राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र

राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्र

मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणि प्रसन्नवक्त्रपङ्कजे निकुञ्जभूविलासिनि ।
व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनुसङ्गते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ १ ॥

'अर्थ'
'हे मुनीन्द्रों के समूह द्वारा वंदित, तीनों लोकों के शोक को हरने वाली, प्रसन्न कमल के समान मुख वाली, निकुंजभूमि में विलास करने वाली, व्रजराज की पुत्री और व्रजेन्द्रनन्दन (श्रीकृष्ण) के साथ रहने वाली श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'प्रथम श्लोक श्री राधा रानी के दिव्य परिचय से आरंभ होता है। 'मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते' उनकी परम पूजनीयता को दर्शाता है कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी उनकी स्तुति करते हैं। 'त्रिलोकशोकहारिणि' उनकी करुणा का गुणगान करता है, जो तीनों लोकों के दुखों को दूर करने में समर्थ हैं। उनके 'प्रसन्नवक्त्रपङ्कजे' मुख की शोभा कमल के समान है, जो सदैव आनंद और शांति बिखेरता है। 'निकुञ्जभूविलासिनि' उन्हें वृंदावन के रमणीय निकुंजों में विहार करने वाली बताता है, जो उनके आनंदमय स्वरूप का प्रतीक है। उन्हें 'व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि' (राजा वृषभानु की पुत्री) और 'व्रजेन्द्रसूनुसङ्गते' (भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय संगिनी) कहकर उनके लौकिक और अलौकिक संबंधों को दर्शाया गया है। भक्त इस श्लोक में उनसे उस परम कृपा-दृष्टि की याचना करता है, जो उसके जीवन को धन्य कर सकती है।'

अशोकवृक्षवल्लरीवितानमण्डपस्थिते प्रवालबालपल्लवप्रभारुणाङ्घ्रिकोमले ।
वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ २॥

'अर्थ'
'हे अशोक वृक्ष की लताओं के मंडप में विराजमान, नवीन प्रवाल और कोमल पत्तों की कांति के समान लालिमायुक्त कोमल चरणों वाली, वर और अभय देने वाले हाथों से सुशोभित, प्रचुर संपदाओं की आश्रयदात्री श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और उनके करुणामयी स्वभाव को रेखांकित करता है। उन्हें 'अशोकवृक्षवल्लरीवितानमण्डपस्थिते' यानी अशोक लताओं से बने मंडप में विराजमान बताया गया है, जो वृंदावन की प्राकृतिक सुंदरता में उनके दिव्य निवास की कल्पना कराता है। उनके चरण कमल की उपमा 'प्रवालबालपल्लवप्रभारुणाङ्घ्रिकोमले' से दी गई है, जिसका अर्थ है कि उनके कोमल चरण नवीन प्रवाल और लाल पत्तों की भांति सुंदर और लालिमायुक्त हैं। उनके 'वराभयस्फुरत्करे' हाथ भक्तों को वरदान और अभय प्रदान करने वाले हैं, जो उनकी शरणागतवत्सलता को दर्शाता है। वे 'प्रभूतसम्पदालये' हैं, अर्थात सभी प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक संपदाओं की स्रोत हैं। भक्त उनसे प्रार्थना कर रहा है कि वे अपनी अहेतुकी कृपा से उसे भी संपदा और सुरक्षा प्रदान करें।'

अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभङ्गुरभ्रुवां सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः ।
निरन्तरं वशीकृतप्रतीतिनन्दनन्दने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ३॥

