
Lyrics:
कृपासागरायाशुकाव्यप्रदाय प्रणम्राखिलाभीष्टसन्दायकाय।
यतीन्द्रैरुपास्याङ्घ्रिपाथोरुहाय प्रबोधप्रदात्रे नमः शङ्कराय।।।1।।
चिदानन्दरूपाय चिन्मुद्रिकोद्यत्करायेशपर्यायरूपाय तुभ्यम्।
मुदा गीयमानाय वेदोत्तमाङ्गैः श्रितानन्ददात्रे नमः शङ्कराय।।।2।।
जटाजूटमध्ये पुरा या सुराणां धुनी साऽद्य कर्मेन्द्ररूपस्य शम्भोः।
गले मल्लिकामालिकाव्याजतस्ते विभातीति मन्ये गुरो किं तथैव।।3।।
नखेन्दुप्रभाधूतनम्रालिहार्दान्धकारव्रजायाब्जमन्दस्मिताय।
महामोहपाथोनिधेर्बाडबाय प्रशान्ताय कुर्मो नमः शङ्कराय।।4।।
प्रणम्रान्तरङ्गाब्जबोधप्रदात्रे दिवारात्रमव्याहतोस्राय कामम्।
क्षपेशाय चित्राय लक्ष्मक्षयाभ्यां विहीनाय कुर्मो नमः शङ्कराय।।5।।
प्रणम्रास्य पाथोजमोदप्रदात्रे सदान्तस्तमस्तोमसंहारकर्त्रे।
रजन्यामपीद्धप्रकाशाय कुर्मो ह्यपूर्वाय पूष्णे नमः शङ्कराय।।6।।
नतानां हृदब्जानि फुल्लानि शीघ्रं करोम्याशु योगप्रदानेन नूनम्।
प्रबोधाय चेत्थं सरोजानि धत्से प्रफुल्लानि किं भो गुरो ब्रूहि मह्यम्।।7।।
प्रभाधूतचन्द्रायुतायाखिलेष्टप्रदायाऽऽनतानां समूहाय शीघ्रम्।
प्रतीपाय नम्रौघदुःखाघपङ्क्तेर्मुदा सर्वदा स्यान्नमः शङ्कराय।।8।।
विनिष्कासितानीश तत्त्वावबोधान्नतानां मनोभ्यो ह्यनन्याश्रयाणि।
रजांसि प्रपन्नानि पादाम्बुजातं गुरो रक्तवस्त्रापदेशाद्बिभर्षि।।9।।
मतेर्वेदशीर्षाध्वसम्प्रापकायाऽऽनतानां जनानां कृपार्द्रैः कटाक्षैः।
ततेः पापवृन्दस्य शीघ्रं निहन्त्रे स्मितास्याय कुर्मो नमः शङ्कराय।।10।।
सुपर्वोक्तिगन्धेन हीनाय तूर्णं पुरा तोटकायाखिलज्ञानदात्रे।
प्रवालीयगर्वापहारस्य कर्त्रे पदाब्जमृदिम्ना नमः शङ्कराय।।11।।
भवाम्भोधिमग्नाञ्जनान्दुःखयुक्ताञ्जवादुद्दिधीर्षुर्भवानित्यहोऽहम्।
विदित्वा हि ते कीर्तिमन्यादृशां भो सुखं निर्विशङ्कः स्वपिम्यस्तयत्नः।।12।।
Meaning:
Verse 1
कृपासागरायाशुकाव्यप्रदाय प्रणम्राखिलाभीष्टसन्दायकाय।
यतीन्द्रैरुपास्याङ्घ्रिपाथोरुहाय प्रबोधप्रदात्रे नमः शङ्कराय।।1।।
यहाँ शंकराचार्य को कृपा के सागर के रूप में प्रणाम किया गया है। कृपासागर का अर्थ है ऐसी असीम करुणा, जिसका कोई किनारा नहीं है। अशुकाव्यप्रदाय का तात्पर्य है कि वे अपने भक्तों को तुरंत ही काव्य, ज्ञान और वाणी की दिव्य शक्ति प्रदान कर देते हैं। यह केवल साहित्यिक क्षमता नहीं, बल्कि भीतर से जागृत होने वाली दिव्य अभिव्यक्ति है।
प्रणम्राखिलाभीष्टसन्दायकाय का अर्थ है कि जो भी नम्रता से उनके चरणों में झुकता है, उसकी सभी योग्य इच्छाएँ पूर्ण होती हैं। यहाँ नम्रता अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अहंकार रहते हुए कृपा का अनुभव संभव नहीं होता। यतीन्द्रैरुपास्य का भाव है कि बड़े-बड़े संन्यासी और ज्ञानी भी उनके चरणों की उपासना करते हैं।
अंग्घ्रिपाथोरुह अर्थात उनके चरण कमल हैं, जो संसार की अशुद्धियों से परे हैं। प्रबोधप्रदात्रे का अर्थ है कि वे आत्मज्ञान देने वाले हैं। यह ज्ञान केवल सूचना नहीं, बल्कि आत्मा की जागृति है। इस प्रकार शंकराचार्य गुरु के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अज्ञान का अंधकार मिटाकर सत्य का प्रकाश देता है।
Verse 2
चिदानन्दरूपाय चिन्मुद्रिकोद्यत्करायेशपर्यायरूपाय तुभ्यम्।
मुदा गीयमानाय वेदोत्तमाङ्गैः श्रितानन्ददात्रे नमः शङ्कराय।।2।।
