सीतापति पंचक स्तोत्र

भक्ताह्लादं सदसदमेयं शान्तं
रामं नित्यं सवनपुमांसं देवम्।
लोकाधीशं गुणनिधिसिन्धुं वीरं
सीतानाथं रघुकुलधीरं वन्दे।
भूनेतारं प्रभुमजमीशं सेव्यं
साहस्राक्षं नरहरिरूपं श्रीशम्।
ब्रह्मानन्दं समवरदानं विष्णुं
सीतानाथं रघुकुलधीरं वन्दे।
सत्तामात्रस्थित- रमणीयस्वान्तं
नैष्कल्याङ्गं पवनजहृद्यं सर्वम्।
सर्वोपाधिं मितवचनं तं श्यामं
सीतानाथं रघुकुलधीरं वन्दे।
पीयूषेशं कमलनिभाक्षं शूरं
कम्बुग्रीवं रिपुहरतुष्टं भूयः।
दिव्याकारं द्विजवरदानं ध्येयं
सीतानाथं रघुकुलधीरं वन्दे।
हेतोर्हेतुं श्रुतिरसपेयं धुर्यं
वैकुण्ठेशं कविवरवन्द्यं काव्यम्।
धर्मे दक्षं दशरथसूनुं पुण्यं
सीतानाथं रघुकुलधीरं वन्दे।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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fGayx
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