'अर्थ'
'हे कामदेव के रंगमंच के मंगलमय प्रसंगों में अपनी चंचल भृकुटियों के साथ, लीलापूर्वक और अनुरागपूर्वक कटाक्ष रूपी बाणों से निरंतर नंदनंदन (श्रीकृष्ण) को अपने वश में करने वाली श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी की उस अद्वितीय प्रेम शक्ति का वर्णन करता है, जिससे वे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को भी मोहित कर लेती हैं। 'अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभङ्गुरभ्रुवां' उन्हें प्रेम-क्रीड़ाओं के मंगलमय प्रसंगों में अपनी चंचल भृकुटियों से शोभायमान बताता है। उनकी 'सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः' यानी लीला और प्रेम से भरी कटाक्ष-दृष्टि बाणों के समान है, जो 'निरन्तरं वशीकृतप्रतीतिनन्दनन्दने' अर्थात नंदनंदन श्रीकृष्ण को निरंतर अपने वश में रखती है। यह राधा-कृष्ण के प्रेम की गहराई और राधा रानी की प्रियतमा के रूप में सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है। भक्त यह जानता है कि यदि राधा रानी श्रीकृष्ण को भी मोहित कर सकती हैं, तो उनकी कृपा से वह भी परम आनंद को प्राप्त कर सकता है।'

तडित्सुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहे मुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले ।
विचित्रचित्रसञ्चरच्चकोरशाबलोचने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष भाजनम् ॥ ४॥

'अर्थ'
'हे बिजली, स्वर्ण और चंपक पुष्प के समान देदीप्यमान गौर वर्ण वाली, जिसके मुख की प्रभा करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्रमाओं के मंडल को भी परास्त कर देती है, और जिसकी आँखें चंचल चकोर के बच्चों के समान सुंदर हैं, ऐसी श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के अलौकिक शारीरिक सौंदर्य का विस्तृत वर्णन करता है। उनका 'तडित्सुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहे' शरीर बिजली, स्वर्ण और चंपक पुष्प के समान उज्ज्वल और गौर वर्ण का है, जो उनकी दिव्य कांति को दर्शाता है। उनके 'मुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले' मुख की आभा करोड़ों शरद पूर्णिमा के चंद्रमाओं की सुंदरता को भी फीका कर देती है, जो उनके मुखमंडल की अद्वितीय चमक और शांति का प्रतीक है। उनकी 'विचित्रचित्रसञ्चरच्चकोरशाबलोचने' आँखें चंचल चकोर के बच्चों के समान सुंदर और गतिशील हैं, जो उनके नेत्रों के आकर्षण और जीवंतता को प्रकट करती हैं। भक्त ऐसी अनुपम सौंदर्यमयी राधा रानी से कृपा की याचना कर रहा है।'

मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डिते प्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते ।
अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥५॥

'अर्थ'
'हे मदमस्त और अतिशय यौवन से परिपूर्ण, आनंद से सुशोभित, प्रियतम (श्रीकृष्ण) के अनुराग से रंगी हुई, कला और विलास में पंडित, और अनुपम धन्य निकुंजों के राज्य में कामकेलि (प्रेम-क्रीड़ा) में प्रवीण श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के यौवन, उनके आनंदमय स्वभाव, श्रीकृष्ण के प्रति उनके अनन्य प्रेम और उनकी कलात्मक प्रवीणता का चित्रण करता है। उनका 'मदोन्मदातियौवने' अनुपम यौवन उनकी सुंदरता और आकर्षण को बढ़ाता है। वे 'प्रमोदमानमण्डिते' अर्थात सदैव आनंद से सुशोभित रहती हैं। 'प्रियानुरागरञ्जिते' का अर्थ है कि वे अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रेम के रंग में रंगी हुई हैं, जो उनके गहरे प्रेम संबंध को दर्शाता है। वे 'कलाविलासपण्डिते' अर्थात कला और विलास में निपुण हैं, जो उनकी सूक्ष्म कलात्मकता का परिचायक है। 'अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकामकेलिकोविदे' उन्हें वृंदावन के अद्वितीय निकुंजों में प्रेम-क्रीड़ाओं में अत्यंत कुशल बताता है, जो उनकी और श्रीकृष्ण की दिव्य रासलीलाओं की ओर संकेत करता है। भक्त उनसे ऐसी दिव्य लीलाओं का अनुभव कराने वाली कृपा की याचना करता है।'

अशेषहावभावधीरहीरहारभूषिते प्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भकुम्भसुस्तनि ।
प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ६॥