इस श्लोक में शंकराचार्य को चिदानन्द स्वरूप कहा गया है। चिदानन्द का अर्थ है चेतना और आनंद का एकरस रूप। वे केवल ज्ञानी नहीं हैं, बल्कि स्वयं परम सत्य के प्रत्यक्ष स्वरूप हैं। चिन्मुद्रिकोद्यत्कराय का अर्थ है कि उनके हाथ में चिन्मुद्रा है, जो जीव और ब्रह्म के ऐक्य का प्रतीक है।
ईशपर्यायरूपाय का अर्थ है कि वे ईश्वर के ही समान स्वरूप हैं। गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं माना गया है। वेदोत्तमाङ्गैः मुदा गीयमानाय का अर्थ है कि उपनिषद जैसे वेदों के श्रेष्ठ अंग भी उनके गुणों का आनंदपूर्वक गान करते हैं।
श्रितानन्ददात्रे का अर्थ है कि जो उनके शरण में आता है, उसे वे सच्चा आनंद प्रदान करते हैं। यह आनंद बाहरी सुख नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की अनुभूति से उत्पन्न शांति है। इस प्रकार यह श्लोक शंकराचार्य को ज्ञान, आनंद और परम सत्य के जीवंत स्वरूप के रूप में प्रस्तुत करता है।
Verse 3
जटाजूटमध्ये पुरा या सुराणां धुनी साऽद्य कर्मेन्द्ररूपस्य शम्भोः।
गले मल्लिकामालिकाव्याजतस्ते विभातीति मन्ये गुरो किं तथैव।।3।।
इस श्लोक में एक सुंदर काव्यात्मक कल्पना प्रस्तुत की गई है। पुराणों के अनुसार, गंगा नदी भगवान शिव की जटाओं में विराजमान हुई थी, जब वह स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरी थी। जटाजूटमध्ये धुनी का अर्थ है शिव की जटाओं में बहने वाली गंगा।
कवि यहाँ यह कल्पना करता है कि वही गंगा आज गुरु के गले में मल्लिका की माला के रूप में सुशोभित हो रही है। मल्लिकामालिका का अर्थ है चमेली के फूलों की माला। यह केवल बाहरी सौंदर्य का वर्णन नहीं है, बल्कि एक गहरा संकेत है।
गुरु को यहाँ शिव के ही स्वरूप के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार शिव ने गंगा को धारण किया, उसी प्रकार गुरु ज्ञानधारा को धारण करते हैं। गंगा ज्ञान का प्रतीक है, जो अज्ञान को धो देती है। इस प्रकार यह श्लोक बताता है कि गुरु वही दिव्य शक्ति हैं, जो पहले शिव के रूप में प्रकट हुई थी और अब ज्ञान के रूप में प्रवाहित हो रही है।
Verse 4
नखेन्दुप्रभाधूतनम्रालिहार्दान्धकारव्रजायाब्जमन्दस्मिताय।
महामोहपाथोनिधेर्बाडबाय प्रशान्ताय कुर्मो नमः शङ्कराय।।4।।
इस श्लोक में शंकराचार्य के दिव्य प्रकाश का वर्णन किया गया है। नखेन्दुप्रभा का अर्थ है उनके नाखूनों से निकलने वाली चंद्रमा के समान शीतल आभा। यह आभा उन लोगों के हृदय के अंधकार को दूर करती है, जो विनम्रता से उनके सामने झुकते हैं।
अब्दमन्दस्मिताय का अर्थ है उनका कोमल और शांत मुस्कान, जो कमल के समान सुंदर है। यह मुस्कान केवल बाहरी भाव नहीं, बल्कि भीतर की शांति और पूर्णता का प्रतीक है।
महामोहपाथोनिधेर्बाडबाय का अर्थ है कि वे मोह रूपी समुद्र को सूखा देने वाली अग्नि के समान हैं। यह एक गहरी उपमा है, जो बताती है कि उनका ज्ञान अज्ञान के विशाल सागर को भी समाप्त कर सकता है।
प्रशान्ताय का अर्थ है पूर्णतः शांत। इतनी महान शक्ति होते हुए भी वे पूर्ण शांति में स्थित हैं। यह शांति ही सच्चे ज्ञान का लक्षण है, जो सभी विकारों को समाप्त कर देती है।
Verse 5
प्रणम्रान्तरङ्गाब्जबोधप्रदात्रे दिवारात्रमव्याहतोस्राय कामम्।
क्षपेशाय चित्राय लक्ष्मक्षयाभ्यां विहीनाय कुर्मो नमः शङ्कराय।।5।।
इस श्लोक में गुरु के उस स्वरूप का वर्णन है, जो शिष्य के हृदय कमल को ज्ञान से प्रकाशित करता है। प्रणम्रान्तरंगाब्जबोधप्रदात्रे का अर्थ है कि वे नम्र शिष्य के अंतःकरण में स्थित कमल को खिलाते हैं।
