
तेजक्रसानु रोष महिशेशा।
अगः अवगुण धनधनी धनेशा।
उदयकेतु समहित सबही के।
कुम्भकरण सम सोबत नीके।
पर अकाज लगी तनु परिहर ही।
जिमि हिम उपल कृशी दलि गरही।
दुष्ट जन तेज में अग्नि के समान हैं और कोप में महिषासुर के समान हैं। अवगुण रूपी धन में ये कुबेर जैसे धनी हैं। यदि सभी का हित हो रहा हो, तो ये केतु की तरह अनिष्टकारी हो जाते हैं। इसलिए कुंभकरण की तरह इनका सोते रहना ही अच्छा है।
दूसरों की हानि करने के लिए ये अपने शरीर को, अपने आप को भी हानि पहुँचा लेते हैं। जैसे ओले खेती का नाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ये भी होते हैं।
अग्नि स्वयं तपती रहती है और लोग उसमें ईंधन डालें तो वह और भी अधिक तपकर दूसरों को जलाती है। वैसे ही दुष्ट जन स्वयं जलते रहते हैं और जितना अधिक विभव पाते हैं, उतने ही अधिक प्रचंड होकर अपने आप को तेजस्वी मानते हुए दूसरों को हानि पहुँचाते हैं।
अग्नि सभी को जलाती है — चाहे वह उसका उपासक हो या द्वेषी। उसी प्रकार दुष्ट जन चाहे मित्र हों या शत्रु, सभी को हानि पहुँचाते हैं। बार-बार ये प्रचंड हो जाते हैं। हर बात पर ये महिषासुर की तरह अपनी लाल आँखें निकालकर दिखाते हैं। यदि बात बढ़ जाए, तो ये यमराज की तरह प्राण भी छीनने को उद्यत हो जाते हैं।
कुबेर धन के देवता हैं। उनके पास अपार धन होता है और वे उसका प्रसार करते रहते हैं। वैसे ही दुर्जन अवगुणों और पापों के देवता जैसे होते हैं। वे इनका आश्रय लेते हैं, इनका प्रचार-प्रसार करते हैं और सदा इनके साथ रहते हैं।
कुबेर का घड़ा चाहे जितना खाली किया जाए, वह फिर भी धन से भरा रहता है। उसी प्रकार दुर्जनों का मन पाप और अवगुणों से भरा ही रहता है।
केतु को पुछ्छतल तारा कहते हैं। जब उसका उदय होता है तो वह राजा और प्रजा, दोनों की हानि करता है। वैसे ही, जहाँ भी ये दुर्जन उपस्थित होते हैं, वहाँ अज्ञान फैलाकर हानि करते हैं।
कुंभकरण की तरह यदि ये सोते रहें तो संसार का कल्याण है। यदि भाग्यवश इन दुर्जनों को कुछ विभव या ऐश्वर्य मिल जाए, तो ये अपने ही हितचिंतकों के लिए बाधक बन जाते हैं। इसलिए दुर्जनों का ऐश्वर्यहीन रहना ही जगत के लिए कल्याणकारी है।
दुष्ट जन थोड़े से ऐश्वर्य से उग्र क्यों हो जाते हैं?
क्योंकि उनका भीतर का अहंकार और जलन सदा सक्रिय रहती है। जैसे ही उन्हें थोड़ा बल या वैभव मिलता है, वे अपने को श्रेष्ठ मानने लगते हैं और दूसरों को दबाने का प्रयास करते हैं। उनका ताप भीतर से निकलकर बाहर आक्रामक रूप में फूटता है।
दुष्ट को इतना अस्थिर क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उनका स्वभाव संतुलित नहीं होता। जैसे अग्नि को यदि हवा मिल जाए तो वह बेकाबू हो जाती है, वैसे ही दुष्ट व्यक्ति को यदि अवसर मिले तो वह नियंत्रण खो देता है।
ऐश्वर्य मिलने पर सब अहंकारी हो जाते हैं क्या?
नहीं, सज्जन व्यक्ति ऐश्वर्य को सेवा और परोपकार का माध्यम बनाते हैं। केवल दुष्ट व्यक्ति ही उसका उपयोग दूसरों को हानि पहुँचाने के लिए करता है।
दुष्ट क्यों अपने ही शुभचिंतकों का भी बुरा करते हैं?