'अर्थ'
'हे समस्त हाव-भाव रूपी गंभीर हीरों के हार से सुशोभित, प्रचुर स्वर्ण कलशों के समान सुंदर स्तनों वाली, और प्रशंसनीय मंद मुस्कान रूपी चूर्ण से परिपूर्ण सौख्य के सागर श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के शारीरिक सौंदर्य और उनके शांत आनंदमय स्वरूप का वर्णन करता है। वे 'अशेषहावभावधीरहीरहारभूषिते' हैं, अर्थात उनके सभी हाव-भाव (शारीरिक चेष्टाएं और भाव) गंभीर हीरों के हार के समान सुंदर और शोभायमान हैं। 'प्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भकुम्भसुस्तनि' उन्हें प्रचुर स्वर्ण कलशों के समान सुंदर और सुडौल स्तनों वाली बताता है, जो उनके शारीरिक सौंदर्य की चरम सीमा है। उनकी 'प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरे' मंद मुस्कान इतनी मनोहारी है कि वह असीम आनंद (सौख्य के सागर) को भर देती है। उनकी हल्की मुस्कान भी अनंत सुख प्रदान करने वाली है। भक्त ऐसी सौंदर्यमयी और आनंदमयी राधा रानी से कृपा की प्रार्थना कर रहा है।'

मृणालवालवल्लरी तरङ्गरङ्गदोर्लते लताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने ।
ललल्लुलन्मलन्मनोज्ञमुग्धमोहनाश्रिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ७॥

'अर्थ'
'हे कमलनाल की कोमल लताओं के समान तरंगित और रंगीन भुजाओं वाली, लता के अग्रभाग पर नाचती हुई चंचल नीली आँखों से देखने वाली, और मन को मोहने वाले, लुभाने वाले और मोहित करने वाले सुंदर, मुग्ध कर देने वाले मोह की आश्रयदात्री श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी की भुजाओं की कोमलता, उनकी आँखों की चंचलता और उनके मनमोहक आकर्षण का वर्णन करता है। उनकी 'मृणालवालवल्लरी तरङ्गरङ्गदोर्लते' भुजाएँ कमलनाल की कोमल लताओं के समान तरंगित और रंगीन हैं, जो उनकी सुंदरता, कोमलता और लचीलेपन को दर्शाता है। उनकी 'लताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने' आँखें लता के अग्रभाग पर नाचती हुई नीली आँखों के समान चंचल और आकर्षक हैं। यह उनकी आँखों की गतिशीलता और मोहक दृष्टि का वर्णन है। 'ललल्लुलन्मलन्मनोज्ञमुग्धमोहनाश्रिते' वाक्यांश उनके संपूर्ण व्यक्तित्व में व्याप्त मनोहारी, लुभावनी और मुग्ध कर देने वाली मोहिनी शक्ति का वर्णन करता है। भक्त ऐसी अत्यंत आकर्षक राधा रानी से कृपा की याचना कर रहा है।'

सुवर्णमालिकाञ्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगे त्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिते ।
सलोलनीलकुन्तलप्रसूनगुच्छगुम्फिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ८॥

'अर्थ'
'हे सोने की मालाओं से सुशोभित तीन रेखाओं वाले शंख के समान कंठ वाली, तीन धागों वाली मंगलमयी डोर (मंगलसूत्र) और तीन रत्नों की दीप्ति से प्रकाशित, तथा चंचल नीले केशों में फूलों के गुच्छों से गुंथी हुई श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के गले, केशों और आभूषणों के सौंदर्य का वर्णन करता है। उनका 'सुवर्णमालिकाञ्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगे' कंठ सोने की मालाओं से सुशोभित और तीन रेखाओं वाले शंख के समान सुंदर है। 'त्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिते' का अर्थ है कि वे तीन धागों वाली मंगलमयी डोर और तीन रत्नों की दीप्ति से प्रकाशित हैं, जो उनके पवित्र और शुभ स्वरूप को दर्शाता है। उनके 'सलोलनीलकुन्तलप्रसूनगुच्छगुम्फिते' चंचल नीले केशों में फूलों के गुच्छे गुंथे हुए हैं, जो उनके केशों की सुंदरता और उनमें सजे फूलों की मनोहारी छटा का वर्णन है। भक्त ऐसी सुंदर और सुसज्जित राधा रानी से अपनी कृपा की याचना कर रहा है।'

नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणे प्रशस्तरत्नकिङ्किणीकलापमध्यमञ्जुले ।
करीन्द्रशुण्डदण्डकावराहसौभगोरुके कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ९॥

'अर्थ'
'हे गोल नितंबों पर लटकती हुई फूलों की मेखला (कमरबंद) से सुशोभित, उत्तम रत्नों की छोटी घंटियों के समूह के बीच अति सुंदर, और हाथी की सूंड के समान सुंदर तथा सौभाग्यशाली जांघों वाली श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के नितंबों, कमरबंद और जांघों के सौंदर्य का वर्णन करता है। उनके 'नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणे' गोल नितंबों पर फूलों की मेखला (कमरबंद) सुशोभित है, जो उनके सौंदर्य को बढ़ाती है। वे 'प्रशस्तरत्नकिङ्किणीकलापमध्यमञ्जुले' अर्थात उत्तम रत्नों की छोटी घंटियों से सजी करधनी के बीच अत्यंत सुंदर लगती हैं। उनकी 'करीन्द्रशुण्डदण्डकावराहसौभगोरुके' जांघें हाथी की सूंड के समान सुंदर और सौभाग्यशाली हैं। हाथी की सूंड को शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है। भक्त ऐसी अनुपम सौंदर्य वाली राधा रानी से कृपा की याचना कर रहा है।'

अनेकमन्त्रनादमञ्जुनूपुरारवस्खल त्समाजराजहंसवंशनिक्वणातिगौरवे ।
विलोलहेमवल्लरीविडम्बचारुचङ्क्रमे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥१०॥

'अर्थ'
'हे जिसके सुंदर नूपुरों का रव अनेक मंत्रों के नाद के समान मधुर है, जिसके चलने पर राजहंसों के समूह का कलरव भी अत्यंत गौण हो जाता है, और जो चंचल स्वर्ण लताओं की शोभा को तिरस्कृत करने वाले सुंदर गति से चलती है, ऐसी श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के नूपुरों की ध्वनि और उनकी चलने की मनोहारी गति का वर्णन करता है। उनके 'अनेकमन्त्रनादमञ्जुनूपुरारवस्खल' सुंदर नूपुरों की ध्वनि अनेक मंत्रों के नाद के समान मधुर है, जो मन को शांति और आनंद प्रदान करती है। उनके चलने पर 'समाजराजहंसवंशनिक्वणातिगौरवे' अर्थात राजहंसों के समूह का मधुर कलरव भी गौण हो जाता है, जो उनकी चाल की पवित्रता और माधुर्य को दर्शाता है। उनकी 'विलोलहेमवल्लरीविडम्बचारुचङ्क्रमे' चलने की गति इतनी सुंदर और मनोहर है कि वह चंचल स्वर्ण लताओं की गति को भी मात देती है। भक्त ऐसी दिव्य ध्वनि और गति वाली राधा रानी से कृपा की याचना कर रहा है।'

अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते हिमाद्रिजापुलोमजाविरिञ्चजावरप्रदे ।
अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसम्पदङ्गुलीनखे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥११॥