दिवारात्रमव्याहतोस्राय का अर्थ है कि उनकी कृपा दिन-रात बिना किसी रुकावट के बहती रहती है। यह कृपा समय और स्थान की सीमाओं से परे है।
क्षपेशाय का अर्थ है समय और परिवर्तन के स्वामी। लक्ष्मक्षयाभ्यां विहीनाय का अर्थ है कि वे न वृद्धि से प्रभावित होते हैं, न हानि से। वे सभी द्वंद्वों से परे हैं।
इस प्रकार गुरु को यहाँ उस परम तत्व के रूप में दर्शाया गया है, जो स्वयं अपरिवर्तनीय है और शिष्य को भी उसी स्थिरता में स्थापित करता है।
Verse 6
प्रणम्रास्य पाथोजमोदप्रदात्रे सदान्तस्तमस्तोमसंहारकर्त्रे।
रजन्यामपीद्धप्रकाशाय कुर्मो ह्यपूर्वाय पूष्णे नमः शङ्कराय।।6।।
यह श्लोक बताता है कि गुरु अपने शरणागतों को आंतरिक आनंद प्रदान करते हैं। प्रणम्रास्य पाथोजमोदप्रदात्रे का अर्थ है कि जो उनके सामने झुकते हैं, उनके हृदय में आनंद का उदय होता है।
सदांतस्तमस्तोमसंहारकर्त्रे का अर्थ है कि वे भीतर के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करते हैं। यह अंधकार वर्षों से संचित भ्रम और गलत धारणाओं का परिणाम है।
रजन्यामपि इद्धप्रकाशाय का अर्थ है कि वे अंधकार में भी प्रकाशमान रहते हैं। उनका ज्ञान स्वयं प्रकाशित है, उसे किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं।
अपूर्वाय पूष्णे का अर्थ है कि वे अद्वितीय रूप से पोषण करने वाले हैं। उनका पोषण केवल शरीर या मन तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मा को सुदृढ़ करता है।
Verse 7
नतानां हृदब्जानि फुल्लानि शीघ्रं करोम्याशु योगप्रदानेन नूनम्।
प्रबोधाय चेत्थं सरोजानि धत्से प्रफुल्लानि किं भो गुरो ब्रूहि मह्यम्।।7।।
इस श्लोक में शिष्य गुरु से प्रश्न करता है। वह कहता है कि आप योग प्रदान करके शरणागतों के हृदय कमलों को तुरंत खिला देते हैं।
योगप्रदानेन का अर्थ है आत्मा और परमात्मा के मिलन का अनुभव देना। हृदब्जानि फुल्लानि करना अर्थात भीतर की चेतना को जागृत करना।
शिष्य पूछता है कि यदि उद्देश्य प्रबोध, यानी आत्मज्ञान देना है, तो पहले हृदय को क्यों खिलाया जाता है। यह प्रश्न बहुत गहरा है।
इसका संकेत यह है कि बिना मन की शुद्धि और हृदय की तैयारी के ज्ञान टिक नहीं सकता। कमल के खिलने का अर्थ है मन का खुलना, निर्मल होना और ग्रहण करने योग्य बनना।
गुरु पहले शिष्य को भीतर से तैयार करते हैं, फिर उसे ज्ञान देते हैं। यही वास्तविक साधना की प्रक्रिया है।
Verse 8
प्रभाधूतचन्द्रायुतायाखिलेष्टप्रदायाऽऽनतानां समूहाय शीघ्रम्।
प्रतीपाय नम्रौघदुःखाघपङ्क्तेर्मुदा सर्वदा स्यान्नमः शङ्कराय।।8।।
इस श्लोक में शंकराचार्य की आभा का वर्णन है, जो अनेक चंद्रमाओं के प्रकाश के समान है। प्रभाधूतचन्द्रायुत का अर्थ है अत्यंत तेजस्वी और शुद्ध प्रकाश से युक्त।
अखिलेष्टप्रदाय का अर्थ है सभी शुभ इच्छाओं को पूर्ण करने वाला। वे केवल भौतिक इच्छाएँ नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति के साधन प्रदान करते हैं।
प्रतीपाय का अर्थ है जो दुखों की श्रृंखला के विरुद्ध खड़े होते हैं। नम्र लोगों के दुखों को दूर करना उनका स्वभाव है।
मुदा सर्वदा स्यान् का अर्थ है कि वे सदैव आनंद में स्थित रहते हैं। यह आनंद किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की अनुभूति से उत्पन्न होता है।
इस प्रकार वे केवल ज्ञानदाता ही नहीं, बल्कि दुखों को दूर करने वाले और आनंद देने वाले भी हैं।