निजात्माष्टक

अनेकान्तिकं द्वन्द्वशून्यं विशुद्धं नितान्तं सुशान्तं गुणातीतमेकम्।
सदा निष्प्रपञ्चं मनोवागतीतं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
सदा स्वप्रभं दुःखहीनं ह्यमेयं निराकारमत्युज्ज्वलं भेदहीनम्।
स्वसंवेद्यमानन्दमाद्यं निरीहं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं प्रत्ययत्वादनेकान्तिकत्वादभेदस्वरूपात् स्वतःसिद्धभावात्।
अनन्याश्रयत्वात्सदा निष्प्रपञ्चं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं ब्रह्म भासादि मत्कार्यजातं स्वलक्ष्येऽद्वये स्फूर्तिशून्ये परे च।
विलाप्यप्रशान्ते सदैवैकरूपे चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अहं ब्रह्मभावो ह्यविद्याकृतत्वाद् विभिन्नात्मकं भोक्तृभोग्यात्मबुध्या।
जडं सम्बभूवयि पूंस्स्त्र्यात्मना यत् चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
अनित्यं जगच्चिद्विवर्तात्मकं यत् विशोध्य स्वतःसिद्धचिन्मात्ररूपम्।
विहायाखिलं यन्निजाज्ञानसिद्धं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
स्वभासा सदा यत्स्वरूपं स्वदीप्तं निजानन्दरूपाद्यदानन्दमात्रम्।
स्वरूपानुभूत्या सदा यत्स्वमात्रं चिदानन्दरूपं भजेम स्वरूपम्।
जगन्नेति वा खल्विदं ब्रह्मवृत्त्या निजात्मानमेवावशिष्याद्वयं यत्।
अभिन्नं सदा निर्विकल्पं प्रशान्तं चिदानन्दरूपं भजेम स्वपरूम्।
निजात्माष्टकं ये पठन्तीह भक्ताः सदाचारयुक्ताः स्वनिष्ठाः प्रशान्ताः।
भवन्तीह ते ब्रह्म वेदप्रमाणात् तथैवाशिषा निश्चितं निश्चितं मे।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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