'अर्थ'
'हे अनन्त कोटि विष्णु लोकों में ब्रह्मा (पद्मजा) द्वारा पूजित, पार्वती (हिमाद्रिजा), इंद्राणी (पुलोमजा) और सरस्वती (विरिञ्चजा) को वरदान देने वाली, तथा जिसकी उंगलियों के नखों में अपार सिद्धियाँ, ऋद्धियाँ और असीम संपदाएँ लिप्त हैं, ऐसी श्री राधे! तुम कब मुझे अपने कृपाकटाक्ष का पात्र बनाओगी?'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी की सर्वोच्च दिव्यता, सर्वशक्तिमानता और असीम ऐश्वर्य का वर्णन करता है। वे 'अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते' हैं, अर्थात अनंत कोटि विष्णु लोकों में भी पूजनीय हैं, और स्वयं ब्रह्मा भी उनकी अर्चना करते हैं। वे 'हिमाद्रिजापुलोमजाविरिञ्चजावरप्रदे' हैं, अर्थात पार्वती, इंद्राणी और सरस्वती जैसी देवियों को भी वरदान प्रदान करने वाली हैं, जो उनकी शक्ति और उदारता का प्रमाण है। 'अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसम्पदङ्गुलीनखे' का अर्थ है कि उनकी उंगलियों के नखों में ही अपार सिद्धियाँ (अलौकिक शक्तियाँ), ऋद्धियाँ (समृद्धि) और असीम संपदाएँ समाहित हैं। यह उनके असीम ऐश्वर्य और सभी प्रकार की सुख-समृद्धि की स्रोत होने का वर्णन करता है। भक्त ऐसी सर्वशक्तिमान और ऐश्वर्यमयी राधा रानी से कृपा की याचना कर रहा है।'

मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि त्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि ।
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोदकाननेश्वरि व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते ॥ १२॥

'अर्थ'
'हे यज्ञों की स्वामिनी, क्रियाओं की स्वामिनी, स्वधा की स्वामिनी, देवताओं की स्वामिनी, तीनों वेदों की भारती (ज्ञान) की स्वामिनी, प्रमाणों और शासनों की स्वामिनी, रमा (लक्ष्मी) की स्वामिनी, क्षमा की स्वामिनी, प्रमोद (आनंद) के वन की स्वामिनी, व्रज की ईश्वरी, व्रज की अधिष्ठात्री देवी श्री राधे! आपको मेरा नमस्कार है।'

'व्याख्या'
'यह श्लोक श्री राधा रानी के विभिन्न रूपों और उनकी सर्वोच्च सत्ता का वर्णन करता है। यह एक नमस्कार श्लोक है जहां भक्त उनके विभिन्न गुणों को नमन करता है। उन्हें 'मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि' (यज्ञों, क्रियाओं, स्वधा और देवताओं की स्वामिनी), 'त्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि' (तीनों वेदों के ज्ञान, प्रमाणों और शासनों की स्वामिनी), 'रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोदकाननेश्वरि' (लक्ष्मी, क्षमा और आनंद के वन की स्वामिनी) और अंत में 'व्रजेश्वरि व्रजाधिपे' (व्रज की ईश्वरी और अधिष्ठात्री देवी) कहकर संबोधित किया गया है। यह श्लोक श्री राधा रानी के सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान स्वरूप को दर्शाता है, जिनसे भक्त अपनी अगाध श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करता है।'

अमुं ममाद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम् ।
भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनं भवेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम् ॥ १३॥

'अर्थ'
'इस मेरे अद्भुत स्तोत्र को सुनकर, वृषभानु की पुत्री (श्री राधा रानी) इस जन को निरंतर कृपाकटाक्ष का पात्र बनाएं। तभी मेरे संचित तीनों प्रकार के कर्मों का नाश होगा, और तभी व्रजेन्द्रनन्दन (श्रीकृष्ण) के मंडल में प्रवेश संभव होगा।'

'व्याख्या'
'यह फलश्रुति श्लोक है, जिसमें स्तोत्र पाठ के लाभ और भक्त की अंतिम इच्छा व्यक्त की गई है। भक्त प्रार्थना करता है कि 'भानुनन्दनी' (राधा रानी) 'अमुं ममाद्भुतं स्तवं निशम्य' (मेरे इस अद्भुत स्तोत्र को सुनकर) उसे 'सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम्' (निरंतर कृपा दृष्टि का पात्र) बनाएं। इस कृपा का परिणाम बताते हुए कहा गया है कि 'भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनं' यानी तभी उसके तीनों प्रकार के कर्मों (संचित, क्रियमाण, प्रारब्ध) का नाश होगा, जो मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। और 'भवेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम्' अर्थात कर्मों के नाश के बाद ही उसे भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य मंडल (उनकी लीलाओं और भक्तों के समूह) में प्रवेश मिलेगा। यह श्लोक राधा रानी की कृपा की सर्वोच्चता को स्थापित करता है, जो मोक्ष और भक्ति प्राप्ति के लिए परम आवश्यक है।'

