कृष्ण चन्द्र अष्टक स्तोत्र

महानीलमेघातिभव्यं सुहासं शिवब्रह्मदेवादिभिः संस्तुतं च ।
रमामन्दिरं देवनन्दापदाहं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ १॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जिनका शरीर महान नीले मेघ के समान अति भव्य है, जिनकी मुस्कान बहुत सुंदर है, जिनकी स्तुति शिव, ब्रह्मा और अन्य देवता करते हैं, जो रमा (लक्ष्मी) के निवास स्थान हैं और जो देवताओं तथा नन्द बाबा के संकटों को हरने वाले हैं।

इस प्रथम श्लोक में भगवान कृष्ण के भव्य और दिव्य स्वरुप का वर्णन है। उनकी तुलना ‘महानीलमेघ’ से की गई है, जो उनके श्याम वर्ण की सुंदरता, शीतलता और कृपा बरसाने वाले स्वभाव का प्रतीक है। उनकी ‘सुहास’ अर्थात् मनमोहक मुस्कान भक्तों के सारे दुखों को हर लेती है। वे केवल मनुष्यों के ही प्रिय नहीं, अपितु ‘शिवब्रह्मदेवादिभिः संस्तुतं’ हैं, अर्थात् त्रिदेव सहित समस्त देवता भी उनकी स्तुति करते हैं, जो उनके परब्रह्म स्वरुप को दर्शाता है। उन्हें ‘रमामन्दिरं’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे स्वयं लक्ष्मी के आश्रय हैं, ऐश्वर्य और सौभाग्य उन्हीं में निवास करते हैं। साथ ही, वे ‘देवनन्दापदाहं’ हैं - उन्होंने देवताओं को कंस जैसे असुरों से और अपने पालक पिता नन्द को विभिन्न आसुरी संकटों से बचाया। यह श्लोक उनके ऐश्वर्य और माधुर्य, दोनों रूपों का सुंदर चित्रण करता है।

रसं वेदवेदान्तवेद्यं दुरापं सुगम्यं तदीयादिभिर्दानवघ्नम् ।
लसत्कुण्डलं सोमवंशप्रदीपं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ २॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जो रस-स्वरूप हैं, जिन्हें वेद और वेदान्त के द्वारा ही जाना जा सकता है और जो (ज्ञानियों के लिए) अत्यंत दुर्लभ हैं, परन्तु अपने भक्तों के लिए वे सहज ही सुलभ हैं। वे दानवों का नाश करने वाले हैं, जिनके कानों में कुण्डल चमक रहे हैं और जो सोमवंश (चंद्रवंश) के दीपक हैं।

इस श्लोक में भगवान कृष्ण के तात्विक और भक्त-सुलभ स्वरुप का विरोधाभास प्रस्तुत किया गया है। वे ‘रस’ स्वरुप हैं, यानी आनंद और प्रेम की साक्षात मूर्ति हैं। ज्ञान मार्ग से उन्हें जानना अत्यंत कठिन है (‘वेदवेदान्तवेद्यं दुरापं’), क्योंकि वे तर्क और बुद्धि से परे हैं। परन्तु जो उनके अपने हैं, जो भक्त हैं (‘तदीयादिभिः’), उनके लिए वे ‘सुगम्यम्’ अर्थात् अत्यंत सुलभ हैं। यह भक्ति मार्ग की श्रेष्ठता को दर्शाता है। वे एक ओर तो ‘दानवघ्नम्’ हैं, दुष्टों का संहार कर धर्म की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर ‘लसत्कुण्डलं’ जैसे अलंकारों से सुशोभित उनका माधुर्य रूप भक्तों को आकर्षित करता है। उन्हें ‘सोमवंशप्रदीपं’ कहकर उनके यदुकुल में अवतार लेने की लीला का स्मरण किया गया है।

यशोदादिसंलालितं पूर्णकामं दृशोरञ्जनं प्राकृतस्थस्वरूपम् ।
दिनान्ते समायान्तमेकान्तभक्तैर्भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ३॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जो यशोदा आदि के द्वारा स्नेहपूर्वक पाले गए हैं, जो स्वयं में ‘पूर्णकाम’ (जिनकी कोई इच्छा अधूरी नहीं) हैं, जो नेत्रों को आनंद देने वाले हैं, जिनका स्वरुप लौकिक-सा प्रतीत होता है, और जो दिन के अंत में (वन से लौटते हुए) अपने अनन्य भक्तों से मिलते हैं।

