
अस्य श्रीरामरक्षाकवचस्य। बुधकौशिकर्षिः। अनुष्टुप्-छन्दः। श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। सीता शक्तिः। हनूमान् कीलकम्। श्रीमद्रामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
हर मंत्र का एक आधार होता है। यह श्लोक आरंभिक जानकारी देता है। ऋषि बुधकौशिक इसके रचयिता हैं। इसमें अनुष्टुप छंद का प्रयोग है। भगवान श्रीराम इसके मुख्य देवता हैं। माता सीता इसकी शक्ति हैं। हनुमान जी इसके रक्षक हैं। श्रीराम की प्रसन्नता हेतु यह पाठ होता है। पाठ से पूर्व यह संकल्प आवश्यक है। इससे मन सांसारिक विचारों से हटता है। हमारा ध्यान एक पवित्र दिशा में जाता है। उचित आरंभ बहुत महत्वपूर्ण है। यह साधक के मन को एकाग्र करता है। सच्ची भक्ति के लिए शुद्ध भावना चाहिए। एक स्थिर मन ही परम शांति पाता है।
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्।
यहाँ प्रस्तुत किए गए सजीव चित्र को देखिए। मन को एक स्पष्ट केंद्र चाहिए। यह श्लोक श्रीराम के दिव्य रूप को दर्शाता है। उनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं। वे हाथ में धनुष-बाण धारण करते हैं। वे पद्मासन में विराजमान हैं। उन्होंने पीले वस्त्र धारण किए हैं। उनके नेत्र नवकमल के समान सुंदर हैं। उनके मुख पर पूर्ण प्रसन्नता है। माता सीता उनके वाम भाग में विराजमान हैं। श्रीराम की दृष्टि सीता जी के मुख पर है। उनके शरीर की कांति मेघों जैसी श्यामल है। वे अनेक आभूषणों से सुसज्जित हैं। उनके सिर पर जटाओं का मुकुट है। भगवान के दर्शन से भक्ति जागृत होती है। एकाग्रता से मन शीघ्र शांत होता है।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्। एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।
यह पंक्ति पवित्र कथाओं की महिमा बताती है। श्रीराम की जीवन कथा अत्यंत विशाल है। इसका विस्तार सौ करोड़ श्लोकों तक है। इसकी वास्तविक सीमा कोई नहीं जानता। यहाँ कथा का आकार महत्वपूर्ण नहीं है। इस कथा का एक-एक अक्षर अत्यंत प्रभावशाली है। केवल एक अक्षर ही महापापों को मिटा देता है। यह गहरे आध्यात्मिक अवरोधों को भस्म करता है। भगवान का नाम स्वयं एक शुद्ध ऊर्जा है। पवित्र ध्वनियों में दिव्य स्पंदन होता है। पूरी कथा का ज्ञान होना अनिवार्य नहीं है। इसका एक छोटा अंश भी कल्याणकारी है। यह मनुष्य के हृदय को पूर्णतः शुद्ध करता है। पाप केवल अज्ञान का अंधकार है। दिव्य नाम भीतर शुद्ध प्रकाश लाता है। प्रकाश क्षण भर में अंधकार नष्ट करता है।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्। जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।
पिछले विचार को आगे बढ़ाते हुए ध्यान पुनः केंद्रित होता है। हम एक बार पुनः भगवान का स्मरण करते हैं। उनका वर्ण श्यामल और अत्यंत सुंदर है। वे नीले कमल के समान प्रतीत होते हैं। उनके नेत्र खिले हुए पुष्पों जैसे कोमल हैं। वे यहाँ एकाकी नहीं हैं। माता सीता और लक्ष्मण उनके साथ हैं। वे शक्ति और गहरी भक्ति के प्रतीक हैं। श्रीराम की जटाएँ ऊपर बंधी हुई हैं। वे एक राजसी मुकुट की भांति दिखती हैं। यह राजधर्म और वैराग्य का अद्भुत संगम है। वे अभी वन में निवास कर रहे हैं। तथापि वे ही वास्तविक राजा हैं। सच्चा राजत्व मन की एक स्थिति है। बाह्य आवरण से कोई अंतर नहीं पड़ता। आंतरिक शांति हर परिस्थिति में प्रकाशित होती है।
सासितूर्णधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्। स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।
