पंचमुख हनुमान पंचरत्न स्तोत्र

श्रीरामपादसरसी- रुहभृङ्गराज-
संसारवार्धि- पतितोद्धरणावतार।
दोःसाध्यराज्यधन- योषिददभ्रबुद्धे
पञ्चाननेश मम देहि करावलम्बम्।
आप्रातरात्रिशकुनाथ- निकेतनालि-
सञ्चारकृत्य पटुपादयुगस्य नित्यम्।
मानाथसेविजन- सङ्गमनिष्कृतं नः
पञ्चाननेश मम देहि करावलम्बम्।
षड्वर्गवैरिसुख- कृद्भवदुर्गुहाया-
मज्ञानगाढतिमिराति- भयप्रदायाम्।
कर्मानिलेन विनिवेशितदेहधर्तुः
पञ्चाननेश मम देहि करावलम्बम्।
सच्छास्त्रवार्धिपरि- मज्जनशुद्धचित्ता-
स्त्वत्पादपद्मपरि- चिन्तनमोदसान्द्राः।
पश्यन्ति नो विषयदूषितमानसं मां
पञ्चाननेश मम देहि करावलम्बम्।
पञ्चेन्द्रियार्जित- महाखिलपापकर्मा
शक्तो न भोक्तुमिव दीनजनो दयालो।
अत्यन्तदुष्टमनसो दृढनष्टदृष्टेः
पञ्चाननेश मम देहि करावलम्बम्।
इत्थं शुभं भजकवेङ्कट- पण्डितेन
पञ्चाननस्य रचितं खलु पञ्चरत्नम्।
यः पापठीति सततं परिशुद्धभक्त्या
सन्तुष्टिमेति भगवानखिलेष्टदायी।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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इस परोपकारी कार्य में वेदधारा का समर्थन करते हुए खुशी हो रही है -Ramandeep

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