 

मुनीन्द्रवृन्दवन्दिते त्रिलोकशोकहारिणि प्रसन्नवक्त्रपङ्कजे निकुञ्जभूविलासिनि ।

व्रजेन्द्रभानुनन्दिनि व्रजेन्द्रसूनुसङ्गते कदा करिष्यसीह  मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ १ ॥

अशोकवृक्षवल्लरीवितानमण्डपस्थिते प्रवालबालपल्लवप्रभारुणाङ्घ्रिकोमले ।

वराभयस्फुरत्करे प्रभूतसम्पदालये कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ २॥

अनङ्गरङ्गमङ्गलप्रसङ्गभङ्गुरभ्रुवां सविभ्रमं ससम्भ्रमं दृगन्तबाणपातनैः ।

निरन्तरं वशीकृतप्रतीतिनन्दनन्दने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ३॥

तडित्सुवर्णचम्पकप्रदीप्तगौरविग्रहे मुखप्रभापरास्तकोटिशारदेन्दुमण्डले ।

विचित्रचित्रसञ्चरच्चकोरशाबलोचने कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्ष भाजनम् ॥ ४॥

मदोन्मदातियौवने प्रमोदमानमण्डिते प्रियानुरागरञ्जिते कलाविलासपण्डिते ।

अनन्यधन्यकुञ्जराज्यकामकेलिकोविदे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥५॥

अशेषहावभावधीरहीरहारभूषिते प्रभूतशातकुम्भकुम्भकुम्भकुम्भसुस्तनि ।

प्रशस्तमन्दहास्यचूर्णपूर्णसौख्यसागरे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ६॥

मृणालवालवल्लरी तरङ्गरङ्गदोर्लते लताग्रलास्यलोलनीललोचनावलोकने ।

ललल्लुलन्मलन्मनोज्ञमुग्धमोहनाश्रिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ७॥

सुवर्णमालिकाञ्चितत्रिरेखकम्बुकण्ठगे त्रिसूत्रमङ्गलीगुणत्रिरत्नदीप्तिदीधिते ।

सलोलनीलकुन्तलप्रसूनगुच्छगुम्फिते कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ८॥

नितम्बबिम्बलम्बमानपुष्पमेखलागुणे प्रशस्तरत्नकिङ्किणीकलापमध्यमञ्जुले ।

करीन्द्रशुण्डदण्डकावराहसौभगोरुके कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥ ९॥

अनेकमन्त्रनादमञ्जुनूपुरारवस्खल त्समाजराजहंसवंशनिक्वणातिगौरवे ।

विलोलहेमवल्लरीविडम्बचारुचङ्क्रमे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥१०॥

अनन्तकोटिविष्णुलोकनम्रपद्मजार्चिते हिमाद्रिजापुलोमजाविरिञ्चजावरप्रदे ।

अपारसिद्धिऋद्धिदिग्धसम्पदङ्गुलीनखे कदा करिष्यसीह मां कृपाकटाक्षभाजनम् ॥११॥

मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि त्रिवेदभारतीश्वरि प्रमाणशासनेश्वरि ।

रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोदकाननेश्वरि व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तु ते ॥ १२॥

अमुं ममाद्भुतं स्तवं निशम्य भानुनन्दनी करोतु सन्ततं जनं कृपाकटाक्षभाजनम् ।

भवेत्तदैव सञ्चितत्रिरूपकर्मनाशनं भवेत्तदा व्रजेन्द्रसूनुमण्डलप्रवेशनम् ॥ १३॥

Ramaswamy Sastry and Vighnesh Ghanapaathi

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