इन शब्दों में एक अत्यंत गहरा सत्य छिपा है। श्लोक श्रीराम को पूर्णतः अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित दिखाता है। उनके हाथों में खड्ग और धनुष है। उनकी पीठ पर तूणीर बंधा है। वे राक्षसों का विनाश करने वाले हैं। राक्षस हमारी नकारात्मक आंतरिक प्रवृत्तियों को दर्शाते हैं। भगवान बिना किसी प्रयास के संसार की रक्षा करते हैं। यह सब केवल उनकी एक दिव्य लीला है। वास्तव में वे अजन्मे और अनंत हैं। उन्होंने हमारे लिए एक रूप धारण किया है। निराकार ईश्वर एक आकार ग्रहण करता है। यह सब विशुद्ध प्रेम के कारण होता है। वे जगत का कल्याण करना चाहते हैं। सुरक्षा उनका मूल स्वभाव है। अच्छाई को बचाने हेतु वे बुराई मिटाते हैं। परमात्मा केवल गहरी करुणा से कार्य करता है।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्। शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।
किसी ज्ञानी व्यक्ति को इसका पाठ क्यों करना चाहिए? इसका उत्तर बहुत स्पष्ट रूप से दिया गया है। यह स्तोत्र सभी पाप कर्मों को नष्ट करता है। यह सभी उत्तम इच्छाओं को पूर्ण भी करता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति इसका नित्य पठन करता है। अब शारीरिक सुरक्षा का अंश आरंभ होता है। यह स्तोत्र मानव शरीर की रक्षा करता है। भगवान राघव मेरे सिर की रक्षा करें। दशरथ के पुत्र मेरे भाल को सुरक्षित रखें। हम भगवान के विभिन्न नामों का स्मरण करते हैं। प्रत्येक नाम शरीर के एक विशिष्ट अंग को बचाता है। परमात्मा हमारे भौतिक शरीर में प्रवेश करता है। अध्यात्म और शारीरिक स्वास्थ्य आपस में जुड़ जाते हैं। शरीर एक सुरक्षित मंदिर बन जाता है। सच्ची आस्था एक अदृश्य कवच का निर्माण करती है।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती। घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।
अब ध्यान मुख के निचले भाग की ओर जाता है। माता कौशल्या के पुत्र नेत्रों की रक्षा करें। विश्वामित्र के प्रिय भगवान कानों को सुरक्षित रखें। यज्ञों के रक्षक मेरी नासिका की रक्षा करें। लक्ष्मण से स्नेह करने वाले मुख को सुरक्षित रखें। यहाँ प्रयुक्त विशेष नामों पर ध्यान दें। प्रत्येक नाम एक महान घटना का स्मरण कराता है। उन्होंने अपनी माता को अत्यंत सुख दिया। उन्होंने अपने गुरु की आज्ञा का पूर्ण पालन किया। उन्होंने प्राचीन पवित्र यज्ञों को बचाया। उन्होंने अपने भ्राता से बहुत गहरा प्रेम किया। ये नाम विशिष्ट दिव्य गुणों का आह्वान करते हैं। शरीर पूर्णतः सद्गुणों से आच्छादित हो जाता है। हमारी दृष्टि और वाणी सुरक्षित हो जाती है। शुद्ध इंद्रियाँ सदैव सत्य को ही देखती हैं।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः। स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।
यह पाठ अंगों का वर्णन जारी रखता है। विद्या के सागर मेरी जिह्वा की रक्षा करें। सत्य वचन वास्तविक ज्ञान से ही आते हैं। भरत द्वारा वंदित भगवान मेरी ग्रीवा को बचाएं। दिव्य अस्त्र धारण करने वाले कंधों की रक्षा करें। शिव का धनुष तोड़ने वाले बाहुओं को सुरक्षित रखें। हमारे कंधे जीवन का भार उठाते हैं। हाथ नित्य प्रति के कर्म करते हैं। इन दोनों कार्यों हेतु ईश्वरीय शक्ति चाहिए। हम उसी गहरी शक्ति की प्रार्थना करते हैं। धनुष तोड़ना महान बल का प्रतीक था। वही बल हमारे कर्मों की रक्षा करता है। शारीरिक कर्मों को यहाँ आध्यात्मिक आश्रय मिलता है। केवल मानवीय प्रयास बहुत सीमित होता है। ईश्वर की कृपा प्रत्येक कार्य को सफल बनाती है।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्। मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।
यह वर्णन देह के मध्य भाग पर प्रकाश डालता है। माता सीता के स्वामी दोनों हाथों की रक्षा करें। हाथ प्रेम से दान देने के काम आते हैं। परशुराम को जीतने वाले हृदय को सुरक्षित रखें। हृदय को बहुत गहरा और अडिग साहस चाहिए। राक्षस खर को मारने वाले शरीर के मध्य भाग को बचाएं। जाम्बवान को आश्रय देने वाले नाभि की रक्षा करें। नाभि हमारे शरीर का ऊर्जा केंद्र है। हम अपने मूल स्थान के लिए सुरक्षा मांगते हैं। भीतर का भय पूर्णतः समाप्त हो जाता है। प्रेम और साहस एक साथ रहते हैं। एक दृढ़ हृदय हर संकट का सामना करता है। सुरक्षित हाथ सदैव उत्तम कार्य ही करेंगे। आंतरिक सुरक्षा आपके बाह्य जीवन को बदल देती है।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः। ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्।