यह श्लोक भगवान के ‘वात्सल्य’ और ‘माधुर्य’ भाव को प्रकट करता है। वे ‘पूर्णकाम’ परब्रह्म हैं, जिन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, फिर भी वे ‘यशोदादिसंलालितं’ अर्थात् यशोदा मैया और गोपियों का स्नेह स्वीकार करते हैं, यह उनकी लीला का माधुर्य है। उनका रूप ‘दृशोरञ्जनं’ है, आँखों को परम सुख देने वाला है। उनका स्वरुप ‘प्राकृतस्थ’ अर्थात् साधारण मनुष्य जैसा दिखता है ताकि भक्त बिना किसी भय या संकोच के उनसे प्रेम कर सकें। श्लोक का सबसे सुंदर भाव ‘दिनान्ते समायान्तम्’ में है। यह उस दृश्य का वर्णन है जब श्रीकृष्ण दिन भर गाय चराकर शाम को घर लौटते हैं और ब्रजवासी, विशेषकर गोपियाँ, उनके दर्शन के लिए आतुर रहती हैं। यह नित्य प्रति होने वाला प्रेम का उत्सव है।

कृपादृष्टिसम्पातसिक्तस्वकुञ्जं तदन्तःस्थितस्वीयसम्यग्दशादम् ।
पुनस्तत्र तैः सत्कृतैकान्तलीलं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्दम् ॥ ४॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जो अपनी कृपादृष्टि की वर्षा से अपने कुञ्जों को सींचते हैं, और उन कुञ्जों में स्थित अपने प्रियजनों (गोपियों) को अपनी उत्तम भक्ति-दशा प्रदान करते हैं। फिर वे वहाँ उन्हीं भक्तों द्वारा सम्मानित होकर एकांत लीलाओं का आनंद लेते हैं।

यह श्लोक वृन्दावन की रासलीला और अन्य गोपनीय लीलाओं की ओर संकेत करता है। ‘कुञ्ज’ वृन्दावन के वे पवित्र स्थान हैं जहाँ राधा-कृष्ण अपनी अंतरंग लीलाएं करते हैं। कृष्ण अपनी कृपा दृष्टि से इन कुञ्जों को और वहाँ उपस्थित अपनी सखियों को सिंचित करते हैं, अर्थात् उन्हें प्रेम और आनंद से भर देते हैं। वे अपने भक्तों को ‘सम्यग्दशा’ अर्थात् भक्ति की सर्वोच्च अवस्था प्रदान करते हैं। इसके बाद, भक्त उन्हें अपनी सेवाओं से प्रसन्न करते हैं (‘सत्कृतैः’) और कृष्ण उनके साथ ‘एकान्तलीलं’ अर्थात् गोपनीय प्रेम-क्रीड़ा करते हैं। यह भक्ति की वह उन्नत अवस्था है जहाँ भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती।

गृहे गोपिकाभिर्धृते चौर्यकाले तदक्ष्णोश्च निक्षिप्य दुग्धं चलन्तम् ।
तदा तद्वियोगादिसम्पत्तिकारं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ५॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जो गोपियों के घर में माखन चोरी करते समय पकड़े जाने पर, उनकी आँखों में दूध फेंककर भाग जाते हैं, और इस प्रकार (भागकर) उन्हें वियोग आदि की (प्रेम रूपी) सम्पत्ति प्रदान करते हैं।

यह श्लोक भगवान कृष्ण की प्रसिद्ध ‘माखन-चोरी’ लीला का वर्णन करता है। यह केवल एक बाल-क्रीड़ा नहीं है, इसमें गहरा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। जब गोपियाँ उन्हें पकड़ लेती हैं, तो वे उनकी आँखों में दूध डालकर भाग जाते हैं। यहाँ ‘तद्वियोगादिसम्पत्तिकारं’ पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है। भागकर वे गोपियों को ‘वियोग’ देते हैं, और भक्ति के क्षेत्र में विरह या वियोग को प्रेम की सर्वोच्च संपत्ति माना गया है। विरह में भक्त का प्रेम और तीव्र हो जाता है, उसकी आतुरता बढ़ जाती है। इस प्रकार, कृष्ण लीला के माध्यम से गोपियों को प्रेम की उच्चतम अवस्था का अनुभव कराते हैं।

चलत्कौस्तुभव्याप्तवक्षःप्रदेशं महावैजयन्तीलसत्पादयुग्मम् ।
सुकस्तूरिकादीप्तभालप्रदेशं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ६॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जिनका वक्षःस्थल चलायमान कौस्तुभ मणि से व्याप्त है, जिनके चरणकमल लंबी वैजयन्ती माला से सुशोभित हैं, और जिनका मस्तक उत्तम कस्तूरी के तिलक से देदीप्यमान है।

इस श्लोक में भगवान कृष्ण के श्रृंगार और उनके दिव्य आभूषणों का वर्णन करके उनके रूप-माधुर्य पर ध्यान केंद्रित किया गया है। उनके वक्ष पर ‘कौस्तुभ मणि’ है, जो भगवान विष्णु का चिह्न है और जो जीव का प्रतीक माना जाता है। उनके गले में घुटनों तक लंबी ‘वैजयन्ती माला’ है, जो पंचतत्वों का प्रतीक है। उनके मस्तक पर ‘कस्तूरी का तिलक’ है, जो अत्यंत सुगंधित और आकर्षक होता है। यह वर्णन भक्त को भगवान के सुंदर और मनमोहक रूप का ध्यान करने में सहायता करता है, जिससे मन सहज ही उनकी ओर आकर्षित हो जाता है।

