में केवल अपना अद्वय आत्मा ही शेष रहता है। सब कुछ नकारने के बाद जो बचता है वह शून्य नहीं है बल्कि वह पूर्ण और अभिन्न तत्व है जो कभी विभाजित नहीं होता। यह स्वरूप निर्विकल्प है जिसका अर्थ है कि इसमें कोई कल्पना या संदेह शेष नहीं रहता और यह सदैव प्रशान्त है।
इस श्लोक का दार्शनिक आधार यह है कि सत्य केवल वही हो सकता है जो कभी बाधित न हो। जगत बाधित हो जाता है लेकिन आत्मा का बोध कभी बाधित नहीं होता। आध्यात्मिक रूप से यह श्लोक साधक को एक महाशून्य या पूर्णता की स्थिति में ले जाता है जहाँ उसे अनुभव होता है कि वह स्वयं ही वह अखण्ड चेतना है। अभिन्नं शब्द इस बात पर जोर देता है कि हमारे और उस परमात्मा के बीच सुई की नोक के बराबर भी दूरी नहीं है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार यही वह परम पद है जिसे पाकर मनुष्य फिर कभी जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ता। चिदानन्दरूप का भजन करना ही इस जीवन का सर्वोच्च पुरुषार्थ है जो हमें समस्त बंधनों से मुक्त कर परम शांति की प्राप्ति कराता है।
श्लोक 9
निजात्माष्टकं ये पठन्तीह भक्ताः सदाचारयुक्ताः स्वनिष्ठाः प्रशान्ताः।
भवन्तीह ते ब्रह्म वेदप्रमाणात् तथैवाशिषा निश्चितं निश्चितं मे।
यह अंतिम श्लोक फलश्रुति है जो इस स्तोत्र के पाठ का फल और आवश्यक पात्रता बताता है। निजात्माष्टकं का अर्थ है अपने आत्मा के स्वरूप का वर्णन करने वाले ये आठ श्लोक। जो भक्त सदाचार से युक्त हैं अर्थात जिनका आचरण शुद्ध है स्वनिष्ठाः हैं अर्थात जो अपने स्वरूप में स्थित हैं और जो प्रशान्ताः हैं वही इसके वास्तविक अधिकारी हैं। ऐसे भक्त इस लोक में ही ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं। आचार्य यहाँ वेदप्रमाणात् शब्द का प्रयोग कर रहे हैं जिसका अर्थ है कि यह केवल उनकी कल्पना नहीं है बल्कि वेदों और उपनिषदों का यही प्रमाण है। वे अपनी आशीष के साथ यह उद्घोष करते हैं कि यह निश्चित है।
आध्यात्मिक महत्व यह है कि ज्ञान केवल सुनने से नहीं बल्कि आचरण और निष्ठा से फलीभूत होता है। सदाचार और शांति वह भूमि है जिस पर आत्म-ज्ञान का बीज अंकुरित होता है। यहाँ निश्चितं निश्चितं मे कहना आचार्य के पूर्ण आत्मविश्वास और करुणा को दर्शाता है कि जो भी व्यक्ति इन सिद्धांतों को जीवन में उतारेगा वह निश्चित ही दुखों से मुक्त होकर ब्रह्मत्व को प्राप्त करेगा। यह श्लोक हमें आश्वासन देता है कि आत्म-साक्षात्कार कोई असंभव कार्य नहीं है बल्कि सही मार्ग और निष्ठा से इसे इसी जन्म में प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार यह स्तोत्र जीव को उसकी संकीर्णता से उठाकर उसे अनंत आकाश जैसी व्यापकता प्रदान करता है और उसे उसके चिदानन्दरूप में प्रतिष्ठित कर देता है।
अनेकान्तिकं द्वन्द्वशून्यं विशुद्धं नितान्तं सुशान्तं गुणातीतमेकम्।
सदा निष्प्रपञ्चं मनोवागतीतं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
सदा स्वप्रभं दुःखहीनं ह्यमेयं निराकारमत्युज्ज्वलं भेदहीनम्।
स्वसंवेद्यमानन्दमाद्यं निरीहं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं प्रत्ययत्वादनेकान्तिकत्वादभेदस्वरूपात् स्वतःसिद्धभावात्।
अनन्याश्रयत्वात्सदा निष्प्रपञ्चं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं ब्रह्म भासादि मत्कार्यजातं स्वलक्ष्येऽद्वये स्फूर्तिशून्ये परे च।
विलाप्यप्रशान्ते सदैवैकरूपे चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं ब्रह्मभावो ह्यविद्याकृतत्वाद् विभिन्नात्मकं भोक्तृभोग्यात्मबुध्या।
जडं सम्बभूवयि पूंस्स्त्र्यात्मना यत् चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अनित्यं जगच्चिद्विवर्तात्मकं यत् विशोध्य स्वतःसिद्धचिन्मात्ररूपम्।
विहायाखिलं यन्निजाज्ञानसिद्धं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
स्वभासा सदा यत्स्वरूपं स्वदीप्तं निजानन्दरूपाद्यदानन्दमात्रम्।
स्वरूपानुभूत्या सदा यत्स्वमात्रं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
जगन्नेति वा खल्विदं ब्रह्मवृत्त्या निजात्मानमेवावशिष्याद्वयं यत्।
अभिन्नं सदा निर्विकल्पं प्रशान्तं चिदानन्दरूपं भजेम स्वपरूम्।
निजात्माष्टकं ये पठन्तीह भक्ताः सदाचारयुक्ताः स्वनिष्ठाः प्रशान्ताः।
भवन्तीह ते ब्रह्म वेदप्रमाणात् तथैवाशिषा निश्चितं निश्चितं मे।