नीचे की ओर बढ़ते हुए निचले भाग को सुरक्षा मिलती है। सुग्रीव के स्वामी मेरी कटि की रक्षा करें। हनुमान जी के प्रभु कूल्हों को सुरक्षित रखें। रघुवंश में सर्वश्रेष्ट भगवान उरुओं को बचाएं। वे राक्षसों के संपूर्ण कुल का नाश करने वाले हैं। शरीर का निचला भाग हमें स्थिरता देता है। यह हमें नित्य सीधे खड़े रहने में सहायता करता है। हनुमान जी संपूर्ण और सच्ची भक्ति के प्रतीक हैं। सुग्रीव मित्रता और गहरे विश्वास को दर्शाते हैं। श्रीराम इन दोनों महान गुणों के स्वामी हैं। हमारी नींव को इन्हीं विशेष गुणों की आवश्यकता है। भक्ति और विश्वास हमें सदैव स्थिर रखते हैं। वे हमें नीचे गिरने से रोकते हैं। आंतरिक स्थिरता बाह्य उथल-पुथल को सरलता से संभाल लेती है।
जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः।
यहाँ एक बहुत गहरा सत्य प्रकट होता है। समुद्र पर सेतु बनाने वाले घुटनों की रक्षा करें। रावण का वध करने वाले जंघाओं को सुरक्षित रखें। विभीषण को ऐश्वर्य देने वाले चरणों की रक्षा करें। अंत में भगवान राम संपूर्ण शरीर को सुरक्षित रखें। रामसेतु बनाना पूर्णतः असंभव प्रतीत होता था। यह दर्शाता है कि भगवान सर्वत्र मार्ग बनाते हैं। रावण अत्यंत बड़े अहंकार का प्रतीक है। भगवान उस विशाल अहंकार को सरलता से मिटा देते हैं। विभीषण को पूर्ण समर्पण के कारण संपत्ति प्राप्त हुई। चरण हमें जीवन में आगे ले जाते हैं। ईश्वर के प्रति समर्पण यात्रा को सुरक्षित बनाता है। अब संपूर्ण शरीर सुरक्षित हो गया है। पूर्ण समर्पण पूर्ण सुरक्षा लेकर आता है।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।
यहाँ ग्रंथ अंतिम फलों के विषय में बताता है। यह प्रार्थना श्रीराम की शक्ति से परिपूर्ण है। एक पुण्यवान व्यक्ति इसका नित्य पाठ करता है। इसके परिणाम बहुत ही स्पष्ट हैं। उस व्यक्ति की आयु लंबी होती है। वह प्रसन्न और सचमुच बहुत धन्य रहता है। उसे उत्तम और संस्कारी संतान प्राप्त होती है। उसे प्रत्येक कार्य में विजय मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अत्यंत विनम्र बन जाता है। विनम्रता वास्तव में सबसे बड़ा पुरस्कार है। शक्ति प्रायः मनुष्यों को बहुत अहंकारी बना देती है। यह विशेष शक्ति मनुष्य को शांत बनाती है। सच्ची सफलता कभी बड़ा अहंकार उत्पन्न नहीं करती। सांसारिक सुख और आंतरिक शांति बहुत सुंदरता से मिल जाते हैं।
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।
इस सुरक्षा का वास्तविक स्वरूप क्या है? यह अदृश्य नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है। पाताल लोक में दुष्ट तत्व घूमते हैं। वे पृथ्वी पर भी खुलेआम विचरते हैं। वे आकाश में भी उड़ते हैं। कई हमारे आस-पास भेष बदलकर छिपते हैं। तथापि वे अपना सारा बल खो देते हैं। वे आपको देख तक नहीं सकते हैं। राम का नाम आपको पूर्णतः बचाता है। यह एक अदृश्य तेज प्रकाश उत्पन्न करता है। नकारात्मकता इस प्रकाश का सामना सर्वथा नहीं कर सकती। बुराई पवित्रता से बहुत दूर रहती है। मन भय से पूर्णतः मुक्त रहता है। अदृश्य संकट बहुत शीघ्र पिघल जाते हैं। भगवान का नाम समस्त अंधकार दूर कर देता है।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।
यह श्लोक स्मरण करने का अभ्यास समझाता है। आप राम या रामभद्र या रामचंद्र कह सकते हैं। नाम का केवल स्मरण करना ही पर्याप्त है। मनुष्य पापों से अछूता रहता है। पुराने बुरे कर्म अपनी पकड़ खो देते हैं। उसके जीवन में बहुत उत्तम घटनाएँ होती हैं। वह सांसारिक सुखों का पूर्ण आनंद लेता है। बाद में उसे आध्यात्मिक मुक्ति भी मिलती है। आपको दोनों में से किसी एक को चुनना नहीं पड़ता। भौतिक और आध्यात्मिक दोनों सुख प्राप्त होते हैं। नाम मन को पूर्णतः शुद्ध कर देता है। एक शुद्ध मन जीवन का सही आनंद लेता है। वह मुक्ति की ओर भी शांति से बढ़ता है। भगवान के नाम में समस्त निधियाँ छिपी हैं।
