Special - Vidya Ganapathy Homa - 26, July, 2024

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ललितांबा स्तुति

का त्वं शुभकरे सुखदुःखहस्ते
त्वाघूर्णितं भवजलं प्रबलोर्मिभङ्गैः।
शान्तिं विधातुमिह किं बहुधा विभग्नां
मतः प्रयत्नपरमासि सदैव विश्वे।
सम्पादयत्यविरतं त्वविरामवृत्ता
या वै स्थिता कृतफलं त्वकृतस्य नेत्री।
सा मे भवत्वनुदिनं वरदा भवानी
जानाम्यहं ध्रुवमिदं धृतकर्मपाशा।
को वा धर्मः किमकृतं क्व कपाललेखः
किं वादृष्टं फलमिहास्ति हि यां विना भोः।
इच्छापाशैर्नियमिता नियमाः स्वतन्त्रैः
यस्या नेत्री भवति सा शरणं ममाद्या।
सन्तानयन्ति जलधिं जनिमृत्युजालम्
सम्भावयन्त्यविकृतं विकृतं विभग्नम्।
यस्या विभूतय इहामितशक्तिपालाः
नाश्रित्य तां वद कुतः शरणं व्रजामः।
मित्रे रिपौ त्वविषमं तव पद्मनेत्रं
स्वस्थे दुःस्थे त्ववितथं तव हस्तपातः।
मृत्युच्छाया तव दया त्वमृतञ्च मातः
मा मां मुञ्चन्तु परमे शुभदृष्टयस्ते।
क्वाम्बा सर्वा क्व गणनं मम हीनबुद्धेः
धत्तुं दोर्भ्यामिव मतिर्जगदेकधात्रीम्।
श्रीसञ्चिन्त्यं सुचरणमभयपतिष्ठं
सेवासारैरभिनुतं शरणं प्रपद्ये।
या माया जन्म विनयत्यतिदुःखमार्गै-
रासंसिद्धेः स्वकलितैर्ल्ललितैर्विलासैः।
या मे बुद्धिं सुविदधे सततं धरण्यां
साम्बा सर्वा मम गतिः सफले फले वा।

 

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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2y6bu
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