गवां दोहने दृष्टराधामुखाब्जं तदानीं च तन्मेलनव्यग्रचित्तम् ।
समुत्पन्नतन्मानसैकान्तभावं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ७॥

मैं उन राधिका के प्रिय कृष्णचन्द्र का भजन करता हूँ, जो गायों को दुहते समय श्री राधा के मुखकमल को देखकर, उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो जाते हैं, और जिनके मन में राधा के प्रति अनन्य प्रेम भाव उत्पन्न हो जाता है।

यह श्लोक इस अष्टक के सार, ‘राधिकावल्लभं’ भाव को उजागर करता है। यहाँ दिखाया गया है कि सर्वशक्तिमान भगवान भी अपनी प्रियतमा श्री राधा के प्रेम में किस प्रकार बंधे हैं। वे गाय दुहने जैसा साधारण कार्य कर रहे हैं, पर जैसे ही उनकी दृष्टि राधा जी के मुख पर पड़ती है, उनका चित्त उनसे मिलने के लिए ‘व्यग्र’ हो उठता है। श्री राधा का भाव और प्रेम उनके मन पर इस तरह छा जाता है कि वे बाकी सब कुछ भूल जाते हैं। यह भगवान और उनकी ह्लादिनी शक्ति के अभेद संबंध का अनुपम चित्रण है।

अदः कृष्णचन्द्राष्टकं प्रेमयुक्तः पठेत्कृष्णसान्निध्यमाप्नोति नित्यम् ।
कलौ यः स संसारदुःखातिरिक्तं प्रयात्येव विष्णोः पदं निर्भयं तत् ॥ ८॥

जो भी व्यक्ति इस कृष्णचन्द्राष्टक का प्रेमपूर्वक नित्य पाठ करता है, वह भगवान कृष्ण का सान्निध्य (निकटता) प्राप्त करता है। कलियुग में वह संसार के दुःखों से पार होकर, भगवान विष्णु के उस निर्भय पद (वैकुंठ या गोलोक) को निश्चित रूप से प्राप्त करता है।

यह अंतिम श्लोक ‘फलश्रुति’ है, जिसमें इस स्तोत्र के पाठ का फल बताया गया है। इसमें कहा गया है कि पाठ केवल यंत्रवत नहीं, बल्कि ‘प्रेमयुक्तः’ अर्थात् प्रेम और भक्ति के साथ करना चाहिए। ऐसा करने का फल है ‘कृष्णसान्निध्यम्’ - भगवान कृष्ण की निकटता पाना, जो भक्त का परम लक्ष्य है। विशेष रूप से ‘कलौ’ अर्थात् कलियुग में, जहाँ अन्य साधन कठिन हैं, यह पाठ संसार के दुखों से मुक्ति दिलाता है। अंततः, भक्त ‘विष्णोः पदं निर्भयं’ अर्थात् भगवान के उस धाम को प्राप्त करता है, जहाँ कोई भय, शोक या दुःख नहीं है, और वह सदा के लिए आनंद में लीन हो जाता है।

 

महानीलमेघातिभव्यं सुहासं शिवब्रह्मदेवादिभिः संस्तुतं च ।
रमामन्दिरं देवनन्दापदाहं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ १॥

रसं वेदवेदान्तवेद्यं दुरापं सुगम्यं तदीयादिभिर्दानवघ्नम् ।
लसत्कुण्डलं सोमवंशप्रदीपं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ २॥

यशोदादिसंलालितं पूर्णकामं दृशोरञ्जनं प्राकृतस्थस्वरूपम् ।
दिनान्ते समायान्तमेकान्तभक्तैर्भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ३॥

कृपादृष्टिसम्पातसिक्तस्वकुञ्जं तदन्तःस्थितस्वीयसम्यग्दशादम् ।
पुनस्तत्र तैः सत्कृतैकान्तलीलं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्दम् ॥ ४॥

गृहे गोपिकाभिर्धृते चौर्यकाले तदक्ष्णोश्च निक्षिप्य दुग्धं चलन्तम् ।
तदा तद्वियोगादिसम्पत्तिकारं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ५॥

चलत्कौस्तुभव्याप्तवक्षःप्रदेशं महावैजयन्तीलसत्पादयुग्मम् ।
सुकस्तूरिकादीप्तभालप्रदेशं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ६॥

गवां दोहने दृष्टराधामुखाब्जं तदानीं च तन्मेलनव्यग्रचित्तम् ।
समुत्पन्नतन्मानसैकान्तभावं भजे राधिकावल्लभं कृष्णचन्द्रम् ॥ ७॥

अदः कृष्णचन्द्राष्टकं प्रेमयुक्तः पठेत्कृष्णसान्निध्यमाप्नोति नित्यम् ।
कलौ यः स संसारदुःखातिरिक्तं प्रयात्येव विष्णोः पदं निर्भयं तत् ॥ ८॥

 

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