Verse 1
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक गुरुदेव श्री दक्षिणामूर्ति को नमन करते हुए वास्तविकता के स्वरूप का वर्णन करता है। इसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड की तुलना एक ऐसे नगर से की गई है जो दर्पण में दिखाई दे रहा हो। जिस प्रकार दर्पण में दिखने वाला नगर दर्पण के भीतर ही होता है, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत, जो हमें बाहर प्रतीत होता है, वास्तव में हमारे अपने आत्म-तत्व के भीतर ही स्थित है। इस बाहरी प्रतीति का कारण माया की शक्ति है, जो भीतर की ही वास्तविकता को बाहर की तरह प्रकट कर देती है, ठीक उसी प्रकार जैसे निद्रा की अवस्था में हमारा मन ही एक सम्पूर्ण स्वप्न-जगत की रचना कर देता है जो हमें उस समय बिलकुल वास्तविक लगता है।
श्लोक कहता है कि जब आत्म-ज्ञान का सूर्योदय होता है ('प्रबोधसमये'), तब साधक अपने अद्वैत, अर्थात एक और अद्वितीय, आत्मा का सीधा अनुभव ('साक्षात्कार') करता है। उसे यह बोध हो जाता है कि जिसे वह जगत समझ रहा था, वह उसके अपने ही आत्म-स्वरूप का विस्तार है। श्री दक्षिणामूर्ति ही वह गुरु-शक्ति हैं जो इस अज्ञान की निद्रा से जगाकर आत्मा के इस अद्वैत सत्य का बोध कराते हैं। यह श्लोक उन आदि-गुरु को नमन है, जो हमें यह ज्ञान प्रदान करते हैं कि जगत हमसे अलग नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर का एक प्रतिबिंब है, और हमारा वास्तविक स्वरूप उस प्रतिबिंब से अप्रभावित, शुद्ध और अद्वितीय आत्मा है।
Verse 2
बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पितदेशकालकलनावैचित्र्यचित्रीकृतम्।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
इस श्लोक में सृष्टि की प्रक्रिया को एक बीज और अंकुर के उदाहरण से समझाया गया है। जिस प्रकार एक विशाल वृक्ष बनने की क्षमता रखने वाला अंकुर सृष्टि से पहले बीज के भीतर अव्यक्त और अभेद रूप में छिपा रहता है, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड अपनी उत्पत्ति से पहले निर्विकल्प, अर्थात नाम-रूप और भेद से रहित, अवस्था में परम तत्व में ही स्थित था। फिर, माया की शक्ति ने देश (स्थान) और काल (समय) की संरचनाओं को रचा, और इन्हीं के माध्यम से उस एक निर्विकल्प सत्य को अनेक प्रकार के नामों, रूपों और विचित्रताओं वाले जगत के रूप में चित्रित कर दिया। देश और काल ही वे पैमाने हैं जिनके कारण हमें यह विविधतापूर्ण जगत दिखाई देता है।
श्लोक के अनुसार, इस सृष्टि का विस्तार करने वाले श्री दक्षिणामूर्ति हैं। वे एक मायावी या जादूगर की तरह इस जगत का खेल रचते हैं, जो दिखाता है कि यह जगत परमार्थिक दृष्टि से एक माया का खेल है। साथ ही, वे एक महायोगी के समान भी हैं, जो अपनी संकल्प-शक्ति और इच्छा मात्र से ही इस ब्रह्मांड की रचना करते हैं। यह बताता है कि यह सृष्टि कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक चेतन शक्ति का संकल्पित विस्तार है। यह श्लोक उन गुरुदेव को नमन करता है जो इस सृष्टि के रचयिता हैं और जिनकी कृपा से ही हम इस माया के खेल को समझकर उस निर्विकल्प सत्य तक पहुँच सकते हैं जहाँ से यह सब आरम्भ हुआ है।
Verse 3
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान्।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक चेतना के स्वरूप और गुरु की भूमिका पर प्रकाश डालता है। यह कहता है कि यह जगत, जो कि मूल रूप से असत्य या मिथ्या है ('असत्कल्पार्थकं'), केवल इसलिए सत्य प्रतीत होता है क्योंकि इसके पीछे शाश्वत आत्म-तत्व ('सदात्मकम्') का प्रकाश या स्फुरण है। इसका अस्तित्व उस परम सत्य से उधार लिया हुआ है। जैसे अँधेरे में एक रस्सी साँप जैसी प्रतीत होती है; साँप का दिखना असत्य है, पर उसका आधार वास्तविक रस्सी ही है। उसी प्रकार, यह नाम-रूप का जगत आत्म-तत्व के आधार पर ही सत्य जैसा 'भासता' है।
श्लोक का मुख्य भाव गुरु के कार्य को बताता है। गुरुदेव अपने आश्रित शिष्यों को वेद के महान वाक्य 'तत् त्वम् असि' (अर्थात, 'वह ब्रह्म तुम ही हो') के द्वारा सीधे और प्रत्यक्ष रूप से परम सत्य का ज्ञान कराते हैं। गुरु का यह उपदेश केवल शाब्दिक नहीं होता, बल्कि यह शिष्य के भीतर आत्म-साक्षात्कार को जगा देता है। इस ज्ञान का फल बताते हुए कहा गया है कि इस सत्य का साक्षात्कार कर लेने पर ('यत्साक्षात्करणात्'), व्यक्ति संसार रूपी महासागर ('भवाम्भोनिधौ') में जन्म-मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है, उसकी पुनरावृत्ति नहीं होती। यह श्लोक उन करुणा मूर्ति श्री दक्षिणामूर्ति को नमन है जो 'तत् त्वम् असि' का ज्ञान देकर अपने भक्तों को इस अथाह संसार-सागर से पार लगाते हैं।
Verse 4
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक एक बहुत ही सुन्दर उपमा के द्वारा यह समझाता है कि किस प्रकार एक ही, सार्वभौमिक चेतना व्यक्ति के और पूरे विश्व के ज्ञान को प्रकाशित करती है। इसमें आत्मा की तुलना एक ऐसे महान दीपक ('महादीप') से की गई है जो अनेक छिद्रों वाले एक घड़े ('नानाच्छिद्रघट') के भीतर रखा हुआ है। उस दीपक का प्रकाश, जो कि शुद्ध ज्ञान-स्वरूप है, उन छिद्रों के माध्यम से बाहर की ओर फैलता है। यहाँ घड़ा हमारा शरीर है और छिद्र हमारी इन्द्रियाँ हैं, जैसे आँख, कान, आदि। आत्मा का यही भीतरी प्रकाश इन्द्रियों के द्वारा बाहर की ओर प्रवाहित ('बहिः स्पन्दते') होता है, जिससे हमें सभी वस्तुओं का ज्ञान संभव हो पाता है।
श्लोक का दूसरा भाग इस विचार को और स्पष्ट करता है। यह सम्पूर्ण जगत ('समस्तं जगत्') हमें केवल इसलिए दिखाई देता है और जाना जाता है क्योंकि स्व-प्रकाशित आत्मा का प्रकाश उस पर पड़ रहा है। जगत का अपना कोई प्रकाश या चेतना नहीं है; वह तो उस स्वयं-प्रकाशमान ('भान्तम्') आत्मा के पीछे-पीछे ही प्रकाशित ('अनुभाति') होता है। हमारा प्रत्येक ज्ञान, जिसे हम 'मैं जानता हूँ' ('जानामि इति') कहकर व्यक्त करते हैं, वह वास्तव में उस मौलिक, सर्व-व्यापी चेतना का ही एक प्रतिबिंब है। हम ज्ञान उत्पन्न नहीं करते, बल्कि हमारे भीतर का ज्ञान-दीपक इन्द्रियों के माध्यम से जगत को प्रकाशित करता है। यह श्लोक उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमन है जो ज्ञान के उस परम, स्व-प्रकाशित स्रोत हैं, जिनके बिना यह ब्रह्मांड अज्ञात और अंधकारमय रहता।
Verse 5
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहा व्यामोहसंहारिणे
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक आत्मा के बारे में प्रचलित विभिन्न भ्रांतियों का वर्णन करता है और श्री दक्षिणामूर्ति की स्तुति उस महा-मोह के विनाशक के रूप में करता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार अज्ञान से भ्रमित लोग 'मैं' की पहचान उन वस्तुओं से कर लेते हैं जो आत्मा नहीं हैं। ऐसे विचारकों को अत्यंत भ्रमित ('भ्रान्ता भृशं') कहा गया है और उनकी समझ की तुलना स्त्रियों, बालकों, नेत्रहीनों और जड़बुद्धि वालों से की गई है, जो उनकी अपरिपक्वता को दर्शाता है। ये लोग गलती से 'मैं' का अर्थ स्थूल शरीर ('देहं'), प्राण-शक्ति ('प्राणम्'), इन्द्रियाँ ('इन्द्रियाणि'), सदा बदलती रहने वाली बुद्धि ('चलां बुद्धिं'), या फिर शून्यवादियों की तरह एक अभाव या शून्य ('शून्यं') को मान लेते हैं।
इनमें से प्रत्येक पहचान दार्शनिक त्रुटि के एक स्तर को दर्शाती है - स्थूल भौतिकवाद से लेकर शून्यवाद तक। श्लोक के अनुसार, इस व्यापक और शक्तिशाली भ्रम ('महाव्यामोह') का कारण माया की शक्ति का खेल ('मायाशक्तिविलास') है। माया ही वह शक्ति है जो इस विविधतापूर्ण जगत की रचना करती है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप पर पर्दा डालकर यह मौलिक त्रुटि उत्पन्न करती है, जिससे हम आत्मा का आरोपण अनात्म वस्तुओं पर कर देते हैं। वास्तविक 'मैं' तो वह शुद्ध चेतना है जो शरीर, श्वास, इन्द्रियों और बुद्धि इन सभी का साक्षी है, पर इनमें से कोई भी नहीं है। यह श्लोक उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमन है जो माया द्वारा रचे गए इस महान भ्रम के संहारक ('संहारिणे') हैं। वे अपनी कृपा और मौन उपदेश से इन झूठी पहचानों को काटकर साधक को उसके वास्तविक, साक्षी स्वरूप का बोध कराते हैं।
Verse 6
राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान्।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक आत्मा के निरंतर और स्थायी स्वरूप को प्रकट करने के लिए गहरी नींद (सुषुप्ति) की अवस्था का उपयोग करता है। इसकी शुरुआत एक शक्तिशाली उपमा से होती है। जिस प्रकार ग्रहण के समय राहु के द्वारा सूर्य ('दिवाकर') या चंद्रमा ('इन्दु') अस्थायी रूप से ढक लिए जाते हैं, उसी प्रकार गहरी नींद के दौरान आत्मा का वास्तविक स्वरूप, जो कि शुद्ध अस्तित्व ('सन्मात्रः') है, माया के आवरण ('माया-समाच्छादनात्') से ढक जाता है। इस अवस्था में सभी इन्द्रियाँ और मन पूरी तरह से शांत और सिमट ('करणोपसंहरणतः') जाते हैं, और व्यक्ति अपनी जाग्रत पहचान को खो देता है। उस समय जगत, शरीर या अहंकार का कोई अनुभव नहीं होता और यह एक शून्यता की अवस्था प्रतीत होती है।
परन्तु, श्लोक का दूसरा भाग रहस्योद्घाटन करता है। जागने पर ('प्रबोधसमये'), व्यक्ति को उस अवस्था की एक स्पष्ट स्मृति या पहचान ('प्रत्यभिज्ञायते') होती है, जिसे वह कहता है 'मैं सुख से सोया था' ('प्रागस्वाप्समिति')। यह स्मृति अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिद्ध करती है कि गहरी नींद में भी चेतना उपस्थित थी। यदि चेतना पूरी तरह से अनुपस्थित होती, तो उस अवस्था की कोई स्मृति नहीं हो सकती थी। जो 'मैं' गहरी नींद की शून्यता के साक्षी के रूप में उपस्थित था, वही 'मैं' जागने पर इस तथ्य को पहचानता है। इससे यह सिद्ध होता है कि आत्मा जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं में एक निरंतर, अपरिवर्तनशील साक्षी है। यह श्लोक उन श्री दक्षिणामूर्ति को नमन करता है जो वही आत्म-तत्व हैं, जो सभी अवस्थाओं के पार स्थायी साक्षी के रूप में विद्यमान रहते हैं।
Verse 7
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक सभी बदलती परिस्थितियों के बीच आत्मा के अपरिवर्तनीय स्वरूप का वर्णन करता है और इस सत्य को एक विशेष मुद्रा द्वारा प्रकट करने के लिए श्री दक्षिणामूर्ति की स्तुति करता है। यह कहता है कि जीवन की सभी विभिन्न अवस्थाओं, जैसे बचपन, युवावस्था और वृद्धावस्था ('बाल्यादिषु') में, तथा चेतना की सभी दशाओं, जैसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ('जाग्रदादिषु') में, और वास्तव में सभी संभव स्थितियों ('सर्वास्ववस्थास्वपि') में एक ही तत्व स्थिर रहता है। जबकि ये सभी अवस्थाएँ आती-जाती रहती हैं और एक-दूसरे से भिन्न हैं ('व्यावृत्तासु'), इन सबके बीच एक निरंतर उपस्थिति ('अनुवर्तमानम्') के रूप में 'मैं' ('अहम् इति') का भाव सदा भीतर प्रकाशित ('अन्तः स्फुरन्तं सदा') होता रहता है।
यही सदा उपस्थित 'मैं' हमारा वास्तविक आत्म-स्वरूप है, वह साक्षी चेतना जो शरीर, मन और जगत के परिवर्तनों से अप्रभावित रहती है। श्लोक आगे बताता है कि गुरु इस सत्य को कैसे प्रकट करते हैं। वे अपने भक्तों ('भजतां') के लिए इस अंतरतम आत्मा ('स्वात्मानं') को अपनी कल्याणकारी हस्त-मुद्रा ('मुद्रया भद्रया') से प्रकट ('प्रकटीकरोति') करते हैं। यह संकेत चिनमुद्रा (या ज्ञान मुद्रा) की ओर है, जिसमें अंगूठे और तर्जनी के सिरों को मिलाकर एक वृत्त बनाया जाता है और अन्य तीन उंगलियाँ सीधी रहती हैं। यह मुद्रा प्रतीकात्मक रूप से जीवात्मा (तर्जनी) का परमात्मा (अंगूठे) के साथ मिलन और तीनों गुणों या अवस्थाओं से परे जाने का प्रतिनिधित्व करती है। यह श्लोक उन दयालु गुरु को नमन है जो एक सरल किन्तु गहन मुद्रा के माध्यम से साधक के भीतर उस परम, सदा-प्रकाशमान आत्म-तत्व को प्रकट कर देते हैं।
Verse 8
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक उस जीवात्मा की दशा का वर्णन करता है जो माया के प्रभाव के कारण द्वैत की धारणाओं के जाल में फँसा हुआ है। यह बताता है कि एक साधारण व्यक्ति ('य एष पुरुषः'), चाहे वह जाग्रत अवस्था ('जाग्रति वा') में हो या स्वप्न ('स्वप्ने') में, वह जगत को पूरी तरह से भेद-भाव और संबंधों ('भेदतः') के रूप में ही देखता है। यह खंडित दृष्टि ही एक अज्ञानी जीवन का परिचायक है। श्लोक इस प्रकार के द्वैतपूर्ण संबंधों के कई उदाहरण देता है: कार्य और कारण का संबंध ('कार्यकारणतया'), स्वामी और सेवक का संबंध ('स्वस्वामिसम्बन्धतः'), शिष्य और आचार्य का संबंध ('शिष्याचार्यतया'), तथा पिता और पुत्र जैसे पारिवारिक संबंध ('पितृपुत्राद्यात्मना')।
इसका मूल विचार यह है कि अज्ञानी व्यक्ति इन वैचारिक श्रेणियों में पूरी तरह से उलझा रहता है। उसकी पूरी वास्तविकता इन्हीं द्वंद्वों और सापेक्ष पहचानों से बनी होती है। वह दुनिया को अलग-अलग वस्तुओं, लोगों और अवधारणाओं के रूप में देखता है, और अपनी पहचान भी इन्हीं अलग-अलग सत्ताओं के संबंध में परिभाषित करता है। श्लोक स्पष्ट रूप से इस खंडित विश्व-दृष्टि का कारण बताता है: वह व्यक्ति 'माया द्वारा पूरी तरह से भ्रमित' ('मायापरिभ्रामितः') है। माया ही वह शक्ति है जो इस अनेकता और भेद के भ्रम को उत्पन्न करती है, जिससे एक अद्वैत वास्तविकता अनगिनत अलग-अलग प्राणियों और वस्तुओं के संसार के रूप में प्रतीत होती है। इस संदर्भ में श्री दक्षिणामूर्ति को नमन अत्यंत मार्मिक है, क्योंकि वे उसी भ्रमित जीवात्मा के वास्तविक आत्म-स्वरूप हैं। गुरु की कृपा से ही व्यक्ति माया के इस भ्रम को भेद पाता है और यह समझता है कि सभी संबंध और भेद अंततः उस एक अद्वैत आत्मा में ही विलीन हो जाते हैं।
Verse 9
भूरम्भास्यनलोऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यह श्लोक श्री दक्षिणामूर्ति का एक विराट, ब्रह्मांडीय स्वरूप प्रस्तुत करता है, जिसमें उन्हें सम्पूर्ण जगत के सभी रूपों के साथ एकाकार बताया गया है। इसमें भगवान के आठ प्रकार के स्वरूपों ('मूर्त्यष्टकम्') की गणना की गई है, जिनसे मिलकर वह सब कुछ बना है जो अस्तित्व में है। ये आठ रूप हैं: पृथ्वी ('भूः'), जल ('अम्भांसि'), अग्नि ('अनलः'), वायु ('अनिलः'), आकाश ('अम्बरम्'), सूर्य ('अहर्नाथः'), चंद्रमा ('हिमांशुः'), और चेतन व्यक्ति या आत्मा ('पुमान्')। इस सूची में भौतिक जगत का निर्माण करने वाले पंच महाभूत, समय और जीवन को नियंत्रित करने वाले दो प्रमुख खगोलीय पिंड, और इस जगत का अनुभव करने वाली चेतन सत्ता शामिल हैं। यह सम्पूर्ण चर-अचर जगत ('चराचरात्मकमिदं') भगवान के इन आठ स्वरूपों की ही अभिव्यक्ति है।
इसके बाद श्लोक इस विराट दर्शन से अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष निकालता है। जो लोग गहराई से विचार ('विमृशतां') करते हैं, उनके लिए यह स्पष्ट हो जाता है कि इस परम और सर्वव्यापी प्रभु ('यस्मात्परस्माद्विभोः') के अलावा और कुछ भी अस्तित्व में नहीं है ('नान्यत्किञ्चन विद्यते')। यह अद्वैत के सिद्धांत का सबसे व्यापक रूप है। यदि ब्रह्मांड में सब कुछ - पृथ्वी के स्थूल तत्व से लेकर आत्मा के सूक्ष्म तत्व तक - भगवान का ही एक रूप है, तो उनसे अलग या बाहर कोई वास्तविकता नहीं हो सकती। जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह केवल उनके आठ-रूपों का ही प्रकाश ('इत्याभाति') है। यह श्लोक गुरु के उस विराट स्वरूप को नमन करता है जो केवल अद्वैत के शिक्षक ही नहीं, बल्कि स्वयं वह अद्वैत वास्तविकता हैं, जो हमारे द्वारा अनुभव की जाने वाली प्रत्येक वस्तु के रूप में प्रकट हो रहे हैं।
Verse 10
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिंस्स्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात्।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम्।
