१।
वेदधर्म की पुनः प्रतिष्ठा करने वाले, संन्यासियों में श्रेष्ठ, केरल से प्रकट होकर पूरे भारतवर्ष को आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने वाले।
जो हिमालय से समुद्र तक फैले भारत में वेदों के गूढ़ तत्त्व का प्रत्यक्ष बोध कराने वाले हैं।
ऐसे करुणामय गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।
२।
जिन महान आत्माओं का मन श्रौत यज्ञों और वैदिक कर्मों में लगा हुआ है, उनके लिए भी वे यह उपदेश देते हैं कि कर्मों के फल की आसक्ति का त्याग कर सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।
वे बताते हैं कि ऐसा करने से मनुष्य को अनुपम परम सत्य की प्राप्ति होती है।
ऐसे परम ज्ञान देने वाले गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।
३।
जब लोग भेदभाव की दृष्टि से यह सोचते हैं कि अनेक देवता अलग-अलग हैं, और इस कारण वे आपस में निरन्तर विवाद और कलह करते रहते हैं,
तब आचार्य शंकर यह समझाते हैं कि वास्तव में एक ही परम दैवत्व है जो अनेक रूपों में प्रकट होता है।
ऐसी एकत्व की शिक्षा देने वाले गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।
४।
उन्होंने भगवान के अनन्त नामों का अत्यन्त सुंदर और विस्तृत स्तवन किया है, जिनमें परम दिव्य तत्त्व की महिमा गायी जाती है।
उनकी रचनाओं के मधुर शब्द मन को आकर्षित करते हैं और आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करते हैं।
ऐसे करुणासागर गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।
५।
बादरायण मुनि (व्यास) द्वारा रचित ब्रह्मसूत्रों पर उन्होंने महान भाष्य लिखा।
उसमें उन्होंने यह दृढ़तापूर्वक स्थापित किया कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और उसके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या है।
अपने अद्भुत तर्कबल से उन्होंने अनेक मतों और दार्शनिकों को पराजित किया।
ऐसे महान विद्वान गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।
६।
जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से गुरु शंकर की स्तुति करता है, उसे परम गुरु का आश्रय प्राप्त होता है।
भक्त को चाहिए कि वह शंकराचार्य के वचनों को समझे और उनके उपदेशों को हृदय में धारण करे।
उनकी कृपा से मनुष्य को उच्चतम बुद्धि और गहन आध्यात्मिक भाव की प्राप्ति होती है।
ऐसे कृपालु गुरु शंकर का मैं आश्रय लेता हूँ — जो इस पृथ्वी पर स्वयं मंगलस्वरूप शंकर हैं और मेरे भी शंकर हैं।