क्योंकि वे सबको संदेह की दृष्टि से देखते हैं। वे मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति उनके प्रभाव को चुनौती दे सकता है। इसीलिए वे मित्र और शत्रु में भेद नहीं करते।
कोई सज्जन भी गलती से दुर्जन को समर्थन दे दे तो?
तब भी दुष्ट उसे कभी स्थायी मित्र नहीं मानता। जैसे सांप को दूध पिलाने से वह विष नहीं छोड़ता, वैसे ही दुष्ट भी अपने स्वभाव में परिवर्तन नहीं करता।
दुष्ट का स्वभाव बदला नहीं जा सकता क्या?
वह बहुत कठिन है, क्योंकि यह उसकी गहराई में बैठी प्रवृत्ति है। यदि कोई परिवर्तन हो भी, तो वह केवल भय या स्वार्थवश होता है, स्थायी नहीं।
क्यों कहा गया कि दुर्जनों का सोए रहना ही अच्छा है?
क्योंकि उनकी निष्क्रियता समाज को राहत देती है। जैसे कुम्भकरण जागता है तो तबाही मचाता है, वैसे ही दुष्ट जागरूक होकर अहित करता है।
क्या किसी को निष्क्रिय बना देना समाधान है?
यदि उसका स्वभाव ही हिंसक और हानिकर हो, तो हाँ। दुष्ट की शक्ति और सक्रियता समाज के लिए हानिकारक है, इसलिए उसे रोकना ही श्रेष्ठ है।
क्या यह दृष्टिकोण क्रूरता नहीं है?
नहीं, यह व्यावहारिक दृष्टि है। यदि किसी की सक्रियता से बार-बार हानि हो रही है, तो उसे सीमित करना ही समाज की रक्षा है।
दुष्ट क्यों स्वयं को भी हानि पहुँचाते हैं?
क्योंकि उनका अहंकार विवेक को ढँक देता है। वे केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया में जीते हैं, और दीर्घकालिक परिणाम नहीं सोचते।
क्या यह आत्मविनाश नहीं है?
हाँ, और यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। जैसे ओले स्वयं भी पिघल जाते हैं, वैसे ही दुष्ट अपनी ही आग में जल जाते हैं।
तो क्या दुष्ट अपने कर्मों का फल खुद भुगतते हैं?
अवश्य। उनकी हानि केवल दूसरों की नहीं होती, वे अंततः स्वयं के लिए भी विनाश का कारण बनते हैं।
दुष्ट का मन सदा पापों से भरा क्यों रहता है?
क्योंकि वे सद्गुणों को अपनाते ही नहीं। वे झूठ, छल, हिंसा और द्वेष में ही आत्मसंतोष महसूस करते हैं।
क्या यह मानसिक रोग जैसा है?
आंशिक रूप से हाँ। जब कोई मन बार-बार अधर्म में लिप्त रहता है, तो वह स्वभाव बन जाता है।
कोई इसे कैसे पहचान सकता है?
जिसके मन में हमेशा क्रोध, ईर्ष्या और विघ्न डालने की प्रवृत्ति हो, वह पापों से भरा होता है।
केतु का उदाहरण दुष्टों से कैसे जुड़ता है?
केतु का उदय जब होता है तो वह राज्य और समाज को हानि पहुँचाता है। दुष्ट भी जहाँ जाते हैं, वहाँ अज्ञान, कलह और विनाश फैलाते हैं।
क्या दुष्ट हमेशा अशांति का कारण बनते हैं?
हाँ, क्योंकि उनका मन सकारात्मकता से रिक्त होता है। वे दूसरों को गिराने में ही सुख अनुभव करते हैं।
तो क्या समाज को सजग रहना चाहिए?
बिलकुल। दुष्टों के प्रभाव को पहचानकर उन्हें दूर रखना ही रक्षा का उपाय है।
यदि दुष्ट ऐश्वर्यहीन रहें तो क्या होगा?
तो वे समाज के लिए निष्क्रिय और निष्प्रभावी बने रहेंगे। उनका हानि करने का बल समाप्त हो जाएगा।
ऐश्वर्य मिलने पर वे क्यों संकट बन जाते हैं?
क्योंकि शक्ति उनके अहंकार को उभार देती है। वे नियंत्रण खो देते हैं और सबका विनाश करने लगते हैं।
क्या इससे यह निष्कर्ष निकले कि संपत्ति केवल सज्जनों के हाथ में होनी चाहिए?
हां, क्योंकि सज्जन उसका उपयोग लोकहित में करते हैं, जबकि दुर्जन उसे विध्वंस के लिए।
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