यह अंतिम श्लोक 'फलश्रुति' है, जो इस स्तोत्र के पाठ, श्रवण और मनन से होने वाले लाभों का वर्णन करता है। यह एक समापन सारांश और साधक के लिए एक प्रोत्साहन के रूप में कार्य करता है। श्लोक की शुरुआत यह कहते हुए होती है कि इस स्तोत्र ('अमुष्मिन् स्तवे') में 'सर्वात्मभाव' के सत्य को, अर्थात सभी का आत्मा होने की अवस्था ('सर्वात्मत्वम्') को, बहुत स्पष्ट रूप से समझाया और प्रकट किया गया है। पिछले नौ श्लोकों ने व्यवस्थित रूप से इस अद्वैत सत्य को उजागर किया है, यह दिखाते हुए कि कैसे जीवात्मा परमात्मा श्री दक्षिणामूर्ति के साथ एक है, और कैसे यही आत्मा सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आधार है।
इसके बाद यह स्तोत्र से जुड़ने की उन विधियों को बताता है जिनसे इसका फल प्राप्त होता है। ये विधियाँ हैं: इसका श्रवण करना ('श्रवणात्'), इसके अर्थ पर मनन करना ('तदर्थमननात्'), इसके सत्यों पर ध्यान करना ('ध्यानाच्च'), और इसका कीर्तन या गायन करना ('सङ्कीर्तनात्')। यह वेदान्तिक साधना का शास्त्रीय मार्ग है: श्रवण, मनन और निदिध्यासन। इन अभ्यासों के माध्यम से, साधक को स्वतः ही ('स्वतः') ईश्वरत्व ('ईश्वरत्वं') की प्राप्ति होती है, जिसका लक्षण है 'सर्वात्मभाव' की महान विभूति का अनुभव करना। इसके अतिरिक्त, उसे आठ प्रकार की अबाधित सिद्धियाँ ('अष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम्') भी प्राप्त होती हैं। ये सिद्धियाँ आत्म-ज्ञान का लक्ष्य नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार का एक स्वाभाविक परिणाम हैं। इस प्रकार, स्तोत्र यह पुष्टि करते हुए समाप्त होता है कि इसकी शिक्षाओं के साथ एक ईमानदार जुड़ाव न केवल एकता के ज्ञान के माध्यम से मुक्ति की ओर ले जाता है, बल्कि उस सर्वोच्च अवस्था की अंतर्निहित शक्तियों और महिमा को भी सहजता से प्रकट करता है।
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदिदं प्राङ्निर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पितदेशकाल-
कलनावैचित्र्यचित्रीकृतम्।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्त्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान्।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
नानाच्छिद्रघटोदरस्थित-
महादीपप्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्रीबालान्धजडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः।
मायाशक्तिविलासकल्पितमहा व्यामोहसंहारिणे
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान्।
प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्तास्वनुवर्तमान-
महमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृपुत्राद्यात्मना भेदतः।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो मायापरिभ्रामितः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
भूरम्भास्यनलो-
ऽनिलोऽम्बरमहर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम्।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये।
सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिंस्स्तवे
तेनास्य श्रवणात्तदर्थ-
मननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात्।
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्यमव्याहतम्।