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।
मूल लाभ बताने के पश्चात यह प्रतिफल और बड़ा हो जाता है। राम का नाम विश्व जीतने वाला मंत्र है। यह सर्वत्र अद्वितीय रूप से शक्तिशाली है। यह मनुष्य की निरंतर रक्षा करता है। कोई इसे अपने कंठ में धारण कर सकता है। वे इसे अपने स्वर में बसा सकते हैं। इसका अर्थ है कि वे इसका नित्य जप करते हैं। उनके लिए सभी चमत्कारी सिद्धियां प्रकट होती हैं। सफलता सीधे उनके हाथों में आ जाती है। वे किसी भी सफलता के पीछे नहीं भागते। सफलता स्वयं उन्हें सरलता से खोज लेती है। नाम को समीप रखने से सब कुछ बदल जाता है। कंठ हमारी वाणी का मुख्य केंद्र है। निरंतर स्मरण से छिपी हुई क्षमता बाहर आती है। आंतरिक ध्यान बाह्य जगत को जीत लेता है।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।
यहाँ प्रयुक्त विशेष शब्द पर ध्यान दें। यह ग्रंथ इसे वज्र का पिंजरा कहता है। वज्र को तोड़ना पूर्णतः असंभव है। राम का यह कवच सर्वथा वैसा ही है। जो इसका स्मरण करता है उसे चरम शक्ति मिलती है। उसकी आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं होता है। उसे सर्वत्र बहुत बड़ा सम्मान प्राप्त होता है। उसे प्रत्येक स्थान पर विजय मिलती है। उसे सदैव शुद्ध मंगल प्राप्त होता है। वज्र का पिंजरा हर ओर से रक्षा करता है। यह प्रकाश को बहुत सुंदरता से भीतर आने देता है। यह सभी संकटों को पूर्णतः बाहर रखता है। मनुष्य बलवान और कांतिमान दोनों बन जाता है। पूर्ण सुरक्षा जीवन में पूर्ण विजय लाती है।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।
यहाँ दी गई शिक्षा सीधे इसके गहरे मूल की ओर संकेत करती है। यह किसी मनुष्य की रचना सर्वथा नहीं है। स्वयं भगवान शिव ने यह प्रार्थना दी थी। वे एक बहुत विशेष स्वप्न में प्रकट हुए थे। उन्होंने इसे ऋषि बुधकौशिक को सुनाया। ऋषि प्रातः काल बहुत शीघ्र जाग गए। उन्होंने तुरंत यह सब लिख लिया। उन्होंने ठीक वही लिखा जो उन्होंने सुना था। एक ऋषि का मन अत्यंत शुद्ध होता है। वह दिव्य संदेशों को पूर्णतः ग्रहण करता है। शिव भगवान राम से अत्यंत प्रेम करते हैं। उन्होंने प्रेमवश यह रहस्य साझा किया। यह प्रार्थना सीधे परमात्मा से आती है। दिव्य वरदान सदैव सत्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
अथ श्रीरामकवचम्।
अस्य श्रीरामरक्षाकवचस्य। बुधकौशिकर्षिः। अनुष्टुप्-छन्दः।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता। सीता शक्तिः। हनूमान् कीलकम्।
श्रीमद्रामचन्द्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
ध्यानम्।
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्।
वामाङ्कारूढसीता-
मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्।
अथ स्तोत्रम्।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्।
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम्।
सासितूर्णधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्।
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम्।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः।
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः।
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः।
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः।
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्।
जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घे दशमुखान्तकः।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्।
पातालभूतलव्योम-
चारिणश्छद्मचारिणः।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः।
रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः।
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्।
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः।